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बंगाल SIR पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, EC से मांगा ट्रिब्यूनल का पूरा डेटा
भारत
34 लाख अपीलों के निपटारे पर उठे सवाल, कोर्ट ने पूछा- कितने मामले सुने और कितने अब भी बाकी
पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट में हुए Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को सुनवाई के दौरान अपीलों के निपटारे की रफ्तार पर सवाल उठे। कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा है कि वह SIR से जुड़े अपीलीय ट्रिब्यूनलों की पूरी स्थिति बताए। कितनी अपीलें दाखिल हुईं, कितनों पर फैसला आया और कितने मामले अभी लंबित हैं, इसका विस्तृत आंकड़ा मांगा गया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुआई वाली बेंच के सामने सुनवाई के दौरान ट्रिब्यूनलों की संख्या, उनके काम करने के घंटे और मामलों के निपटारे की गति पर भी जानकारी मांगी गई। मामला कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी की याचिका से जुड़ा है, जिसमें SIR के दौरान वोटर लिस्ट से बाहर हुए लोगों की अपीलों पर जल्द सुनवाई की मांग की गई है। ताजा सुनवाई ऐसे वक्त हुई है जब करीब 34 लाख अपीलों का आंकड़ा पहले से अदालत के सामने है। अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट के आदेश में भी कहा गया था कि 34 लाख से ज्यादा अपीलें ट्रिब्यूनलों के सामने दाखिल हो चुकी थीं। इनमें सिर्फ नाम हटाए जाने के खिलाफ मामले ही नहीं, बल्कि संशोधित वोटर लिस्ट में किसी व्यक्ति का नाम शामिल किए जाने पर आपत्ति वाली अपीलें भी थीं।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि अपीलीय ट्रिब्यूनलों में मामलों की सुनवाई की गति बहुत धीमी है। दावा किया गया कि बड़ी संख्या में लोग अपनी अपील के फैसले का इंतजार कर रहे हैं। इसी दौरान कोर्ट ने पूछा कि अब तक कितने मामलों का निपटारा किया जा चुका है। चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ वकील दामा शेषाद्रि नायडू ने कहा कि इस संबंध में आंकड़े जुटाकर अदालत के सामने रखे जाएंगे। बेंच ने यह भी साफ किया कि वह ट्रिब्यूनलों की पूरी व्यवस्था को देखना चाहती है, जिसमें कितने ट्रिब्यूनल काम कर रहे हैं, वे रोज कितने घंटे बैठते हैं और एक दिन में औसतन कितने मामलों का निपटारा हो रहा है। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस की ओर से देरी पर टिप्पणी भी सामने आई। अदालत ने कहा कि अगर इसी रफ्तार से मामले चलते रहे तो अगला चुनाव भी आ जाएगा। हालांकि अदालत ने ट्रिब्यूनलों के लिए कोई तय समय सीमा निर्धारित करने से फिलहाल परहेज किया। जुलाई में भी सुप्रीम कोर्ट ने करीब 34 लाख लंबित अपीलों को लेकर चुनाव आयोग, पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी और राज्य सरकार से जवाब मांगा था। उस सुनवाई में याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया था कि करीब 38 हजार अपीलों पर ही सुनवाई हो सकी है।
SIR के दौरान पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव हुआ था। प्रक्रिया शुरू होने के समय राज्य में करीब 7.66 करोड़ मतदाता थे। दिसंबर 2025 में जारी ड्राफ्ट सूची में यह संख्या घटकर करीब 7.08 करोड़ रह गई थी। ड्राफ्ट स्तर पर 58.20 लाख नाम हटाए गए थे। बाद की प्रक्रिया में यह आंकड़ा और बदला। चुनाव आयोग से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक अंतिम सूची तैयार होने तक कुल 63.66 लाख नाम हटाए गए थे, जबकि करीब 60 लाख नामों को अलग से समीक्षा के लिए चिह्नित किया गया था। ड्राफ्ट सूची में हटाए गए 58.20 लाख नामों में अलग-अलग कारण शामिल थे। इनमें मृत मतदाता, दूसरी जगह चले गए या संपर्क में नहीं मिले लोग, डुप्लीकेट प्रविष्टियां और दूसरी श्रेणियां थीं।
SIR को लेकर विवाद सिर्फ वोटर लिस्ट से नाम हटाने तक सीमित नहीं रहा। नामों को लेकर आपत्ति और अपील की प्रक्रिया भी लगातार अदालत की निगरानी में रही है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही कहा था कि अपीलीय ट्रिब्यूनल को संबंधित रिकॉर्ड और पहले की जांच में दिए गए कारणों को देखना होगा। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का मौका देने पर भी जोर दिया गया था। अदालत के अप्रैल के आदेश में कहा गया था कि अगर किसी अपील को मंजूर करते हुए नाम जोड़ने या हटाने का अंतिम निर्देश दिया जाता है तो उसे लागू किया जाना चाहिए। इस पूरी प्रक्रिया के लिए न्यायिक अधिकारियों की तैनाती भी की गई थी। मार्च में सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश जानकारी के मुताबिक पश्चिम बंगाल में 500 से ज्यादा न्यायिक अधिकारियों को SIR से जुड़े काम में लगाया गया था और ओडिशा तथा झारखंड से भी करीब 200 अधिकारियों की मदद ली गई थी। उस समय 10 लाख से ज्यादा आपत्तियों के निपटारे की जानकारी अदालत को दी गई थी।
अब अदालत का जोर अपीलीय स्तर पर लंबित मामलों की वास्तविक स्थिति जानने पर है। ट्रिब्यूनलों के पास पड़े मामलों का आंकड़ा काफी बड़ा है और इसी वजह से उनकी कार्यक्षमता पर सवाल उठ रहे हैं। अदालत यह देखना चाहती है कि उपलब्ध व्यवस्था के हिसाब से रोज कितने मामलों की सुनवाई संभव है और लंबित मामलों को निपटाने में मौजूदा ढांचा कितना सक्षम है। चुनाव आयोग की ओर से डेटा पेश किए जाने के बाद ट्रिब्यूनलों की संख्या और कामकाज को लेकर तस्वीर और साफ हो सकती है। जुलाई की सुनवाई में भी सुप्रीम कोर्ट के सामने यह मुद्दा आया था कि बड़ी संख्या में अपीलें लंबित हैं और उनकी सुनवाई की गति को लेकर शिकायतें हैं। उस समय याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया था कि जिन मामलों की सुनवाई हुई, उनमें बड़ी संख्या में अपीलें स्वीकार की गईं।
SIR की पूरी प्रक्रिया में एक तरफ चुनाव आयोग ने मतदाता सूची को अपडेट और सत्यापित करने की कवायद की, वहीं दूसरी तरफ बड़ी संख्या में नामों के हटने के बाद अपीलों का रास्ता खुला। इसी अपीलीय व्यवस्था को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट में लगातार सुनवाई हो रही है। मंगलवार की कार्यवाही में कोर्ट ने चुनाव आयोग से सिर्फ लंबित मामलों का आंकड़ा ही नहीं, बल्कि ट्रिब्यूनलों की काम करने की क्षमता से जुड़ी जानकारी भी मांगी है। कितने ट्रिब्यूनल सक्रिय हैं, कितने घंटे सुनवाई होती है और अब तक कितने मामलों में आदेश दिए गए हैं, इन सवालों के जवाब चुनाव आयोग को देने होंगे। इसी के साथ करीब 34 लाख अपीलों के निपटारे की रफ्तार भी अदालत के सामने प्रमुख मुद्दा बनी हुई है।
बंगाल SIR पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, EC से मांगा ट्रिब्यूनल का पूरा डेटा
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पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट में हुए Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को सुनवाई के दौरान अपीलों के निपटारे की रफ्तार पर सवाल उठे। कोर्ट ने चुनाव आयोग से कहा है कि वह SIR से जुड़े अपीलीय ट्रिब्यूनलों की पूरी स्थिति बताए। कितनी अपीलें दाखिल हुईं, कितनों पर फैसला आया और कितने मामले अभी लंबित हैं, इसका विस्तृत आंकड़ा मांगा गया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुआई वाली बेंच के सामने सुनवाई के दौरान ट्रिब्यूनलों की संख्या, उनके काम करने के घंटे और मामलों के निपटारे की गति पर भी जानकारी मांगी गई। मामला कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी की याचिका से जुड़ा है, जिसमें SIR के दौरान वोटर लिस्ट से बाहर हुए लोगों की अपीलों पर जल्द सुनवाई की मांग की गई है। ताजा सुनवाई ऐसे वक्त हुई है जब करीब 34 लाख अपीलों का आंकड़ा पहले से अदालत के सामने है। अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट के आदेश में भी कहा गया था कि 34 लाख से ज्यादा अपीलें ट्रिब्यूनलों के सामने दाखिल हो चुकी थीं। इनमें सिर्फ नाम हटाए जाने के खिलाफ मामले ही नहीं, बल्कि संशोधित वोटर लिस्ट में किसी व्यक्ति का नाम शामिल किए जाने पर आपत्ति वाली अपीलें भी थीं।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि अपीलीय ट्रिब्यूनलों में मामलों की सुनवाई की गति बहुत धीमी है। दावा किया गया कि बड़ी संख्या में लोग अपनी अपील के फैसले का इंतजार कर रहे हैं। इसी दौरान कोर्ट ने पूछा कि अब तक कितने मामलों का निपटारा किया जा चुका है। चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ वकील दामा शेषाद्रि नायडू ने कहा कि इस संबंध में आंकड़े जुटाकर अदालत के सामने रखे जाएंगे। बेंच ने यह भी साफ किया कि वह ट्रिब्यूनलों की पूरी व्यवस्था को देखना चाहती है, जिसमें कितने ट्रिब्यूनल काम कर रहे हैं, वे रोज कितने घंटे बैठते हैं और एक दिन में औसतन कितने मामलों का निपटारा हो रहा है। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस की ओर से देरी पर टिप्पणी भी सामने आई। अदालत ने कहा कि अगर इसी रफ्तार से मामले चलते रहे तो अगला चुनाव भी आ जाएगा। हालांकि अदालत ने ट्रिब्यूनलों के लिए कोई तय समय सीमा निर्धारित करने से फिलहाल परहेज किया। जुलाई में भी सुप्रीम कोर्ट ने करीब 34 लाख लंबित अपीलों को लेकर चुनाव आयोग, पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी और राज्य सरकार से जवाब मांगा था। उस सुनवाई में याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया था कि करीब 38 हजार अपीलों पर ही सुनवाई हो सकी है।
SIR के दौरान पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव हुआ था। प्रक्रिया शुरू होने के समय राज्य में करीब 7.66 करोड़ मतदाता थे। दिसंबर 2025 में जारी ड्राफ्ट सूची में यह संख्या घटकर करीब 7.08 करोड़ रह गई थी। ड्राफ्ट स्तर पर 58.20 लाख नाम हटाए गए थे। बाद की प्रक्रिया में यह आंकड़ा और बदला। चुनाव आयोग से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक अंतिम सूची तैयार होने तक कुल 63.66 लाख नाम हटाए गए थे, जबकि करीब 60 लाख नामों को अलग से समीक्षा के लिए चिह्नित किया गया था। ड्राफ्ट सूची में हटाए गए 58.20 लाख नामों में अलग-अलग कारण शामिल थे। इनमें मृत मतदाता, दूसरी जगह चले गए या संपर्क में नहीं मिले लोग, डुप्लीकेट प्रविष्टियां और दूसरी श्रेणियां थीं।
SIR को लेकर विवाद सिर्फ वोटर लिस्ट से नाम हटाने तक सीमित नहीं रहा। नामों को लेकर आपत्ति और अपील की प्रक्रिया भी लगातार अदालत की निगरानी में रही है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही कहा था कि अपीलीय ट्रिब्यूनल को संबंधित रिकॉर्ड और पहले की जांच में दिए गए कारणों को देखना होगा। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का मौका देने पर भी जोर दिया गया था। अदालत के अप्रैल के आदेश में कहा गया था कि अगर किसी अपील को मंजूर करते हुए नाम जोड़ने या हटाने का अंतिम निर्देश दिया जाता है तो उसे लागू किया जाना चाहिए। इस पूरी प्रक्रिया के लिए न्यायिक अधिकारियों की तैनाती भी की गई थी। मार्च में सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश जानकारी के मुताबिक पश्चिम बंगाल में 500 से ज्यादा न्यायिक अधिकारियों को SIR से जुड़े काम में लगाया गया था और ओडिशा तथा झारखंड से भी करीब 200 अधिकारियों की मदद ली गई थी। उस समय 10 लाख से ज्यादा आपत्तियों के निपटारे की जानकारी अदालत को दी गई थी।
अब अदालत का जोर अपीलीय स्तर पर लंबित मामलों की वास्तविक स्थिति जानने पर है। ट्रिब्यूनलों के पास पड़े मामलों का आंकड़ा काफी बड़ा है और इसी वजह से उनकी कार्यक्षमता पर सवाल उठ रहे हैं। अदालत यह देखना चाहती है कि उपलब्ध व्यवस्था के हिसाब से रोज कितने मामलों की सुनवाई संभव है और लंबित मामलों को निपटाने में मौजूदा ढांचा कितना सक्षम है। चुनाव आयोग की ओर से डेटा पेश किए जाने के बाद ट्रिब्यूनलों की संख्या और कामकाज को लेकर तस्वीर और साफ हो सकती है। जुलाई की सुनवाई में भी सुप्रीम कोर्ट के सामने यह मुद्दा आया था कि बड़ी संख्या में अपीलें लंबित हैं और उनकी सुनवाई की गति को लेकर शिकायतें हैं। उस समय याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया था कि जिन मामलों की सुनवाई हुई, उनमें बड़ी संख्या में अपीलें स्वीकार की गईं।
SIR की पूरी प्रक्रिया में एक तरफ चुनाव आयोग ने मतदाता सूची को अपडेट और सत्यापित करने की कवायद की, वहीं दूसरी तरफ बड़ी संख्या में नामों के हटने के बाद अपीलों का रास्ता खुला। इसी अपीलीय व्यवस्था को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट में लगातार सुनवाई हो रही है। मंगलवार की कार्यवाही में कोर्ट ने चुनाव आयोग से सिर्फ लंबित मामलों का आंकड़ा ही नहीं, बल्कि ट्रिब्यूनलों की काम करने की क्षमता से जुड़ी जानकारी भी मांगी है। कितने ट्रिब्यूनल सक्रिय हैं, कितने घंटे सुनवाई होती है और अब तक कितने मामलों में आदेश दिए गए हैं, इन सवालों के जवाब चुनाव आयोग को देने होंगे। इसी के साथ करीब 34 लाख अपीलों के निपटारे की रफ्तार भी अदालत के सामने प्रमुख मुद्दा बनी हुई है।
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