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सबालेंका की वापसी का सफर, पिता को खोया तो टेनिस छोड़ने का आया ख्याल
स्पोर्ट्स डेस्क
2022 में लगातार आलोचनाओं और खराब सर्विस से परेशान हुईं आर्यना सबालेंका, लेकिन तकनीक बदली और अगले ही साल पहला ग्रैंड स्लैम जीत लिया
टेनिस कोर्ट पर आर्यना सबालेंका को देखने वाला शायद ही अंदाजा लगा पाए कि इस खिलाड़ी ने अपने करियर के दौरान कितनी बार खुद से लड़ाई लड़ी है। तेज सर्विस, आक्रामक फोरहैंड और मैच के दौरान खुलकर भावनाएं जाहिर करने वाली सबालेंका आज दुनिया की शीर्ष खिलाड़ियों में गिनी जाती हैं। लेकिन यह मुकाम उनके लिए सीधी राह नहीं रहा। बेलारूस की राजधानी मिन्स्क में पली-बढ़ीं सबालेंका को छह साल की उम्र में उनके पिता सर्गेई पहली बार टेनिस कोर्ट पर लेकर गए थे। सर्गेई खुद आइस हॉकी खेल चुके थे और बेटी के भीतर शुरू से ही खेल को लेकर कुछ खास देखते थे।
सबालेंका बचपन में भी काफी बेबाक थीं। कोच की हर बात चुपचाप मान लेने के बजाय अपनी राय रखना, सवाल करना और कभी-कभी बहस तक करना उनके स्वभाव का हिस्सा था। धीरे-धीरे टेनिस ही उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा बन गया। पढ़ाई, ट्रेनिंग और प्रतियोगिताओं के बीच उनका समय निकलता रहा। 2018 में 20 साल की उम्र में उन्हें WTA न्यूकमर ऑफ द ईयर चुना गया। उस दौर में कई बड़ी खिलाड़ियों के खिलाफ जीत ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया। पिता और बेटी ने तब एक बड़ा लक्ष्य भी तय किया था कि 25 साल की उम्र से पहले कम से कम दो ग्रैंड स्लैम खिताब हासिल करने हैं। लेकिन अगले ही साल जिंदगी ने ऐसा मोड़ लिया, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी।
2019 में सबालेंका के पिता सर्गेई का 43 साल की उम्र में निधन हो गया। मेनिनजाइटिस के बाद हुई इस मौत ने उन्हें भीतर तक हिला दिया। पिता उनके लिए सिर्फ परिवार का हिस्सा नहीं थे, बल्कि टेनिस की शुरुआती यात्रा के साथी, सलाहकार और सबसे करीबी लोगों में से एक थे। उनके जाने के बाद सबालेंका ने खुद पर एक अलग तरह का दबाव डाल लिया। उन्हें लगता था कि कोर्ट पर बड़ी जीत हासिल करके ही वह पिता को सही मायने में श्रद्धांजलि दे पाएंगी। हर टूर्नामेंट में परिणाम का दबाव बढ़ता गया। परिवार की तरफ से उन्हें यह समझाने की कोशिश हुई कि उनके पिता के लिए सबसे बड़ी बात उनकी बेटी का इस स्तर तक पहुंचना ही थी। धीरे-धीरे उन्होंने उस भावनात्मक बोझ से बाहर आने की कोशिश की।
लेकिन करियर का मुश्किल दौर अभी बाकी था। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद बेलारूस से जुड़ी राजनीतिक परिस्थितियों के कारण सबालेंका को भी लगातार सवालों और आलोचना का सामना करना पड़ा। मैदान के बाहर का दबाव उनके खेल में भी दिखाई देने लगा। खास तौर पर उनकी सर्विस बड़ी समस्या बन गई। एक समय उनकी डबल फॉल्ट की संख्या इतनी बढ़ गई कि आलोचकों ने उनके खेल पर ही सवाल खड़े कर दिए। 2022 में उन्होंने 428 डबल फॉल्ट किए। कुछ लोगों को लगने लगा कि उनकी तकनीकी कमजोरी अब करियर पर भारी पड़ सकती है। खुद सबालेंका भी एक समय टेनिस से दूरी बनाने के बारे में सोचने लगी थीं।
यहीं से उनके करियर की दिशा फिर बदली। सबालेंका ने अपनी सर्विस की तकनीक पर दोबारा काम शुरू किया। उन्होंने बायोमैकेनिक्स विशेषज्ञों की मदद ली और यह समझने की कोशिश की कि समस्या सिर्फ मानसिक दबाव की नहीं, बल्कि तकनीकी स्तर पर भी थी। उनकी सर्विस को नए तरीके से तैयार किया गया। इस दौरान उन्होंने अपने खेल को लेकर बाहरी राय पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय खुद की समझ पर भरोसा करना शुरू किया। धीरे-धीरे कोर्ट पर उनका आत्मविश्वास लौटने लगा। जिस सर्विस को लेकर लगातार सवाल उठ रहे थे, वही आगे चलकर उनके खेल का बड़ा हथियार बनी। जनवरी 2023 में इसका नतीजा ऑस्ट्रेलियन ओपन में दिखाई दिया। सबालेंका ने अपना पहला ग्रैंड स्लैम खिताब जीता। यह जीत सिर्फ एक ट्रॉफी नहीं थी। उनके लिए यह उस दौर से निकलने का संकेत भी थी, जब वह खुद अपने खेल और करियर को लेकर सवालों में घिर गई थीं। इसके बाद उनके प्रदर्शन में लगातार मजबूती दिखाई दी और वह महिला टेनिस की शीर्ष खिलाड़ियों में अपनी जगह पक्की करती चली गईं।
सबालेंका की कहानी में एक और पहलू लगातार चर्चा में रहा है। वह कोर्ट पर अपनी भावनाएं छिपाने की कोशिश नहीं करतीं। मैच के दौरान गुस्सा, निराशा या जीत की खुशी उनके चेहरे और व्यवहार में साफ दिखाई देती है। कभी-कभी वह अपनी टीम पर भी नाराज होती नजर आती हैं। लेकिन अब वह इसी भावनात्मक अंदाज को अपने खेल का हिस्सा मानती हैं। उनका मानना है कि खिलाड़ी को खुद को किसी तय छवि में ढालने के बजाय अपनी वास्तविक personality के साथ रहना चाहिए। उनके करियर में मानसिक मजबूती का सवाल भी इसी वजह से अहम रहा है। एक समय जहां बाहरी दबाव उन्हें प्रभावित कर रहा था, वहीं बाद में उन्होंने खुद को समझने और अपने फैसलों पर भरोसा करने की कोशिश की। उनके लिए यह बदलाव किसी एक मैच या एक कोच की वजह से नहीं आया। इसमें तकनीकी बदलाव, कठिन ट्रेनिंग और लंबे समय तक खुद के साथ की गई मेहनत शामिल रही।
अब सबालेंका के करियर में वह दौर है, जहां उनसे हर बड़े टूर्नामेंट में खिताब की उम्मीद की जाती है। एक खिलाड़ी के लिए यह स्थिति भी आसान नहीं होती। शुरुआती दिनों में जहां उन्हें खुद को साबित करना था, अब हर मुकाबले के साथ उम्मीदों का वजन भी बढ़ता है। उनके पास ग्रैंड स्लैम का अनुभव है, बड़े मुकाबलों में दबाव झेलने की आदत है और अपनी कमजोरियों पर काम करने का अनुभव भी। यही वजह है कि जब वह यूएस ओपन के लिए कोर्ट पर उतरती हैं तो कहानी सिर्फ एक और टूर्नामेंट की नहीं होती। उनके सामने अपने पुराने संघर्षों को पीछे छोड़कर उसी आक्रामक अंदाज में खेलने की चुनौती रहती है, जिसने उन्हें दुनिया की शीर्ष खिलाड़ियों तक पहुंचाया है। न्यूयॉर्क में उनकी नजर तीसरे यूएस ओपन खिताब पर है और इस सफर में उनकी पुरानी मुश्किलें, पिता की याद और करियर का वह दौर भी साथ चलता है, जब उन्होंने टेनिस छोड़ने तक के बारे में सोचा था।
सबालेंका की वापसी का सफर, पिता को खोया तो टेनिस छोड़ने का आया ख्याल
स्पोर्ट्स डेस्क
टेनिस कोर्ट पर आर्यना सबालेंका को देखने वाला शायद ही अंदाजा लगा पाए कि इस खिलाड़ी ने अपने करियर के दौरान कितनी बार खुद से लड़ाई लड़ी है। तेज सर्विस, आक्रामक फोरहैंड और मैच के दौरान खुलकर भावनाएं जाहिर करने वाली सबालेंका आज दुनिया की शीर्ष खिलाड़ियों में गिनी जाती हैं। लेकिन यह मुकाम उनके लिए सीधी राह नहीं रहा। बेलारूस की राजधानी मिन्स्क में पली-बढ़ीं सबालेंका को छह साल की उम्र में उनके पिता सर्गेई पहली बार टेनिस कोर्ट पर लेकर गए थे। सर्गेई खुद आइस हॉकी खेल चुके थे और बेटी के भीतर शुरू से ही खेल को लेकर कुछ खास देखते थे।
सबालेंका बचपन में भी काफी बेबाक थीं। कोच की हर बात चुपचाप मान लेने के बजाय अपनी राय रखना, सवाल करना और कभी-कभी बहस तक करना उनके स्वभाव का हिस्सा था। धीरे-धीरे टेनिस ही उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा बन गया। पढ़ाई, ट्रेनिंग और प्रतियोगिताओं के बीच उनका समय निकलता रहा। 2018 में 20 साल की उम्र में उन्हें WTA न्यूकमर ऑफ द ईयर चुना गया। उस दौर में कई बड़ी खिलाड़ियों के खिलाफ जीत ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया। पिता और बेटी ने तब एक बड़ा लक्ष्य भी तय किया था कि 25 साल की उम्र से पहले कम से कम दो ग्रैंड स्लैम खिताब हासिल करने हैं। लेकिन अगले ही साल जिंदगी ने ऐसा मोड़ लिया, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी।
2019 में सबालेंका के पिता सर्गेई का 43 साल की उम्र में निधन हो गया। मेनिनजाइटिस के बाद हुई इस मौत ने उन्हें भीतर तक हिला दिया। पिता उनके लिए सिर्फ परिवार का हिस्सा नहीं थे, बल्कि टेनिस की शुरुआती यात्रा के साथी, सलाहकार और सबसे करीबी लोगों में से एक थे। उनके जाने के बाद सबालेंका ने खुद पर एक अलग तरह का दबाव डाल लिया। उन्हें लगता था कि कोर्ट पर बड़ी जीत हासिल करके ही वह पिता को सही मायने में श्रद्धांजलि दे पाएंगी। हर टूर्नामेंट में परिणाम का दबाव बढ़ता गया। परिवार की तरफ से उन्हें यह समझाने की कोशिश हुई कि उनके पिता के लिए सबसे बड़ी बात उनकी बेटी का इस स्तर तक पहुंचना ही थी। धीरे-धीरे उन्होंने उस भावनात्मक बोझ से बाहर आने की कोशिश की।
लेकिन करियर का मुश्किल दौर अभी बाकी था। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद बेलारूस से जुड़ी राजनीतिक परिस्थितियों के कारण सबालेंका को भी लगातार सवालों और आलोचना का सामना करना पड़ा। मैदान के बाहर का दबाव उनके खेल में भी दिखाई देने लगा। खास तौर पर उनकी सर्विस बड़ी समस्या बन गई। एक समय उनकी डबल फॉल्ट की संख्या इतनी बढ़ गई कि आलोचकों ने उनके खेल पर ही सवाल खड़े कर दिए। 2022 में उन्होंने 428 डबल फॉल्ट किए। कुछ लोगों को लगने लगा कि उनकी तकनीकी कमजोरी अब करियर पर भारी पड़ सकती है। खुद सबालेंका भी एक समय टेनिस से दूरी बनाने के बारे में सोचने लगी थीं।
यहीं से उनके करियर की दिशा फिर बदली। सबालेंका ने अपनी सर्विस की तकनीक पर दोबारा काम शुरू किया। उन्होंने बायोमैकेनिक्स विशेषज्ञों की मदद ली और यह समझने की कोशिश की कि समस्या सिर्फ मानसिक दबाव की नहीं, बल्कि तकनीकी स्तर पर भी थी। उनकी सर्विस को नए तरीके से तैयार किया गया। इस दौरान उन्होंने अपने खेल को लेकर बाहरी राय पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय खुद की समझ पर भरोसा करना शुरू किया। धीरे-धीरे कोर्ट पर उनका आत्मविश्वास लौटने लगा। जिस सर्विस को लेकर लगातार सवाल उठ रहे थे, वही आगे चलकर उनके खेल का बड़ा हथियार बनी। जनवरी 2023 में इसका नतीजा ऑस्ट्रेलियन ओपन में दिखाई दिया। सबालेंका ने अपना पहला ग्रैंड स्लैम खिताब जीता। यह जीत सिर्फ एक ट्रॉफी नहीं थी। उनके लिए यह उस दौर से निकलने का संकेत भी थी, जब वह खुद अपने खेल और करियर को लेकर सवालों में घिर गई थीं। इसके बाद उनके प्रदर्शन में लगातार मजबूती दिखाई दी और वह महिला टेनिस की शीर्ष खिलाड़ियों में अपनी जगह पक्की करती चली गईं।
सबालेंका की कहानी में एक और पहलू लगातार चर्चा में रहा है। वह कोर्ट पर अपनी भावनाएं छिपाने की कोशिश नहीं करतीं। मैच के दौरान गुस्सा, निराशा या जीत की खुशी उनके चेहरे और व्यवहार में साफ दिखाई देती है। कभी-कभी वह अपनी टीम पर भी नाराज होती नजर आती हैं। लेकिन अब वह इसी भावनात्मक अंदाज को अपने खेल का हिस्सा मानती हैं। उनका मानना है कि खिलाड़ी को खुद को किसी तय छवि में ढालने के बजाय अपनी वास्तविक personality के साथ रहना चाहिए। उनके करियर में मानसिक मजबूती का सवाल भी इसी वजह से अहम रहा है। एक समय जहां बाहरी दबाव उन्हें प्रभावित कर रहा था, वहीं बाद में उन्होंने खुद को समझने और अपने फैसलों पर भरोसा करने की कोशिश की। उनके लिए यह बदलाव किसी एक मैच या एक कोच की वजह से नहीं आया। इसमें तकनीकी बदलाव, कठिन ट्रेनिंग और लंबे समय तक खुद के साथ की गई मेहनत शामिल रही।
अब सबालेंका के करियर में वह दौर है, जहां उनसे हर बड़े टूर्नामेंट में खिताब की उम्मीद की जाती है। एक खिलाड़ी के लिए यह स्थिति भी आसान नहीं होती। शुरुआती दिनों में जहां उन्हें खुद को साबित करना था, अब हर मुकाबले के साथ उम्मीदों का वजन भी बढ़ता है। उनके पास ग्रैंड स्लैम का अनुभव है, बड़े मुकाबलों में दबाव झेलने की आदत है और अपनी कमजोरियों पर काम करने का अनुभव भी। यही वजह है कि जब वह यूएस ओपन के लिए कोर्ट पर उतरती हैं तो कहानी सिर्फ एक और टूर्नामेंट की नहीं होती। उनके सामने अपने पुराने संघर्षों को पीछे छोड़कर उसी आक्रामक अंदाज में खेलने की चुनौती रहती है, जिसने उन्हें दुनिया की शीर्ष खिलाड़ियों तक पहुंचाया है। न्यूयॉर्क में उनकी नजर तीसरे यूएस ओपन खिताब पर है और इस सफर में उनकी पुरानी मुश्किलें, पिता की याद और करियर का वह दौर भी साथ चलता है, जब उन्होंने टेनिस छोड़ने तक के बारे में सोचा था।
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