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बैंक ऑफ इंडिया में फर्जीवाड़ा, कूटरचित दस्तावेजों से लोन घोटाला, दो को 7-7 साल की सजा
भोपाल (म.प्र)
भोपाल के मिसरोद स्थित बैंक ऑफ इंडिया शाखा में फर्जी लोन घोटाले में सीबीआई कोर्ट ने तत्कालीन शाखा प्रबंधक और उनके सहयोगी को दोषी ठहराते हुए 7-7 साल की सजा सुनाई।
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के मिसरोद क्षेत्र में बैंक ऑफ इंडिया की शाखा में हुए फर्जी लोन घोटाले ने बैंकिंग व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। इस मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने सख्त निर्णय सुनाते हुए तत्कालीन शाखा प्रबंधक और उनके सहयोगी को दोषी करार दिया है। अदालत ने दोनों दोषियों को विभिन्न धाराओं के तहत 7-7 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है।
फर्जी दस्तावेजों के आधार पर तैयार हुआ पूरा घोटाला
मामले की शुरुआत वर्ष 2014 में हुई, जब बैंक शाखा में तैनात तत्कालीन मैनेजर ने कुछ अन्य लोगों के साथ मिलकर एक सुनियोजित योजना के तहत फर्जी दस्तावेज तैयार किए। इन दस्तावेजों के आधार पर अलग-अलग व्यक्तियों और फर्मों के नाम पर टर्म लोन और कैश क्रेडिट लिमिट स्वीकृत कर दी गई। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि जिन खातों के नाम पर लोन लिया गया था, उन्हें इस पूरी प्रक्रिया की कोई जानकारी नहीं थी।
12.5 लाख रुपये का ‘विजन कम्प्यूटर’ मामला
जांच में सामने आया कि “विजन कम्प्यूटर” नामक फर्म के नाम पर 12.50 लाख रुपये का लोन स्वीकृत किया गया था। यह पूरा लोन कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर मंजूर हुआ और बाद में यह राशि वास्तविक खाताधारक की जानकारी के बिना दूसरे खाते में ट्रांसफर कर दी गई। इस वित्तीय हेरफेर में सहअभियुक्त की भूमिका भी स्पष्ट रूप से सामने आई।
सीबीआई जांच में खुली परतें
वर्ष 2016 में इस घोटाले की शिकायत सीबीआई एंटी करप्शन ब्रांच भोपाल को प्राप्त हुई थी। इसके बाद विस्तृत जांच शुरू की गई, जिसमें कई वित्तीय अनियमितताओं और फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ। जांच में यह साबित हुआ कि बैंकिंग प्रक्रियाओं का दुरुपयोग कर अवैध रूप से लोन स्वीकृत किए गए और राशि का गबन किया गया।
कोर्ट ने बढ़ाईं गंभीर धाराएं
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर भारतीय दंड संहिता की कई गंभीर धाराओं को शामिल किया। इसमें धोखाधड़ी, जालसाजी और जाली दस्तावेजों के उपयोग से जुड़े प्रावधान प्रमुख रहे। अदालत ने यह भी माना कि यह अपराध सुनियोजित तरीके से किया गया था, जिसमें बैंक की आंतरिक प्रणाली का दुरुपयोग हुआ।
अलग-अलग धाराओं में सजा का प्रावधान
अदालत ने दोषियों को धोखाधड़ी से संबंधित धारा में 5-5 साल, जालसाजी से जुड़े गंभीर अपराध में 7-7 साल तथा अन्य संबंधित धाराओं में 5-5 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही आर्थिक दंड भी लगाया गया है, जिसे न चुकाने की स्थिति में अतिरिक्त कारावास का प्रावधान रखा गया है। इसके अलावा बैंक के तत्कालीन शाखा प्रबंधक को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अतिरिक्त सजा और जुर्माना भी दिया गया है।
न्यायालय का सख्त संदेश
इस फैसले के माध्यम से अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि बैंकिंग सिस्टम में धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार को किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह निर्णय वित्तीय संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
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बैंक ऑफ इंडिया में फर्जीवाड़ा, कूटरचित दस्तावेजों से लोन घोटाला, दो को 7-7 साल की सजा
भोपाल (म.प्र)
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के मिसरोद क्षेत्र में बैंक ऑफ इंडिया की शाखा में हुए फर्जी लोन घोटाले ने बैंकिंग व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। इस मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने सख्त निर्णय सुनाते हुए तत्कालीन शाखा प्रबंधक और उनके सहयोगी को दोषी करार दिया है। अदालत ने दोनों दोषियों को विभिन्न धाराओं के तहत 7-7 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है।
फर्जी दस्तावेजों के आधार पर तैयार हुआ पूरा घोटाला
मामले की शुरुआत वर्ष 2014 में हुई, जब बैंक शाखा में तैनात तत्कालीन मैनेजर ने कुछ अन्य लोगों के साथ मिलकर एक सुनियोजित योजना के तहत फर्जी दस्तावेज तैयार किए। इन दस्तावेजों के आधार पर अलग-अलग व्यक्तियों और फर्मों के नाम पर टर्म लोन और कैश क्रेडिट लिमिट स्वीकृत कर दी गई। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि जिन खातों के नाम पर लोन लिया गया था, उन्हें इस पूरी प्रक्रिया की कोई जानकारी नहीं थी।
12.5 लाख रुपये का ‘विजन कम्प्यूटर’ मामला
जांच में सामने आया कि “विजन कम्प्यूटर” नामक फर्म के नाम पर 12.50 लाख रुपये का लोन स्वीकृत किया गया था। यह पूरा लोन कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर मंजूर हुआ और बाद में यह राशि वास्तविक खाताधारक की जानकारी के बिना दूसरे खाते में ट्रांसफर कर दी गई। इस वित्तीय हेरफेर में सहअभियुक्त की भूमिका भी स्पष्ट रूप से सामने आई।
सीबीआई जांच में खुली परतें
वर्ष 2016 में इस घोटाले की शिकायत सीबीआई एंटी करप्शन ब्रांच भोपाल को प्राप्त हुई थी। इसके बाद विस्तृत जांच शुरू की गई, जिसमें कई वित्तीय अनियमितताओं और फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ। जांच में यह साबित हुआ कि बैंकिंग प्रक्रियाओं का दुरुपयोग कर अवैध रूप से लोन स्वीकृत किए गए और राशि का गबन किया गया।
कोर्ट ने बढ़ाईं गंभीर धाराएं
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर भारतीय दंड संहिता की कई गंभीर धाराओं को शामिल किया। इसमें धोखाधड़ी, जालसाजी और जाली दस्तावेजों के उपयोग से जुड़े प्रावधान प्रमुख रहे। अदालत ने यह भी माना कि यह अपराध सुनियोजित तरीके से किया गया था, जिसमें बैंक की आंतरिक प्रणाली का दुरुपयोग हुआ।
अलग-अलग धाराओं में सजा का प्रावधान
अदालत ने दोषियों को धोखाधड़ी से संबंधित धारा में 5-5 साल, जालसाजी से जुड़े गंभीर अपराध में 7-7 साल तथा अन्य संबंधित धाराओं में 5-5 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही आर्थिक दंड भी लगाया गया है, जिसे न चुकाने की स्थिति में अतिरिक्त कारावास का प्रावधान रखा गया है। इसके अलावा बैंक के तत्कालीन शाखा प्रबंधक को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अतिरिक्त सजा और जुर्माना भी दिया गया है।
न्यायालय का सख्त संदेश
इस फैसले के माध्यम से अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि बैंकिंग सिस्टम में धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार को किसी भी स्तर पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह निर्णय वित्तीय संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
