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‘डार्क साइकोलॉजी’ और ‘अल्फा मेल’ कंटेंट का बढ़ता ट्रेंड: क्या युवाओं की सोच और रिश्तों पर पड़ रहा असर?
Priyanka Mathur
सोशल मीडिया रील्स में दिखाए जा रहे मैनिपुलेशन टिप्स और पावर गेम्स को लेकर विशेषज्ञों ने जताई चिंता
सोशल मीडिया पर पिछले कुछ समय से ‘डार्क साइकोलॉजी’, ‘मैनिपुलेशन टेक्निक्स’ और ‘अल्फा मेल माइंडसेट’ जैसे शब्द काफी चर्चा में हैं। इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर ऐसे वीडियो बड़ी संख्या में देखे जा रहे हैं, जिनमें लोगों को प्रभावशाली बनने, दूसरों को नियंत्रित करने और बातचीत में बढ़त हासिल करने के तरीके बताए जाते हैं। इनमें से कई वीडियो युवाओं को आत्मविश्वास बढ़ाने, बॉडी लैंग्वेज सुधारने और बेहतर कम्युनिकेशन की सलाह देते हैं। लेकिन कुछ कंटेंट में रिश्तों को एक तरह के पावर गेम की तरह पेश किया जाता है, जहां सामने वाले व्यक्ति को समझने की जगह उसे प्रभावित या नियंत्रित करने पर ज्यादा जोर दिया जाता है। यही वजह है कि मनोवैज्ञानिक और सोशल बिहेवियर विशेषज्ञ इस तरह के कंटेंट को लेकर सावधानी बरतने की सलाह देते हैं।
क्या है ‘डार्क साइकोलॉजी’ का ट्रेंड?
डार्क साइकोलॉजी शब्द का इस्तेमाल आमतौर पर उन मनोवैज्ञानिक तरीकों के लिए किया जाता है, जिनमें किसी व्यक्ति के व्यवहार, सोच या फैसलों को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है। सोशल मीडिया पर इसके नाम से कई तरह के वीडियो वायरल होते हैं, जिनमें दावा किया जाता है कि कुछ खास तकनीकों से किसी को अपनी बात मानने के लिए तैयार किया जा सकता है या बातचीत में हमेशा बढ़त बनाई जा सकती है। हालांकि, मनोविज्ञान के जानकारों के अनुसार, हर व्यवहार को नियंत्रित करने या लोगों को प्रभावित करने की कोशिश स्वस्थ संवाद का हिस्सा नहीं होती। रिश्तों में विश्वास और सम्मान की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण होती है।
‘अल्फा मेल’ कंटेंट क्यों हो रहा लोकप्रिय?
‘अल्फा मेल’ शब्द पहले जानवरों के व्यवहार से जुड़े अध्ययन में इस्तेमाल होता था, लेकिन सोशल मीडिया पर इसे एक ऐसी छवि के रूप में पेश किया जाता है जिसमें व्यक्ति को बेहद आत्मविश्वासी, प्रभावशाली और हमेशा नियंत्रण में दिखाया जाता है। कई ऑनलाइन वीडियो युवाओं को बताते हैं कि कैसे ज्यादा मजबूत व्यक्तित्व बनाया जाए, कैसे बातचीत में प्रभाव बढ़ाया जाए और कैसे दूसरों के सामने अपनी छवि बेहतर बनाई जाए। लेकिन कई बार यह कंटेंट आत्मविश्वास और अहंकार के बीच अंतर को नजरअंदाज कर देता है। कुछ वीडियो में भावनाओं को कमजोरी और संवेदनशीलता को कम ताकत के रूप में दिखाया जाता है।
सोशल स्किल्स पर कैसे पड़ सकता है असर?
सोशल स्किल्स का मतलब केवल प्रभावशाली बोलना नहीं, बल्कि दूसरों की बात सुनना, भावनाओं को समझना और बेहतर संबंध बनाना भी है।विशेषज्ञों का मानना है कि अगर युवा लगातार ऐसे कंटेंट को देखते हैं जिसमें हर बातचीत को जीत-हार या नियंत्रण के नजरिए से दिखाया जाता है, तो उनके वास्तविक रिश्तों में गलत धारणाएं बन सकती हैं। दोस्ती, परिवार और पार्टनरशिप जैसे रिश्तों में सहयोग, भरोसा और सहानुभूति जरूरी होती है। केवल खुद को श्रेष्ठ साबित करने की सोच लंबे समय में रिश्तों को प्रभावित कर सकती है।
क्या हर ऐसा कंटेंट नुकसानदायक है?
विशेषज्ञों के अनुसार, सोशल मीडिया पर मौजूद हर सेल्फ-इम्प्रूवमेंट कंटेंट गलत नहीं होता। कुछ वीडियो युवाओं को आत्मविश्वास बढ़ाने, बेहतर संवाद करने, अनुशासन अपनाने और व्यक्तिगत विकास में मदद कर सकते हैं। समस्या तब शुरू होती है जब आत्म-सुधार के नाम पर दूसरों को नियंत्रित करने, भावनाओं को नजरअंदाज करने या रिश्तों को केवल फायदे-नुकसान के नजरिए से देखने की सलाह दी जाने लगे।
युवाओं के लिए जरूरी है डिजिटल समझ
सोशल मीडिया पर किसी भी सलाह को अपनाने से पहले उसकी विश्वसनीयता और उद्देश्य को समझना जरूरी है। हर वायरल ट्रेंड जीवन में लागू करने लायक नहीं होता। स्वस्थ व्यक्तित्व विकास में आत्मविश्वास के साथ-साथ विनम्रता, सहानुभूति और दूसरों की भावनाओं को समझने की क्षमता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। डिजिटल दौर में युवाओं के लिए यह समझना जरूरी है कि मजबूत व्यक्तित्व का मतलब केवल दूसरों पर प्रभाव जमाना नहीं, बल्कि अच्छे संबंध बनाना और बेहतर इंसान बनना भी है।
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