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Dr. Ankur Pare and Dr. Ambar Pare : गांव से राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पहचान तक: दो भाइयों की उच्च शिक्षा और सफलता की यात्रा
Digital Desk
हरदा जिले के ग्राम दुलिया से निकलकर ने उच्च शिक्षा, निरंतर अध्ययन और अपने-अपने कार्यक्षेत्र में सक्रियता के माध्यम से राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। किसी छोटे गांव से निकलकर देश और विदेश तक अपनी पहचान बनाना केवल मंजिल तक पहुंचने की कहानी नहीं होती। इसके पीछे शिक्षा, परिवार का वातावरण, अपनी रुचि को पहचानने की क्षमता और वर्षों तक लगातार काम करते रहने का सिलसिला होता है। हरदा जिले के ग्राम दुलिया से शुरू हुई डॉ. अंकुर पारे और डॉ. अम्बर पारे की कहानी भी इसी क्रम में आगे बढ़ी है।
दोनों सगे भाइयों में डॉ. अंकुर पारे बड़े और डॉ. अम्बर पारे छोटे हैं। उनके पिता स्वर्गीय राजेंद्र पारे हरदा जिले के प्रतिष्ठित कृषक रहे। परिवार में शिक्षा को महत्व दिया गया और दोनों भाइयों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने तथा अपनी रुचि के अनुसार आगे बढ़ने के अवसर मिले। दुलिया का ग्रामीण परिवेश उनके जीवन का शुरुआती आधार रहा, जबकि शिक्षा ने उनके सामने आगे की दुनिया को देखने और अपने लिए कार्यक्षेत्र चुनने के नए अवसर खोले।
उच्च शिक्षा से ज्ञान और कार्यक्षेत्र के विस्तार तक-
दोनों भाइयों की शिक्षा के बाद की यात्रा केवल औपचारिक डिग्रियों तक सीमित नहीं रही। अपने-अपने विषयों को समझने, पढ़ने और अनुभव से सीखने का सिलसिला आगे भी जारी रहा। इसी क्रम में दोनों ने अपनी रुचि और अनुभव के अनुसार कार्यक्षेत्र विकसित किए और समय के साथ उनके काम का दायरा भी बढ़ता गया।
डॉ. अंकुर पारे का कार्य लेखन, अध्ययन, सामाजिक विषयों, भारतीय ज्ञान परंपरा और उद्यमिता से जुड़े क्षेत्रों में रहा है। आयुर्वेद और हर्बल क्षेत्र से जुड़े विषय भी उनके कार्य का हिस्सा रहे हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा और पारंपरिक संसाधनों को आधुनिक संदर्भ में देखने तथा उनके सामाजिक और व्यावहारिक पक्षों को समझने में उनकी रुचि रही है।
वहीं डॉ. अम्बर पारे ने आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, भारतीय प्राचीन वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धतियों, मंत्र विज्ञान और समग्र स्वास्थ्य को अपने प्रमुख कार्यक्षेत्रों में शामिल किया। डॉ. अम्बर पारे नेचुरोपैथी सेंटर के माध्यम से उनका कार्य स्वास्थ्य सेवा, स्वास्थ्य शिक्षा और भारतीय चिकित्सा परंपराओं से जुड़े विषयों तक विस्तृत हुआ है। दोनों भाइयों के काम की दिशा में अपनी-अपनी विशिष्टताएं हैं, लेकिन भारतीय ज्ञान परंपरा और स्वास्थ्य से जुड़े विषय उनकी पेशेवर यात्राओं के बीच एक स्वाभाविक जुड़ाव भी बनाते हैं।
दुलिया से वैश्विक पहचान तक -
किसी ग्रामीण परिवेश से निकलकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचना एक क्रमिक प्रक्रिया है। इसमें शिक्षा के साथ अनुभव, निरंतरता और अपने काम को समय के साथ विकसित करने की भूमिका रहती है।
डॉ. अंकुर पारे और डॉ. अम्बर पारे की यात्रा में भी शुरुआती काम का दायरा धीरे-धीरे दुलिया और हरदा से बाहर बढ़ा। उनके कार्यों और विचारों को विभिन्न सार्वजनिक मंचों और समाचार माध्यमों में स्थान मिला। राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित सामग्री के साथ उनके कार्यों का संपर्क अंतर्राष्ट्रीय मंचों तक भी पहुंचा। यह पहचान किसी एक अवसर या एक उपलब्धि से नहीं बनी। अपने-अपने क्षेत्रों में लंबे समय तक सक्रिय रहना, नए विषयों को समझना और काम को आगे बढ़ाते रहना इस विस्तार का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।
एक ही परिवार से निकले, अपनी-अपनी दिशा में आगे बढ़े -
दोनों भाइयों की कहानी का एक खास पहलू यह है कि शुरुआत एक ही परिवार और एक ही ग्रामीण परिवेश से हुई, लेकिन आगे बढ़ते हुए दोनों ने अपनी रुचि के अनुसार काम की दिशा विकसित की। डॉ. अंकुर पारे ने लेखन, भारतीय ज्ञान परंपरा और उद्यमिता के क्षेत्रों में काम को आगे बढ़ाया, जबकि डॉ. अम्बर पारे ने आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा और भारतीय प्राचीन चिकित्सा परंपराओं को अपने कार्य का प्रमुख आधार बनाया। दोनों के काम में विषयगत समानताएं भी हैं और अपने-अपने क्षेत्र की विशिष्टताएं भी।
उच्च शिक्षा ने दोनों को अपने विषयों को समझने का आधार दिया। इसके बाद का निरंतर अध्ययन, अनुभव और व्यावहारिक कार्य उनके ज्ञान को व्यापक बनाता गया। इसी प्रक्रिया में उनकी पहचान केवल शैक्षणिक योग्यता तक सीमित नहीं रही, बल्कि उनके वर्षों के कार्य से जुड़ती चली गई।

आज दोनों भाई अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय हैं। एक ओर लेखन, अध्ययन और उद्यमिता से जुड़े कार्य आगे बढ़ रहे हैं, तो दूसरी ओर आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा और भारतीय प्राचीन चिकित्सा परंपराओं से जुड़े कार्य जारी हैं।
ग्राम दुलिया से शुरू हुई यह यात्रा आज राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पहचान तक पहुंच चुकी है। इसकी खासियत यही है कि शुरुआत भले ही एक छोटे से गांव से हुई, लेकिन शिक्षा ने दृष्टि का विस्तार किया और वर्षों के काम ने उस दृष्टि को व्यापक मंच तक पहुंचाया। दुलिया से शुरू हुआ यह सफर अभी थमा नहीं है; दोनों भाई अपने-अपने क्षेत्रों में आगे भी काम कर रहे हैं।
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Dr. Ankur Pare and Dr. Ambar Pare : गांव से राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पहचान तक: दो भाइयों की उच्च शिक्षा और सफलता की यात्रा
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हरदा जिले के ग्राम दुलिया से निकलकर ने उच्च शिक्षा, निरंतर अध्ययन और अपने-अपने कार्यक्षेत्र में सक्रियता के माध्यम से राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। किसी छोटे गांव से निकलकर देश और विदेश तक अपनी पहचान बनाना केवल मंजिल तक पहुंचने की कहानी नहीं होती। इसके पीछे शिक्षा, परिवार का वातावरण, अपनी रुचि को पहचानने की क्षमता और वर्षों तक लगातार काम करते रहने का सिलसिला होता है। हरदा जिले के ग्राम दुलिया से शुरू हुई डॉ. अंकुर पारे और डॉ. अम्बर पारे की कहानी भी इसी क्रम में आगे बढ़ी है।
दोनों सगे भाइयों में डॉ. अंकुर पारे बड़े और डॉ. अम्बर पारे छोटे हैं। उनके पिता स्वर्गीय राजेंद्र पारे हरदा जिले के प्रतिष्ठित कृषक रहे। परिवार में शिक्षा को महत्व दिया गया और दोनों भाइयों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने तथा अपनी रुचि के अनुसार आगे बढ़ने के अवसर मिले। दुलिया का ग्रामीण परिवेश उनके जीवन का शुरुआती आधार रहा, जबकि शिक्षा ने उनके सामने आगे की दुनिया को देखने और अपने लिए कार्यक्षेत्र चुनने के नए अवसर खोले।
उच्च शिक्षा से ज्ञान और कार्यक्षेत्र के विस्तार तक-
दोनों भाइयों की शिक्षा के बाद की यात्रा केवल औपचारिक डिग्रियों तक सीमित नहीं रही। अपने-अपने विषयों को समझने, पढ़ने और अनुभव से सीखने का सिलसिला आगे भी जारी रहा। इसी क्रम में दोनों ने अपनी रुचि और अनुभव के अनुसार कार्यक्षेत्र विकसित किए और समय के साथ उनके काम का दायरा भी बढ़ता गया।
डॉ. अंकुर पारे का कार्य लेखन, अध्ययन, सामाजिक विषयों, भारतीय ज्ञान परंपरा और उद्यमिता से जुड़े क्षेत्रों में रहा है। आयुर्वेद और हर्बल क्षेत्र से जुड़े विषय भी उनके कार्य का हिस्सा रहे हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा और पारंपरिक संसाधनों को आधुनिक संदर्भ में देखने तथा उनके सामाजिक और व्यावहारिक पक्षों को समझने में उनकी रुचि रही है।
वहीं डॉ. अम्बर पारे ने आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, भारतीय प्राचीन वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धतियों, मंत्र विज्ञान और समग्र स्वास्थ्य को अपने प्रमुख कार्यक्षेत्रों में शामिल किया। डॉ. अम्बर पारे नेचुरोपैथी सेंटर के माध्यम से उनका कार्य स्वास्थ्य सेवा, स्वास्थ्य शिक्षा और भारतीय चिकित्सा परंपराओं से जुड़े विषयों तक विस्तृत हुआ है। दोनों भाइयों के काम की दिशा में अपनी-अपनी विशिष्टताएं हैं, लेकिन भारतीय ज्ञान परंपरा और स्वास्थ्य से जुड़े विषय उनकी पेशेवर यात्राओं के बीच एक स्वाभाविक जुड़ाव भी बनाते हैं।
दुलिया से वैश्विक पहचान तक -
किसी ग्रामीण परिवेश से निकलकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचना एक क्रमिक प्रक्रिया है। इसमें शिक्षा के साथ अनुभव, निरंतरता और अपने काम को समय के साथ विकसित करने की भूमिका रहती है।
डॉ. अंकुर पारे और डॉ. अम्बर पारे की यात्रा में भी शुरुआती काम का दायरा धीरे-धीरे दुलिया और हरदा से बाहर बढ़ा। उनके कार्यों और विचारों को विभिन्न सार्वजनिक मंचों और समाचार माध्यमों में स्थान मिला। राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित सामग्री के साथ उनके कार्यों का संपर्क अंतर्राष्ट्रीय मंचों तक भी पहुंचा। यह पहचान किसी एक अवसर या एक उपलब्धि से नहीं बनी। अपने-अपने क्षेत्रों में लंबे समय तक सक्रिय रहना, नए विषयों को समझना और काम को आगे बढ़ाते रहना इस विस्तार का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।
एक ही परिवार से निकले, अपनी-अपनी दिशा में आगे बढ़े -
दोनों भाइयों की कहानी का एक खास पहलू यह है कि शुरुआत एक ही परिवार और एक ही ग्रामीण परिवेश से हुई, लेकिन आगे बढ़ते हुए दोनों ने अपनी रुचि के अनुसार काम की दिशा विकसित की। डॉ. अंकुर पारे ने लेखन, भारतीय ज्ञान परंपरा और उद्यमिता के क्षेत्रों में काम को आगे बढ़ाया, जबकि डॉ. अम्बर पारे ने आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा और भारतीय प्राचीन चिकित्सा परंपराओं को अपने कार्य का प्रमुख आधार बनाया। दोनों के काम में विषयगत समानताएं भी हैं और अपने-अपने क्षेत्र की विशिष्टताएं भी।
उच्च शिक्षा ने दोनों को अपने विषयों को समझने का आधार दिया। इसके बाद का निरंतर अध्ययन, अनुभव और व्यावहारिक कार्य उनके ज्ञान को व्यापक बनाता गया। इसी प्रक्रिया में उनकी पहचान केवल शैक्षणिक योग्यता तक सीमित नहीं रही, बल्कि उनके वर्षों के कार्य से जुड़ती चली गई।

आज दोनों भाई अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय हैं। एक ओर लेखन, अध्ययन और उद्यमिता से जुड़े कार्य आगे बढ़ रहे हैं, तो दूसरी ओर आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा और भारतीय प्राचीन चिकित्सा परंपराओं से जुड़े कार्य जारी हैं।
ग्राम दुलिया से शुरू हुई यह यात्रा आज राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पहचान तक पहुंच चुकी है। इसकी खासियत यही है कि शुरुआत भले ही एक छोटे से गांव से हुई, लेकिन शिक्षा ने दृष्टि का विस्तार किया और वर्षों के काम ने उस दृष्टि को व्यापक मंच तक पहुंचाया। दुलिया से शुरू हुआ यह सफर अभी थमा नहीं है; दोनों भाई अपने-अपने क्षेत्रों में आगे भी काम कर रहे हैं।
