छत्तीसगढ़ के इकलौते रामसर स्थल के करीब कोल कारोबार, सर्वे में प्रदूषण का खतरा

बिलासपुर (छ.ग.)

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कोपरा वेटलैंड के पांच किमी दायरे में कोल वाशरी और डिपो चिह्नित, विस्तृत जांच के बाद बनेगी संरक्षण योजना

छत्तीसगढ़ के एकमात्र रामसर स्थल कोपरा वेटलैंड के आसपास चल रही कोयला आधारित गतिविधियों ने पर्यावरण को लेकर चिंता बढ़ा दी है। वन विभाग के शुरुआती सर्वे में वेटलैंड के पांच किलोमीटर के दायरे में दो कोल वाशरी और नौ कोयला डिपो संचालित होने की जानकारी सामने आई है। इनमें कुछ इकाइयां जलाशय के काफी नजदीक बताई जा रही हैं। सबसे बड़ी चिंता बारिश के दौरान ऊंचे इलाकों से बहकर आने वाले पानी को लेकर है। आशंका है कि कोयले की धूल, महीन कण और औद्योगिक गतिविधियों से निकलने वाला प्रदूषित पदार्थ बहाव के साथ वेटलैंड के कैचमेंट तक पहुंच सकता है। प्रारंभिक सर्वे रिपोर्ट जिला वेटलैंड समिति के माध्यम से राज्य शासन को भेजी गई है। अब विस्तृत अध्ययन के आधार पर तय किया जाएगा कि इस संवेदनशील क्षेत्र को सुरक्षित रखने के लिए किस तरह के कदम उठाने होंगे।

करीब 210 हेक्टेयर यानी लगभग 2.10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले कोपरा वेटलैंड को करीब सात महीने पहले रामसर स्थल का दर्जा मिला था। अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि के रूप में पहचान मिलने के बाद इसके आसपास की गतिविधियों और पर्यावरणीय दबाव का आकलन शुरू किया गया। इसी प्रक्रिया में वन विभाग ने कैचमेंट क्षेत्र के साथ आसपास संचालित औद्योगिक और कोयला कारोबार से जुड़ी इकाइयों की प्राथमिक जानकारी जुटाई। सर्वे में कोपरा के अलावा बेलमुंडी, सैदा और सांबलपुरी-बाहतराई क्षेत्र की गतिविधियों को भी देखा गया। इन इलाकों में कोयले के भंडारण, परिवहन, लोडिंग-अनलोडिंग और प्रसंस्करण से जुड़ी गतिविधियां होने की जानकारी सामने आई है।

सर्वे में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य कोपरा वेटलैंड के पांच किलोमीटर के दायरे में मौजूद कोयला आधारित इकाइयों को लेकर सामने आया। यहां दो कोल वाशरी और नौ कोल डिपो चिह्नित किए गए हैं। वेटलैंड की ओर जाने वाले रास्ते के आसपास भी कई कोयला डिपो मौजूद बताए गए हैं। प्रारंभिक रिपोर्ट के मुताबिक तीन डिपो तो वेटलैंड की सीमा के नजदीक स्थित हैं। पहुंच मार्ग के एक ओर एक और दूसरी तरफ दो डिपो होने की जानकारी दर्ज की गई है। ऐसे में कोयले की आवाजाही से उड़ने वाली धूल और बारिश के पानी के साथ बहने वाले महीन कणों का असर भविष्य में अध्ययन का अहम हिस्सा रहेगा।

वेटलैंड से लगभग 500 मीटर की दूरी पर एक बड़ी कोल वाशरी संचालित होने की बात भी सर्वे में सामने आई है। कोल वाशरी में कोयले की आवाजाही के साथ लोडिंग, अनलोडिंग और प्रोसेसिंग जैसी गतिविधियां होती हैं। इतनी कम दूरी पर औद्योगिक गतिविधि होने के कारण पर्यावरणीय प्रभाव की विस्तृत जांच की जरूरत महसूस की जा रही है। हालांकि शुरुआती सर्वे केवल आसपास मौजूद इकाइयों और संभावित दबाव को चिह्नित करने के उद्देश्य से किया गया है। किसी इकाई से वास्तव में कितना प्रदूषण हो रहा है या उसका वेटलैंड पर सीधा प्रभाव पड़ा है, इसका निर्धारण विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन के बाद ही हो सकेगा।

कोपरा और आसपास के कुछ औद्योगिक इलाके भौगोलिक रूप से ऊंचाई पर स्थित बताए जा रहे हैं। मानसून में इन क्षेत्रों का वर्षाजल प्राकृतिक ढलान के साथ निचले हिस्सों की ओर बहता है। वेटलैंड इसी जलग्रहण व्यवस्था से जुड़ा होने के कारण चिंता यह है कि बारिश के पानी के साथ कोयले की धूल या अन्य अवशेष भी नीचे तक पहुंच सकते हैं। यदि ऐसा लंबे समय तक होता है तो पानी की गुणवत्ता पर दबाव बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

आर्द्रभूमि का पर्यावरण सामान्य जलाशय से अलग और काफी संवेदनशील होता है। यहां पानी, मिट्टी, जलीय वनस्पति, मछलियां, सूक्ष्म जीव और पक्षियों का एक-दूसरे से जुड़ा प्राकृतिक तंत्र काम करता है। पानी की गुणवत्ता में धीरे-धीरे होने वाला बदलाव भी पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर असर डाल सकता है। विशेष रूप से कोयले के महीन कण और तलछट पानी में पहुंचने की स्थिति में उसके प्रभाव का वैज्ञानिक परीक्षण जरूरी माना जाता है।

कोपरा को रामसर दर्जा मिलने के बाद इसके संरक्षण की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। रामसर कन्वेंशन के तहत अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों के पारिस्थितिक स्वरूप को बनाए रखने पर जोर दिया जाता है। इसका अर्थ केवल जल क्षेत्र की सुरक्षा नहीं है। आसपास का कैचमेंट, पानी आने के प्राकृतिक रास्ते, जैव विविधता और ऐसी गतिविधियां जो वेटलैंड को प्रभावित कर सकती हैं, सभी संरक्षण योजना का हिस्सा बनती हैं।

वन विभाग के प्राथमिक सर्वे को इसी दिशा में शुरुआती कदम माना जा रहा है। अधिकारियों ने फिलहाल आसपास मौजूद कोल वाशरी, डिपो और अन्य गतिविधियों की स्थिति दर्ज की है। रिपोर्ट जिला वेटलैंड समिति के सामने रखी गई और वहां से इसे आगे राज्य सरकार को भेजा गया है। अब विस्तृत सर्वे में यह समझने की कोशिश होगी कि इन गतिविधियों का वास्तविक पर्यावरणीय प्रभाव कितना है और किन स्थानों पर तत्काल निगरानी बढ़ाने की जरूरत है।

अगले चरण में राज्य और केंद्रीय स्तर की संबंधित एजेंसियों तथा विशेषज्ञों को शामिल करते हुए संयुक्त अध्ययन किए जाने की तैयारी है। इसमें पानी की गुणवत्ता, कैचमेंट क्षेत्र, वर्षाजल के बहाव, औद्योगिक इकाइयों की दूरी और संभावित प्रदूषण स्रोतों का अधिक विस्तार से अध्ययन किया जा सकता है। इसी रिपोर्ट के आधार पर कोपरा रामसर स्थल के लिए दीर्घकालिक प्रबंधन और संरक्षण का मास्टर प्लान तैयार होने की उम्मीद है।

विस्तृत सर्वे इसलिए भी अहम होगा क्योंकि केवल किसी औद्योगिक इकाई की दूरी के आधार पर उसके पर्यावरणीय प्रभाव का अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। यह देखना होगा कि संबंधित इकाई में प्रदूषण नियंत्रण के क्या इंतजाम हैं, कोयले का भंडारण किस तरीके से किया जाता है, बारिश के पानी की निकासी कहां होती है और धूल रोकने के लिए कौन से उपाय अपनाए जा रहे हैं। इन सभी पहलुओं को जोड़कर ही वास्तविक जोखिम का आकलन किया जा सकेगा।

वेटलैंड तक पहुंचने वाले पानी के स्रोतों की मैपिंग भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि किसी औद्योगिक क्षेत्र से निकलने वाला सतही बहाव सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से जलाशय में पहुंचता है तो वहां नियमित निगरानी की जरूरत बढ़ जाती है। मानसून के अलग-अलग चरणों में पानी के नमूने लेकर उनमें मौजूद कणों और अन्य तत्वों की जांच से स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकती है।

कोयला डिपो के मामले में उड़ने वाली धूल भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। खुले में बड़ी मात्रा में कोयला जमा होने पर तेज हवा के दौरान महीन कण आसपास के क्षेत्र में फैल सकते हैं। ट्रकों की लगातार आवाजाही से सड़क पर गिरे कोयले और धूल का फैलाव भी होता है। बारिश आने पर यही सामग्री पानी के साथ बह सकती है। सर्वे में वेटलैंड के नजदीक डिपो चिह्नित होने के बाद इन बिंदुओं की जांच की जरूरत और बढ़ गई है।

कोपरा वेटलैंड के संरक्षण में केवल प्रदूषण नियंत्रण ही नहीं, बल्कि यहां मौजूद जैव विविधता की नियमित निगरानी भी जरूरी होगी। रामसर स्थल की पहचान मिलने के बाद यहां आने वाले स्थानीय और प्रवासी पक्षियों, जलीय जीवों तथा वनस्पतियों का रिकॉर्ड तैयार करना भविष्य की संरक्षण योजना में उपयोगी हो सकता है। इससे आने वाले वर्षों में पर्यावरण में किसी बदलाव को तुलनात्मक रूप से समझना आसान होगा।

औद्योगिक विकास और प्राकृतिक क्षेत्रों के संरक्षण के बीच संतुलन का सवाल भी इस मामले के साथ जुड़ गया है। छत्तीसगढ़ खनिज और कोयला आधारित उद्योगों वाला राज्य है। ऐसे में पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र के आसपास पहले से संचालित औद्योगिक गतिविधियों के लिए स्पष्ट प्रबंधन व्यवस्था महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रदूषण नियंत्रण मानकों के पालन, नियमित निरीक्षण और वैज्ञानिक निगरानी से ही यह तय किया जा सकता है कि आर्थिक गतिविधियों का दबाव वेटलैंड के प्राकृतिक स्वरूप पर न पड़े।

प्रारंभिक रिपोर्ट सामने आने के बाद अब नजर विस्तृत सर्वे पर है। इसमें अलग-अलग विभागों और विशेषज्ञों की भूमिका रहने की संभावना है। जल की गुणवत्ता से लेकर औद्योगिक इकाइयों के संचालन और कैचमेंट की भौगोलिक स्थिति तक कई बिंदुओं की पड़ताल की जाएगी। इसी आधार पर बफर क्षेत्र, निगरानी व्यवस्था, प्रदूषण रोकने के उपाय या दूसरी जरूरी पाबंदियों को लेकर आगे निर्णय लिया जा सकता है।

कोपरा वेटलैंड को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने के बाद इसके आसपास मौजूद गतिविधियों का आधिकारिक रिकॉर्ड तैयार होना संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सामने आए आंकड़ों में पांच किलोमीटर के भीतर दो कोल वाशरी और नौ डिपो की मौजूदगी दर्ज की गई है। इनमें वेटलैंड सीमा के करीब स्थित इकाइयों पर विस्तृत अध्ययन के दौरान विशेष ध्यान रहने की संभावना है। राज्य सरकार को भेजी गई प्राथमिक रिपोर्ट के बाद अब संयुक्त टीम के सर्वे और प्रस्तावित मास्टर प्लान की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

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23 Jul 2026 By Priyanka

छत्तीसगढ़ के इकलौते रामसर स्थल के करीब कोल कारोबार, सर्वे में प्रदूषण का खतरा

बिलासपुर (छ.ग.)

छत्तीसगढ़ के एकमात्र रामसर स्थल कोपरा वेटलैंड के आसपास चल रही कोयला आधारित गतिविधियों ने पर्यावरण को लेकर चिंता बढ़ा दी है। वन विभाग के शुरुआती सर्वे में वेटलैंड के पांच किलोमीटर के दायरे में दो कोल वाशरी और नौ कोयला डिपो संचालित होने की जानकारी सामने आई है। इनमें कुछ इकाइयां जलाशय के काफी नजदीक बताई जा रही हैं। सबसे बड़ी चिंता बारिश के दौरान ऊंचे इलाकों से बहकर आने वाले पानी को लेकर है। आशंका है कि कोयले की धूल, महीन कण और औद्योगिक गतिविधियों से निकलने वाला प्रदूषित पदार्थ बहाव के साथ वेटलैंड के कैचमेंट तक पहुंच सकता है। प्रारंभिक सर्वे रिपोर्ट जिला वेटलैंड समिति के माध्यम से राज्य शासन को भेजी गई है। अब विस्तृत अध्ययन के आधार पर तय किया जाएगा कि इस संवेदनशील क्षेत्र को सुरक्षित रखने के लिए किस तरह के कदम उठाने होंगे।

करीब 210 हेक्टेयर यानी लगभग 2.10 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले कोपरा वेटलैंड को करीब सात महीने पहले रामसर स्थल का दर्जा मिला था। अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि के रूप में पहचान मिलने के बाद इसके आसपास की गतिविधियों और पर्यावरणीय दबाव का आकलन शुरू किया गया। इसी प्रक्रिया में वन विभाग ने कैचमेंट क्षेत्र के साथ आसपास संचालित औद्योगिक और कोयला कारोबार से जुड़ी इकाइयों की प्राथमिक जानकारी जुटाई। सर्वे में कोपरा के अलावा बेलमुंडी, सैदा और सांबलपुरी-बाहतराई क्षेत्र की गतिविधियों को भी देखा गया। इन इलाकों में कोयले के भंडारण, परिवहन, लोडिंग-अनलोडिंग और प्रसंस्करण से जुड़ी गतिविधियां होने की जानकारी सामने आई है।

सर्वे में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य कोपरा वेटलैंड के पांच किलोमीटर के दायरे में मौजूद कोयला आधारित इकाइयों को लेकर सामने आया। यहां दो कोल वाशरी और नौ कोल डिपो चिह्नित किए गए हैं। वेटलैंड की ओर जाने वाले रास्ते के आसपास भी कई कोयला डिपो मौजूद बताए गए हैं। प्रारंभिक रिपोर्ट के मुताबिक तीन डिपो तो वेटलैंड की सीमा के नजदीक स्थित हैं। पहुंच मार्ग के एक ओर एक और दूसरी तरफ दो डिपो होने की जानकारी दर्ज की गई है। ऐसे में कोयले की आवाजाही से उड़ने वाली धूल और बारिश के पानी के साथ बहने वाले महीन कणों का असर भविष्य में अध्ययन का अहम हिस्सा रहेगा।

वेटलैंड से लगभग 500 मीटर की दूरी पर एक बड़ी कोल वाशरी संचालित होने की बात भी सर्वे में सामने आई है। कोल वाशरी में कोयले की आवाजाही के साथ लोडिंग, अनलोडिंग और प्रोसेसिंग जैसी गतिविधियां होती हैं। इतनी कम दूरी पर औद्योगिक गतिविधि होने के कारण पर्यावरणीय प्रभाव की विस्तृत जांच की जरूरत महसूस की जा रही है। हालांकि शुरुआती सर्वे केवल आसपास मौजूद इकाइयों और संभावित दबाव को चिह्नित करने के उद्देश्य से किया गया है। किसी इकाई से वास्तव में कितना प्रदूषण हो रहा है या उसका वेटलैंड पर सीधा प्रभाव पड़ा है, इसका निर्धारण विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन के बाद ही हो सकेगा।

कोपरा और आसपास के कुछ औद्योगिक इलाके भौगोलिक रूप से ऊंचाई पर स्थित बताए जा रहे हैं। मानसून में इन क्षेत्रों का वर्षाजल प्राकृतिक ढलान के साथ निचले हिस्सों की ओर बहता है। वेटलैंड इसी जलग्रहण व्यवस्था से जुड़ा होने के कारण चिंता यह है कि बारिश के पानी के साथ कोयले की धूल या अन्य अवशेष भी नीचे तक पहुंच सकते हैं। यदि ऐसा लंबे समय तक होता है तो पानी की गुणवत्ता पर दबाव बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

आर्द्रभूमि का पर्यावरण सामान्य जलाशय से अलग और काफी संवेदनशील होता है। यहां पानी, मिट्टी, जलीय वनस्पति, मछलियां, सूक्ष्म जीव और पक्षियों का एक-दूसरे से जुड़ा प्राकृतिक तंत्र काम करता है। पानी की गुणवत्ता में धीरे-धीरे होने वाला बदलाव भी पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर असर डाल सकता है। विशेष रूप से कोयले के महीन कण और तलछट पानी में पहुंचने की स्थिति में उसके प्रभाव का वैज्ञानिक परीक्षण जरूरी माना जाता है।

कोपरा को रामसर दर्जा मिलने के बाद इसके संरक्षण की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। रामसर कन्वेंशन के तहत अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियों के पारिस्थितिक स्वरूप को बनाए रखने पर जोर दिया जाता है। इसका अर्थ केवल जल क्षेत्र की सुरक्षा नहीं है। आसपास का कैचमेंट, पानी आने के प्राकृतिक रास्ते, जैव विविधता और ऐसी गतिविधियां जो वेटलैंड को प्रभावित कर सकती हैं, सभी संरक्षण योजना का हिस्सा बनती हैं।

वन विभाग के प्राथमिक सर्वे को इसी दिशा में शुरुआती कदम माना जा रहा है। अधिकारियों ने फिलहाल आसपास मौजूद कोल वाशरी, डिपो और अन्य गतिविधियों की स्थिति दर्ज की है। रिपोर्ट जिला वेटलैंड समिति के सामने रखी गई और वहां से इसे आगे राज्य सरकार को भेजा गया है। अब विस्तृत सर्वे में यह समझने की कोशिश होगी कि इन गतिविधियों का वास्तविक पर्यावरणीय प्रभाव कितना है और किन स्थानों पर तत्काल निगरानी बढ़ाने की जरूरत है।

अगले चरण में राज्य और केंद्रीय स्तर की संबंधित एजेंसियों तथा विशेषज्ञों को शामिल करते हुए संयुक्त अध्ययन किए जाने की तैयारी है। इसमें पानी की गुणवत्ता, कैचमेंट क्षेत्र, वर्षाजल के बहाव, औद्योगिक इकाइयों की दूरी और संभावित प्रदूषण स्रोतों का अधिक विस्तार से अध्ययन किया जा सकता है। इसी रिपोर्ट के आधार पर कोपरा रामसर स्थल के लिए दीर्घकालिक प्रबंधन और संरक्षण का मास्टर प्लान तैयार होने की उम्मीद है।

विस्तृत सर्वे इसलिए भी अहम होगा क्योंकि केवल किसी औद्योगिक इकाई की दूरी के आधार पर उसके पर्यावरणीय प्रभाव का अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। यह देखना होगा कि संबंधित इकाई में प्रदूषण नियंत्रण के क्या इंतजाम हैं, कोयले का भंडारण किस तरीके से किया जाता है, बारिश के पानी की निकासी कहां होती है और धूल रोकने के लिए कौन से उपाय अपनाए जा रहे हैं। इन सभी पहलुओं को जोड़कर ही वास्तविक जोखिम का आकलन किया जा सकेगा।

वेटलैंड तक पहुंचने वाले पानी के स्रोतों की मैपिंग भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि किसी औद्योगिक क्षेत्र से निकलने वाला सतही बहाव सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से जलाशय में पहुंचता है तो वहां नियमित निगरानी की जरूरत बढ़ जाती है। मानसून के अलग-अलग चरणों में पानी के नमूने लेकर उनमें मौजूद कणों और अन्य तत्वों की जांच से स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकती है।

कोयला डिपो के मामले में उड़ने वाली धूल भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। खुले में बड़ी मात्रा में कोयला जमा होने पर तेज हवा के दौरान महीन कण आसपास के क्षेत्र में फैल सकते हैं। ट्रकों की लगातार आवाजाही से सड़क पर गिरे कोयले और धूल का फैलाव भी होता है। बारिश आने पर यही सामग्री पानी के साथ बह सकती है। सर्वे में वेटलैंड के नजदीक डिपो चिह्नित होने के बाद इन बिंदुओं की जांच की जरूरत और बढ़ गई है।

कोपरा वेटलैंड के संरक्षण में केवल प्रदूषण नियंत्रण ही नहीं, बल्कि यहां मौजूद जैव विविधता की नियमित निगरानी भी जरूरी होगी। रामसर स्थल की पहचान मिलने के बाद यहां आने वाले स्थानीय और प्रवासी पक्षियों, जलीय जीवों तथा वनस्पतियों का रिकॉर्ड तैयार करना भविष्य की संरक्षण योजना में उपयोगी हो सकता है। इससे आने वाले वर्षों में पर्यावरण में किसी बदलाव को तुलनात्मक रूप से समझना आसान होगा।

औद्योगिक विकास और प्राकृतिक क्षेत्रों के संरक्षण के बीच संतुलन का सवाल भी इस मामले के साथ जुड़ गया है। छत्तीसगढ़ खनिज और कोयला आधारित उद्योगों वाला राज्य है। ऐसे में पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र के आसपास पहले से संचालित औद्योगिक गतिविधियों के लिए स्पष्ट प्रबंधन व्यवस्था महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रदूषण नियंत्रण मानकों के पालन, नियमित निरीक्षण और वैज्ञानिक निगरानी से ही यह तय किया जा सकता है कि आर्थिक गतिविधियों का दबाव वेटलैंड के प्राकृतिक स्वरूप पर न पड़े।

प्रारंभिक रिपोर्ट सामने आने के बाद अब नजर विस्तृत सर्वे पर है। इसमें अलग-अलग विभागों और विशेषज्ञों की भूमिका रहने की संभावना है। जल की गुणवत्ता से लेकर औद्योगिक इकाइयों के संचालन और कैचमेंट की भौगोलिक स्थिति तक कई बिंदुओं की पड़ताल की जाएगी। इसी आधार पर बफर क्षेत्र, निगरानी व्यवस्था, प्रदूषण रोकने के उपाय या दूसरी जरूरी पाबंदियों को लेकर आगे निर्णय लिया जा सकता है।

कोपरा वेटलैंड को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने के बाद इसके आसपास मौजूद गतिविधियों का आधिकारिक रिकॉर्ड तैयार होना संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सामने आए आंकड़ों में पांच किलोमीटर के भीतर दो कोल वाशरी और नौ डिपो की मौजूदगी दर्ज की गई है। इनमें वेटलैंड सीमा के करीब स्थित इकाइयों पर विस्तृत अध्ययन के दौरान विशेष ध्यान रहने की संभावना है। राज्य सरकार को भेजी गई प्राथमिक रिपोर्ट के बाद अब संयुक्त टीम के सर्वे और प्रस्तावित मास्टर प्लान की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

https://www.dainikjagranmpcg.com/state/chhattisgarh/danger-of-pollution-in-coal-business-survey-near-the-only/article-59574

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