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GGU में BA-LLB छठे सेमेस्टर की परीक्षा रद्द, 27 जुलाई से दोबारा होंगे पेपर
छत्तीसगढ़
पेपर लीक विवाद के बाद विश्वविद्यालय का फैसला, जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग पर अड़े छात्र
गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय (GGU) में BA-LLB छठे सेमेस्टर की परीक्षा को लेकर विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने 7 मई से 28 मई के बीच कराई गई छठे सेमेस्टर की परीक्षाओं को निरस्त करते हुए अब नए सिरे से परीक्षा कराने का निर्णय लिया है। संशोधित कार्यक्रम के अनुसार दोबारा परीक्षाएं 27 जुलाई से शुरू होंगी। विश्वविद्यालय ने परीक्षा रद्द करने के पीछे प्रशासनिक कारणों का उल्लेख किया है, लेकिन मामला पहले सामने आए कथित प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा से जुड़े गोपनीय डेटा तक अनधिकृत पहुंच के आरोपों से जुड़ा बताया जा रहा है। आदेश जारी होने के बाद विधि विभाग के छात्रों ने इस फैसले पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि सभी विद्यार्थियों को दोबारा परीक्षा में बैठाने से पहले विश्वविद्यालय को उस जांच की पूरी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, जिसके आधार पर पहले हो चुकी परीक्षाओं को अमान्य करने जैसा बड़ा निर्णय लिया गया।
परीक्षा निरस्त किए जाने और नया टाइम टेबल सामने आने के बाद छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन के समक्ष अपनी आपत्ति दर्ज कराई। छात्रों की प्रमुख मांग है कि मामले की जांच के लिए गठित फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। उनका सवाल है कि यदि गड़बड़ी कुछ लोगों के स्तर पर हुई है तो उसकी जिम्मेदारी तय करने के बजाय पूरे सेमेस्टर के विद्यार्थियों को फिर से परीक्षा देने के लिए क्यों कहा जा रहा है। छात्रों ने पुनर्परीक्षा के निर्णय पर पुनर्विचार करने, कथित पेपर लीक के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान करने और उनके खिलाफ कार्रवाई की जानकारी सामने रखने की मांग की है। विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार प्रो. अश्विनी दीक्षित सहित अधिकारियों ने आपत्ति दर्ज कराने पहुंचे विद्यार्थियों से बातचीत की और प्रशासनिक निर्णय से जुड़ी परिस्थितियों को समझाने की कोशिश की। इसके बावजूद छात्र जांच रिपोर्ट और कार्रवाई को लेकर अधिक स्पष्टता की मांग कर रहे हैं।
इस पूरे मामले में विश्वविद्यालय की कार्रवाई के समय को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। जानकारी के मुताबिक प्रश्नपत्र और परीक्षा संबंधी गोपनीय जानकारी की सुरक्षा पर सवाल उठने के बाद पांच सदस्यीय फैक्ट फाइंडिंग कमेटी बनाई गई थी। समिति ने अपनी जांच पूरी कर 6 जून को रिपोर्ट विश्वविद्यालय प्रशासन को सौंप दी थी। इसके बाद भी परीक्षा रद्द करने का फैसला तत्काल सामने नहीं आया। रिपोर्ट पर एक महीने से अधिक समय तक प्रशासनिक स्तर पर विचार होने के बाद परीक्षा निरस्त करने का आदेश जारी किया गया। छात्रों का कहना है कि यदि जांच में ऐसी गंभीर गड़बड़ी सामने आ चुकी थी, जिसके कारण पूरी परीक्षा रद्द करना जरूरी था, तो निर्णय लेने में इतना समय क्यों लगा। इस देरी के कारण विद्यार्थियों की पढ़ाई और आगे की शैक्षणिक योजना भी प्रभावित हुई है।
मामले में सबसे अहम पहलू विश्वविद्यालय के डिजिटल परीक्षा सिस्टम से जुड़ा है। प्रारंभिक जांच में कथित तौर पर यह बात सामने आई कि विश्वविद्यालय का ‘समर्थ’ पोर्टल बाहरी साइबर हमले या तकनीकी हैकिंग का शिकार नहीं हुआ था। इसके बजाय गोपनीय परीक्षा सामग्री तक पहुंच वैध लॉगिन आईडी और पासवर्ड के जरिए होने की आशंका जताई गई। यदि यह तथ्य आगे की जांच में भी सही पाया जाता है तो मामला केवल तकनीकी सुरक्षा में सेंध का नहीं, बल्कि अधिकृत डिजिटल क्रेडेंशियल के गलत इस्तेमाल का हो सकता है।
यही वजह है कि अब यह पता लगाना महत्वपूर्ण हो गया है कि परीक्षा से जुड़ी संवेदनशील जानकारी तक किन लोगों की पहुंच थी। प्रश्नपत्र और दूसरे गोपनीय दस्तावेजों को देखने या डाउनलोड करने की अनुमति किन यूजर अकाउंट को दी गई थी, लॉगिन कब और कहां से किया गया और संबंधित सामग्री आगे किस तरह पहुंची, जैसे सवाल जांच के केंद्र में हैं। विश्वविद्यालय के डिजिटल सिस्टम में लॉगिन रिकॉर्ड और अन्य तकनीकी डेटा की जांच से इस मामले में महत्वपूर्ण जानकारी सामने आ सकती है।
फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की जांच से जुड़ी जानकारी में यह भी सामने आया है कि मामले की गहराई से पड़ताल के लिए पुलिस जांच की जरूरत बताई गई। कथित तौर पर समिति ने यह पता लगाने की सिफारिश की कि गोपनीय परीक्षा सामग्री तक पहुंच किसने बनाई और वह विश्वविद्यालय के नियंत्रित सिस्टम से बाहर कैसे पहुंची। इस घटनाक्रम के बाद विश्वविद्यालय स्तर पर विभागीय जांच की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई गई है।
विभागीय जांच के लिए वरिष्ठ शैक्षणिक और प्रशासनिक अधिकारियों को जिम्मेदारी दी गई है। इसमें प्रो. एससी श्रीवास्तव, चीफ प्रॉक्टर प्रो. मुकेश कुमार सिंह, प्रो. खेमचंद देवांगन, ओएसडी प्रो. भारती अहिरवार और सहायक कुलसचिव परीक्षा टीपी सिंह के शामिल होने की जानकारी है। समिति के सामने परीक्षा प्रबंधन, गोपनीय दस्तावेजों की सुरक्षा, डिजिटल एक्सेस और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी जैसे बिंदुओं की जांच महत्वपूर्ण रहेगी।
पेपर लीक से जुड़े विवाद का असर विश्वविद्यालय के विधि विभाग की प्रशासनिक व्यवस्था पर पहले ही दिखाई दे चुका है। पूर्व में विधि विभाग के तत्कालीन विभागाध्यक्ष और विधि संकाय के डीन प्रो. सुधांशु रंजन महापात्र को जिम्मेदारी से हटाया गया था। परीक्षा प्रबंधन और विभागीय निगरानी को लेकर सवाल उठने के बाद यह बदलाव किया गया। इसके बाद इतिहास विभाग के प्रो. प्रवीण मिश्रा को विधि विभाग के डीन और विभागाध्यक्ष की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई।
हालांकि छात्रों का कहना है कि केवल प्रशासनिक पदों पर बदलाव से पूरे मामले के सवाल खत्म नहीं होते। वे जानना चाहते हैं कि जांच में वास्तविक रूप से क्या पाया गया, परीक्षा की गोपनीयता किस स्तर पर प्रभावित हुई और जिन पेपरों को रद्द किया गया है, उनमें से कितने प्रश्नपत्र कथित तौर पर पहले बाहर पहुंचे थे। इसी आधार पर छात्र पूरी परीक्षा रद्द करने के औचित्य पर सवाल उठा रहे हैं।
BA-LLB छठे सेमेस्टर की परीक्षा पहले ही 7 मई से 28 मई के बीच पूरी हो चुकी थी। छात्र सभी निर्धारित पेपर दे चुके थे और आगे की शैक्षणिक प्रक्रिया का इंतजार कर रहे थे। अब परीक्षा रद्द होने के कारण उन्हें उसी सेमेस्टर के विषयों की दोबारा तैयारी करनी होगी। 27 जुलाई से पुनर्परीक्षा शुरू होने के कारण विद्यार्थियों के पास तैयारी के लिए सीमित समय होने की बात भी सामने आ रही है।
छात्रों की नाराजगी का एक कारण यह भी है कि कथित गड़बड़ी परीक्षा संचालन या गोपनीय सामग्री की सुरक्षा से संबंधित है, जबकि उसका सीधा असर उन सभी विद्यार्थियों पर पड़ा है जिन्होंने निर्धारित प्रक्रिया के तहत परीक्षा दी थी। छात्र प्रतिनिधियों की मांग है कि यदि प्रशासन के पास पेपर लीक के ठोस प्रमाण हैं तो उन्हें कम से कम यह स्पष्ट करना चाहिए कि परीक्षा की निष्पक्षता किस तरह प्रभावित हुई और पूरे सेमेस्टर की परीक्षा रद्द करना क्यों जरूरी हो गया।
मामला विश्वविद्यालय परिसर से बाहर भी पहुंच चुका है। छात्रों ने पहले भी उच्च स्तर पर शिकायत भेजकर हस्तक्षेप की मांग की थी। विश्वविद्यालय के विजिटर सहित संवैधानिक स्तर के कार्यालयों तक शिकायत पहुंचाए जाने की बात सामने आई है। छात्रों ने परीक्षा व्यवस्था में कथित गड़बड़ी और उसके बाद हुई प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर निष्पक्ष जांच की मांग उठाई थी।
इस विवाद ने विश्वविद्यालयों में डिजिटल परीक्षा प्रबंधन की सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। अब अधिकांश विश्वविद्यालय प्रश्नपत्र तैयार करने, परीक्षा कार्यक्रम, गोपनीय दस्तावेज और दूसरे अकादमिक डेटा के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं। ऐसी स्थिति में केवल सर्वर को हैकिंग से बचाना पर्याप्त नहीं होता। अधिकृत यूजर आईडी और पासवर्ड की सुरक्षा, लॉगिन अधिकार सीमित करना और संवेदनशील फाइलों तक पहुंच का डिजिटल रिकॉर्ड बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
यदि वैध लॉगिन क्रेडेंशियल का इस्तेमाल करके परीक्षा सामग्री तक अनधिकृत तरीके से पहुंच बनाई गई थी, तो जांच का दायरा उन सभी लोगों तक जा सकता है जिनके पास संबंधित सिस्टम की अनुमति थी। यह भी देखा जा सकता है कि पासवर्ड साझा किए गए थे या किसी अन्य व्यक्ति ने बिना अनुमति उनका इस्तेमाल किया। इन्हीं तकनीकी और प्रशासनिक पहलुओं के आधार पर जिम्मेदारी तय होने की संभावना है।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने फिलहाल पुनर्परीक्षा की तैयारी आगे बढ़ा दी है। संशोधित कार्यक्रम के तहत BA-LLB छठे सेमेस्टर के छात्रों को 27 जुलाई से दोबारा परीक्षा देनी होगी। परीक्षा केंद्र, प्रश्नपत्रों की गोपनीयता और डिजिटल डेटा की सुरक्षा को लेकर इस बार अतिरिक्त सतर्कता बरते जाने की जरूरत होगी। छात्रों की नजर इस बात पर भी है कि पहले हुई कथित चूक के बाद नए प्रश्नपत्रों की सुरक्षा के लिए विश्वविद्यालय क्या व्यवस्था करता है।
फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग फिलहाल छात्रों के विरोध का मुख्य मुद्दा बनी हुई है। विद्यार्थी यह भी चाहते हैं कि पुनर्परीक्षा कराने से पहले जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया की स्थिति स्पष्ट की जाए। दूसरी ओर विश्वविद्यालय प्रशासन परीक्षा रद्द करने का आदेश जारी कर नया कार्यक्रम घोषित कर चुका है। ऐसे में 27 जुलाई से प्रस्तावित परीक्षा से पहले प्रशासन और छात्रों के बीच इस मुद्दे पर गतिविधियां और तेज हो सकती हैं।
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गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय (GGU) में BA-LLB छठे सेमेस्टर की परीक्षा को लेकर विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने 7 मई से 28 मई के बीच कराई गई छठे सेमेस्टर की परीक्षाओं को निरस्त करते हुए अब नए सिरे से परीक्षा कराने का निर्णय लिया है। संशोधित कार्यक्रम के अनुसार दोबारा परीक्षाएं 27 जुलाई से शुरू होंगी। विश्वविद्यालय ने परीक्षा रद्द करने के पीछे प्रशासनिक कारणों का उल्लेख किया है, लेकिन मामला पहले सामने आए कथित प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा से जुड़े गोपनीय डेटा तक अनधिकृत पहुंच के आरोपों से जुड़ा बताया जा रहा है। आदेश जारी होने के बाद विधि विभाग के छात्रों ने इस फैसले पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि सभी विद्यार्थियों को दोबारा परीक्षा में बैठाने से पहले विश्वविद्यालय को उस जांच की पूरी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, जिसके आधार पर पहले हो चुकी परीक्षाओं को अमान्य करने जैसा बड़ा निर्णय लिया गया।
परीक्षा निरस्त किए जाने और नया टाइम टेबल सामने आने के बाद छात्रों ने विश्वविद्यालय प्रशासन के समक्ष अपनी आपत्ति दर्ज कराई। छात्रों की प्रमुख मांग है कि मामले की जांच के लिए गठित फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। उनका सवाल है कि यदि गड़बड़ी कुछ लोगों के स्तर पर हुई है तो उसकी जिम्मेदारी तय करने के बजाय पूरे सेमेस्टर के विद्यार्थियों को फिर से परीक्षा देने के लिए क्यों कहा जा रहा है। छात्रों ने पुनर्परीक्षा के निर्णय पर पुनर्विचार करने, कथित पेपर लीक के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान करने और उनके खिलाफ कार्रवाई की जानकारी सामने रखने की मांग की है। विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार प्रो. अश्विनी दीक्षित सहित अधिकारियों ने आपत्ति दर्ज कराने पहुंचे विद्यार्थियों से बातचीत की और प्रशासनिक निर्णय से जुड़ी परिस्थितियों को समझाने की कोशिश की। इसके बावजूद छात्र जांच रिपोर्ट और कार्रवाई को लेकर अधिक स्पष्टता की मांग कर रहे हैं।
इस पूरे मामले में विश्वविद्यालय की कार्रवाई के समय को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। जानकारी के मुताबिक प्रश्नपत्र और परीक्षा संबंधी गोपनीय जानकारी की सुरक्षा पर सवाल उठने के बाद पांच सदस्यीय फैक्ट फाइंडिंग कमेटी बनाई गई थी। समिति ने अपनी जांच पूरी कर 6 जून को रिपोर्ट विश्वविद्यालय प्रशासन को सौंप दी थी। इसके बाद भी परीक्षा रद्द करने का फैसला तत्काल सामने नहीं आया। रिपोर्ट पर एक महीने से अधिक समय तक प्रशासनिक स्तर पर विचार होने के बाद परीक्षा निरस्त करने का आदेश जारी किया गया। छात्रों का कहना है कि यदि जांच में ऐसी गंभीर गड़बड़ी सामने आ चुकी थी, जिसके कारण पूरी परीक्षा रद्द करना जरूरी था, तो निर्णय लेने में इतना समय क्यों लगा। इस देरी के कारण विद्यार्थियों की पढ़ाई और आगे की शैक्षणिक योजना भी प्रभावित हुई है।
मामले में सबसे अहम पहलू विश्वविद्यालय के डिजिटल परीक्षा सिस्टम से जुड़ा है। प्रारंभिक जांच में कथित तौर पर यह बात सामने आई कि विश्वविद्यालय का ‘समर्थ’ पोर्टल बाहरी साइबर हमले या तकनीकी हैकिंग का शिकार नहीं हुआ था। इसके बजाय गोपनीय परीक्षा सामग्री तक पहुंच वैध लॉगिन आईडी और पासवर्ड के जरिए होने की आशंका जताई गई। यदि यह तथ्य आगे की जांच में भी सही पाया जाता है तो मामला केवल तकनीकी सुरक्षा में सेंध का नहीं, बल्कि अधिकृत डिजिटल क्रेडेंशियल के गलत इस्तेमाल का हो सकता है।
यही वजह है कि अब यह पता लगाना महत्वपूर्ण हो गया है कि परीक्षा से जुड़ी संवेदनशील जानकारी तक किन लोगों की पहुंच थी। प्रश्नपत्र और दूसरे गोपनीय दस्तावेजों को देखने या डाउनलोड करने की अनुमति किन यूजर अकाउंट को दी गई थी, लॉगिन कब और कहां से किया गया और संबंधित सामग्री आगे किस तरह पहुंची, जैसे सवाल जांच के केंद्र में हैं। विश्वविद्यालय के डिजिटल सिस्टम में लॉगिन रिकॉर्ड और अन्य तकनीकी डेटा की जांच से इस मामले में महत्वपूर्ण जानकारी सामने आ सकती है।
फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की जांच से जुड़ी जानकारी में यह भी सामने आया है कि मामले की गहराई से पड़ताल के लिए पुलिस जांच की जरूरत बताई गई। कथित तौर पर समिति ने यह पता लगाने की सिफारिश की कि गोपनीय परीक्षा सामग्री तक पहुंच किसने बनाई और वह विश्वविद्यालय के नियंत्रित सिस्टम से बाहर कैसे पहुंची। इस घटनाक्रम के बाद विश्वविद्यालय स्तर पर विभागीय जांच की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई गई है।
विभागीय जांच के लिए वरिष्ठ शैक्षणिक और प्रशासनिक अधिकारियों को जिम्मेदारी दी गई है। इसमें प्रो. एससी श्रीवास्तव, चीफ प्रॉक्टर प्रो. मुकेश कुमार सिंह, प्रो. खेमचंद देवांगन, ओएसडी प्रो. भारती अहिरवार और सहायक कुलसचिव परीक्षा टीपी सिंह के शामिल होने की जानकारी है। समिति के सामने परीक्षा प्रबंधन, गोपनीय दस्तावेजों की सुरक्षा, डिजिटल एक्सेस और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी जैसे बिंदुओं की जांच महत्वपूर्ण रहेगी।
पेपर लीक से जुड़े विवाद का असर विश्वविद्यालय के विधि विभाग की प्रशासनिक व्यवस्था पर पहले ही दिखाई दे चुका है। पूर्व में विधि विभाग के तत्कालीन विभागाध्यक्ष और विधि संकाय के डीन प्रो. सुधांशु रंजन महापात्र को जिम्मेदारी से हटाया गया था। परीक्षा प्रबंधन और विभागीय निगरानी को लेकर सवाल उठने के बाद यह बदलाव किया गया। इसके बाद इतिहास विभाग के प्रो. प्रवीण मिश्रा को विधि विभाग के डीन और विभागाध्यक्ष की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई।
हालांकि छात्रों का कहना है कि केवल प्रशासनिक पदों पर बदलाव से पूरे मामले के सवाल खत्म नहीं होते। वे जानना चाहते हैं कि जांच में वास्तविक रूप से क्या पाया गया, परीक्षा की गोपनीयता किस स्तर पर प्रभावित हुई और जिन पेपरों को रद्द किया गया है, उनमें से कितने प्रश्नपत्र कथित तौर पर पहले बाहर पहुंचे थे। इसी आधार पर छात्र पूरी परीक्षा रद्द करने के औचित्य पर सवाल उठा रहे हैं।
BA-LLB छठे सेमेस्टर की परीक्षा पहले ही 7 मई से 28 मई के बीच पूरी हो चुकी थी। छात्र सभी निर्धारित पेपर दे चुके थे और आगे की शैक्षणिक प्रक्रिया का इंतजार कर रहे थे। अब परीक्षा रद्द होने के कारण उन्हें उसी सेमेस्टर के विषयों की दोबारा तैयारी करनी होगी। 27 जुलाई से पुनर्परीक्षा शुरू होने के कारण विद्यार्थियों के पास तैयारी के लिए सीमित समय होने की बात भी सामने आ रही है।
छात्रों की नाराजगी का एक कारण यह भी है कि कथित गड़बड़ी परीक्षा संचालन या गोपनीय सामग्री की सुरक्षा से संबंधित है, जबकि उसका सीधा असर उन सभी विद्यार्थियों पर पड़ा है जिन्होंने निर्धारित प्रक्रिया के तहत परीक्षा दी थी। छात्र प्रतिनिधियों की मांग है कि यदि प्रशासन के पास पेपर लीक के ठोस प्रमाण हैं तो उन्हें कम से कम यह स्पष्ट करना चाहिए कि परीक्षा की निष्पक्षता किस तरह प्रभावित हुई और पूरे सेमेस्टर की परीक्षा रद्द करना क्यों जरूरी हो गया।
मामला विश्वविद्यालय परिसर से बाहर भी पहुंच चुका है। छात्रों ने पहले भी उच्च स्तर पर शिकायत भेजकर हस्तक्षेप की मांग की थी। विश्वविद्यालय के विजिटर सहित संवैधानिक स्तर के कार्यालयों तक शिकायत पहुंचाए जाने की बात सामने आई है। छात्रों ने परीक्षा व्यवस्था में कथित गड़बड़ी और उसके बाद हुई प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर निष्पक्ष जांच की मांग उठाई थी।
इस विवाद ने विश्वविद्यालयों में डिजिटल परीक्षा प्रबंधन की सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। अब अधिकांश विश्वविद्यालय प्रश्नपत्र तैयार करने, परीक्षा कार्यक्रम, गोपनीय दस्तावेज और दूसरे अकादमिक डेटा के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं। ऐसी स्थिति में केवल सर्वर को हैकिंग से बचाना पर्याप्त नहीं होता। अधिकृत यूजर आईडी और पासवर्ड की सुरक्षा, लॉगिन अधिकार सीमित करना और संवेदनशील फाइलों तक पहुंच का डिजिटल रिकॉर्ड बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
यदि वैध लॉगिन क्रेडेंशियल का इस्तेमाल करके परीक्षा सामग्री तक अनधिकृत तरीके से पहुंच बनाई गई थी, तो जांच का दायरा उन सभी लोगों तक जा सकता है जिनके पास संबंधित सिस्टम की अनुमति थी। यह भी देखा जा सकता है कि पासवर्ड साझा किए गए थे या किसी अन्य व्यक्ति ने बिना अनुमति उनका इस्तेमाल किया। इन्हीं तकनीकी और प्रशासनिक पहलुओं के आधार पर जिम्मेदारी तय होने की संभावना है।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने फिलहाल पुनर्परीक्षा की तैयारी आगे बढ़ा दी है। संशोधित कार्यक्रम के तहत BA-LLB छठे सेमेस्टर के छात्रों को 27 जुलाई से दोबारा परीक्षा देनी होगी। परीक्षा केंद्र, प्रश्नपत्रों की गोपनीयता और डिजिटल डेटा की सुरक्षा को लेकर इस बार अतिरिक्त सतर्कता बरते जाने की जरूरत होगी। छात्रों की नजर इस बात पर भी है कि पहले हुई कथित चूक के बाद नए प्रश्नपत्रों की सुरक्षा के लिए विश्वविद्यालय क्या व्यवस्था करता है।
फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग फिलहाल छात्रों के विरोध का मुख्य मुद्दा बनी हुई है। विद्यार्थी यह भी चाहते हैं कि पुनर्परीक्षा कराने से पहले जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया की स्थिति स्पष्ट की जाए। दूसरी ओर विश्वविद्यालय प्रशासन परीक्षा रद्द करने का आदेश जारी कर नया कार्यक्रम घोषित कर चुका है। ऐसे में 27 जुलाई से प्रस्तावित परीक्षा से पहले प्रशासन और छात्रों के बीच इस मुद्दे पर गतिविधियां और तेज हो सकती हैं।
