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MP Teachers E-Attendance: नेटवर्क नहीं मिला तो छत और पेड़ों पर चढ़े शिक्षक
Sandeep Patel
मध्य प्रदेश में ‘हमारे शिक्षक’ ऐप पर ई-अटेंडेंस के लिए नेटवर्क नहीं मिलने से शिक्षक छतों और पेड़ों पर सिग्नल तलाश रहे हैं। जानें विभाग का पक्ष और पूरा विवाद।
मध्य प्रदेश के दूरदराज सरकारी स्कूलों में ऑनलाइन हाजिरी ने नई परेशानी खड़ी कर दी है। नेटवर्क के लिए शिक्षक छतों और पेड़ों पर चढ़ने को मजबूर, विभाग ने डिजिटल व्यवस्था को पारदर्शिता और जवाबदेही से जोड़ा।
मध्य प्रदेश के दूरदराज सरकारी स्कूलों में ‘हमारे शिक्षक’ ऐप पर ई-अटेंडेंस दर्ज करने की व्यवस्था अब डिजिटल सुविधा से ज्यादा जमीनी चुनौती बनती दिख रही है। कमजोर या बिल्कुल नहीं मिलने वाले मोबाइल नेटवर्क के बीच कुछ शिक्षक कथित तौर पर स्कूल की छतों और पेड़ों पर चढ़कर सिग्नल तलाश रहे हैं। 21 अगस्त को सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक आगर-मालवा के बड़ोद क्षेत्र के एक सरकारी स्कूल का वीडियो भी सोशल मीडिया पर सामने आया, जिसमें एक शिक्षक ऊंचाई पर मोबाइल के जरिए उपस्थिति दर्ज करने की कोशिश करते दिखाई दिए।
शिक्षकों का कहना है कि समय पर ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज नहीं होने पर उन्हें वेतन में देरी या प्रशासनिक कार्रवाई की चिंता रहती है। दूसरी ओर शिक्षा विभाग का तर्क है कि डिजिटल उपस्थिति से कर्मचारियों की वास्तविक मौजूदगी सुनिश्चित करने, जवाबदेही बढ़ाने और फर्जी स्टाफिंग पर रोक लगाने में मदद मिलती है।
1. नेटवर्क के लिए नई जद्दोजहद
दूरदराज इलाकों में समस्या उस समय सामने आती है जब शिक्षक स्कूल पहुंचने के बाद मोबाइल से उपस्थिति दर्ज करने की कोशिश करते हैं। जहां स्कूल परिसर में मोबाइल सिग्नल कमजोर है, वहां कुछ शिक्षक ऊंची जगह खोजने लगते हैं।
21 अगस्त की रिपोर्ट में छतों और पेड़ों पर चढ़कर मोबाइल सिग्नल पकड़ने की तस्वीरें और वीडियो सामने आने का उल्लेख है। आगर-मालवा के बड़ोद क्षेत्र का वीडियो इसी समस्या को उजागर करता है।
यह स्थिति केवल तकनीकी असुविधा का मामला नहीं है। यदि किसी शिक्षक को रोजाना हाजिरी के लिए स्कूल परिसर छोड़कर ऊंची जगह तलाशनी पड़े, तो डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य ही सवालों के घेरे में आ जाता है।
2. ‘हमारे शिक्षक’ ऐप कैसे काम करता है?
मध्य प्रदेश का ‘हमारे शिक्षक’ ऐप स्कूल शिक्षा विभाग के Education Portal 3.0 से जुड़ा है। ऐप के आधिकारिक Google Play विवरण के अनुसार कर्मचारी मोबाइल लोकेशन और फेस पहचान के जरिए उपस्थिति दर्ज कर सकते हैं। इसके अलावा छुट्टी, प्रशिक्षण, सेवा विवरण और विभागीय सूचनाओं जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध हैं।
यानी डिजिटल उपस्थिति केवल मोबाइल में एक बटन दबाने की प्रक्रिया नहीं है। सिस्टम को शिक्षक की पहचान और स्थान से संबंधित डिजिटल जानकारी भी चाहिए।
यही कारण है कि मोबाइल नेटवर्क की समस्या वाले इलाकों में ऐप आधारित उपस्थिति का इस्तेमाल अधिक कठिन हो सकता है।
3. वेतन और कार्रवाई की चिंता
शिक्षकों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि तकनीकी समस्या को कहीं उनकी अनुपस्थिति न मान लिया जाए। कई शिक्षकों ने ऐसी स्थिति में वेतन रुकने या प्रशासनिक कार्रवाई की आशंका जताई है। 21 अगस्त की रिपोर्ट में शिक्षक संगठनों की ओर से भी नेटवर्क की समस्या को लेकर स्थायी समाधान की मांग का उल्लेख है।
हालांकि, हर नेटवर्क विफलता पर स्वतः वेतन कटौती होने का दावा अलग से आधिकारिक रूप से सत्यापित किए बिना नहीं किया जाना चाहिए। पुराने मामलों में वेतन कटौती और ई-अटेंडेंस को लेकर शिकायतें सामने आ चुकी हैं, लेकिन वर्तमान घटना में किसी विशेष शिक्षक की वेतन कटौती को नेटवर्क समस्या से जोड़ने के लिए विभागीय रिकॉर्ड जरूरी होगा।
इसलिए मूल सवाल तकनीकी विफलता की स्थिति में जवाबदेही तय करने की स्पष्ट प्रक्रिया का है।
4. विभाग का डिजिटल तर्क
शिक्षा विभाग डिजिटल उपस्थिति व्यवस्था को कर्मचारियों की जवाबदेही और पारदर्शिता से जोड़ता है। ताजा रिपोर्ट में विभागीय अधिकारी ने कहा कि ऐप आधारित उपस्थिति व्यवस्था का उद्देश्य ghost staffing को कम करना और accountability सुनिश्चित करना है। विभाग ने सर्वर ओवरलोड और तकनीकी दिक्कतों से निपटने के लिए grace time और CAPTCHA checks जैसे उपायों का भी उल्लेख किया।
यह तर्क अपनी जगह महत्वपूर्ण है। सरकारी स्कूलों में शिक्षक की वास्तविक उपस्थिति सुनिश्चित करना प्रशासनिक निगरानी का जरूरी हिस्सा है।
लेकिन सर्वर की समस्या और मोबाइल नेटवर्क की अनुपलब्धता दो अलग चुनौतियां हैं। यदि किसी स्कूल में सिग्नल ही नहीं पहुंचता, तो CAPTCHA या server-side सुधार उस समस्या को पूरी तरह हल नहीं कर सकते।
5. ग्रामीण स्कूलों की असली चुनौती
मध्य प्रदेश के दूरदराज और ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल व्यवस्था लागू करने का सबसे बड़ा सवाल infrastructure का है। स्कूल में बिजली, इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क की स्थिति हर जगह समान नहीं है।
ऐसी परिस्थितियों में शिक्षक को स्कूल की छत या पेड़ पर चढ़कर सिग्नल तलाशना पड़े तो यह केवल प्रशासनिक असुविधा नहीं, बल्कि सुरक्षा का भी सवाल बन जाता है।
2025 में भी मध्य प्रदेश में ऐप आधारित शिक्षक उपस्थिति को लेकर विवाद अदालत तक पहुंचा था। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में शिक्षकों ने नेटवर्क और ऐप के व्यावहारिक इस्तेमाल से जुड़ी समस्याएं उठाई थीं और अदालत ने राज्य से प्रशिक्षण तथा नेटवर्क संबंधी पहलुओं पर जानकारी मांगी थी।
6. क्या हो सकता है समाधान?
डिजिटल उपस्थिति का उद्देश्य खत्म किए बिना तकनीकी बाधाओं के लिए अलग व्यवस्था बनाई जा सकती है। सबसे पहले प्रत्येक सरकारी स्कूल का connectivity audit होना चाहिए।
जहां नेटवर्क उपलब्ध नहीं है, वहां स्कूल आधारित Wi-Fi या अन्य कनेक्टिविटी व्यवस्था, offline attendance और नेटवर्क लौटने पर automatic sync जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है।
साथ ही, जिस दिन तकनीकी कारण से उपस्थिति दर्ज नहीं हो पाए, उसके लिए human verification और exception mechanism होना जरूरी है। इससे वास्तविक अनुपस्थिति और तकनीकी विफलता के बीच अंतर किया जा सकेगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिक्षक को सिग्नल पकड़ने के लिए असुरक्षित जगह पर चढ़ने की जरूरत न पड़े।
7. अब सबसे बड़ा सवाल
मध्य प्रदेश में डिजिटल उपस्थिति की बहस अब केवल ‘शिक्षक स्कूल में हैं या नहीं’ तक सीमित नहीं रह गई है।
असल सवाल यह है:
जब स्कूल में मोबाइल नेटवर्क ही उपलब्ध नहीं है, तो उसी नेटवर्क पर आधारित डिजिटल उपस्थिति को हर शिक्षक के लिए अनिवार्य कैसे बनाया जाए?
जवाबदेही जरूरी है और फर्जी उपस्थिति रोकना भी जरूरी है। लेकिन किसी डिजिटल व्यवस्था की सफलता इस बात से तय होगी कि वह राज्य के सबसे दूरस्थ स्कूल में भी उतनी ही विश्वसनीय है या नहीं जितनी किसी शहर के स्कूल में।
आगर-मालवा से सामने आए वीडियो और शिक्षकों की शिकायतें इसी digital governance बनाम ground reality के अंतर को उजागर करती हैं।
घटना और विभागीय प्रतिक्रिया: क्या पता है?
| मुद्दा | उपलब्ध स्थिति |
|---|---|
| समस्या | दूरदराज स्कूलों में कमजोर/अनुपलब्ध मोबाइल नेटवर्क |
| शिक्षकों की प्रतिक्रिया | छतों और पेड़ों पर सिग्नल तलाशने की शिकायत |
| वायरल उदाहरण | आगर-मालवा के बड़ोद क्षेत्र का वीडियो |
| ऐप | ‘हमारे शिक्षक’, Education Portal 3.0 से जुड़ा |
| विभाग का तर्क | पारदर्शिता, जवाबदेही और ghost staffing पर रोक |
| मुख्य विवाद | नेटवर्क न होने पर अनिवार्य ऑनलाइन उपस्थिति |
| संभावित समाधान | connectivity audit, offline sync और exception mechanism |
निष्कर्ष: मध्य प्रदेश में ‘हमारे शिक्षक’ ऐप के जरिए ई-अटेंडेंस का उद्देश्य शिक्षकों की उपस्थिति को पारदर्शी और सत्यापित बनाना है। लेकिन दूरदराज स्कूलों में नेटवर्क की कमी इस व्यवस्था की व्यवहारिकता पर गंभीर सवाल उठा रही है। शिक्षकों का छतों और पेड़ों पर सिग्नल तलाशना बताता है कि डिजिटल नियम लागू करने से पहले डिजिटल infrastructure सुनिश्चित करना उतना ही जरूरी है।
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