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भारत ने रॉकेट इंजन की नई रेस में लगाई छलांग, Astrobase ने पेश किया 800 kN का ‘Everest’
Digital Desk
बेंगलुरु की कंपनी ने बनाया Full-Flow Staged Combustion इंजन, 2028 में पहले ऑर्बिटल लॉन्च का लक्ष्य; अभी हॉट-फायर टेस्टिंग बाकी
भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर में बड़ी तकनीकी उपलब्धि सामने आई है। बेंगलुरु की स्पेस टेक्नोलॉजी कंपनी Astrobase Space Technologies ने 800 किलो न्यूटन क्लास का Full-Flow Staged Combustion यानी FFSC रॉकेट इंजन पेश किया है। कंपनी ने इस इंजन का नाम ‘Everest’ रखा है। दावा है कि यह भारत का पहला निजी तौर पर विकसित हाई-थ्रस्ट FFSC इंजन है, जिसे भविष्य में कंपनी के रीयूजेबल मीडियम-लिफ्ट लॉन्च व्हीकल में इस्तेमाल किया जाएगा।
Astrobase के मुताबिक, कंपनी का लक्ष्य दिसंबर 2028 तक इस लॉन्च व्हीकल की पहली ऑर्बिटल उड़ान भरना है। इसके बाद उसी समय के आसपास कमर्शियल लॉन्च ऑपरेशन शुरू करने की योजना है। हालांकि अभी Everest इंजन विकास के शुरुआती चरण में है। इसका हॉट-फायर टेस्ट नहीं हुआ है। कंपनी आने वाले महीनों में इंजन की टेस्टिंग शुरू करने की तैयारी कर रही है।
रॉकेट इंजन की दुनिया में FFSC तकनीक को बेहद जटिल और उन्नत माना जाता है। इस सिस्टम में फ्यूल और ऑक्सीडाइजर दोनों को पूरी तरह गैस में बदलकर कम्बशन चैंबर में भेजा जाता है। इससे इंजन की दक्षता बढ़ाने और टर्बोमशीनरी को बेहतर तरीके से मैनेज करने में मदद मिलती है। यही वजह है कि इस तकनीक को रीयूजेबल रॉकेट सिस्टम के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जाता है।
Everest इंजन में लिक्विड ऑक्सीजन और मीथेन को प्रोपेलेंट के तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा। कंपनी ने इसे 800 kN थ्रस्ट के लिए डिजाइन किया है। Astrobase का दावा है कि इंजन का स्पेसिफिक इंपल्स करीब 340 सेकंड रखा गया है। इसकी थ्रॉटलिंग क्षमता 50 फीसदी से लेकर 110 फीसदी तक बताई गई है। रीयूजेबल रॉकेट में यह क्षमता खास तौर पर अहम होती है, क्योंकि उड़ान के अलग-अलग चरणों और लैंडिंग के दौरान इंजन का थ्रस्ट नियंत्रित करना पड़ता है।
Astrobase के CEO नीरज खंडेलवाल के मुताबिक, कंपनी भारत को ग्लोबल लॉन्च मार्केट में एक मजबूत विकल्प के तौर पर स्थापित करना चाहती है। उनका कहना है कि दुनिया में ऑर्बिटल लॉन्च क्षमता कुछ चुनिंदा देशों और कंपनियों के पास ही केंद्रित है। ऐसे में भारत के पास मौजूद इंजीनियरिंग टैलेंट और बढ़ते स्पेस इकोसिस्टम का इस्तेमाल करके एक अलग लॉन्च कैपेबिलिटी तैयार की जा सकती है।
कंपनी का कहना है कि FFSC इंजन तकनीक अभी दुनिया में सीमित संख्या में ही विकसित की गई है। अमेरिका, रूस और चीन के कुछ प्रमुख कार्यक्रमों में इस तरह की तकनीक पर काम हुआ है। Astrobase ने खुद को इस श्रेणी में काम करने वाली चुनिंदा कमर्शियल कंपनियों में शामिल होने का दावा किया है। हालांकि Everest की वास्तविक क्षमता का आकलन उसके टेस्ट और आगे होने वाली क्वालिफिकेशन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही किया जा सकेगा।
कंपनी के मुताबिक, इंजन का 70 फीसदी से ज्यादा हिस्सा भारत में डिजाइन और तैयार किया गया है। इसका डिजाइन इन-हाउस किया गया है और मैन्युफैक्चरिंग बेंगलुरु में होने की बात कही गई है। कुछ ऐसे सेंसर और कंपोनेंट अभी बाहर से मंगाए जा रहे हैं, जो घरेलू स्तर पर उपलब्ध नहीं हैं। Astrobase का कहना है कि आगे चलकर घरेलू सप्लाई चेन मजबूत होने के साथ स्थानीय स्तर पर निर्माण का दायरा और बढ़ाया जाएगा।
Astrobase केवल इंजन बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहती। कंपनी एक पूरा रीयूजेबल लॉन्च सिस्टम तैयार करने की दिशा में काम कर रही है। इसके तहत रॉकेट निर्माण, इंजन टेस्टिंग और लॉन्च ऑपरेशन को एक ही इकोसिस्टम में विकसित करने की योजना है। कंपनी ने शुरुआती चरण में हर साल 100 टन तक पेलोड को ऑर्बिट में पहुंचाने की क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा है। आगे चलकर इसे बढ़ाकर सालाना 1,000 टन से ज्यादा पेलोड तक ले जाने की महत्वाकांक्षी योजना बताई गई है।
कंपनी के अनुसार लॉन्च सर्विस की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन मौजूदा समय में सबसे बड़ी चुनौती पर्याप्त लॉन्च क्षमता की है। सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन, कम्युनिकेशन सिस्टम और अन्य स्पेस मिशनों के बढ़ने के साथ बार-बार लॉन्च की जरूरत बढ़ रही है। ऐसे में रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल की सफलता लॉन्च लागत और मिशन की फ्रीक्वेंसी दोनों पर असर डाल सकती है।
हालांकि Everest के सामने अभी लंबा टेस्टिंग चरण बाकी है। हॉट-फायर टेस्टिंग के बाद इंजन को कई बार चलाकर उसकी विश्वसनीयता, थ्रस्ट, तापमान, दबाव और दूसरे तकनीकी मानकों की जांच करनी होगी। इसके बाद क्वालिफिकेशन और पूरे लॉन्च व्हीकल के साथ इंटीग्रेशन की प्रक्रिया होगी। रीयूजेबल सिस्टम के लिए इंजन को सिर्फ एक सफल परीक्षण ही नहीं, बल्कि बार-बार इस्तेमाल की क्षमता भी साबित करनी होगी।
इसलिए दिसंबर 2028 का पहला ऑर्बिटल लॉन्च लक्ष्य फिलहाल कंपनी की योजना है, जिसे हासिल करने के लिए अगले दो साल बेहद अहम होंगे। Everest का अनावरण भारत के निजी स्पेस सेक्टर के बढ़ते दायरे को जरूर दिखाता है, लेकिन असली परीक्षा अब इंजन की टेस्टिंग और उड़ान के दौरान होगी। अगर यह तकनीक सफल रहती है तो भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए हाई-थ्रस्ट और रीयूजेबल लॉन्च सिस्टम की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकती है।
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भारत ने रॉकेट इंजन की नई रेस में लगाई छलांग, Astrobase ने पेश किया 800 kN का ‘Everest’
Digital Desk
भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर में बड़ी तकनीकी उपलब्धि सामने आई है। बेंगलुरु की स्पेस टेक्नोलॉजी कंपनी Astrobase Space Technologies ने 800 किलो न्यूटन क्लास का Full-Flow Staged Combustion यानी FFSC रॉकेट इंजन पेश किया है। कंपनी ने इस इंजन का नाम ‘Everest’ रखा है। दावा है कि यह भारत का पहला निजी तौर पर विकसित हाई-थ्रस्ट FFSC इंजन है, जिसे भविष्य में कंपनी के रीयूजेबल मीडियम-लिफ्ट लॉन्च व्हीकल में इस्तेमाल किया जाएगा।
Astrobase के मुताबिक, कंपनी का लक्ष्य दिसंबर 2028 तक इस लॉन्च व्हीकल की पहली ऑर्बिटल उड़ान भरना है। इसके बाद उसी समय के आसपास कमर्शियल लॉन्च ऑपरेशन शुरू करने की योजना है। हालांकि अभी Everest इंजन विकास के शुरुआती चरण में है। इसका हॉट-फायर टेस्ट नहीं हुआ है। कंपनी आने वाले महीनों में इंजन की टेस्टिंग शुरू करने की तैयारी कर रही है।
रॉकेट इंजन की दुनिया में FFSC तकनीक को बेहद जटिल और उन्नत माना जाता है। इस सिस्टम में फ्यूल और ऑक्सीडाइजर दोनों को पूरी तरह गैस में बदलकर कम्बशन चैंबर में भेजा जाता है। इससे इंजन की दक्षता बढ़ाने और टर्बोमशीनरी को बेहतर तरीके से मैनेज करने में मदद मिलती है। यही वजह है कि इस तकनीक को रीयूजेबल रॉकेट सिस्टम के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जाता है।
Everest इंजन में लिक्विड ऑक्सीजन और मीथेन को प्रोपेलेंट के तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा। कंपनी ने इसे 800 kN थ्रस्ट के लिए डिजाइन किया है। Astrobase का दावा है कि इंजन का स्पेसिफिक इंपल्स करीब 340 सेकंड रखा गया है। इसकी थ्रॉटलिंग क्षमता 50 फीसदी से लेकर 110 फीसदी तक बताई गई है। रीयूजेबल रॉकेट में यह क्षमता खास तौर पर अहम होती है, क्योंकि उड़ान के अलग-अलग चरणों और लैंडिंग के दौरान इंजन का थ्रस्ट नियंत्रित करना पड़ता है।
Astrobase के CEO नीरज खंडेलवाल के मुताबिक, कंपनी भारत को ग्लोबल लॉन्च मार्केट में एक मजबूत विकल्प के तौर पर स्थापित करना चाहती है। उनका कहना है कि दुनिया में ऑर्बिटल लॉन्च क्षमता कुछ चुनिंदा देशों और कंपनियों के पास ही केंद्रित है। ऐसे में भारत के पास मौजूद इंजीनियरिंग टैलेंट और बढ़ते स्पेस इकोसिस्टम का इस्तेमाल करके एक अलग लॉन्च कैपेबिलिटी तैयार की जा सकती है।
कंपनी का कहना है कि FFSC इंजन तकनीक अभी दुनिया में सीमित संख्या में ही विकसित की गई है। अमेरिका, रूस और चीन के कुछ प्रमुख कार्यक्रमों में इस तरह की तकनीक पर काम हुआ है। Astrobase ने खुद को इस श्रेणी में काम करने वाली चुनिंदा कमर्शियल कंपनियों में शामिल होने का दावा किया है। हालांकि Everest की वास्तविक क्षमता का आकलन उसके टेस्ट और आगे होने वाली क्वालिफिकेशन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही किया जा सकेगा।
कंपनी के मुताबिक, इंजन का 70 फीसदी से ज्यादा हिस्सा भारत में डिजाइन और तैयार किया गया है। इसका डिजाइन इन-हाउस किया गया है और मैन्युफैक्चरिंग बेंगलुरु में होने की बात कही गई है। कुछ ऐसे सेंसर और कंपोनेंट अभी बाहर से मंगाए जा रहे हैं, जो घरेलू स्तर पर उपलब्ध नहीं हैं। Astrobase का कहना है कि आगे चलकर घरेलू सप्लाई चेन मजबूत होने के साथ स्थानीय स्तर पर निर्माण का दायरा और बढ़ाया जाएगा।
Astrobase केवल इंजन बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहती। कंपनी एक पूरा रीयूजेबल लॉन्च सिस्टम तैयार करने की दिशा में काम कर रही है। इसके तहत रॉकेट निर्माण, इंजन टेस्टिंग और लॉन्च ऑपरेशन को एक ही इकोसिस्टम में विकसित करने की योजना है। कंपनी ने शुरुआती चरण में हर साल 100 टन तक पेलोड को ऑर्बिट में पहुंचाने की क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा है। आगे चलकर इसे बढ़ाकर सालाना 1,000 टन से ज्यादा पेलोड तक ले जाने की महत्वाकांक्षी योजना बताई गई है।
कंपनी के अनुसार लॉन्च सर्विस की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन मौजूदा समय में सबसे बड़ी चुनौती पर्याप्त लॉन्च क्षमता की है। सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन, कम्युनिकेशन सिस्टम और अन्य स्पेस मिशनों के बढ़ने के साथ बार-बार लॉन्च की जरूरत बढ़ रही है। ऐसे में रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल की सफलता लॉन्च लागत और मिशन की फ्रीक्वेंसी दोनों पर असर डाल सकती है।
हालांकि Everest के सामने अभी लंबा टेस्टिंग चरण बाकी है। हॉट-फायर टेस्टिंग के बाद इंजन को कई बार चलाकर उसकी विश्वसनीयता, थ्रस्ट, तापमान, दबाव और दूसरे तकनीकी मानकों की जांच करनी होगी। इसके बाद क्वालिफिकेशन और पूरे लॉन्च व्हीकल के साथ इंटीग्रेशन की प्रक्रिया होगी। रीयूजेबल सिस्टम के लिए इंजन को सिर्फ एक सफल परीक्षण ही नहीं, बल्कि बार-बार इस्तेमाल की क्षमता भी साबित करनी होगी।
इसलिए दिसंबर 2028 का पहला ऑर्बिटल लॉन्च लक्ष्य फिलहाल कंपनी की योजना है, जिसे हासिल करने के लिए अगले दो साल बेहद अहम होंगे। Everest का अनावरण भारत के निजी स्पेस सेक्टर के बढ़ते दायरे को जरूर दिखाता है, लेकिन असली परीक्षा अब इंजन की टेस्टिंग और उड़ान के दौरान होगी। अगर यह तकनीक सफल रहती है तो भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए हाई-थ्रस्ट और रीयूजेबल लॉन्च सिस्टम की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकती है।
