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10 टेस्ट हार के बाद भी गंभीर के साथ खड़े अमित मिश्रा
स्पोर्ट्स डेस्क
पूर्व लेग स्पिनर बोले- सिर्फ कोच को जिम्मेदार ठहराना ठीक नहीं, खिलाड़ियों को भी जवाबदेही लेनी होगी; रेड-बॉल क्रिकेट में गंभीर को समय देना चाहिए
गौतम गंभीर के भारतीय टीम के हेड कोच बनने के बाद टेस्ट क्रिकेट में नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे हैं। 19 टेस्ट में टीम इंडिया को 10 मुकाबलों में हार मिली है और इसी वजह से गंभीर की कोचिंग को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। ऐसे समय में पूर्व भारतीय लेग स्पिनर अमित मिश्रा ने उनका बचाव किया है। मिश्रा का कहना है कि टेस्ट में खराब प्रदर्शन के लिए सिर्फ कोच को जिम्मेदार मानना सही नहीं होगा। मैदान पर उतरने वाले खिलाड़ियों की भी उतनी ही जिम्मेदारी है। उनके मुताबिक, टीम में कई ऐसे खिलाड़ी हैं जो टेस्ट क्रिकेट में अभी अनुभव हासिल कर रहे हैं और उन्हें परिस्थितियों के मुताबिक खुद को ढालने के लिए वक्त चाहिए।
गंभीर के कार्यकाल में भारतीय टेस्ट टीम को कई बड़े झटके लगे। न्यूजीलैंड ने भारत को घरेलू जमीन पर 3-0 से हराया, इसके बाद दक्षिण अफ्रीका ने भी भारत में 2-0 से सीरीज अपने नाम की। ऑस्ट्रेलिया दौरे पर बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी भारत 1-3 से हार गया। इंग्लैंड में हालांकि पांच टेस्ट की सीरीज 2-2 से बराबर रही। लगातार इन नतीजों के चलते कोचिंग स्टाफ, टीम चयन और टेस्ट क्रिकेट के लिए अपनाई जा रही रणनीति पर बहस तेज हुई। खासकर घरेलू मैदान पर मिली हार ने सवाल और बढ़ा दिए, क्योंकि भारतीय टीम लंबे समय तक अपनी जमीन पर टेस्ट क्रिकेट में बेहद मजबूत मानी जाती रही है।
अमित मिश्रा ने इसी पूरे माहौल के बीच कहा कि कोच को पर्याप्त समय मिलना चाहिए। उनका तर्क है कि जब टीम में नए चेहरे आते हैं तो सिर्फ ट्रेनिंग और रणनीति से तुरंत नतीजे नहीं मिलते। खिलाड़ियों को भी यह समझना होता है कि टेस्ट क्रिकेट में किस परिस्थिति में कितना जोखिम लेना है, कब गेंद छोड़नी है और कब रन बनाने के लिए दबाव बनाना है। मिश्रा के मुताबिक कोच मानसिक तैयारी और तकनीकी पहलुओं पर काम कर सकता है, लेकिन मैदान पर सही फैसला आखिरकार खिलाड़ी को ही लेना होता है। इसलिए लगातार हार के बाद जिम्मेदारी का दायरा सिर्फ ड्रेसिंग रूम के एक व्यक्ति तक सीमित करना ठीक नहीं है।
मिश्रा ने अपनी बात रखते हुए राहुल द्रविड़ का उदाहरण भी दिया। उनका मानना है कि किसी नए कोच को टीम के खिलाड़ियों, उनकी मानसिकता और उनकी कमियों को समझने में वक्त लगता है। द्रविड़ को भी शुरुआत में खुद को स्थापित करने और टीम के साथ काम करने में समय लगा था। इसके बाद उनके कार्यकाल में टीम ने टेस्ट क्रिकेट में कई मजबूत प्रदर्शन किए। मिश्रा का कहना है कि गंभीर के मामले में भी इसी तरह धैर्य रखने की जरूरत है। खासकर रेड-बॉल क्रिकेट में जहां हर खिलाड़ी की तकनीक, स्वभाव और लंबे समय तक एकाग्र रहने की क्षमता काफी मायने रखती है।
गंभीर के कार्यकाल की एक दिलचस्प बात यह भी रही है कि व्हाइट-बॉल क्रिकेट में भारतीय टीम के नतीजे टेस्ट से काफी अलग रहे हैं। टी20 और सीमित ओवरों के क्रिकेट में टीम ने बड़े टूर्नामेंटों में अच्छा प्रदर्शन किया, जबकि टेस्ट में लगातार गिरावट दिखाई दी। यही विरोधाभास गंभीर की भूमिका पर चर्चा को और ज्यादा बढ़ाता है। टेस्ट क्रिकेट में टीम को एक अलग तरह की तैयारी और सोच चाहिए। बल्लेबाजों को लंबी पारियां खेलने, गेंदबाजों को लंबे स्पेल डालने और पूरी टीम को पांच दिन तक एक ही स्तर की एकाग्रता बनाए रखने की जरूरत होती है।
भारतीय टेस्ट टीम इस समय बदलाव के दौर से भी गुजर रही है। पिछले कुछ समय में टीम के कई अनुभवी खिलाड़ियों ने इस फॉर्मेट से दूरी बनाई या संन्यास लिया, जिसके बाद नई पीढ़ी के खिलाड़ियों पर जिम्मेदारी बढ़ी है। ऐसे में एक तरफ कोच से नतीजे मांगे जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ बल्लेबाजी और गेंदबाजी इकाई से भी लगातार प्रदर्शन की उम्मीद है। टेस्ट क्रिकेट में एक खिलाड़ी की छोटी सी गलती कई बार पूरे मैच का रुख बदल देती है। मिश्रा का जोर इसी बात पर है कि खिलाड़ियों को परिस्थितियों को पढ़ना सीखना होगा और हर मैच में अपनी भूमिका की जिम्मेदारी उठानी होगी।
उन्होंने रेड-बॉल क्रिकेट को ज्यादा समय देने की बात ऐसे वक्त कही है जब भारत के सामने टेस्ट में वापसी की चुनौती बनी हुई है। टीम का अगला कार्यक्रम भी काफी अहम है और आने वाली सीरीज में खिलाड़ियों की तकनीक के साथ-साथ कोचिंग प्लान की भी परीक्षा होगी। गंभीर के लिए यह दौर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उनसे सिर्फ मैच जीतने की उम्मीद नहीं है, बल्कि नई टेस्ट टीम को स्थिर करने की जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है। टीम में नए खिलाड़ियों को मौका देना, उन्हें सही भूमिका देना और लंबे फॉर्मेट के लिए तैयार करना एक साथ चलने वाला काम है।
मिश्रा के मुताबिक इंटरनेशनल क्रिकेट में जगह बना लेना किसी खिलाड़ी की यात्रा का आखिरी पड़ाव नहीं होता। असली चुनौती तब शुरू होती है जब सामने अलग तरह की पिच, गेंदबाज और मैच की परिस्थिति हो। टेस्ट में बल्लेबाज को यह तय करना पड़ता है कि कब आक्रामक होना है और कब लंबे समय तक गेंदबाजों को झेलना है। गेंदबाजों के लिए भी सिर्फ विकेट लेना काफी नहीं, सही लाइन पर लगातार गेंद डालकर बल्लेबाज को गलती करने के लिए मजबूर करना पड़ता है। कोच इन चीजों की तैयारी करा सकता है, लेकिन मैच में उसका इस्तेमाल खिलाड़ियों को करना होता है।
गंभीर की टेस्ट कोचिंग को लेकर बहस फिलहाल थमी नहीं है। भारत के हालिया नतीजों ने सवाल जरूर खड़े किए हैं, लेकिन अमित मिश्रा की राय में इस स्थिति से निकलने के लिए कोच और खिलाड़ियों दोनों को साथ काम करना होगा। आने वाली रेड-बॉल सीरीज में टीम का प्रदर्शन ही बताएगा कि बदलाव और तैयारी का असर किस तरह दिखाई देता है।
10 टेस्ट हार के बाद भी गंभीर के साथ खड़े अमित मिश्रा
स्पोर्ट्स डेस्क
गौतम गंभीर के भारतीय टीम के हेड कोच बनने के बाद टेस्ट क्रिकेट में नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे हैं। 19 टेस्ट में टीम इंडिया को 10 मुकाबलों में हार मिली है और इसी वजह से गंभीर की कोचिंग को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। ऐसे समय में पूर्व भारतीय लेग स्पिनर अमित मिश्रा ने उनका बचाव किया है। मिश्रा का कहना है कि टेस्ट में खराब प्रदर्शन के लिए सिर्फ कोच को जिम्मेदार मानना सही नहीं होगा। मैदान पर उतरने वाले खिलाड़ियों की भी उतनी ही जिम्मेदारी है। उनके मुताबिक, टीम में कई ऐसे खिलाड़ी हैं जो टेस्ट क्रिकेट में अभी अनुभव हासिल कर रहे हैं और उन्हें परिस्थितियों के मुताबिक खुद को ढालने के लिए वक्त चाहिए।
गंभीर के कार्यकाल में भारतीय टेस्ट टीम को कई बड़े झटके लगे। न्यूजीलैंड ने भारत को घरेलू जमीन पर 3-0 से हराया, इसके बाद दक्षिण अफ्रीका ने भी भारत में 2-0 से सीरीज अपने नाम की। ऑस्ट्रेलिया दौरे पर बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी भारत 1-3 से हार गया। इंग्लैंड में हालांकि पांच टेस्ट की सीरीज 2-2 से बराबर रही। लगातार इन नतीजों के चलते कोचिंग स्टाफ, टीम चयन और टेस्ट क्रिकेट के लिए अपनाई जा रही रणनीति पर बहस तेज हुई। खासकर घरेलू मैदान पर मिली हार ने सवाल और बढ़ा दिए, क्योंकि भारतीय टीम लंबे समय तक अपनी जमीन पर टेस्ट क्रिकेट में बेहद मजबूत मानी जाती रही है।
अमित मिश्रा ने इसी पूरे माहौल के बीच कहा कि कोच को पर्याप्त समय मिलना चाहिए। उनका तर्क है कि जब टीम में नए चेहरे आते हैं तो सिर्फ ट्रेनिंग और रणनीति से तुरंत नतीजे नहीं मिलते। खिलाड़ियों को भी यह समझना होता है कि टेस्ट क्रिकेट में किस परिस्थिति में कितना जोखिम लेना है, कब गेंद छोड़नी है और कब रन बनाने के लिए दबाव बनाना है। मिश्रा के मुताबिक कोच मानसिक तैयारी और तकनीकी पहलुओं पर काम कर सकता है, लेकिन मैदान पर सही फैसला आखिरकार खिलाड़ी को ही लेना होता है। इसलिए लगातार हार के बाद जिम्मेदारी का दायरा सिर्फ ड्रेसिंग रूम के एक व्यक्ति तक सीमित करना ठीक नहीं है।
मिश्रा ने अपनी बात रखते हुए राहुल द्रविड़ का उदाहरण भी दिया। उनका मानना है कि किसी नए कोच को टीम के खिलाड़ियों, उनकी मानसिकता और उनकी कमियों को समझने में वक्त लगता है। द्रविड़ को भी शुरुआत में खुद को स्थापित करने और टीम के साथ काम करने में समय लगा था। इसके बाद उनके कार्यकाल में टीम ने टेस्ट क्रिकेट में कई मजबूत प्रदर्शन किए। मिश्रा का कहना है कि गंभीर के मामले में भी इसी तरह धैर्य रखने की जरूरत है। खासकर रेड-बॉल क्रिकेट में जहां हर खिलाड़ी की तकनीक, स्वभाव और लंबे समय तक एकाग्र रहने की क्षमता काफी मायने रखती है।
गंभीर के कार्यकाल की एक दिलचस्प बात यह भी रही है कि व्हाइट-बॉल क्रिकेट में भारतीय टीम के नतीजे टेस्ट से काफी अलग रहे हैं। टी20 और सीमित ओवरों के क्रिकेट में टीम ने बड़े टूर्नामेंटों में अच्छा प्रदर्शन किया, जबकि टेस्ट में लगातार गिरावट दिखाई दी। यही विरोधाभास गंभीर की भूमिका पर चर्चा को और ज्यादा बढ़ाता है। टेस्ट क्रिकेट में टीम को एक अलग तरह की तैयारी और सोच चाहिए। बल्लेबाजों को लंबी पारियां खेलने, गेंदबाजों को लंबे स्पेल डालने और पूरी टीम को पांच दिन तक एक ही स्तर की एकाग्रता बनाए रखने की जरूरत होती है।
भारतीय टेस्ट टीम इस समय बदलाव के दौर से भी गुजर रही है। पिछले कुछ समय में टीम के कई अनुभवी खिलाड़ियों ने इस फॉर्मेट से दूरी बनाई या संन्यास लिया, जिसके बाद नई पीढ़ी के खिलाड़ियों पर जिम्मेदारी बढ़ी है। ऐसे में एक तरफ कोच से नतीजे मांगे जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ बल्लेबाजी और गेंदबाजी इकाई से भी लगातार प्रदर्शन की उम्मीद है। टेस्ट क्रिकेट में एक खिलाड़ी की छोटी सी गलती कई बार पूरे मैच का रुख बदल देती है। मिश्रा का जोर इसी बात पर है कि खिलाड़ियों को परिस्थितियों को पढ़ना सीखना होगा और हर मैच में अपनी भूमिका की जिम्मेदारी उठानी होगी।
उन्होंने रेड-बॉल क्रिकेट को ज्यादा समय देने की बात ऐसे वक्त कही है जब भारत के सामने टेस्ट में वापसी की चुनौती बनी हुई है। टीम का अगला कार्यक्रम भी काफी अहम है और आने वाली सीरीज में खिलाड़ियों की तकनीक के साथ-साथ कोचिंग प्लान की भी परीक्षा होगी। गंभीर के लिए यह दौर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उनसे सिर्फ मैच जीतने की उम्मीद नहीं है, बल्कि नई टेस्ट टीम को स्थिर करने की जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है। टीम में नए खिलाड़ियों को मौका देना, उन्हें सही भूमिका देना और लंबे फॉर्मेट के लिए तैयार करना एक साथ चलने वाला काम है।
मिश्रा के मुताबिक इंटरनेशनल क्रिकेट में जगह बना लेना किसी खिलाड़ी की यात्रा का आखिरी पड़ाव नहीं होता। असली चुनौती तब शुरू होती है जब सामने अलग तरह की पिच, गेंदबाज और मैच की परिस्थिति हो। टेस्ट में बल्लेबाज को यह तय करना पड़ता है कि कब आक्रामक होना है और कब लंबे समय तक गेंदबाजों को झेलना है। गेंदबाजों के लिए भी सिर्फ विकेट लेना काफी नहीं, सही लाइन पर लगातार गेंद डालकर बल्लेबाज को गलती करने के लिए मजबूर करना पड़ता है। कोच इन चीजों की तैयारी करा सकता है, लेकिन मैच में उसका इस्तेमाल खिलाड़ियों को करना होता है।
गंभीर की टेस्ट कोचिंग को लेकर बहस फिलहाल थमी नहीं है। भारत के हालिया नतीजों ने सवाल जरूर खड़े किए हैं, लेकिन अमित मिश्रा की राय में इस स्थिति से निकलने के लिए कोच और खिलाड़ियों दोनों को साथ काम करना होगा। आने वाली रेड-बॉल सीरीज में टीम का प्रदर्शन ही बताएगा कि बदलाव और तैयारी का असर किस तरह दिखाई देता है।
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