शीतला सप्तमी 2026: जानें इस दिन क्या करें और क्या न करें

धर्म डेस्क

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10 मार्च को मनाई जा रही शीतला सप्तमी, बासी भोजन के भोग और विशेष नियमों का होता है पालन

नई दिल्ली। हिंदू धार्मिक परंपराओं में महत्वपूर्ण मानी जाने वाली शीतला सप्तमी इस वर्ष 10 मार्च 2026, मंगलवार को मनाई जा रही है। यह व्रत चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को रखा जाता है और शीतला माता को समर्पित होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन माताएं अपनी संतान के अच्छे स्वास्थ्य, रोगों से रक्षा और लंबी आयु की कामना के लिए व्रत रखती हैं और विधि-विधान से शीतला माता की पूजा करती हैं।

परंपरा के अनुसार शीतला सप्तमी के दिन घर में ताजा भोजन नहीं बनाया जाता। माता को एक दिन पहले तैयार किए गए भोजन का भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन नियमों का पालन करने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और बच्चों को बीमारियों से सुरक्षा मिलती है।

शीतला सप्तमी के दिन क्या करें

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद साफ और पवित्र वस्त्र धारण किए जाते हैं। पूजा से पहले व्रत रखा जाता है और शीतला माता की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाकर पूजा की जाती है।

माता को भोग में आमतौर पर एक दिन पहले तैयार किया गया भोजन चढ़ाया जाता है। मीठे चावल, हलवा-पूरी और गुलगुले जैसे व्यंजन शीतला माता को प्रिय माने जाते हैं। पूजा के बाद परिवार के सदस्य उसी प्रसाद को ग्रहण करते हैं। कई स्थानों पर महिलाएं शाम के समय सामूहिक रूप से शीतला माता की आराधना भी करती हैं।

शीतला सप्तमी पर क्या न करें

मान्यता के अनुसार इस दिन चूल्हा या गैस नहीं जलाना चाहिए। ताजा भोजन बनाना और गर्म खाना खाना वर्जित माना जाता है। पूजा के समय माता को गर्म भोजन का भोग नहीं लगाया जाता।

इसके अलावा इस दिन कढ़ाई-बुनाई जैसे कार्यों से भी परहेज करने की सलाह दी जाती है। कुछ स्थानों पर परंपरा के अनुसार बाल धोने या घर में गर्म चीजें बनाने से भी बचा जाता है। मान्यता यह भी है कि यदि घर में किसी व्यक्ति को चेचक जैसी बीमारी हो तो उस स्थिति में पूजा-व्रत करने से पहले सावधानी बरतनी चाहिए।

शीतला सप्तमी की धार्मिक मान्यता

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शीतला माता को बच्चों की रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। कहा जाता है कि एक बार शीतला माता को किसी ने गर्म चावल का पानी डाल दिया था, जिससे उन्हें पीड़ा हुई। उस समय एक कुम्हारन ने उन्हें अपने घर बुलाकर ठंडा और बासी भोजन खिलाया, जिससे उनकी पीड़ा शांत हुई। तभी से शीतला माता को बासी भोजन का भोग लगाने की परंपरा शुरू हुई।

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