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लापता व्यक्ति की शिकायत पर तुरंत FIR जरूरी, सुप्रीम कोर्ट का निर्देश
भारत
उम्र और लिंग के आधार पर फर्क नहीं होगा, कोर्ट ने राज्यों को पुराने आदेश का सही मतलब समझाया
लापता होने वाले किसी भी व्यक्ति की शिकायत मिलने पर पुलिस को अब FIR दर्ज करने में देरी नहीं करनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को साफ शब्दों में कहा है कि लापता व्यक्ति बच्चा हो, महिला हो या वयस्क पुरुष, हर मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल कार्रवाई की जाए। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि कुछ राज्यों ने अदालत के पहले के निर्देश को सिर्फ बच्चों के मामलों तक सीमित समझ लिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि आदेश में इस्तेमाल किया गया ‘व्यक्ति’ शब्द किसी एक उम्र या वर्ग तक सीमित नहीं है। यानी गुमशुदगी की सूचना मिलते ही पुलिस की जिम्मेदारी शुरू हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी लापता बच्चों और मानव तस्करी के मामलों में पुलिस की कार्रवाई को लेकर सख्त रुख अपना चुका है। मई में अदालत ने देशभर में लापता लोगों के मामलों में तुरंत FIR दर्ज करने का निर्देश दिया था और संबंधित पुलिस अधिकारियों को जांच में देरी से बचने के लिए स्पष्ट प्रक्रिया अपनाने को कहा था। उस दौरान अदालत के सामने देश में करीब 47 हजार बच्चे अब भी लापता होने की जानकारी रखी गई थी।
मामले की सुनवाई के दौरान बेंच ने इस बात को गंभीर माना कि राज्यों की तरफ से अदालत के निर्देश की अलग-अलग व्याख्या की जा रही है। कोर्ट का कहना था कि अगर किसी व्यक्ति के अचानक गायब होने की शिकायत परिवार या संबंधित व्यक्ति की ओर से आती है तो पुलिस सिर्फ यह देखकर इंतजार नहीं कर सकती कि वह नाबालिग है या बालिग। इसी तरह महिला और पुरुष के आधार पर भी FIR दर्ज करने की प्रक्रिया अलग नहीं हो सकती। अदालत ने पहले के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि उसमें ‘person’ का अर्थ व्यापक है और इसे केवल बच्चों तक सीमित करना सही नहीं होगा। पीठ ने राज्यों की ऐसी दलील को लेकर कड़ी टिप्पणी की और कहा कि आदेश की ऐसी व्याख्या करना गंभीर बात है। सुप्रीम कोर्ट की चिंता केवल FIR दर्ज करने तक नहीं है। अदालत चाहती है कि लापता लोगों की तलाश के लिए पुलिस व्यवस्था ज्यादा सक्रिय हो और शुरुआती घंटों में जांच शुरू हो, क्योंकि कई मामलों में समय बीतने के साथ सुराग जुटाना मुश्किल हो जाता है। मानव तस्करी से जुड़े मामलों में यह चिंता और ज्यादा बढ़ जाती है।
सुप्रीम कोर्ट की यह सख्ती ऐसे समय में सामने आई है जब देशभर में लापता बच्चों और लोगों की तलाश से जुड़े मामलों में राज्यों की पुलिस व्यवस्था पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। अदालत ने मई में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस प्रमुखों को एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट्स को पूरी तरह सक्रिय करने के लिए भी निर्देश दिए थे। इसके लिए चार सप्ताह का समय दिया गया था। कोर्ट ने माना था कि लापता बच्चों के कई मामले संगठित अंतरराज्यीय मानव तस्करी से जुड़े हो सकते हैं। ऐसे मामलों में केवल गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कर जांच को सामान्य प्रक्रिया की तरह चलाना पर्याप्त नहीं है। पुलिस को यह भी देखना होगा कि व्यक्ति के गायब होने के पीछे अपहरण, तस्करी या किसी दूसरे अपराध की संभावना तो नहीं है। अदालत ने गृह मंत्रालय को देश के सभी पुलिस थानों को जोड़ने वाले एक राष्ट्रीय स्तर के सिस्टम पर भी काम करने को कहा था। इसमें मानव तस्करी, लापता बच्चों और महिलाओं से संबंधित जानकारी साझा करने के लिए विशेष पोर्टल की व्यवस्था की बात कही गई थी।
इस मामले की सुनवाई का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट लापता लोगों की तलाश को केवल कागजी कार्रवाई का विषय नहीं मान रहा। अदालत पहले भी राज्यों से ऐसे मामलों का डेटा मांग चुकी है और यह जानने की कोशिश करती रही है कि कितने लोग लापता हुए, कितनों को तलाश लिया गया और कितने अभी तक नहीं मिले हैं। फरवरी में अदालत के सामने रखी गई जानकारी में कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से लापता बच्चों के आंकड़े लंबित पाए गए थे। कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक कुछ राज्यों ने निर्धारित समय तक बच्चों के लापता होने और उनसे जुड़े अभियोजन का पूरा डेटा उपलब्ध नहीं कराया था। इस तरह की स्थिति को देखते हुए अदालत ने राज्यों से आंकड़े समय पर उपलब्ध कराने और मामलों की निगरानी मजबूत करने पर जोर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट जिस मामले पर सुनवाई कर रहा है, उसमें एक बच्ची के लंबे समय से लापता रहने का मामला भी सामने आया था। इसी तरह के मामलों से जुड़े अनुभवों के आधार पर अदालत ने पहले कहा था कि लापता बच्चों की तलाश के लिए देशभर में एक समान Standard Operating Procedure यानी SOP की जरूरत है। जनवरी में बेंच ने इस बात पर चिंता जताई थी कि 2011 से लापता एक बच्ची के मामले में इतने साल बीत जाने के बावजूद उसे तलाशा नहीं जा सका। कोर्ट ने कहा था कि ऐसे मामलों को सामान्य तरीके से नहीं देखा जा सकता और राज्यों को व्यावहारिक रणनीति के साथ काम करना होगा। अदालत की टिप्पणियों में यह भी सामने आया कि लापता बच्चों के मामलों में शुरुआती कार्रवाई और अलग-अलग एजेंसियों के बीच तालमेल काफी अहम है।
पुलिस के लिए इस निर्देश का सीधा मतलब यह है कि किसी व्यक्ति के लापता होने की सूचना मिलने के बाद शिकायत को टालने या पहले से लंबी पूछताछ के नाम पर FIR रोकने की गुंजाइश कम होगी। शिकायत के आधार पर शुरुआती जांच और जरूरी कानूनी कार्रवाई तुरंत शुरू करनी होगी। अगर बाद की जांच में अपहरण या किसी दूसरे अपराध के संकेत मिलते हैं तो उसी दिशा में कार्रवाई आगे बढ़ेगी। सुप्रीम कोर्ट ने मानव तस्करी के मामलों में भी राज्यों की एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट्स को सक्रिय और सक्षम बनाने पर जोर दिया है। अदालत की निगरानी में पुलिस थानों, बाल संरक्षण संस्थाओं और दूसरी संबंधित एजेंसियों के बीच सूचना साझा करने की व्यवस्था मजबूत करने की प्रक्रिया भी चल रही है।
लापता व्यक्ति की शिकायत पर तुरंत FIR जरूरी, सुप्रीम कोर्ट का निर्देश
भारत
लापता होने वाले किसी भी व्यक्ति की शिकायत मिलने पर पुलिस को अब FIR दर्ज करने में देरी नहीं करनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को साफ शब्दों में कहा है कि लापता व्यक्ति बच्चा हो, महिला हो या वयस्क पुरुष, हर मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल कार्रवाई की जाए। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि कुछ राज्यों ने अदालत के पहले के निर्देश को सिर्फ बच्चों के मामलों तक सीमित समझ लिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि आदेश में इस्तेमाल किया गया ‘व्यक्ति’ शब्द किसी एक उम्र या वर्ग तक सीमित नहीं है। यानी गुमशुदगी की सूचना मिलते ही पुलिस की जिम्मेदारी शुरू हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी लापता बच्चों और मानव तस्करी के मामलों में पुलिस की कार्रवाई को लेकर सख्त रुख अपना चुका है। मई में अदालत ने देशभर में लापता लोगों के मामलों में तुरंत FIR दर्ज करने का निर्देश दिया था और संबंधित पुलिस अधिकारियों को जांच में देरी से बचने के लिए स्पष्ट प्रक्रिया अपनाने को कहा था। उस दौरान अदालत के सामने देश में करीब 47 हजार बच्चे अब भी लापता होने की जानकारी रखी गई थी।
मामले की सुनवाई के दौरान बेंच ने इस बात को गंभीर माना कि राज्यों की तरफ से अदालत के निर्देश की अलग-अलग व्याख्या की जा रही है। कोर्ट का कहना था कि अगर किसी व्यक्ति के अचानक गायब होने की शिकायत परिवार या संबंधित व्यक्ति की ओर से आती है तो पुलिस सिर्फ यह देखकर इंतजार नहीं कर सकती कि वह नाबालिग है या बालिग। इसी तरह महिला और पुरुष के आधार पर भी FIR दर्ज करने की प्रक्रिया अलग नहीं हो सकती। अदालत ने पहले के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि उसमें ‘person’ का अर्थ व्यापक है और इसे केवल बच्चों तक सीमित करना सही नहीं होगा। पीठ ने राज्यों की ऐसी दलील को लेकर कड़ी टिप्पणी की और कहा कि आदेश की ऐसी व्याख्या करना गंभीर बात है। सुप्रीम कोर्ट की चिंता केवल FIR दर्ज करने तक नहीं है। अदालत चाहती है कि लापता लोगों की तलाश के लिए पुलिस व्यवस्था ज्यादा सक्रिय हो और शुरुआती घंटों में जांच शुरू हो, क्योंकि कई मामलों में समय बीतने के साथ सुराग जुटाना मुश्किल हो जाता है। मानव तस्करी से जुड़े मामलों में यह चिंता और ज्यादा बढ़ जाती है।
सुप्रीम कोर्ट की यह सख्ती ऐसे समय में सामने आई है जब देशभर में लापता बच्चों और लोगों की तलाश से जुड़े मामलों में राज्यों की पुलिस व्यवस्था पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। अदालत ने मई में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस प्रमुखों को एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट्स को पूरी तरह सक्रिय करने के लिए भी निर्देश दिए थे। इसके लिए चार सप्ताह का समय दिया गया था। कोर्ट ने माना था कि लापता बच्चों के कई मामले संगठित अंतरराज्यीय मानव तस्करी से जुड़े हो सकते हैं। ऐसे मामलों में केवल गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कर जांच को सामान्य प्रक्रिया की तरह चलाना पर्याप्त नहीं है। पुलिस को यह भी देखना होगा कि व्यक्ति के गायब होने के पीछे अपहरण, तस्करी या किसी दूसरे अपराध की संभावना तो नहीं है। अदालत ने गृह मंत्रालय को देश के सभी पुलिस थानों को जोड़ने वाले एक राष्ट्रीय स्तर के सिस्टम पर भी काम करने को कहा था। इसमें मानव तस्करी, लापता बच्चों और महिलाओं से संबंधित जानकारी साझा करने के लिए विशेष पोर्टल की व्यवस्था की बात कही गई थी।
इस मामले की सुनवाई का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट लापता लोगों की तलाश को केवल कागजी कार्रवाई का विषय नहीं मान रहा। अदालत पहले भी राज्यों से ऐसे मामलों का डेटा मांग चुकी है और यह जानने की कोशिश करती रही है कि कितने लोग लापता हुए, कितनों को तलाश लिया गया और कितने अभी तक नहीं मिले हैं। फरवरी में अदालत के सामने रखी गई जानकारी में कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से लापता बच्चों के आंकड़े लंबित पाए गए थे। कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक कुछ राज्यों ने निर्धारित समय तक बच्चों के लापता होने और उनसे जुड़े अभियोजन का पूरा डेटा उपलब्ध नहीं कराया था। इस तरह की स्थिति को देखते हुए अदालत ने राज्यों से आंकड़े समय पर उपलब्ध कराने और मामलों की निगरानी मजबूत करने पर जोर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट जिस मामले पर सुनवाई कर रहा है, उसमें एक बच्ची के लंबे समय से लापता रहने का मामला भी सामने आया था। इसी तरह के मामलों से जुड़े अनुभवों के आधार पर अदालत ने पहले कहा था कि लापता बच्चों की तलाश के लिए देशभर में एक समान Standard Operating Procedure यानी SOP की जरूरत है। जनवरी में बेंच ने इस बात पर चिंता जताई थी कि 2011 से लापता एक बच्ची के मामले में इतने साल बीत जाने के बावजूद उसे तलाशा नहीं जा सका। कोर्ट ने कहा था कि ऐसे मामलों को सामान्य तरीके से नहीं देखा जा सकता और राज्यों को व्यावहारिक रणनीति के साथ काम करना होगा। अदालत की टिप्पणियों में यह भी सामने आया कि लापता बच्चों के मामलों में शुरुआती कार्रवाई और अलग-अलग एजेंसियों के बीच तालमेल काफी अहम है।
पुलिस के लिए इस निर्देश का सीधा मतलब यह है कि किसी व्यक्ति के लापता होने की सूचना मिलने के बाद शिकायत को टालने या पहले से लंबी पूछताछ के नाम पर FIR रोकने की गुंजाइश कम होगी। शिकायत के आधार पर शुरुआती जांच और जरूरी कानूनी कार्रवाई तुरंत शुरू करनी होगी। अगर बाद की जांच में अपहरण या किसी दूसरे अपराध के संकेत मिलते हैं तो उसी दिशा में कार्रवाई आगे बढ़ेगी। सुप्रीम कोर्ट ने मानव तस्करी के मामलों में भी राज्यों की एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट्स को सक्रिय और सक्षम बनाने पर जोर दिया है। अदालत की निगरानी में पुलिस थानों, बाल संरक्षण संस्थाओं और दूसरी संबंधित एजेंसियों के बीच सूचना साझा करने की व्यवस्था मजबूत करने की प्रक्रिया भी चल रही है।
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