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पूर्व गूगल वेंडर कर्मचारी ने धार्मिक भेदभाव का आरोप लगाया, सुप्रीम कोर्ट में लंबित समीक्षा याचिका पर सुनवाई की मांग
डिजिटल डेस्क
ज़ाहिद शौकत का दावा — पीएमओ को दी गई शिकायत (जिसे अल्पसंख्यक आयोग को भेजा गया) बार-बार बंद की गई; अपने मामले पर मीडिया रिपोर्टों पर भी उठाए सवाल
शुक्रवार को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कश्मीरी मुस्लिम तकनीकी पेशेवर ज़ाहिद शौकत ने आरोप लगाया कि गुरुग्राम स्थित गूगल रोल्टा टावर्स में लगभग 18 महीनों तक काम करने के दौरान उन्हें धार्मिक भेदभाव और “बनावटी तरीके से नौकरी समाप्त” किए जाने का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि लगभग 8–9 वर्ष पहले नौकरी से हटाए जाने के बाद से ही वे न्याय पाने के लिए विभिन्न संस्थानों से संपर्क करते रहे हैं।

ज़ाहिद के अनुसार, उन्होंने सबसे पहले गूगल के खिलाफ शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में की थी। पीएमओ ने इस मामले को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को भेज दिया, लेकिन उनका आरोप है कि आयोग ने यह कहते हुए मामला तीन-चार बार बंद कर दिया कि गूगल ने उन्हें पत्र भेजे थे जिनका उन्होंने जवाब नहीं दिया। ज़ाहिद का कहना है कि उन्हें ऐसे कोई पत्र कभी प्राप्त नहीं हुए और न ही मामले की प्रगति के बारे में उन्हें सूचित किया गया, जिसके कारण मामला बार-बार बंद होता रहा।
इन घटनाक्रमों के बाद उन्होंने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इस याचिका में प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, श्रीनगर जिला अदालत के सिटी मुंसिफ और एसएसपी श्रीनगर को प्रतिवादी बनाया गया था। ज़ाहिद ने बताया कि सितंबर 2024 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ के समक्ष वर्चुअल सुनवाई के दौरान उन्होंने स्वयं अपना पक्ष रखने की कोशिश की, लेकिन उन्हें बोलने के लिए बहुत कम समय दिया गया और याचिका खारिज कर दी गई। उनका दावा है कि यह आदेश तथ्यात्मक, कानूनी और संवैधानिक रूप से गलत था, क्योंकि अदालत ने इसे एक रोजगार विवाद मान लिया, जबकि उनके अनुसार मामला सरकारी संस्थाओं द्वारा मौलिक अधिकारों के कथित उल्लंघन से जुड़ा था।
ज़ाहिद ने कहा कि उनकी याचिका नौकरी या सेवा समाप्ति के विवाद से संबंधित नहीं थी, बल्कि पीएमओ और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग सहित सरकारी संस्थाओं द्वारा कथित पक्षपात और भेदभाव से जुड़ी थी। उनका आरोप है कि इन संस्थाओं ने गूगल के साथ मिलीभगत कर उनकी शिकायत को दबाने का काम किया। उन्होंने कहा कि उन्होंने केवल अपनी शिकायत के निपटान से जुड़े दस्तावेज और स्पष्टीकरण मांगे थे, न कि रोजगार से संबंधित राहत।
उन्होंने बताया कि अक्टूबर 2024 में उन्होंने डायरी नंबर 46622/2024 के तहत एक समीक्षा याचिका दायर की थी, जो उनके अनुसार डेढ़ वर्ष से अधिक समय से बिना सुनवाई के लंबित है। आरटीआई आवेदन के माध्यम से उन्होंने याचिका की स्थिति के बारे में जानकारी मांगी, लेकिन उन्हें केवल यह निर्देश दिया गया कि वे मामले की स्थिति ऑनलाइन देखें, जबकि उन्हें कोई ठोस जवाब नहीं मिला।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ज़ाहिद ने कुछ मीडिया संस्थानों — जिनमें इंडिया टुडे, लाइव लॉ और लॉचक्रा शामिल हैं — पर भी उनके मामले को भ्रामक तरीके से प्रकाशित करने का आरोप लगाया। उनके अनुसार इन रिपोर्टों में उन्हें गूगल का पूर्व कर्मचारी बताया गया और मामले को एक निजी रोजगार विवाद के रूप में प्रस्तुत किया गया। ज़ाहिद का कहना है कि वे वास्तव में गूगल के वेंडर (सेरको) के कर्मचारी थे और उनकी याचिका गूगल की आंतरिक रोजगार प्रक्रिया से नहीं बल्कि सरकारी संस्थाओं से संबंधित थी।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इन समाचारों में उनकी पहचान एक कश्मीरी मुस्लिम के रूप में छिपाई गई और रिपोर्टों को ऐसे तरीके से प्रकाशित किया गया जिससे उनकी प्रमुखता कम हो गई और आम लोगों की नजर से मामला ओझल रहा। ज़ाहिद का कहना है कि इससे यह गलत धारणा बनी कि सुप्रीम कोर्ट ने एक निजी रोजगार विवाद में हस्तक्षेप से इनकार किया, जबकि उनके अनुसार यह उनके मामले की प्रकृति को गलत तरीके से प्रस्तुत करता है।
ज़ाहिद ने बताया कि मार्च 2024 में उन्होंने श्रीनगर के लाल बाजार पुलिस स्टेशन में इन मीडिया संस्थानों के खिलाफ भ्रामक जानकारी प्रकाशित करने के आरोप में पुलिस शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन उनका दावा है कि पुलिस ने इस शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की। इसके बाद उन्होंने श्रीनगर में जिला मजिस्ट्रेट की अदालत में एक निजी शिकायत दायर की, जहां उनके अनुसार अदालत द्वारा जारी समन के बावजूद पुलिस बार-बार जवाब देने में विफल रही है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पहले राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई को नोटिस जारी कर 15 दिनों के भीतर आयोग के सामने उपस्थित होने के लिए कहा था, लेकिन उसके बाद उन्हें इस संबंध में कोई और जानकारी नहीं मिली।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ज़ाहिद ने यह भी कहा कि गूगल के वैश्विक प्रभाव के कारण उनके मामले को न तो कानूनी स्तर पर और न ही मीडिया में पर्याप्त ध्यान मिल पाया है। उनका कहना है कि उन्होंने अल जज़ीरा और टीआरटी वर्ल्ड सहित कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों से संपर्क किया, लेकिन उनकी कहानी को जगह नहीं दी गई।
उन्होंने यह भी बताया कि वे यह मामला बिना किसी वकील के खुद लड़ रहे हैं। उनके अनुसार वकील रखने की कोशिशें सफल नहीं रहीं या परिस्थितियां अनुकूल नहीं थीं, इसलिए उन्होंने अदालत में स्वयं अपना पक्ष रखने का निर्णय लिया।
ज़ाहिद ने अपने मामले को संस्थागत जवाबदेही से जुड़ा बड़ा मुद्दा बताते हुए मीडिया से अपील की कि वह सुप्रीम कोर्ट, प्रधानमंत्री कार्यालय, गूगल और संबंधित मीडिया संस्थानों से इस मामले पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि उनकी मुख्य मांग यह है कि लंबित समीक्षा याचिका पर सुनवाई हो और संबंधित संस्थाएं उनके आरोपों पर जवाब दें।
उन्होंने कहा कि इस मामले को आगे बढ़ाने में उन्होंने लगभग एक दशक लगा दिया है, जिसका असर उनके करियर और निजी जीवन पर पड़ा है। अंत में उन्होंने पत्रकारों से अपील की कि वे इस मामले को निष्पक्ष और ईमानदारी से रिपोर्ट करें ताकि जनता पूरे प्रकरण और इसमें शामिल संस्थाओं को समझ सके।
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