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क्या Minimalism अमीरों के लिए ही आसान है? कम सामान का सच
Priyanka Mathur
जरूरतमंदों के लिए समय सुरक्षा सहायक कर्मचारी रखना मजबूरी भी हो सकती है, जबकि आर्थिक वाले लोगों के लिए कम सामान में जीना एक सोच और जीवनशैली बन सकती है
आजकल सोशल मीडिया पर Minimalism यानी कम सामान में सादा जीवन जीने का चलन काफी दिखाई देता है। साफ-सुथरे कमरे, सीमित कपड़े, कुछ जरूरी फर्नीचर और बिना भीड़भाड़ वाली अलमारियां। तस्वीरों में यह जिंदगी काफी आकर्षक लगती है। लेकिन इसी के साथ एक सवाल भी उठता है कि क्या कम सामान में रहना हर किसी के लिए उतना ही आसान है? खासकर उन लोगों के लिए जिनके पास आर्थिक सुरक्षा नहीं है। कम आय वाले परिवारों में कई ऐसी चीजें घर में रखी जाती हैं, जिनका रोज इस्तेमाल नहीं होता, लेकिन जरूरत पड़ने पर उन्हें दोबारा खरीदना मुश्किल हो सकता है। पुराने कपड़े, अतिरिक्त बर्तन, बच्चों की पुरानी किताबें, इलेक्ट्रॉनिक सामान, फर्नीचर या किसी रिश्तेदार से मिली चीजें भी इसलिए संभालकर रखी जाती हैं कि आगे कभी काम आ सकती हैं। ऐसे घर में ज्यादा सामान हमेशा अव्यवस्था का संकेत नहीं होता। कई बार वह भविष्य की अनिश्चितता से निपटने का तरीका होता है।
Minimalism की मूल सोच सिर्फ घर खाली करने या सामान फेंकने तक सीमित नहीं है। इसका विचार यह है कि इंसान अपनी जरूरत और प्राथमिकताओं के हिसाब से चीजें रखे और गैरजरूरी उपभोग को कम करे। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब इसे हर व्यक्ति के लिए एक ही तरह से लागू करने की कोशिश की जाती है। आर्थिक रूप से मजबूत व्यक्ति के पास कोई चीज खराब होने पर उसे तुरंत खरीदने का विकल्प मौजूद होता है। अगर उसके पास तीन जैकेट हैं और वह दो दे देता है तो जरूरत पड़ने पर नई जैकेट खरीद सकता है। लेकिन कम आय वाले व्यक्ति के लिए वही अतिरिक्त जैकेट सुरक्षा का काम कर सकती है। शायद अगले साल कपड़े खरीदने के पैसे न हों। इसी तरह घर में रखा पुराना प्रेशर कुकर, सिलाई मशीन, अतिरिक्त बर्तन या कोई पुराना मोबाइल भी किसी दिन काम आ सकता है। इसलिए जिसे बाहर से clutter कहा जा रहा है, वह किसी परिवार के लिए संसाधन हो सकता है।
यहीं Minimalism और गरीबी के बीच का फर्क समझना जरूरी हो जाता है। गरीबी में कम सामान होना और Minimalist होना एक बात नहीं है। अगर किसी व्यक्ति के पास पैसे की कमी के कारण जरूरी चीजें भी नहीं हैं, तो उसे Minimalism नहीं कहा जा सकता। Minimalism में चुनाव की भूमिका महत्वपूर्ण है। व्यक्ति के पास खरीदने की क्षमता होती है, लेकिन वह तय करता है कि उसे कितना रखना है और कितना नहीं। दूसरी तरफ आर्थिक मजबूरी में विकल्प सीमित हो जाते हैं। एक तरफ कम सामान रखने का फैसला है, दूसरी तरफ सामान खरीदने या बदलने में असमर्थता। दोनों को एक जैसा समझना वास्तविक आर्थिक परिस्थितियों को नजरअंदाज करना होगा।
दूसरी तरफ यह भी सच है कि Minimalism को पूरी तरह अमीरों का शौक कहना भी शायद सही नहीं होगा। कम खर्च में रहना, चीजों का दोबारा इस्तेमाल करना और जरूरत से ज्यादा खरीदारी से बचना कम आय वाले परिवारों की रोजमर्रा की आदत भी हो सकती है। कई परिवार कपड़े तब तक इस्तेमाल करते हैं जब तक वे पूरी तरह खराब न हो जाएं। पुराने डिब्बों का इस्तेमाल स्टोरेज के लिए होता है, बच्चों के पुराने कपड़े छोटे भाई-बहनों को दिए जाते हैं और फर्नीचर सालों तक चलता है। यह आधुनिक सोशल मीडिया वाले Minimalism से अलग जरूर है, लेकिन इसमें संसाधनों की बचत की भावना मौजूद रहती है। फर्क इतना है कि यहां यह कोई lifestyle trend नहीं, बल्कि जरूरत और समझदारी दोनों हो सकती है।
सोशल मीडिया ने Minimalism को एक खास तरह की तस्वीर के साथ जोड़ दिया है। सफेद दीवारें, महंगे लकड़ी के फर्नीचर, सीमित लेकिन खूबसूरत कपड़े, महंगे reusable products और व्यवस्थित kitchen देखकर लगता है कि कम सामान में रहना बहुत आसान है। लेकिन इस तरह का minimalist lifestyle खुद काफी खर्चीला हो सकता है। कई बार पुराने प्लास्टिक के डिब्बे हटाकर एक जैसे महंगे कंटेनर खरीदना, पुराने कपड़ों की जगह महंगे basic outfits लेना या घर को minimalist दिखाने के लिए नया फर्नीचर खरीदना उस सोच के उलट है, जिसमें कम उपभोग की बात की जाती है। कम सामान दिखाने के लिए ज्यादा पैसा खर्च करना एक अलग तरह का consumerism बन सकता है।
इस बहस में समय भी एक बड़ा factor है। आर्थिक रूप से सुरक्षित व्यक्ति के लिए रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के बाद यह सोचना आसान हो सकता है कि कौन सी चीज उसके जीवन में value जोड़ रही है। लेकिन कई परिवारों में सामान रखने का फैसला भविष्य की जरूरतों से जुड़ा होता है। अगर बच्चे तेजी से बड़े हो रहे हैं, तो छोटे हुए कपड़े भी परिवार के दूसरे बच्चे के काम आ सकते हैं। अगर घर में किसी चीज की मरम्मत महंगी है, तो पुराने spare parts रखना समझदारी हो सकती है। ग्रामीण और छोटे शहरों के परिवारों में भी सामान का इस्तेमाल कई तरह से किया जाता है। वहां किसी वस्तु को तब तक घर से बाहर नहीं किया जाता जब तक उसका कोई उपयोग बचा हो। यह पश्चिमी शैली के Minimalism से अलग सामाजिक और आर्थिक संदर्भ है।
विशेषज्ञों की नजर से देखें तो मानसिक शांति के लिए भी कम सामान रखना कुछ लोगों के लिए फायदेमंद हो सकता है। बहुत ज्यादा चीजों को व्यवस्थित करना समय और ऊर्जा लेता है। घर में जरूरत से ज्यादा सामान होने पर सफाई और रखरखाव भी मुश्किल हो सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर घर में एक तय संख्या में चीजें ही होनी चाहिए। Minimalism का व्यावहारिक रूप व्यक्ति की आय, घर का आकार, परिवार के सदस्यों की संख्या और जरूरतों के अनुसार बदल सकता है। किसी अकेले रहने वाले व्यक्ति के लिए 20 कपड़े ज्यादा हो सकते हैं, जबकि चार बच्चों वाले परिवार के लिए वही संख्या बहुत कम पड़ सकती है।
इसलिए शायद असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि घर में कितनी चीजें हैं। सवाल यह है कि उन चीजों का इस्तेमाल किस तरह हो रहा है और उन्हें रखने का कारण क्या है। अगर कोई व्यक्ति सिर्फ सोशल मीडिया के ट्रेंड के कारण अपनी जरूरी चीजें फेंक रहा है तो यह Minimalism नहीं बल्कि दबाव में लिया गया फैसला हो सकता है। वहीं अगर कोई परिवार कम आय के बावजूद चीजों का समझदारी से इस्तेमाल करता है, उन्हें दोबारा उपयोग में लाता है और अनावश्यक खरीदारी से बचता है, तो वह भी कम उपभोग की एक तरह की सोच है।
Minimalism को अगर सिर्फ महंगे घरों, designer furniture और perfectly arranged कमरों की तस्वीरों से अलग करके देखा जाए तो इसका एक ज्यादा व्यावहारिक रूप सामने आता है। अपनी जरूरत समझना, बेवजह खरीदारी से बचना और उपलब्ध संसाधनों का सही इस्तेमाल करना किसी भी आर्थिक वर्ग के व्यक्ति के लिए संभव है। लेकिन आर्थिक सुरक्षा का अंतर यहां नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जिस व्यक्ति के पास जरूरत पड़ने पर तुरंत नई चीज खरीदने की क्षमता है, उसके लिए पुरानी चीज छोड़ना आसान है। जिस परिवार के पास ऐसा विकल्प नहीं है, उसके लिए वही वस्तु भविष्य की जरूरत का सहारा हो सकती है। यही अंतर Minimalism को सिर्फ lifestyle choice नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिति और सामाजिक वर्ग से जुड़ी बहस भी बना देता है।
क्या Minimalism अमीरों के लिए ही आसान है? कम सामान का सच
Priyanka Mathur
आजकल सोशल मीडिया पर Minimalism यानी कम सामान में सादा जीवन जीने का चलन काफी दिखाई देता है। साफ-सुथरे कमरे, सीमित कपड़े, कुछ जरूरी फर्नीचर और बिना भीड़भाड़ वाली अलमारियां। तस्वीरों में यह जिंदगी काफी आकर्षक लगती है। लेकिन इसी के साथ एक सवाल भी उठता है कि क्या कम सामान में रहना हर किसी के लिए उतना ही आसान है? खासकर उन लोगों के लिए जिनके पास आर्थिक सुरक्षा नहीं है। कम आय वाले परिवारों में कई ऐसी चीजें घर में रखी जाती हैं, जिनका रोज इस्तेमाल नहीं होता, लेकिन जरूरत पड़ने पर उन्हें दोबारा खरीदना मुश्किल हो सकता है। पुराने कपड़े, अतिरिक्त बर्तन, बच्चों की पुरानी किताबें, इलेक्ट्रॉनिक सामान, फर्नीचर या किसी रिश्तेदार से मिली चीजें भी इसलिए संभालकर रखी जाती हैं कि आगे कभी काम आ सकती हैं। ऐसे घर में ज्यादा सामान हमेशा अव्यवस्था का संकेत नहीं होता। कई बार वह भविष्य की अनिश्चितता से निपटने का तरीका होता है।
Minimalism की मूल सोच सिर्फ घर खाली करने या सामान फेंकने तक सीमित नहीं है। इसका विचार यह है कि इंसान अपनी जरूरत और प्राथमिकताओं के हिसाब से चीजें रखे और गैरजरूरी उपभोग को कम करे। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब इसे हर व्यक्ति के लिए एक ही तरह से लागू करने की कोशिश की जाती है। आर्थिक रूप से मजबूत व्यक्ति के पास कोई चीज खराब होने पर उसे तुरंत खरीदने का विकल्प मौजूद होता है। अगर उसके पास तीन जैकेट हैं और वह दो दे देता है तो जरूरत पड़ने पर नई जैकेट खरीद सकता है। लेकिन कम आय वाले व्यक्ति के लिए वही अतिरिक्त जैकेट सुरक्षा का काम कर सकती है। शायद अगले साल कपड़े खरीदने के पैसे न हों। इसी तरह घर में रखा पुराना प्रेशर कुकर, सिलाई मशीन, अतिरिक्त बर्तन या कोई पुराना मोबाइल भी किसी दिन काम आ सकता है। इसलिए जिसे बाहर से clutter कहा जा रहा है, वह किसी परिवार के लिए संसाधन हो सकता है।
यहीं Minimalism और गरीबी के बीच का फर्क समझना जरूरी हो जाता है। गरीबी में कम सामान होना और Minimalist होना एक बात नहीं है। अगर किसी व्यक्ति के पास पैसे की कमी के कारण जरूरी चीजें भी नहीं हैं, तो उसे Minimalism नहीं कहा जा सकता। Minimalism में चुनाव की भूमिका महत्वपूर्ण है। व्यक्ति के पास खरीदने की क्षमता होती है, लेकिन वह तय करता है कि उसे कितना रखना है और कितना नहीं। दूसरी तरफ आर्थिक मजबूरी में विकल्प सीमित हो जाते हैं। एक तरफ कम सामान रखने का फैसला है, दूसरी तरफ सामान खरीदने या बदलने में असमर्थता। दोनों को एक जैसा समझना वास्तविक आर्थिक परिस्थितियों को नजरअंदाज करना होगा।
दूसरी तरफ यह भी सच है कि Minimalism को पूरी तरह अमीरों का शौक कहना भी शायद सही नहीं होगा। कम खर्च में रहना, चीजों का दोबारा इस्तेमाल करना और जरूरत से ज्यादा खरीदारी से बचना कम आय वाले परिवारों की रोजमर्रा की आदत भी हो सकती है। कई परिवार कपड़े तब तक इस्तेमाल करते हैं जब तक वे पूरी तरह खराब न हो जाएं। पुराने डिब्बों का इस्तेमाल स्टोरेज के लिए होता है, बच्चों के पुराने कपड़े छोटे भाई-बहनों को दिए जाते हैं और फर्नीचर सालों तक चलता है। यह आधुनिक सोशल मीडिया वाले Minimalism से अलग जरूर है, लेकिन इसमें संसाधनों की बचत की भावना मौजूद रहती है। फर्क इतना है कि यहां यह कोई lifestyle trend नहीं, बल्कि जरूरत और समझदारी दोनों हो सकती है।
सोशल मीडिया ने Minimalism को एक खास तरह की तस्वीर के साथ जोड़ दिया है। सफेद दीवारें, महंगे लकड़ी के फर्नीचर, सीमित लेकिन खूबसूरत कपड़े, महंगे reusable products और व्यवस्थित kitchen देखकर लगता है कि कम सामान में रहना बहुत आसान है। लेकिन इस तरह का minimalist lifestyle खुद काफी खर्चीला हो सकता है। कई बार पुराने प्लास्टिक के डिब्बे हटाकर एक जैसे महंगे कंटेनर खरीदना, पुराने कपड़ों की जगह महंगे basic outfits लेना या घर को minimalist दिखाने के लिए नया फर्नीचर खरीदना उस सोच के उलट है, जिसमें कम उपभोग की बात की जाती है। कम सामान दिखाने के लिए ज्यादा पैसा खर्च करना एक अलग तरह का consumerism बन सकता है।
इस बहस में समय भी एक बड़ा factor है। आर्थिक रूप से सुरक्षित व्यक्ति के लिए रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के बाद यह सोचना आसान हो सकता है कि कौन सी चीज उसके जीवन में value जोड़ रही है। लेकिन कई परिवारों में सामान रखने का फैसला भविष्य की जरूरतों से जुड़ा होता है। अगर बच्चे तेजी से बड़े हो रहे हैं, तो छोटे हुए कपड़े भी परिवार के दूसरे बच्चे के काम आ सकते हैं। अगर घर में किसी चीज की मरम्मत महंगी है, तो पुराने spare parts रखना समझदारी हो सकती है। ग्रामीण और छोटे शहरों के परिवारों में भी सामान का इस्तेमाल कई तरह से किया जाता है। वहां किसी वस्तु को तब तक घर से बाहर नहीं किया जाता जब तक उसका कोई उपयोग बचा हो। यह पश्चिमी शैली के Minimalism से अलग सामाजिक और आर्थिक संदर्भ है।
विशेषज्ञों की नजर से देखें तो मानसिक शांति के लिए भी कम सामान रखना कुछ लोगों के लिए फायदेमंद हो सकता है। बहुत ज्यादा चीजों को व्यवस्थित करना समय और ऊर्जा लेता है। घर में जरूरत से ज्यादा सामान होने पर सफाई और रखरखाव भी मुश्किल हो सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर घर में एक तय संख्या में चीजें ही होनी चाहिए। Minimalism का व्यावहारिक रूप व्यक्ति की आय, घर का आकार, परिवार के सदस्यों की संख्या और जरूरतों के अनुसार बदल सकता है। किसी अकेले रहने वाले व्यक्ति के लिए 20 कपड़े ज्यादा हो सकते हैं, जबकि चार बच्चों वाले परिवार के लिए वही संख्या बहुत कम पड़ सकती है।
इसलिए शायद असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि घर में कितनी चीजें हैं। सवाल यह है कि उन चीजों का इस्तेमाल किस तरह हो रहा है और उन्हें रखने का कारण क्या है। अगर कोई व्यक्ति सिर्फ सोशल मीडिया के ट्रेंड के कारण अपनी जरूरी चीजें फेंक रहा है तो यह Minimalism नहीं बल्कि दबाव में लिया गया फैसला हो सकता है। वहीं अगर कोई परिवार कम आय के बावजूद चीजों का समझदारी से इस्तेमाल करता है, उन्हें दोबारा उपयोग में लाता है और अनावश्यक खरीदारी से बचता है, तो वह भी कम उपभोग की एक तरह की सोच है।
Minimalism को अगर सिर्फ महंगे घरों, designer furniture और perfectly arranged कमरों की तस्वीरों से अलग करके देखा जाए तो इसका एक ज्यादा व्यावहारिक रूप सामने आता है। अपनी जरूरत समझना, बेवजह खरीदारी से बचना और उपलब्ध संसाधनों का सही इस्तेमाल करना किसी भी आर्थिक वर्ग के व्यक्ति के लिए संभव है। लेकिन आर्थिक सुरक्षा का अंतर यहां नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जिस व्यक्ति के पास जरूरत पड़ने पर तुरंत नई चीज खरीदने की क्षमता है, उसके लिए पुरानी चीज छोड़ना आसान है। जिस परिवार के पास ऐसा विकल्प नहीं है, उसके लिए वही वस्तु भविष्य की जरूरत का सहारा हो सकती है। यही अंतर Minimalism को सिर्फ lifestyle choice नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिति और सामाजिक वर्ग से जुड़ी बहस भी बना देता है।
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