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हाईकोर्ट की सख्ती बेअसर! बिलासपुर-कोरबा हाईवे पर ट्रेलर ने 9 मवेशियों को कुचला
छत्तीसगढ़
हाईकोर्ट की सख्ती और निर्देशों के बावजूद हाईवे पर आवारा मवेशियों की मौजूदगी बरकरार, गौसेवकों ने फेंसिंग, स्पीड लिमिट और गौ एम्बुलेंस की मांग दोहराई
बिलासपुर-कोरबा नेशनल हाईवे पर एक बार फिर तेज रफ्तार का कहर देखने को मिला। कोनी थाना क्षेत्र के गतौरी के पास एक बेकाबू ट्रेलर ने सड़क पर मौजूद मवेशियों के झुंड को रौंद दिया। इस दर्दनाक हादसे में 9 मवेशियों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि एक नंदी गंभीर रूप से घायल हो गया। घटना के बाद इलाके में आक्रोश का माहौल है। ग्रामीणों, गौसेवकों और सामाजिक संगठनों ने इस हादसे को प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम बताते हुए हाईवे पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की मांग की है।
जानकारी के अनुसार मंगलवार सुबह जब ग्रामीण और राहगीर घटनास्थल से गुजरे तो सड़क पर कई मवेशियों के शव पड़े मिले। चारों ओर खून फैला हुआ था और एक घायल नंदी तड़प रहा था। इसकी सूचना तत्काल पुलिस और गौसेवकों को दी गई। सूचना मिलते ही पुलिस टीम और गौसेवा से जुड़े लोग मौके पर पहुंचे और राहत कार्य शुरू किया।
गंभीर रूप से घायल नंदी को प्राथमिक उपचार के बाद छतौना स्थित गौरी गोपाल गौसेवा धाम भेजा गया, जहां उसका इलाज जारी है। वहीं मृत 9 मवेशियों का गौसेवकों और स्थानीय लोगों की मौजूदगी में अंतिम संस्कार किया गया। घटना के बाद आसपास के ग्रामीणों ने प्रशासन से तत्काल प्रभावी कदम उठाने की मांग की।
यह हादसा ऐसे समय हुआ है जब सड़कों पर आवारा मवेशियों की समस्या को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट लगातार सख्त रुख अपनाए हुए है। इस मुद्दे पर दायर जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट कई बार राज्य सरकार और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) को फटकार लगा चुका है। अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि हाईवे पर मवेशियों की आवाजाही रोकने के लिए ठोस और प्रभावी व्यवस्था की जाए, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात अब भी नहीं बदले हैं।
हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए थे कि हाईवे किनारे फेंसिंग, मवेशियों के लिए सुरक्षित शेल्टर और निगरानी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए ताकि सड़क दुर्घटनाओं पर रोक लग सके। इसके बावजूद बिलासपुर-कोरबा मार्ग सहित प्रदेश के कई हाईवे पर आवारा मवेशियों की मौजूदगी लगातार बनी हुई है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस मार्ग पर रात के समय भारी वाहन तेज रफ्तार से गुजरते हैं। सड़क पर अचानक मवेशियों के आ जाने से अक्सर दुर्घटनाएं होती रहती हैं। कई बार वाहन चालक भी हादसों का शिकार होते हैं और कई लोगों की जान भी जा चुकी है। इसके बावजूद स्थायी समाधान की दिशा में कोई प्रभावी पहल दिखाई नहीं दे रही।
घटना के बाद गौसेवकों और सामाजिक संगठनों ने कई महत्वपूर्ण मांगें प्रशासन के सामने रखी हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर तत्काल गौ सुरक्षा फेंसिंग लगाई जाए, ताकि मवेशी सड़क पर न आ सकें। इसके अलावा दुर्घटना संभावित क्षेत्रों में अनिवार्य रूप से स्पीड लिमिट तय की जाए और उसकी सख्ती से निगरानी भी हो।
गौसेवकों ने प्रत्येक जिले में विशेष गौ एम्बुलेंस की व्यवस्था करने की मांग भी उठाई है, ताकि दुर्घटना में घायल मवेशियों को समय पर उपचार मिल सके। उनका कहना है कि वर्तमान में कई बार घायल पशु घंटों तक सड़क किनारे तड़पते रहते हैं क्योंकि उन्हें अस्पताल पहुंचाने के लिए कोई समुचित व्यवस्था नहीं होती।
सामाजिक संगठनों ने यह भी सुझाव दिया कि आवारा मवेशियों के लिए पर्याप्त संख्या में गौशालाएं और स्थायी शेड बनाए जाएं। साथ ही उनके भोजन और देखभाल की जिम्मेदारी सुनिश्चित की जाए, जिससे वे सड़कों पर भटकने को मजबूर न हों। उनका मानना है कि केवल हादसे के बाद कार्रवाई करने से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि इसके लिए दीर्घकालिक योजना बनानी होगी।
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हाईकोर्ट की सख्ती बेअसर! बिलासपुर-कोरबा हाईवे पर ट्रेलर ने 9 मवेशियों को कुचला
छत्तीसगढ़
बिलासपुर-कोरबा नेशनल हाईवे पर एक बार फिर तेज रफ्तार का कहर देखने को मिला। कोनी थाना क्षेत्र के गतौरी के पास एक बेकाबू ट्रेलर ने सड़क पर मौजूद मवेशियों के झुंड को रौंद दिया। इस दर्दनाक हादसे में 9 मवेशियों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि एक नंदी गंभीर रूप से घायल हो गया। घटना के बाद इलाके में आक्रोश का माहौल है। ग्रामीणों, गौसेवकों और सामाजिक संगठनों ने इस हादसे को प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम बताते हुए हाईवे पर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की मांग की है।
जानकारी के अनुसार मंगलवार सुबह जब ग्रामीण और राहगीर घटनास्थल से गुजरे तो सड़क पर कई मवेशियों के शव पड़े मिले। चारों ओर खून फैला हुआ था और एक घायल नंदी तड़प रहा था। इसकी सूचना तत्काल पुलिस और गौसेवकों को दी गई। सूचना मिलते ही पुलिस टीम और गौसेवा से जुड़े लोग मौके पर पहुंचे और राहत कार्य शुरू किया।
गंभीर रूप से घायल नंदी को प्राथमिक उपचार के बाद छतौना स्थित गौरी गोपाल गौसेवा धाम भेजा गया, जहां उसका इलाज जारी है। वहीं मृत 9 मवेशियों का गौसेवकों और स्थानीय लोगों की मौजूदगी में अंतिम संस्कार किया गया। घटना के बाद आसपास के ग्रामीणों ने प्रशासन से तत्काल प्रभावी कदम उठाने की मांग की।
यह हादसा ऐसे समय हुआ है जब सड़कों पर आवारा मवेशियों की समस्या को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट लगातार सख्त रुख अपनाए हुए है। इस मुद्दे पर दायर जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट कई बार राज्य सरकार और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) को फटकार लगा चुका है। अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि हाईवे पर मवेशियों की आवाजाही रोकने के लिए ठोस और प्रभावी व्यवस्था की जाए, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात अब भी नहीं बदले हैं।
हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए थे कि हाईवे किनारे फेंसिंग, मवेशियों के लिए सुरक्षित शेल्टर और निगरानी व्यवस्था सुनिश्चित की जाए ताकि सड़क दुर्घटनाओं पर रोक लग सके। इसके बावजूद बिलासपुर-कोरबा मार्ग सहित प्रदेश के कई हाईवे पर आवारा मवेशियों की मौजूदगी लगातार बनी हुई है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस मार्ग पर रात के समय भारी वाहन तेज रफ्तार से गुजरते हैं। सड़क पर अचानक मवेशियों के आ जाने से अक्सर दुर्घटनाएं होती रहती हैं। कई बार वाहन चालक भी हादसों का शिकार होते हैं और कई लोगों की जान भी जा चुकी है। इसके बावजूद स्थायी समाधान की दिशा में कोई प्रभावी पहल दिखाई नहीं दे रही।
घटना के बाद गौसेवकों और सामाजिक संगठनों ने कई महत्वपूर्ण मांगें प्रशासन के सामने रखी हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर तत्काल गौ सुरक्षा फेंसिंग लगाई जाए, ताकि मवेशी सड़क पर न आ सकें। इसके अलावा दुर्घटना संभावित क्षेत्रों में अनिवार्य रूप से स्पीड लिमिट तय की जाए और उसकी सख्ती से निगरानी भी हो।
गौसेवकों ने प्रत्येक जिले में विशेष गौ एम्बुलेंस की व्यवस्था करने की मांग भी उठाई है, ताकि दुर्घटना में घायल मवेशियों को समय पर उपचार मिल सके। उनका कहना है कि वर्तमान में कई बार घायल पशु घंटों तक सड़क किनारे तड़पते रहते हैं क्योंकि उन्हें अस्पताल पहुंचाने के लिए कोई समुचित व्यवस्था नहीं होती।
सामाजिक संगठनों ने यह भी सुझाव दिया कि आवारा मवेशियों के लिए पर्याप्त संख्या में गौशालाएं और स्थायी शेड बनाए जाएं। साथ ही उनके भोजन और देखभाल की जिम्मेदारी सुनिश्चित की जाए, जिससे वे सड़कों पर भटकने को मजबूर न हों। उनका मानना है कि केवल हादसे के बाद कार्रवाई करने से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि इसके लिए दीर्घकालिक योजना बनानी होगी।
