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जनभागीदारी समिति में 15 साल की नौकरी से स्थायी दर्जा नहीं, हाईकोर्ट ने 11 कर्मचारियों को मिली राहत पलटी
जबलपुर (म.प्र.)
सीधी के संजय गांधी स्मृति शासकीय महाविद्यालय का मामला; डिवीजन बेंच ने कहा- कटऑफ तारीख से लगातार सेवा का ठोस प्रमाण जरूरी
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने जनभागीदारी समिति के माध्यम से नियुक्त कर्मचारियों के स्थायीकरण से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि किसी कर्मचारी की लंबे समय तक सेवा अपने आप उसे स्थायी सरकारी कर्मचारी बनने का अधिकार नहीं देती। इस फैसले के साथ सीधी के संजय गांधी स्मृति शासकीय महाविद्यालय के 11 कर्मचारियों को राहत देने वाला सिंगल बेंच का आदेश रद्द हो गया। मामला कॉलेज में तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के पदों पर काम कर रहे 11 कर्मचारियों से जुड़ा है। कर्मचारियों का कहना था कि वे 15 साल से अधिक समय से लगातार सेवाएं दे रहे हैं और इसलिए उन्हें स्थायी कर्मचारी का दर्जा तथा उससे जुड़े लाभ मिलना चाहिए। उन्होंने अपनी मांग के समर्थन में सामान्य प्रशासन विभाग की 7 अक्टूबर 2016 की नीति का भी हवाला दिया था।
इस नीति में निर्धारित शर्तों के तहत 16 मई 2007 और 1 सितंबर 2016 तक लगातार काम करने वाले दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को स्थायी कर्मी का दर्जा देने का प्रावधान था। कर्मचारियों ने दावा किया कि वे इस व्यवस्था के दायरे में आते हैं और लंबे समय से कॉलेज में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। पहले सिंगल बेंच ने 16 अक्टूबर 2025 को कर्मचारियों के पक्ष में फैसला दिया था। अदालत ने संबंधित कर्मचारियों को स्थायी कर्मचारी का दर्जा देने के निर्देश दिए थे। इसके बाद उच्च शिक्षा विभाग की ओर से इस आदेश को चुनौती देते हुए डिवीजन बेंच में रिट अपील दाखिल की गई।
डिवीजन बेंच में जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बीपी शर्मा ने मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान अदालत ने कर्मचारियों की सेवा अवधि से जुड़े दस्तावेजों की जांच की और पाया कि 16 मई 2007 से लगातार सेवा में रहने का पर्याप्त दस्तावेजी प्रमाण रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं था। अदालत के सामने उपलब्ध रिकॉर्ड में अक्टूबर 2010 के बाद के लेबर चार्ज बिल थे। कोर्ट ने माना कि केवल इन बिलों के आधार पर यह साबित नहीं किया जा सकता कि कर्मचारी 2007 से लगातार सेवा में थे। स्थायी दर्जे के लिए संबंधित नीति की सभी शर्तों को पूरा करना और कटऑफ तारीख से निरंतर सेवा का विश्वसनीय प्रमाण देना जरूरी है।
जनभागीदारी समिति की नियुक्ति पर भी कोर्ट की टिप्पणी
डिवीजन बेंच ने जनभागीदारी समिति की नियुक्ति संबंधी शक्तियों को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने 30 सितंबर 1996 की गजट अधिसूचना का उल्लेख करते हुए कहा कि जनभागीदारी समिति राज्य सरकार की पूर्व अनुमति के बिना नया पद सृजित करने या नियमित सरकारी नियुक्ति करने की शक्ति नहीं रखती। कोर्ट के अनुसार, समिति कॉलेज के कामकाज के लिए किसी व्यक्ति की सेवाएं ले सकती है, लेकिन ऐसी नियुक्ति से वह व्यक्ति अपने आप राज्य सरकार का नियमित कर्मचारी नहीं बन जाता। इसलिए केवल जनभागीदारी समिति के तहत वर्षों तक काम करने को नियमित सरकारी सेवा का आधार नहीं माना जा सकता।
लंबे समय की सेवा अकेले पर्याप्त नहीं
इस मामले में अदालत का मुख्य जोर सेवा की अवधि के साथ नियमों की शर्तें पूरी करने पर रहा। यानी किसी कर्मचारी ने कितने साल काम किया, यह अकेला आधार नहीं हो सकता। कर्मचारी को संबंधित सरकारी नीति के तहत पात्रता साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज भी प्रस्तुत करने होंगे। हाईकोर्ट ने स्वायत्त महाविद्यालयों पर पड़ने वाले संभावित वित्तीय प्रभाव का भी उल्लेख किया। अदालत ने माना कि ऐसे संस्थानों पर अतिरिक्त वित्तीय दायित्व डालने से उनके उपलब्ध संसाधनों और शिक्षा व्यवस्था पर असर पड़ सकता है।
राज्य सरकार की अपील स्वीकार
मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार की रिट अपील स्वीकार कर ली। इसके साथ ही 16 अक्टूबर 2025 को सिंगल बेंच द्वारा दिया गया वह आदेश निरस्त कर दिया गया, जिसमें 11 कर्मचारियों को स्थायी कर्मचारी का दर्जा देने के निर्देश दिए गए थे।
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