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भोपाल-रायपुर के क्रांतिवीर: नाम रोज दिखते हैं, कहानी कितनों को पता?
Digital Desk
भोपाल और रायपुर की सड़कों, चौकों और स्मारकों से जुड़े स्वतंत्रता सेनानियों की कहानी जानिए और शहर के पुराने इतिहास को नई नजर से देखिए।
भोपाल की सड़कों से लेकर रायपुर के आजाद चौक और शहीद स्मारक तक, शहर के कई नाम स्वतंत्रता आंदोलन की याद दिलाते हैं। जानिए इन जगहों और उनसे जुड़े संघर्षों की कहानी।
भोपाल और रायपुर में रोज हजारों लोग जिन सड़कों, चौकों और इलाकों से गुजरते हैं, उनमें कई नाम स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय आंदोलन की स्मृतियों से जुड़े हैं।
समस्या यह है कि नाम अक्सर याद रह जाते हैं, लेकिन नाम के पीछे की कहानी गायब हो जाती है।
रायपुर के सरकारी अभिलेख बताते हैं कि शहर और आसपास के इलाकों ने नमक सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। भोपाल में भी कई स्थान स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बैठकों, गुप्त गतिविधियों और विरोध प्रदर्शनों के गवाह रहे।
रायपुर का आजाद चौक
रायपुर का आजाद चौक इस कहानी का सबसे सीधा उदाहरण है।
जीई रोड पर स्थित यह चौक आज शहर के व्यस्त मार्गों में शामिल है। स्थानीय इतिहास पर प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, इसका नाम स्वतंत्रता संग्राम में शहीद हुए वीरों की स्मृति में रखा गया था। चौक पर महात्मा गांधी की प्रतिमा भी स्थापित है।
यानी जिस जगह से आज रोजाना लोग गुजरते हैं, वह केवल ट्रैफिक का जंक्शन नहीं है। उसके नाम में स्वतंत्रता आंदोलन की सामूहिक स्मृति दर्ज है।
फोटो फीचर के लिए यहां आज के ट्रैफिक, चौक के नाम-पट्ट और गांधी प्रतिमा के साथ पुराने अभिलेखीय संदर्भ को एक फ्रेम में रखा जा सकता है।
जयस्तंभ की कहानी
रायपुर का जयस्तंभ चौक भी स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों से जुड़ा स्थान है। स्थानीय स्रोतों में इसे वीर नारायण सिंह की शहादत से जोड़ा जाता है, जबकि उनके संघर्ष और बलिदान का विवरण सरकारी ऐतिहासिक स्रोतों में भी मिलता है।
वीर नारायण सिंह सोनाखान के जमींदार थे। 1856 के अकाल के दौरान उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों के अनाज भंडार से अनाज निकालकर भूखे लोगों में बांटा। बाद में उन्हें गिरफ्तार कर रायपुर जेल में रखा गया। वे जेल से निकलकर अपना सशस्त्र दल बनाने में सफल हुए और ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष किया।
आज उनके नाम और स्मृति से जुड़े स्थानों से गुजरते हुए बहुत कम लोगों को उस दौर की पूरी कहानी पता होती है।
शहीद स्मारक का इतिहास
रायपुर का शहीद स्मारक भवन इस स्थानीय इतिहास को दस्तावेजी रूप में समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
संस्कृति मंत्रालय के डिजिटल जिला अभिलेखों में कई स्वतंत्रता सेनानियों के नाम शहीद स्मारक भवन में अंकित सूची से जुड़े बताए गए हैं। इनमें नरेंद्र कुमार दुबे जैसे कार्यकर्ताओं का उल्लेख मिलता है।
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान रायपुर में इदगाह भाठा से जुलूस निकला था। नेतृत्व करने वाले कई लोगों की गिरफ्तारी के बाद नरेंद्र कुमार दुबे और अन्य कार्यकर्ताओं ने जुलूस को गांधी चौक की ओर आगे बढ़ाया। बाद में उन्हें भी गिरफ्तार कर सजा दी गई।
यह कहानी बताती है कि आंदोलन केवल बड़े नेताओं तक सीमित नहीं था।
पुलिस परेड ग्राउंड की गूंज
रायपुर का पुलिस परेड ग्राउंड आज एक सामान्य सार्वजनिक स्थल जैसा दिखाई दे सकता है, लेकिन इसका इतिहास बेहद अलग है।
संस्कृति मंत्रालय के Digital District Repository के अनुसार, 1857 के विद्रोह के दौरान यह स्थान ब्रिटिश सैन्य गतिविधियों से जुड़ा था। 18 जनवरी 1858 को हनुमान सिंह और उनके साथियों ने ब्रिटिश अधिकारियों को चुनौती दी। करीब छह घंटे की लड़ाई के बाद 17 क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया।
22 जनवरी 1858 को इनमें से 17 क्रांतिकारियों को सार्वजनिक रूप से फांसी दी गई। अभिलेख में गौज खान, अब्दुल हयात, शिव नारायण, पन्नालाल मातादीन, ठाकुर सिंह, अकबर हुसैन और हनुमान सिंह समेत कई नाम दर्ज हैं।
आज का स्थान उस इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए है।
भोपाल का छिपा स्वतंत्रता ट्रेल
भोपाल में भी स्वतंत्रता आंदोलन के कई स्थल आज की शहरी जिंदगी के बीच मौजूद हैं।
एक पुराने स्थानीय वृत्तांत में रतनकुटी का उल्लेख मिलता है, जहां स्वतंत्रता सेनानी रतन कुमार के घर से 1929 में नई राह नामक समाचार पत्र प्रकाशित हुआ था। यह घर बैठकों और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र भी बना।
उसी रिपोर्ट में बेगम जमीला ग्राउंड का भी उल्लेख है, जहां महात्मा गांधी ने भाषण दिया था। जुमेराती पोस्ट ऑफिस के कर्मचारियों के गुप्त रूप से आंदोलन से जुड़े होने का भी विवरण मिलता है।
ये स्थान बताते हैं कि भोपाल का स्वतंत्रता संघर्ष केवल बड़े राजनीतिक मंचों पर नहीं हुआ।
नामों के पीछे लोग
रायपुर के स्वतंत्रता आंदोलन में पंडित रविशंकर शुक्ल जैसे नेताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। 1930 में जिला परिषद उनके नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन से जुड़ी और शिक्षकों तथा अन्य कर्मचारियों ने विदेशी कपड़ों के बहिष्कार, खादी और राष्ट्रीय शिक्षा के प्रचार में हिस्सा लिया।
इसी आंदोलन में डॉ. राधाबाई जैसी महिलाओं ने भी स्थानीय स्तर पर बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने महिलाओं को संगठित किया, चरखा और बुनाई को बढ़ावा दिया तथा शराब की दुकानों के सामने विरोध किया। 1932 में उन्हें 20 अन्य महिला सत्याग्रहियों के साथ गिरफ्तार किया गया था।
इसलिए सड़क का नाम केवल किसी व्यक्ति की पहचान नहीं है। वह उस दौर के सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष का संकेत भी हो सकता है।
अगली बार रुककर देखिए
भोपाल और रायपुर का यह इतिहास किसी एक संग्रहालय में बंद नहीं है। वह चौराहों के नाम, प्रतिमाओं, स्कूलों, सड़कों, पुराने भवनों और स्मारकों में बिखरा हुआ है।
एक बेहतर फोटो फीचर के लिए आज के स्थानों के साथ पुराने दस्तावेज, स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों से उपलब्ध तस्वीरें और स्थानीय इतिहासकारों के रिकॉर्ड जोड़े जा सकते हैं। इससे पाठक सिर्फ नाम नहीं देखेगा, बल्कि यह समझ सकेगा कि उस जगह पर क्या हुआ था।
अगली बार भोपाल या रायपुर की किसी ऐसी सड़क या चौक से गुजरें जिसका नाम किसी क्रांतिकारी या स्वतंत्रता सेनानी पर रखा गया है, तो कुछ पल रुककर उसका इतिहास पढ़िए। शहर की सड़क वही रहेगी, लेकिन उसके पीछे की कहानी शायद आपको पहली बार दिखाई दे।
भोपाल-रायपुर के क्रांतिवीर: नाम रोज दिखते हैं, कहानी कितनों को पता?
Digital Desk
भोपाल की सड़कों से लेकर रायपुर के आजाद चौक और शहीद स्मारक तक, शहर के कई नाम स्वतंत्रता आंदोलन की याद दिलाते हैं। जानिए इन जगहों और उनसे जुड़े संघर्षों की कहानी।
भोपाल और रायपुर में रोज हजारों लोग जिन सड़कों, चौकों और इलाकों से गुजरते हैं, उनमें कई नाम स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय आंदोलन की स्मृतियों से जुड़े हैं।
समस्या यह है कि नाम अक्सर याद रह जाते हैं, लेकिन नाम के पीछे की कहानी गायब हो जाती है।
रायपुर के सरकारी अभिलेख बताते हैं कि शहर और आसपास के इलाकों ने नमक सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। भोपाल में भी कई स्थान स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बैठकों, गुप्त गतिविधियों और विरोध प्रदर्शनों के गवाह रहे।
रायपुर का आजाद चौक
रायपुर का आजाद चौक इस कहानी का सबसे सीधा उदाहरण है।
जीई रोड पर स्थित यह चौक आज शहर के व्यस्त मार्गों में शामिल है। स्थानीय इतिहास पर प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, इसका नाम स्वतंत्रता संग्राम में शहीद हुए वीरों की स्मृति में रखा गया था। चौक पर महात्मा गांधी की प्रतिमा भी स्थापित है।
यानी जिस जगह से आज रोजाना लोग गुजरते हैं, वह केवल ट्रैफिक का जंक्शन नहीं है। उसके नाम में स्वतंत्रता आंदोलन की सामूहिक स्मृति दर्ज है।
फोटो फीचर के लिए यहां आज के ट्रैफिक, चौक के नाम-पट्ट और गांधी प्रतिमा के साथ पुराने अभिलेखीय संदर्भ को एक फ्रेम में रखा जा सकता है।
जयस्तंभ की कहानी
रायपुर का जयस्तंभ चौक भी स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों से जुड़ा स्थान है। स्थानीय स्रोतों में इसे वीर नारायण सिंह की शहादत से जोड़ा जाता है, जबकि उनके संघर्ष और बलिदान का विवरण सरकारी ऐतिहासिक स्रोतों में भी मिलता है।
वीर नारायण सिंह सोनाखान के जमींदार थे। 1856 के अकाल के दौरान उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों के अनाज भंडार से अनाज निकालकर भूखे लोगों में बांटा। बाद में उन्हें गिरफ्तार कर रायपुर जेल में रखा गया। वे जेल से निकलकर अपना सशस्त्र दल बनाने में सफल हुए और ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष किया।
आज उनके नाम और स्मृति से जुड़े स्थानों से गुजरते हुए बहुत कम लोगों को उस दौर की पूरी कहानी पता होती है।
शहीद स्मारक का इतिहास
रायपुर का शहीद स्मारक भवन इस स्थानीय इतिहास को दस्तावेजी रूप में समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
संस्कृति मंत्रालय के डिजिटल जिला अभिलेखों में कई स्वतंत्रता सेनानियों के नाम शहीद स्मारक भवन में अंकित सूची से जुड़े बताए गए हैं। इनमें नरेंद्र कुमार दुबे जैसे कार्यकर्ताओं का उल्लेख मिलता है।
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान रायपुर में इदगाह भाठा से जुलूस निकला था। नेतृत्व करने वाले कई लोगों की गिरफ्तारी के बाद नरेंद्र कुमार दुबे और अन्य कार्यकर्ताओं ने जुलूस को गांधी चौक की ओर आगे बढ़ाया। बाद में उन्हें भी गिरफ्तार कर सजा दी गई।
यह कहानी बताती है कि आंदोलन केवल बड़े नेताओं तक सीमित नहीं था।
पुलिस परेड ग्राउंड की गूंज
रायपुर का पुलिस परेड ग्राउंड आज एक सामान्य सार्वजनिक स्थल जैसा दिखाई दे सकता है, लेकिन इसका इतिहास बेहद अलग है।
संस्कृति मंत्रालय के Digital District Repository के अनुसार, 1857 के विद्रोह के दौरान यह स्थान ब्रिटिश सैन्य गतिविधियों से जुड़ा था। 18 जनवरी 1858 को हनुमान सिंह और उनके साथियों ने ब्रिटिश अधिकारियों को चुनौती दी। करीब छह घंटे की लड़ाई के बाद 17 क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया।
22 जनवरी 1858 को इनमें से 17 क्रांतिकारियों को सार्वजनिक रूप से फांसी दी गई। अभिलेख में गौज खान, अब्दुल हयात, शिव नारायण, पन्नालाल मातादीन, ठाकुर सिंह, अकबर हुसैन और हनुमान सिंह समेत कई नाम दर्ज हैं।
आज का स्थान उस इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए है।
भोपाल का छिपा स्वतंत्रता ट्रेल
भोपाल में भी स्वतंत्रता आंदोलन के कई स्थल आज की शहरी जिंदगी के बीच मौजूद हैं।
एक पुराने स्थानीय वृत्तांत में रतनकुटी का उल्लेख मिलता है, जहां स्वतंत्रता सेनानी रतन कुमार के घर से 1929 में नई राह नामक समाचार पत्र प्रकाशित हुआ था। यह घर बैठकों और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र भी बना।
उसी रिपोर्ट में बेगम जमीला ग्राउंड का भी उल्लेख है, जहां महात्मा गांधी ने भाषण दिया था। जुमेराती पोस्ट ऑफिस के कर्मचारियों के गुप्त रूप से आंदोलन से जुड़े होने का भी विवरण मिलता है।
ये स्थान बताते हैं कि भोपाल का स्वतंत्रता संघर्ष केवल बड़े राजनीतिक मंचों पर नहीं हुआ।
नामों के पीछे लोग
रायपुर के स्वतंत्रता आंदोलन में पंडित रविशंकर शुक्ल जैसे नेताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। 1930 में जिला परिषद उनके नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन से जुड़ी और शिक्षकों तथा अन्य कर्मचारियों ने विदेशी कपड़ों के बहिष्कार, खादी और राष्ट्रीय शिक्षा के प्रचार में हिस्सा लिया।
इसी आंदोलन में डॉ. राधाबाई जैसी महिलाओं ने भी स्थानीय स्तर पर बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने महिलाओं को संगठित किया, चरखा और बुनाई को बढ़ावा दिया तथा शराब की दुकानों के सामने विरोध किया। 1932 में उन्हें 20 अन्य महिला सत्याग्रहियों के साथ गिरफ्तार किया गया था।
इसलिए सड़क का नाम केवल किसी व्यक्ति की पहचान नहीं है। वह उस दौर के सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष का संकेत भी हो सकता है।
अगली बार रुककर देखिए
भोपाल और रायपुर का यह इतिहास किसी एक संग्रहालय में बंद नहीं है। वह चौराहों के नाम, प्रतिमाओं, स्कूलों, सड़कों, पुराने भवनों और स्मारकों में बिखरा हुआ है।
एक बेहतर फोटो फीचर के लिए आज के स्थानों के साथ पुराने दस्तावेज, स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों से उपलब्ध तस्वीरें और स्थानीय इतिहासकारों के रिकॉर्ड जोड़े जा सकते हैं। इससे पाठक सिर्फ नाम नहीं देखेगा, बल्कि यह समझ सकेगा कि उस जगह पर क्या हुआ था।
अगली बार भोपाल या रायपुर की किसी ऐसी सड़क या चौक से गुजरें जिसका नाम किसी क्रांतिकारी या स्वतंत्रता सेनानी पर रखा गया है, तो कुछ पल रुककर उसका इतिहास पढ़िए। शहर की सड़क वही रहेगी, लेकिन उसके पीछे की कहानी शायद आपको पहली बार दिखाई दे।
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