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रतलाम में पंचायत का विवादित फैसला: लव मैरिज करने वाले परिवारों पर सामाजिक बहिष्कार लागू
रतलाम (म.प्र.)
भागकर शादी करने वाले परिवारों को न दूध मिलेगा, न पंडित-नाई; गांव में प्रशासन ने समझाइश दी
रतलाम जिले के पिपलौदा तहसील के पंचायतवा गांव में पंचायत ने लव मैरिज करने वाले परिवारों के सामाजिक बहिष्कार का विवादित फैसला सुनाया है। पंचायत के निर्णय के अनुसार, ऐसे परिवारों को किसी भी सामाजिक या पारिवारिक कार्यक्रम में शामिल नहीं किया जाएगा, उनके घर पंडित और नाई सेवाएं नहीं देंगे और किसी से दूध या अन्य सामग्री का लेन-देन नहीं किया जाएगा।
यह फैसला पिछले छह महीनों में आठ युवा जोड़े के भागकर शादी करने के बाद लिया गया। पंचायत के अनुसार, यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों को रोकने और गांव में पारंपरिक रीति-रिवाजों को बनाए रखने के उद्देश्य से किया गया। पंचायत की बैठक में सरपंच और बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे। बैठक का वीडियो सोशल मीडिया पर भी साझा किया गया, जिसमें ग्रामीणों ने बहिष्कार के नियम विस्तार से बताए।
वीडियो में एक व्यक्ति हाथ में रजिस्टर लेकर पंचायत द्वारा तय प्रतिबंधों की सूची पढ़ता दिखाई दे रहा है। इसमें कहा गया है कि लव मैरिज करने वाले परिवार को न तो काम दिया जाएगा और न ही कोई खेत लीज पर लिया जाएगा। इसके अलावा, विवाह में शामिल गवाह, पंडित, नाई और सहयोग करने वाले व्यक्तियों पर भी सामाजिक बहिष्कार लगाया जाएगा।
प्रशासन की प्रतिक्रिया वीडियो सामने आने के बाद रविवार को पिपलौदा जनपद सीईओ बह्म स्वरूप हंस और जावरा एसडीएम सुनील जायसवाल गांव पहुंचे। अधिकारियों ने ग्रामीणों से बात की और उन्हें संविधान के तहत सभी नागरिकों के अधिकारों की जानकारी देते हुए समझाइश दी। अधिकारियों के अनुसार, किसी भी व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित करने वाले फैसले अवैध हो सकते हैं और ऐसे मामलों में कानूनी कार्रवाई की संभावना रहती है।
गांव में फैसले के विरोध में कई परिवारों ने कलेक्टर से शिकायत करने की तैयारी भी शुरू कर दी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पंचायत का यह निर्णय बच्चों और युवाओं के निजी अधिकारों के खिलाफ है। वहीं, कुछ ग्रामीण इसे पारंपरिक मूल्यों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम मान रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि लव मैरिज को लेकर ऐसे बहिष्कार न केवल संविधान और व्यक्तिगत अधिकारों के खिलाफ हैं, बल्कि सामाजिक असंतुलन और तनाव को बढ़ा सकते हैं। सरकारी अधिकारियों को चाहिए कि वे ऐसे मामलों में समय रहते हस्तक्षेप करें और समुदाय को संवैधानिक अधिकारों की जानकारी दें।
इस मामले की निगरानी अब प्रशासन कर रहा है। पंचायत और प्रशासन के बीच बातचीत से यह स्पष्ट किया जाएगा कि भविष्य में किसी भी परिवार या युवक-युवती के व्यक्तिगत फैसलों पर अवैध दबाव न बनाया जाए।
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