भाभरा में किसानों को सीएम डॉ. मोहन यादव ने किया सम्मानित, प्राकृतिक खेती से बढ़ी आय और नई उम्मीदें

मध्य प्रदेश

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बलराम कृषि महोत्सव में किसानों ने साझा किए अनुभव, सरकारी योजनाओं से मिली मदद के साथ कम बारिश पर जताई चिंता

आलीराजपुर जिले के भाभरा में आयोजित बलराम कृषि महोत्सव किसानों के लिए खास अवसर बना। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के हाथों सम्मान पाने वाले किसानों ने खेती में किए गए अपने प्रयोग, प्राकृतिक कृषि से मिली सफलता और सरकारी योजनाओं से मिले सहयोग के अनुभव साझा किए। किसी किसान ने केसर आम के बड़े बगीचे को अपनी आय का मजबूत जरिया बनाया है तो कोई कम पानी में तैयार होने वाले मोटे अनाज और दलहन को प्राथमिकता दे रहा है। किसानों ने सम्मान मिलने पर खुशी जताने के साथ सिंचाई, फसल सुरक्षा, बेहतर बाजार, प्राकृतिक खेती के प्रमाणीकरण और कम बारिश से होने वाले संभावित नुकसान जैसे मुद्दे भी सामने रखे।

कांदा क्षेत्र के किसान यशपाल सिंह प्राकृतिक पद्धति से केसर आम का उत्पादन कर रहे हैं। करीब 18 एकड़ में फैले उनके बगीचे में एक हजार से अधिक आम के पेड़ हैं। उन्होंने अपनी खेती की शुरुआत सरकारी सहयोग से की थी। शुरुआती दौर में कृषि विभाग से करीब 400 पौधे उपलब्ध कराए गए और आर्थिक सहायता भी मिली। समय के साथ उन्होंने बगीचे का विस्तार किया और आज उनके यहां तैयार होने वाले आम दूसरे राज्यों तक पहुंच रहे हैं। यशपाल के मुताबिक उनके उत्पाद की मांग ऐसी है कि कई खरीदार सीधे उनके क्षेत्र तक पहुंच जाते हैं। सोलर पंप योजना से सिंचाई व्यवस्था में भी सहायता मिली है। अब उनकी कोशिश प्राकृतिक खेती का प्रमाणपत्र हासिल करने की है, ताकि भविष्य में अपने केसर आम को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने की संभावना तलाश सकें।

जोबट क्षेत्र के कांदा गांव के विजय सिंह भी केसर आम की बागवानी को आय का प्रमुख जरिया बना चुके हैं। करीब नौ एकड़ जमीन पर उनके एक हजार से अधिक आम के पेड़ हैं। बागवानी विकसित करने के दौरान उन्हें विभाग से पौधों और आर्थिक सहायता का लाभ मिला। विजय के अनुसार इस वर्ष उन्होंने करीब आठ लाख रुपये मूल्य के आम बेचे और अधिकांश उपज स्थानीय स्तर पर ही आसानी से बिक गई। इससे उन्हें दूर के बाजारों तक फसल पहुंचाने का अतिरिक्त खर्च नहीं उठाना पड़ा। हालांकि उन्होंने बागानों की सुरक्षा को बड़ी जरूरत बताया। उनका कहना है कि यदि तार फेंसिंग जैसी सुविधा के लिए अतिरिक्त सहायता उपलब्ध हो तो पेड़ों और तैयार फसल को नुकसान से बचाना आसान होगा।

जानिया-केल्दी क्षेत्र की किसान माल मोटे अनाज और दलहन आधारित खेती करती हैं। करीब दो से तीन हेक्टेयर कृषि भूमि पर ज्वार, बाजरा और मक्का के साथ तुअर तथा उड़द जैसी फसलें उगाई जाती हैं। इस वर्ष अपेक्षाकृत कम बारिश के कारण किसानों की चिंता बढ़ी है, लेकिन मोटे अनाज की कई फसलें कम पानी में भी तैयार हो सकती हैं। इसी कारण ऐसे क्षेत्रों में इन फसलों को बेहतर विकल्प माना जा रहा है। किसान का कहना है कि मौसम की मार से फसल खराब होने की स्थिति में फसल बीमा से मिलने वाली सहायता आर्थिक नुकसान को कुछ हद तक कम करती है। कृषि विभाग के अधिकारी भी समय-समय पर खेती की तकनीक और योजनाओं से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराते हैं।

औजड़ की किसान पूनम सिंह करीब 1.30 एकड़ भूमि पर अलग-अलग फसलों की खेती करती हैं। उनके खेत में कपास, ज्वार, बाजरा, मूंगफली और सोयाबीन जैसी फसलें ली जाती हैं। मौजूदा खरीफ सीजन में उन्होंने कपास और बाजरा बोया है। कम वर्षा के कारण उत्पादन प्रभावित होने की आशंका जरूर बनी हुई है, लेकिन उनका कहना है कि सरकारी सहायता योजनाएं किसानों को जोखिम से निपटने में मदद करती हैं। कृषि उपज की बिक्री मंडी के जरिए होने और पात्रता के अनुसार विभिन्न योजनाओं का लाभ मिलने से खेती को जारी रखने में सहारा मिलता है।

पूनम सिंह के मुताबिक कृषि विभाग से उन्हें जैविक और प्राकृतिक खाद के इस्तेमाल के साथ आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी भी मिलती रहती है। छोटे किसानों के लिए केवल आर्थिक सहायता ही नहीं, बल्कि सही समय पर तकनीकी मार्गदर्शन भी महत्वपूर्ण है। मिट्टी की जरूरत के अनुसार फसल चुनने, प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने और खेती की लागत घटाने से जुड़ी जानकारी किसानों की उत्पादकता बढ़ाने में मदद कर सकती है।

सोरवा के किसान मुकेश करीब नौ एकड़ जमीन पर सोयाबीन, उड़द, मूंगफली और कपास की खेती करते हैं। वे प्राकृतिक खेती की दिशा में भी काम कर रहे हैं। उनके अनुसार विभाग की ओर से खाद-बीज और कृषि पद्धतियों से संबंधित मार्गदर्शन मिलता है। प्रशिक्षण और सलाह के जरिए किसानों को बदलते मौसम के अनुसार फसल प्रबंधन के तरीके समझाए जाते हैं। इस वर्ष कम बारिश उनके लिए भी चिंता का विषय बनी हुई है। यदि पर्याप्त वर्षा नहीं हुई और सूखे जैसी परिस्थिति बनी तो खरीफ की पैदावार प्रभावित हो सकती है। ऐसे में उन्होंने संभावित नुकसान की स्थिति में किसानों के लिए पर्याप्त आर्थिक सहायता की जरूरत बताई।

आमखूंट के किसान नौरतन सीमित कृषि भूमि पर प्राकृतिक तरीके से खेती कर रहे हैं। उनके पास करीब ढाई से तीन एकड़ जमीन है, जिसमें धान, ज्वार, बाजरा, उड़द और तुअर जैसी फसलें ली जाती हैं। मौजूदा मौसम में कम वर्षा को देखते हुए उन्होंने उड़द को प्राथमिकता दी है, क्योंकि यह अपेक्षाकृत कम पानी में तैयार होने वाली फसलों में शामिल है। उनका कहना है कि सरकारी योजनाओं का लाभ मिल रहा है, लेकिन किसानों के लिए अपनी उपज का बेहतर मूल्य सुनिश्चित होना भी बेहद जरूरी है। उत्पादन लागत और मौसम के बढ़ते जोखिम के बीच उचित कीमत किसानों की आय के लिए महत्वपूर्ण आधार बनती है।

नानपुर की किसान गनबाई भी प्राकृतिक खेती से जुड़ी हैं। करीब दो एकड़ खेत में वे मक्का, ज्वार, बाजरा, मूंगफली और उड़द जैसी फसलें उगाती हैं। उन्हें भी मुख्यमंत्री के हाथों सम्मानित किए जाने की जानकारी मिली थी और उन्होंने कार्यक्रम में शामिल होने की तैयारी कर ली थी, लेकिन परिवार में शोक होने के कारण वे उपस्थित नहीं हो सकीं। इसके बावजूद किसान स्तर पर किए जा रहे काम को पहचान मिलने को उन्होंने महत्वपूर्ण बताया।

गनबाई के अनुसार प्राकृतिक खेती के लिए उन्हें विभागीय स्तर पर खाद और बीज से जुड़ी सहायता मिलती है। कृषि विज्ञान केंद्र के माध्यम से प्रशिक्षण कार्यक्रमों में किसानों को बेहतर कृषि तकनीक, प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल और फसल प्रबंधन की जानकारी दी जाती है। कम बारिश के मौजूदा हालात को देखते हुए उनके जैसे छोटे किसान ऐसी फसलों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं, जिनकी पानी की जरूरत अपेक्षाकृत कम होती है।

भाभरा के बलराम कृषि महोत्सव में सामने आए किसानों के अनुभवों में बागवानी से लेकर मोटे अनाज और प्राकृतिक खेती तक अलग-अलग कृषि मॉडल दिखाई दिए। केसर आम की व्यावसायिक खेती करने वाले किसान अब दूसरे राज्यों के बाद विदेशी बाजार तक पहुंच बनाने की तैयारी करना चाहते हैं। वहीं छोटे और सीमांत किसान कम पानी वाली फसलों, फसल बीमा, कृषि प्रशिक्षण और सरकारी सहायता को खेती के जोखिम कम करने का जरिया मान रहे हैं। किसानों ने तार फेंसिंग, प्राकृतिक उत्पादों के प्रमाणीकरण, बेहतर उपज मूल्य और मौसम से होने वाले नुकसान की स्थिति में पर्याप्त सहायता जैसी जरूरतें भी सामने रखीं।

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23 Jul 2026 By Priyanka

भाभरा में किसानों को सीएम डॉ. मोहन यादव ने किया सम्मानित, प्राकृतिक खेती से बढ़ी आय और नई उम्मीदें

मध्य प्रदेश

आलीराजपुर जिले के भाभरा में आयोजित बलराम कृषि महोत्सव किसानों के लिए खास अवसर बना। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के हाथों सम्मान पाने वाले किसानों ने खेती में किए गए अपने प्रयोग, प्राकृतिक कृषि से मिली सफलता और सरकारी योजनाओं से मिले सहयोग के अनुभव साझा किए। किसी किसान ने केसर आम के बड़े बगीचे को अपनी आय का मजबूत जरिया बनाया है तो कोई कम पानी में तैयार होने वाले मोटे अनाज और दलहन को प्राथमिकता दे रहा है। किसानों ने सम्मान मिलने पर खुशी जताने के साथ सिंचाई, फसल सुरक्षा, बेहतर बाजार, प्राकृतिक खेती के प्रमाणीकरण और कम बारिश से होने वाले संभावित नुकसान जैसे मुद्दे भी सामने रखे।

कांदा क्षेत्र के किसान यशपाल सिंह प्राकृतिक पद्धति से केसर आम का उत्पादन कर रहे हैं। करीब 18 एकड़ में फैले उनके बगीचे में एक हजार से अधिक आम के पेड़ हैं। उन्होंने अपनी खेती की शुरुआत सरकारी सहयोग से की थी। शुरुआती दौर में कृषि विभाग से करीब 400 पौधे उपलब्ध कराए गए और आर्थिक सहायता भी मिली। समय के साथ उन्होंने बगीचे का विस्तार किया और आज उनके यहां तैयार होने वाले आम दूसरे राज्यों तक पहुंच रहे हैं। यशपाल के मुताबिक उनके उत्पाद की मांग ऐसी है कि कई खरीदार सीधे उनके क्षेत्र तक पहुंच जाते हैं। सोलर पंप योजना से सिंचाई व्यवस्था में भी सहायता मिली है। अब उनकी कोशिश प्राकृतिक खेती का प्रमाणपत्र हासिल करने की है, ताकि भविष्य में अपने केसर आम को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने की संभावना तलाश सकें।

जोबट क्षेत्र के कांदा गांव के विजय सिंह भी केसर आम की बागवानी को आय का प्रमुख जरिया बना चुके हैं। करीब नौ एकड़ जमीन पर उनके एक हजार से अधिक आम के पेड़ हैं। बागवानी विकसित करने के दौरान उन्हें विभाग से पौधों और आर्थिक सहायता का लाभ मिला। विजय के अनुसार इस वर्ष उन्होंने करीब आठ लाख रुपये मूल्य के आम बेचे और अधिकांश उपज स्थानीय स्तर पर ही आसानी से बिक गई। इससे उन्हें दूर के बाजारों तक फसल पहुंचाने का अतिरिक्त खर्च नहीं उठाना पड़ा। हालांकि उन्होंने बागानों की सुरक्षा को बड़ी जरूरत बताया। उनका कहना है कि यदि तार फेंसिंग जैसी सुविधा के लिए अतिरिक्त सहायता उपलब्ध हो तो पेड़ों और तैयार फसल को नुकसान से बचाना आसान होगा।

जानिया-केल्दी क्षेत्र की किसान माल मोटे अनाज और दलहन आधारित खेती करती हैं। करीब दो से तीन हेक्टेयर कृषि भूमि पर ज्वार, बाजरा और मक्का के साथ तुअर तथा उड़द जैसी फसलें उगाई जाती हैं। इस वर्ष अपेक्षाकृत कम बारिश के कारण किसानों की चिंता बढ़ी है, लेकिन मोटे अनाज की कई फसलें कम पानी में भी तैयार हो सकती हैं। इसी कारण ऐसे क्षेत्रों में इन फसलों को बेहतर विकल्प माना जा रहा है। किसान का कहना है कि मौसम की मार से फसल खराब होने की स्थिति में फसल बीमा से मिलने वाली सहायता आर्थिक नुकसान को कुछ हद तक कम करती है। कृषि विभाग के अधिकारी भी समय-समय पर खेती की तकनीक और योजनाओं से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराते हैं।

औजड़ की किसान पूनम सिंह करीब 1.30 एकड़ भूमि पर अलग-अलग फसलों की खेती करती हैं। उनके खेत में कपास, ज्वार, बाजरा, मूंगफली और सोयाबीन जैसी फसलें ली जाती हैं। मौजूदा खरीफ सीजन में उन्होंने कपास और बाजरा बोया है। कम वर्षा के कारण उत्पादन प्रभावित होने की आशंका जरूर बनी हुई है, लेकिन उनका कहना है कि सरकारी सहायता योजनाएं किसानों को जोखिम से निपटने में मदद करती हैं। कृषि उपज की बिक्री मंडी के जरिए होने और पात्रता के अनुसार विभिन्न योजनाओं का लाभ मिलने से खेती को जारी रखने में सहारा मिलता है।

पूनम सिंह के मुताबिक कृषि विभाग से उन्हें जैविक और प्राकृतिक खाद के इस्तेमाल के साथ आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी भी मिलती रहती है। छोटे किसानों के लिए केवल आर्थिक सहायता ही नहीं, बल्कि सही समय पर तकनीकी मार्गदर्शन भी महत्वपूर्ण है। मिट्टी की जरूरत के अनुसार फसल चुनने, प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने और खेती की लागत घटाने से जुड़ी जानकारी किसानों की उत्पादकता बढ़ाने में मदद कर सकती है।

सोरवा के किसान मुकेश करीब नौ एकड़ जमीन पर सोयाबीन, उड़द, मूंगफली और कपास की खेती करते हैं। वे प्राकृतिक खेती की दिशा में भी काम कर रहे हैं। उनके अनुसार विभाग की ओर से खाद-बीज और कृषि पद्धतियों से संबंधित मार्गदर्शन मिलता है। प्रशिक्षण और सलाह के जरिए किसानों को बदलते मौसम के अनुसार फसल प्रबंधन के तरीके समझाए जाते हैं। इस वर्ष कम बारिश उनके लिए भी चिंता का विषय बनी हुई है। यदि पर्याप्त वर्षा नहीं हुई और सूखे जैसी परिस्थिति बनी तो खरीफ की पैदावार प्रभावित हो सकती है। ऐसे में उन्होंने संभावित नुकसान की स्थिति में किसानों के लिए पर्याप्त आर्थिक सहायता की जरूरत बताई।

आमखूंट के किसान नौरतन सीमित कृषि भूमि पर प्राकृतिक तरीके से खेती कर रहे हैं। उनके पास करीब ढाई से तीन एकड़ जमीन है, जिसमें धान, ज्वार, बाजरा, उड़द और तुअर जैसी फसलें ली जाती हैं। मौजूदा मौसम में कम वर्षा को देखते हुए उन्होंने उड़द को प्राथमिकता दी है, क्योंकि यह अपेक्षाकृत कम पानी में तैयार होने वाली फसलों में शामिल है। उनका कहना है कि सरकारी योजनाओं का लाभ मिल रहा है, लेकिन किसानों के लिए अपनी उपज का बेहतर मूल्य सुनिश्चित होना भी बेहद जरूरी है। उत्पादन लागत और मौसम के बढ़ते जोखिम के बीच उचित कीमत किसानों की आय के लिए महत्वपूर्ण आधार बनती है।

नानपुर की किसान गनबाई भी प्राकृतिक खेती से जुड़ी हैं। करीब दो एकड़ खेत में वे मक्का, ज्वार, बाजरा, मूंगफली और उड़द जैसी फसलें उगाती हैं। उन्हें भी मुख्यमंत्री के हाथों सम्मानित किए जाने की जानकारी मिली थी और उन्होंने कार्यक्रम में शामिल होने की तैयारी कर ली थी, लेकिन परिवार में शोक होने के कारण वे उपस्थित नहीं हो सकीं। इसके बावजूद किसान स्तर पर किए जा रहे काम को पहचान मिलने को उन्होंने महत्वपूर्ण बताया।

गनबाई के अनुसार प्राकृतिक खेती के लिए उन्हें विभागीय स्तर पर खाद और बीज से जुड़ी सहायता मिलती है। कृषि विज्ञान केंद्र के माध्यम से प्रशिक्षण कार्यक्रमों में किसानों को बेहतर कृषि तकनीक, प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल और फसल प्रबंधन की जानकारी दी जाती है। कम बारिश के मौजूदा हालात को देखते हुए उनके जैसे छोटे किसान ऐसी फसलों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं, जिनकी पानी की जरूरत अपेक्षाकृत कम होती है।

भाभरा के बलराम कृषि महोत्सव में सामने आए किसानों के अनुभवों में बागवानी से लेकर मोटे अनाज और प्राकृतिक खेती तक अलग-अलग कृषि मॉडल दिखाई दिए। केसर आम की व्यावसायिक खेती करने वाले किसान अब दूसरे राज्यों के बाद विदेशी बाजार तक पहुंच बनाने की तैयारी करना चाहते हैं। वहीं छोटे और सीमांत किसान कम पानी वाली फसलों, फसल बीमा, कृषि प्रशिक्षण और सरकारी सहायता को खेती के जोखिम कम करने का जरिया मान रहे हैं। किसानों ने तार फेंसिंग, प्राकृतिक उत्पादों के प्रमाणीकरण, बेहतर उपज मूल्य और मौसम से होने वाले नुकसान की स्थिति में पर्याप्त सहायता जैसी जरूरतें भी सामने रखीं।

https://www.dainikjagranmpcg.com/state/madhya-pradesh/cm-dr-mohan-yadav-honored-the-farmers-in-bhabhra-increase/article-59598

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