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खिवनी में बाघों की वर्चस्व की लड़ाई, घायल युवराज को भोपाल किया गया शिफ्ट
देवास,(म.प्र.)
अल्फा मेल बाघ युवराज और युवा बाघ अधिराज के बीच संघर्ष के बाद वन विभाग ने बिना हाथी चार घंटे तक रेस्क्यू ऑपरेशन चलाकर घायल बाघ को वन विहार भोपाल पहुंचाया।
देवास जिले के खिवनी अभयारण्य में बाघों के बीच वर्चस्व की लड़ाई ने वन विभाग की चिंता बढ़ा दी है। करीब 10 साल तक इस क्षेत्र पर राज करने वाले अल्फा मेल बाघ 'युवराज' को युवा बाघ 'अधिराज' ने चुनौती दी। दोनों के बीच हुए संघर्ष में युवराज गंभीर रूप से घायल हो गया। उसके अगले दोनों पंजों पर गहरे घाव मिले हैं, जिससे वह लंगड़ाकर चल रहा था और शिकार करने में भी असमर्थ हो गया था। वन विभाग की गश्ती टीम ने जब उसे घायल हालत में देखा तो तुरंत वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना दी गई। इसके बाद शनिवार को विशेष रेस्क्यू अभियान चलाकर उसे इलाज के लिए वन विहार भोपाल भेज दिया गया। वन अधिकारियों के अनुसार, युवराज लंबे समय से खिवनी अभयारण्य का प्रमुख नर बाघ माना जाता था। उसने अपने क्षेत्र पर कई वर्षों तक कब्जा बनाए रखा और अन्य बाघों को चुनौती नहीं देने दी। लेकिन हाल के दिनों में युवा बाघ अधिराज लगातार उसके इलाके में सक्रिय था। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि उम्र बढ़ने के साथ युवराज की ताकत पहले जैसी नहीं रही, जबकि अधिराज अपनी फुर्ती और ताकत के दम पर इलाके पर कब्जा जमाने की कोशिश कर रहा था। इसी दौरान दोनों के बीच संघर्ष हुआ, जिसमें युवराज बुरी तरह घायल हो गया और उसे अपना इलाका छोड़ना पड़ा। घायल बाघ की जानकारी मिलते ही वन विहार भोपाल के वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ. अतुल गुप्ता के नेतृत्व में विशेषज्ञों की टीम खिवनी अभयारण्य पहुंची। हालांकि इस अभियान की सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि मौके पर बाघ को ट्रैंकुलाइज करने के लिए आमतौर पर इस्तेमाल होने वाला हाथी उपलब्ध नहीं था। ऐसे में पूरी टीम को जमीन पर रहकर ही बेहद सावधानी और रणनीति के साथ ऑपरेशन चलाना पड़ा। घने जंगल और घायल बाघ की अनिश्चित गतिविधियों के कारण हर कदम जोखिम भरा था।
करीब चार घंटे तक चले इस रेस्क्यू अभियान के दौरान विशेषज्ञों ने लगातार बाघ की गतिविधियों पर नजर रखी। सही समय मिलने पर उसे ट्रैंकुलाइजर डार्ट के जरिए बेहोश किया गया। बेहोश होने के बाद पशु चिकित्सकों ने उसकी प्राथमिक जांच की, जिसमें पंजों पर गंभीर चोट और शरीर पर संघर्ष के निशान पाए गए। प्राथमिक उपचार देने के बाद उसे विशेष पिंजरे में सुरक्षित रखा गया और सड़क मार्ग से वन विहार भोपाल के लिए रवाना किया गया, जहां उसका विस्तृत उपचार और निगरानी की जाएगी। वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि खिवनी अभयारण्य में बिना हाथी के इस तरह का सफल बाघ रेस्क्यू पहली बार किया गया है। सामान्य परिस्थितियों में हाथी की मदद से बाघ के काफी करीब पहुंचना आसान होता है, लेकिन इस बार पूरी टीम को पैदल और वाहनों की सहायता से ऑपरेशन करना पड़ा। इसलिए इस अभियान को तकनीकी रूप से काफी चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। बाघों के बीच क्षेत्रीय वर्चस्व को लेकर संघर्ष सामान्य प्राकृतिक प्रक्रिया है। प्रत्येक नर बाघ अपने इलाके पर अधिकार बनाए रखने की कोशिश करता है क्योंकि उसी क्षेत्र में उसे शिकार, पानी और प्रजनन के अवसर मिलते हैं। जब कोई युवा और ताकतवर बाघ परिपक्व होता है, तब वह पुराने अल्फा मेल को चुनौती देता है। ऐसे संघर्ष कई बार बेहद हिंसक हो जाते हैं और दोनों बाघ गंभीर रूप से घायल हो सकते हैं।
लड़ाई के दौरान बाघ अक्सर प्रतिद्वंद्वी के अगले पंजों और कंधों को निशाना बनाते हैं। इसका उद्देश्य सामने वाले बाघ को शिकार करने और तेजी से चलने में अक्षम बनाना होता है। यदि किसी बाघ के पंजे गंभीर रूप से घायल हो जाएं तो उसके लिए जंगल में जीवित रहना मुश्किल हो सकता है। यही वजह है कि घायल युवराज को तत्काल उपचार के लिए सुरक्षित स्थान पर ले जाना जरूरी समझा गया। खिवनी अभयारण्य में युवराज का विशेष महत्व रहा है। वन विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, बाघिन मीरा के साथ उसकी जोड़ी ने इस क्षेत्र में बाघों की संख्या बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। वर्तमान में अभयारण्य में मौजूद अधिकांश बाघों का संबंध इसी कुनबे से माना जाता है। कई वर्षों तक युवराज ने अपने क्षेत्र में संतुलन बनाए रखा और उसकी मौजूदगी के कारण दूसरे बाघों की गतिविधियां भी नियंत्रित रहीं।
अब अधिराज के इलाके पर कब्जा जमाने के बाद अभयारण्य में बाघों की गतिविधियों पर वन विभाग विशेष नजर रखे हुए है। अधिकारियों का कहना है कि आने वाले दिनों में कैमरा ट्रैप और नियमित गश्त के जरिए अधिराज की गतिविधियों की निगरानी की जाएगी। वहीं वन विहार भोपाल में युवराज की हालत पर लगातार नजर रखी जाएगी। डॉक्टरों का प्रयास रहेगा कि इलाज के बाद यदि उसकी स्थिति सामान्य होती है तो भविष्य में विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार आगे का निर्णय लिया जाएगा। वन विभाग का मानना है कि यह घटना जंगल में प्राकृतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा जरूर है, लेकिन घायल वन्यजीवों को समय पर उपचार देना संरक्षण की जिम्मेदारी भी है।
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खिवनी में बाघों की वर्चस्व की लड़ाई, घायल युवराज को भोपाल किया गया शिफ्ट
देवास,(म.प्र.)
देवास जिले के खिवनी अभयारण्य में बाघों के बीच वर्चस्व की लड़ाई ने वन विभाग की चिंता बढ़ा दी है। करीब 10 साल तक इस क्षेत्र पर राज करने वाले अल्फा मेल बाघ 'युवराज' को युवा बाघ 'अधिराज' ने चुनौती दी। दोनों के बीच हुए संघर्ष में युवराज गंभीर रूप से घायल हो गया। उसके अगले दोनों पंजों पर गहरे घाव मिले हैं, जिससे वह लंगड़ाकर चल रहा था और शिकार करने में भी असमर्थ हो गया था। वन विभाग की गश्ती टीम ने जब उसे घायल हालत में देखा तो तुरंत वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना दी गई। इसके बाद शनिवार को विशेष रेस्क्यू अभियान चलाकर उसे इलाज के लिए वन विहार भोपाल भेज दिया गया। वन अधिकारियों के अनुसार, युवराज लंबे समय से खिवनी अभयारण्य का प्रमुख नर बाघ माना जाता था। उसने अपने क्षेत्र पर कई वर्षों तक कब्जा बनाए रखा और अन्य बाघों को चुनौती नहीं देने दी। लेकिन हाल के दिनों में युवा बाघ अधिराज लगातार उसके इलाके में सक्रिय था। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि उम्र बढ़ने के साथ युवराज की ताकत पहले जैसी नहीं रही, जबकि अधिराज अपनी फुर्ती और ताकत के दम पर इलाके पर कब्जा जमाने की कोशिश कर रहा था। इसी दौरान दोनों के बीच संघर्ष हुआ, जिसमें युवराज बुरी तरह घायल हो गया और उसे अपना इलाका छोड़ना पड़ा। घायल बाघ की जानकारी मिलते ही वन विहार भोपाल के वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ. अतुल गुप्ता के नेतृत्व में विशेषज्ञों की टीम खिवनी अभयारण्य पहुंची। हालांकि इस अभियान की सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि मौके पर बाघ को ट्रैंकुलाइज करने के लिए आमतौर पर इस्तेमाल होने वाला हाथी उपलब्ध नहीं था। ऐसे में पूरी टीम को जमीन पर रहकर ही बेहद सावधानी और रणनीति के साथ ऑपरेशन चलाना पड़ा। घने जंगल और घायल बाघ की अनिश्चित गतिविधियों के कारण हर कदम जोखिम भरा था।
करीब चार घंटे तक चले इस रेस्क्यू अभियान के दौरान विशेषज्ञों ने लगातार बाघ की गतिविधियों पर नजर रखी। सही समय मिलने पर उसे ट्रैंकुलाइजर डार्ट के जरिए बेहोश किया गया। बेहोश होने के बाद पशु चिकित्सकों ने उसकी प्राथमिक जांच की, जिसमें पंजों पर गंभीर चोट और शरीर पर संघर्ष के निशान पाए गए। प्राथमिक उपचार देने के बाद उसे विशेष पिंजरे में सुरक्षित रखा गया और सड़क मार्ग से वन विहार भोपाल के लिए रवाना किया गया, जहां उसका विस्तृत उपचार और निगरानी की जाएगी। वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि खिवनी अभयारण्य में बिना हाथी के इस तरह का सफल बाघ रेस्क्यू पहली बार किया गया है। सामान्य परिस्थितियों में हाथी की मदद से बाघ के काफी करीब पहुंचना आसान होता है, लेकिन इस बार पूरी टीम को पैदल और वाहनों की सहायता से ऑपरेशन करना पड़ा। इसलिए इस अभियान को तकनीकी रूप से काफी चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। बाघों के बीच क्षेत्रीय वर्चस्व को लेकर संघर्ष सामान्य प्राकृतिक प्रक्रिया है। प्रत्येक नर बाघ अपने इलाके पर अधिकार बनाए रखने की कोशिश करता है क्योंकि उसी क्षेत्र में उसे शिकार, पानी और प्रजनन के अवसर मिलते हैं। जब कोई युवा और ताकतवर बाघ परिपक्व होता है, तब वह पुराने अल्फा मेल को चुनौती देता है। ऐसे संघर्ष कई बार बेहद हिंसक हो जाते हैं और दोनों बाघ गंभीर रूप से घायल हो सकते हैं।
लड़ाई के दौरान बाघ अक्सर प्रतिद्वंद्वी के अगले पंजों और कंधों को निशाना बनाते हैं। इसका उद्देश्य सामने वाले बाघ को शिकार करने और तेजी से चलने में अक्षम बनाना होता है। यदि किसी बाघ के पंजे गंभीर रूप से घायल हो जाएं तो उसके लिए जंगल में जीवित रहना मुश्किल हो सकता है। यही वजह है कि घायल युवराज को तत्काल उपचार के लिए सुरक्षित स्थान पर ले जाना जरूरी समझा गया। खिवनी अभयारण्य में युवराज का विशेष महत्व रहा है। वन विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, बाघिन मीरा के साथ उसकी जोड़ी ने इस क्षेत्र में बाघों की संख्या बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। वर्तमान में अभयारण्य में मौजूद अधिकांश बाघों का संबंध इसी कुनबे से माना जाता है। कई वर्षों तक युवराज ने अपने क्षेत्र में संतुलन बनाए रखा और उसकी मौजूदगी के कारण दूसरे बाघों की गतिविधियां भी नियंत्रित रहीं।
अब अधिराज के इलाके पर कब्जा जमाने के बाद अभयारण्य में बाघों की गतिविधियों पर वन विभाग विशेष नजर रखे हुए है। अधिकारियों का कहना है कि आने वाले दिनों में कैमरा ट्रैप और नियमित गश्त के जरिए अधिराज की गतिविधियों की निगरानी की जाएगी। वहीं वन विहार भोपाल में युवराज की हालत पर लगातार नजर रखी जाएगी। डॉक्टरों का प्रयास रहेगा कि इलाज के बाद यदि उसकी स्थिति सामान्य होती है तो भविष्य में विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार आगे का निर्णय लिया जाएगा। वन विभाग का मानना है कि यह घटना जंगल में प्राकृतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा जरूर है, लेकिन घायल वन्यजीवों को समय पर उपचार देना संरक्षण की जिम्मेदारी भी है।
