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कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 का ग्लासगो में आगाज, भारत के 125 खिलाड़ी मैदान में
स्पोर्ट्स डेस्क
8 खेलों में भारतीय चुनौती, लवलीना का पदक तय
ग्लासगो में 23वें कॉमनवेल्थ गेम्स का आज से आगाज होने जा रहा है। स्कॉटलैंड का यह शहर एक बार फिर कॉमनवेल्थ देशों के खिलाड़ियों की मेजबानी के लिए तैयार है। 23 जुलाई से शुरू हो रहे खेल 2 अगस्त तक चलेंगे, जिसमें 74 देशों और क्षेत्रों से 3 हजार से अधिक खिलाड़ी अपनी चुनौती पेश करेंगे। इस बार 10 खेलों में कुल 215 मेडल इवेंट रखे गए हैं और इनमें 47 पैरा स्पोर्ट्स इवेंट भी शामिल हैं। भारत की ओर से 125 खिलाड़ियों का दल ग्लासगो पहुंचा है। भारतीय खिलाड़ी आठ खेलों में हिस्सा लेंगे। हालांकि हॉकी, बैडमिंटन, शूटिंग और कुश्ती जैसे उन खेलों को इस बार कार्यक्रम में जगह नहीं मिली है, जिनमें भारत का रिकॉर्ड काफी मजबूत रहा है। ऐसे में छोटे दल और सीमित खेलों के बावजूद भारतीय खिलाड़ियों से पदकों की उम्मीद बनी हुई है।
भारत के अभियान की शुरुआत से पहले ही बॉक्सिंग से अच्छी खबर आई है। ओलिंपिक पदक विजेता लवलीना बोरगोहेन ने महिलाओं के 75 किलोग्राम भार वर्ग में कम से कम कांस्य पदक सुनिश्चित कर लिया है। ड्रॉ में उन्हें क्वार्टर फाइनल में बाई मिली, जिससे वह सीधे सेमीफाइनल में पहुंच गई हैं। उनका सेमीफाइनल मुकाबला 31 जुलाई को टी.के.बी.पी. ताफाकी के खिलाफ निर्धारित है। बॉक्सिंग प्रतियोगिता में कांस्य पदक के लिए अलग मुकाबला नहीं होता। दोनों सेमीफाइनल में हारने वाले मुक्केबाजों को कांस्य दिया जाता है, इसलिए अंतिम चार में जगह बनाते ही लवलीना का पदक पक्का हो गया है। अब उनकी कोशिश फाइनल में पहुंचकर पदक का रंग बदलने की होगी।
कॉमनवेल्थ गेम्स का इतिहास करीब एक सदी पुराना है। इसकी पहली प्रतियोगिता 1930 में कनाडा के हैमिल्टन शहर में हुई थी। उस समय इन खेलों को ब्रिटिश एम्पायर गेम्स के नाम से जाना जाता था। शुरुआती आयोजन में 11 देशों के 400 से ज्यादा खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया था और एथलेटिक्स, मुक्केबाजी, लॉन बॉल्स, रोइंग, तैराकी और कुश्ती जैसी स्पर्धाएं कराई गई थीं। समय के साथ प्रतियोगिता का नाम कई बार बदला। 1954 में इसे ब्रिटिश एम्पायर एंड कॉमनवेल्थ गेम्स कहा गया, जबकि 1970 में नाम ब्रिटिश कॉमनवेल्थ गेम्स हुआ। वर्ष 1978 से यह आयोजन मौजूदा नाम यानी कॉमनवेल्थ गेम्स के रूप में आयोजित किया जा रहा है। सामान्य तौर पर इसका आयोजन चार साल में एक बार किया जाता है।
भारत ने इन खेलों में पहली बार 1934 में हिस्सा लिया था। लंदन में हुए उस संस्करण में भारतीय दल काफी छोटा था और केवल छह खिलाड़ी पहुंचे थे। भारत ने ट्रैक एंड फील्ड तथा कुश्ती की स्पर्धाओं में चुनौती पेश की थी। उसी प्रतियोगिता में पहलवान राशिद अनवर ने पुरुष फ्रीस्टाइल कुश्ती के 74 किलोग्राम वर्ग में कांस्य जीतकर भारत को कॉमनवेल्थ गेम्स इतिहास का पहला पदक दिलाया। शुरुआती वर्षों के मुकाबले बाद में भारत इस प्रतियोगिता की बड़ी खेल शक्तियों में शामिल हुआ। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार भारतीय खिलाड़ियों ने अब तक कॉमनवेल्थ गेम्स में कुल 564 पदक हासिल किए हैं, जिनमें 203 स्वर्ण, 189 रजत और 172 कांस्य शामिल हैं।
ग्लासगो में होने वाला इस बार का आयोजन भारत के लिए पिछले कई संस्करणों से अलग रहने वाला है। इसकी बड़ी वजह खेलों की संख्या में कटौती है। क्रिकेट, हॉकी, बैडमिंटन, शूटिंग, कुश्ती, टेबल टेनिस और स्क्वैश को 2026 के कार्यक्रम में शामिल नहीं किया गया है। इन खेलों का बाहर होना भारतीय पदक संभावनाओं पर सीधा असर डाल सकता है। खास तौर पर शूटिंग और कुश्ती लंबे समय से भारत के मजबूत खेल रहे हैं। शूटिंग में भारत ने कॉमनवेल्थ स्तर पर बड़ी संख्या में पदक जीते हैं, जबकि कुश्ती में भी भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन लगातार मजबूत रहा है। बैडमिंटन और टेबल टेनिस में भी पिछले आयोजनों में भारतीय खिलाड़ियों ने कई पदक अपने नाम किए थे।
इस बार प्रतियोगिता को अपेक्षाकृत सीमित स्वरूप में आयोजित किया जा रहा है। कुल 10 खेलों में मुकाबले होंगे और इनमें 215 स्वर्ण पदक दांव पर रहेंगे। पैरा खिलाड़ियों के लिए भी आयोजन खास है। छह खेलों में पैरा स्पर्धाओं को मुख्य कार्यक्रम के साथ जोड़ा गया है और कुल 47 पैरा मेडल इवेंट होंगे। इसे कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास के सबसे बड़े एकीकृत पैरा स्पोर्ट्स कार्यक्रमों में गिना जा रहा है। इससे पैरा खिलाड़ियों को मुख्य प्रतियोगिता के साथ बड़े मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिलेगा।
एथलेटिक्स में भी इस बार एक पुरानी प्रतियोगिता वापस लौट रही है। कॉमनवेल्थ माइल को लंबे अंतराल के बाद कार्यक्रम में शामिल किया गया है। यह स्पर्धा आखिरी बार 1966 में आयोजित हुई थी। इसमें पारंपरिक 1500 मीटर दौड़ के स्थान पर एक मील यानी करीब 1.609 किलोमीटर की पुरुष और महिला रेस होगी। इस बदलाव को कॉमनवेल्थ गेम्स की पुरानी खेल परंपरा से जोड़कर देखा जा रहा है।
ग्लासगो दूसरी बार इन खेलों की मेजबानी कर रहा है। इससे पहले 2014 में भी शहर ने कॉमनवेल्थ गेम्स आयोजित किए थे। इस बार मुकाबलों को चार प्रमुख आयोजन स्थलों तक सीमित रखा गया है। इससे खिलाड़ियों, अधिकारियों और दर्शकों की आवाजाही को आसान बनाने की कोशिश की गई है। शहर में प्रतियोगिता से जुड़ी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं और अलग-अलग देशों के खिलाड़ी अपने अभ्यास सत्र में जुटे हैं।
ओपनिंग सेरेमनी भी भारतीय खेल प्रेमियों के लिए खास रहने वाली है। भारत की तरफ से ओलिंपिक पदक विजेता वेटलिफ्टर मीराबाई चानू और मुक्केबाज लवलीना बोरगोहेन को ध्वजवाहक की जिम्मेदारी दी गई है। उद्घाटन समारोह ग्लासगो के ओवीओ हाइड्रो एरीना में आयोजित होगा। भारतीय समय के अनुसार कार्यक्रम देर रात करीब 12:30 बजे शुरू होकर 2:30 बजे तक चलने की जानकारी है। समारोह में ब्रिटिश गायक टॉम वॉकर की प्रस्तुति भी प्रस्तावित है। भारतीय दल के मार्च पास्ट पर भी खास नजर रहेगी।
इस बार खिलाड़ियों को दिए जाने वाले पदकों के डिजाइन में भी कई बदलाव किए गए हैं। ग्लासगो की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को पदकों में जगह देने की कोशिश की गई है। इन्हें कलाकार और डिजाइनर मिलित्सा मिलेनकोवा ने तैयार किया है। डिजाइन में शहर के प्रमुख लैंडमार्क, औद्योगिक विरासत, स्थानीय प्रतीकों और सांस्कृतिक पहचान से प्रेरित तत्व शामिल किए गए हैं। खास बात यह है कि पहली बार पदकों में ब्रेल और स्पर्श से पहचाने जा सकने वाले टैक्टाइल एलिमेंट भी जोड़े गए हैं। इसका उद्देश्य पदकों को अधिक समावेशी बनाना है।
भारत के लिए इस संस्करण में सबसे बड़ी चुनौती उन खेलों की गैरमौजूदगी है, जिनसे आम तौर पर पदक तालिका में बड़ा योगदान मिलता रहा है। शूटिंग, कुश्ती, बैडमिंटन और टेबल टेनिस के हटने से भारतीय दल का आकार भी सीमित हुआ है। इसके बावजूद बॉक्सिंग, वेटलिफ्टिंग, एथलेटिक्स और दूसरे शामिल खेलों में भारतीय खिलाड़ियों से अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद है। लवलीना का पदक प्रतियोगिता शुरू होने से पहले ही सुनिश्चित होने से भारतीय खेमे को शुरुआती बढ़त मिली है।
कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत की यात्रा कई उतार-चढ़ाव से गुजरी है। भारत ने 1930 के पहले संस्करण में हिस्सा नहीं लिया था और 1934 में अपना अभियान शुरू किया। इसके बाद कुछ संस्करणों को छोड़कर भारतीय खिलाड़ी लगातार इस प्रतियोगिता का हिस्सा रहे। दशकों के दौरान भारत ने एथलेटिक्स और कुश्ती से आगे बढ़कर शूटिंग, वेटलिफ्टिंग, बैडमिंटन, टेबल टेनिस, बॉक्सिंग और हॉकी सहित कई खेलों में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई।
भारतीय दर्शक ग्लासगो से होने वाले मुकाबलों का सीधा प्रसारण टीवी और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर देख सकेंगे। उपलब्ध प्रसारण जानकारी के मुताबिक भारत में मुकाबले सोनी स्पोर्ट्स नेटवर्क पर दिखाए जाएंगे, जबकि डिजिटल लाइव स्ट्रीमिंग सोनी लिव पर उपलब्ध होगी। डीडी स्पोर्ट्स पर भी चुनिंदा प्रसारण उपलब्ध होने की जानकारी दी गई है। अलग-अलग स्पर्धाओं के समय में भारत और स्कॉटलैंड के टाइम जोन का अंतर रहेगा, इसलिए कई अहम मुकाबले भारतीय समय के अनुसार शाम और देर रात खेले जा सकते हैं।
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कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 का ग्लासगो में आगाज, भारत के 125 खिलाड़ी मैदान में
स्पोर्ट्स डेस्क
ग्लासगो में 23वें कॉमनवेल्थ गेम्स का आज से आगाज होने जा रहा है। स्कॉटलैंड का यह शहर एक बार फिर कॉमनवेल्थ देशों के खिलाड़ियों की मेजबानी के लिए तैयार है। 23 जुलाई से शुरू हो रहे खेल 2 अगस्त तक चलेंगे, जिसमें 74 देशों और क्षेत्रों से 3 हजार से अधिक खिलाड़ी अपनी चुनौती पेश करेंगे। इस बार 10 खेलों में कुल 215 मेडल इवेंट रखे गए हैं और इनमें 47 पैरा स्पोर्ट्स इवेंट भी शामिल हैं। भारत की ओर से 125 खिलाड़ियों का दल ग्लासगो पहुंचा है। भारतीय खिलाड़ी आठ खेलों में हिस्सा लेंगे। हालांकि हॉकी, बैडमिंटन, शूटिंग और कुश्ती जैसे उन खेलों को इस बार कार्यक्रम में जगह नहीं मिली है, जिनमें भारत का रिकॉर्ड काफी मजबूत रहा है। ऐसे में छोटे दल और सीमित खेलों के बावजूद भारतीय खिलाड़ियों से पदकों की उम्मीद बनी हुई है।
भारत के अभियान की शुरुआत से पहले ही बॉक्सिंग से अच्छी खबर आई है। ओलिंपिक पदक विजेता लवलीना बोरगोहेन ने महिलाओं के 75 किलोग्राम भार वर्ग में कम से कम कांस्य पदक सुनिश्चित कर लिया है। ड्रॉ में उन्हें क्वार्टर फाइनल में बाई मिली, जिससे वह सीधे सेमीफाइनल में पहुंच गई हैं। उनका सेमीफाइनल मुकाबला 31 जुलाई को टी.के.बी.पी. ताफाकी के खिलाफ निर्धारित है। बॉक्सिंग प्रतियोगिता में कांस्य पदक के लिए अलग मुकाबला नहीं होता। दोनों सेमीफाइनल में हारने वाले मुक्केबाजों को कांस्य दिया जाता है, इसलिए अंतिम चार में जगह बनाते ही लवलीना का पदक पक्का हो गया है। अब उनकी कोशिश फाइनल में पहुंचकर पदक का रंग बदलने की होगी।
कॉमनवेल्थ गेम्स का इतिहास करीब एक सदी पुराना है। इसकी पहली प्रतियोगिता 1930 में कनाडा के हैमिल्टन शहर में हुई थी। उस समय इन खेलों को ब्रिटिश एम्पायर गेम्स के नाम से जाना जाता था। शुरुआती आयोजन में 11 देशों के 400 से ज्यादा खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया था और एथलेटिक्स, मुक्केबाजी, लॉन बॉल्स, रोइंग, तैराकी और कुश्ती जैसी स्पर्धाएं कराई गई थीं। समय के साथ प्रतियोगिता का नाम कई बार बदला। 1954 में इसे ब्रिटिश एम्पायर एंड कॉमनवेल्थ गेम्स कहा गया, जबकि 1970 में नाम ब्रिटिश कॉमनवेल्थ गेम्स हुआ। वर्ष 1978 से यह आयोजन मौजूदा नाम यानी कॉमनवेल्थ गेम्स के रूप में आयोजित किया जा रहा है। सामान्य तौर पर इसका आयोजन चार साल में एक बार किया जाता है।
भारत ने इन खेलों में पहली बार 1934 में हिस्सा लिया था। लंदन में हुए उस संस्करण में भारतीय दल काफी छोटा था और केवल छह खिलाड़ी पहुंचे थे। भारत ने ट्रैक एंड फील्ड तथा कुश्ती की स्पर्धाओं में चुनौती पेश की थी। उसी प्रतियोगिता में पहलवान राशिद अनवर ने पुरुष फ्रीस्टाइल कुश्ती के 74 किलोग्राम वर्ग में कांस्य जीतकर भारत को कॉमनवेल्थ गेम्स इतिहास का पहला पदक दिलाया। शुरुआती वर्षों के मुकाबले बाद में भारत इस प्रतियोगिता की बड़ी खेल शक्तियों में शामिल हुआ। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार भारतीय खिलाड़ियों ने अब तक कॉमनवेल्थ गेम्स में कुल 564 पदक हासिल किए हैं, जिनमें 203 स्वर्ण, 189 रजत और 172 कांस्य शामिल हैं।
ग्लासगो में होने वाला इस बार का आयोजन भारत के लिए पिछले कई संस्करणों से अलग रहने वाला है। इसकी बड़ी वजह खेलों की संख्या में कटौती है। क्रिकेट, हॉकी, बैडमिंटन, शूटिंग, कुश्ती, टेबल टेनिस और स्क्वैश को 2026 के कार्यक्रम में शामिल नहीं किया गया है। इन खेलों का बाहर होना भारतीय पदक संभावनाओं पर सीधा असर डाल सकता है। खास तौर पर शूटिंग और कुश्ती लंबे समय से भारत के मजबूत खेल रहे हैं। शूटिंग में भारत ने कॉमनवेल्थ स्तर पर बड़ी संख्या में पदक जीते हैं, जबकि कुश्ती में भी भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन लगातार मजबूत रहा है। बैडमिंटन और टेबल टेनिस में भी पिछले आयोजनों में भारतीय खिलाड़ियों ने कई पदक अपने नाम किए थे।
इस बार प्रतियोगिता को अपेक्षाकृत सीमित स्वरूप में आयोजित किया जा रहा है। कुल 10 खेलों में मुकाबले होंगे और इनमें 215 स्वर्ण पदक दांव पर रहेंगे। पैरा खिलाड़ियों के लिए भी आयोजन खास है। छह खेलों में पैरा स्पर्धाओं को मुख्य कार्यक्रम के साथ जोड़ा गया है और कुल 47 पैरा मेडल इवेंट होंगे। इसे कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास के सबसे बड़े एकीकृत पैरा स्पोर्ट्स कार्यक्रमों में गिना जा रहा है। इससे पैरा खिलाड़ियों को मुख्य प्रतियोगिता के साथ बड़े मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिलेगा।
एथलेटिक्स में भी इस बार एक पुरानी प्रतियोगिता वापस लौट रही है। कॉमनवेल्थ माइल को लंबे अंतराल के बाद कार्यक्रम में शामिल किया गया है। यह स्पर्धा आखिरी बार 1966 में आयोजित हुई थी। इसमें पारंपरिक 1500 मीटर दौड़ के स्थान पर एक मील यानी करीब 1.609 किलोमीटर की पुरुष और महिला रेस होगी। इस बदलाव को कॉमनवेल्थ गेम्स की पुरानी खेल परंपरा से जोड़कर देखा जा रहा है।
ग्लासगो दूसरी बार इन खेलों की मेजबानी कर रहा है। इससे पहले 2014 में भी शहर ने कॉमनवेल्थ गेम्स आयोजित किए थे। इस बार मुकाबलों को चार प्रमुख आयोजन स्थलों तक सीमित रखा गया है। इससे खिलाड़ियों, अधिकारियों और दर्शकों की आवाजाही को आसान बनाने की कोशिश की गई है। शहर में प्रतियोगिता से जुड़ी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं और अलग-अलग देशों के खिलाड़ी अपने अभ्यास सत्र में जुटे हैं।
ओपनिंग सेरेमनी भी भारतीय खेल प्रेमियों के लिए खास रहने वाली है। भारत की तरफ से ओलिंपिक पदक विजेता वेटलिफ्टर मीराबाई चानू और मुक्केबाज लवलीना बोरगोहेन को ध्वजवाहक की जिम्मेदारी दी गई है। उद्घाटन समारोह ग्लासगो के ओवीओ हाइड्रो एरीना में आयोजित होगा। भारतीय समय के अनुसार कार्यक्रम देर रात करीब 12:30 बजे शुरू होकर 2:30 बजे तक चलने की जानकारी है। समारोह में ब्रिटिश गायक टॉम वॉकर की प्रस्तुति भी प्रस्तावित है। भारतीय दल के मार्च पास्ट पर भी खास नजर रहेगी।
इस बार खिलाड़ियों को दिए जाने वाले पदकों के डिजाइन में भी कई बदलाव किए गए हैं। ग्लासगो की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को पदकों में जगह देने की कोशिश की गई है। इन्हें कलाकार और डिजाइनर मिलित्सा मिलेनकोवा ने तैयार किया है। डिजाइन में शहर के प्रमुख लैंडमार्क, औद्योगिक विरासत, स्थानीय प्रतीकों और सांस्कृतिक पहचान से प्रेरित तत्व शामिल किए गए हैं। खास बात यह है कि पहली बार पदकों में ब्रेल और स्पर्श से पहचाने जा सकने वाले टैक्टाइल एलिमेंट भी जोड़े गए हैं। इसका उद्देश्य पदकों को अधिक समावेशी बनाना है।
भारत के लिए इस संस्करण में सबसे बड़ी चुनौती उन खेलों की गैरमौजूदगी है, जिनसे आम तौर पर पदक तालिका में बड़ा योगदान मिलता रहा है। शूटिंग, कुश्ती, बैडमिंटन और टेबल टेनिस के हटने से भारतीय दल का आकार भी सीमित हुआ है। इसके बावजूद बॉक्सिंग, वेटलिफ्टिंग, एथलेटिक्स और दूसरे शामिल खेलों में भारतीय खिलाड़ियों से अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद है। लवलीना का पदक प्रतियोगिता शुरू होने से पहले ही सुनिश्चित होने से भारतीय खेमे को शुरुआती बढ़त मिली है।
कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत की यात्रा कई उतार-चढ़ाव से गुजरी है। भारत ने 1930 के पहले संस्करण में हिस्सा नहीं लिया था और 1934 में अपना अभियान शुरू किया। इसके बाद कुछ संस्करणों को छोड़कर भारतीय खिलाड़ी लगातार इस प्रतियोगिता का हिस्सा रहे। दशकों के दौरान भारत ने एथलेटिक्स और कुश्ती से आगे बढ़कर शूटिंग, वेटलिफ्टिंग, बैडमिंटन, टेबल टेनिस, बॉक्सिंग और हॉकी सहित कई खेलों में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई।
भारतीय दर्शक ग्लासगो से होने वाले मुकाबलों का सीधा प्रसारण टीवी और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर देख सकेंगे। उपलब्ध प्रसारण जानकारी के मुताबिक भारत में मुकाबले सोनी स्पोर्ट्स नेटवर्क पर दिखाए जाएंगे, जबकि डिजिटल लाइव स्ट्रीमिंग सोनी लिव पर उपलब्ध होगी। डीडी स्पोर्ट्स पर भी चुनिंदा प्रसारण उपलब्ध होने की जानकारी दी गई है। अलग-अलग स्पर्धाओं के समय में भारत और स्कॉटलैंड के टाइम जोन का अंतर रहेगा, इसलिए कई अहम मुकाबले भारतीय समय के अनुसार शाम और देर रात खेले जा सकते हैं।
