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पाक राष्ट्रपति जरदारी के कश्मीर-काशी बयान पर भारत का कड़ा जवाब, कहा- आंतरिक मामलों में दखल बर्दाश्त नहीं
Digital Desk
भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार फिर बयानबाजी का दौर तेज हो गया है। पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी द्वारा कश्मीर और वाराणसी से जुड़े मुद्दों पर की गई टिप्पणियों को भारत ने सख्ती से खारिज कर दिया है।
विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति को भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है। नई दिल्ली की ओर से यह प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है जब पाकिस्तान की तरफ से एक बार फिर कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की कोशिश की जा रही है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारत इस तरह की अनावश्यक और आधारहीन टिप्पणियों को पूरी तरह खारिज करता है। उन्होंने कहा कि किसी भी संप्रभु देश के आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जा सकता। मंत्रालय का कहना है कि पाकिस्तान को पहले अपने यहां की परिस्थितियों पर ध्यान देना चाहिए, जहां मानवाधिकारों और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर लगातार गंभीर सवाल उठते रहे हैं।
विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान के रिकॉर्ड का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां धार्मिक और सामाजिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ होने वाली घटनाएं पूरी दुनिया के सामने हैं। अधिकारियों के अनुसार पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना बनाए जाने, जबरन धर्मांतरण और सामाजिक भेदभाव जैसी घटनाओं की खबरें समय-समय पर सामने आती रही हैं। ऐसे में भारत को उपदेश देने की कोशिश करना पूरी तरह अनुचित और विरोधाभासी प्रतीत होता है।
दरअसल विवाद की शुरुआत उस बयान से हुई जिसमें पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित काशी रेलवे स्टेशन के पास मौजूद गंज शहीदा मस्जिद से जुड़े मामले का जिक्र किया था। रेलवे प्रशासन द्वारा स्टेशन के पुनर्विकास और विस्तार परियोजना के तहत क्षेत्र खाली कराने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। इसी संदर्भ में जारी नोटिस को लेकर जरदारी ने प्रतिक्रिया दी और अल्पसंख्यकों के अधिकारों तथा सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा की बात कही थी। उन्होंने अपने बयान में कश्मीर का भी उल्लेख किया, जिसके बाद भारत की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई।
भारत सरकार का कहना है कि काशी रेलवे स्टेशन का मामला पूरी तरह प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है। इससे जुड़े निर्णय स्थानीय कानूनों और विकास परियोजनाओं के अनुरूप लिए जा रहे हैं। ऐसे मामलों पर किसी विदेशी नेता की टिप्पणी को भारत ने अनावश्यक हस्तक्षेप बताया है। विदेश मंत्रालय ने दो टूक कहा कि भारत अपने आंतरिक मामलों को संभालने में पूरी तरह सक्षम है और किसी बाहरी सलाह या टिप्पणी की आवश्यकता नहीं है।
राजनयिक हलकों में भी इस बयान को लेकर चर्चा तेज है। जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान समय-समय पर कश्मीर सहित अन्य मुद्दों को उठाकर घरेलू राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश करता रहा है। हालांकि भारत लगातार यह दोहराता आया है कि जम्मू-कश्मीर उसका अभिन्न अंग है और इससे जुड़े सभी विषय पूरी तरह आंतरिक हैं। भारत की नीति रही है कि किसी भी द्विपक्षीय मुद्दे का समाधान दोनों देशों के बीच सीधे संवाद से ही संभव है, न कि सार्वजनिक बयानबाजी से।
पिछले कुछ वर्षों में भारत और पाकिस्तान के संबंधों में कई उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं। सीमा पार आतंकवाद, कश्मीर और अन्य मुद्दों को लेकर दोनों देशों के बीच कई बार तनाव बढ़ा है। ऐसे माहौल में पाकिस्तान के राष्ट्रपति का यह बयान एक बार फिर दोनों देशों के बीच राजनीतिक बहस का कारण बन गया है। फिलहाल भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस तरह की टिप्पणियों को गंभीरता से नहीं लेता और अपने आंतरिक मामलों में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करेगा।
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पाक राष्ट्रपति जरदारी के कश्मीर-काशी बयान पर भारत का कड़ा जवाब, कहा- आंतरिक मामलों में दखल बर्दाश्त नहीं
Digital Desk
विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति को भारत के आंतरिक मामलों पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है। नई दिल्ली की ओर से यह प्रतिक्रिया ऐसे समय आई है जब पाकिस्तान की तरफ से एक बार फिर कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की कोशिश की जा रही है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि भारत इस तरह की अनावश्यक और आधारहीन टिप्पणियों को पूरी तरह खारिज करता है। उन्होंने कहा कि किसी भी संप्रभु देश के आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जा सकता। मंत्रालय का कहना है कि पाकिस्तान को पहले अपने यहां की परिस्थितियों पर ध्यान देना चाहिए, जहां मानवाधिकारों और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर लगातार गंभीर सवाल उठते रहे हैं।
विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान के रिकॉर्ड का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां धार्मिक और सामाजिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ होने वाली घटनाएं पूरी दुनिया के सामने हैं। अधिकारियों के अनुसार पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना बनाए जाने, जबरन धर्मांतरण और सामाजिक भेदभाव जैसी घटनाओं की खबरें समय-समय पर सामने आती रही हैं। ऐसे में भारत को उपदेश देने की कोशिश करना पूरी तरह अनुचित और विरोधाभासी प्रतीत होता है।
दरअसल विवाद की शुरुआत उस बयान से हुई जिसमें पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित काशी रेलवे स्टेशन के पास मौजूद गंज शहीदा मस्जिद से जुड़े मामले का जिक्र किया था। रेलवे प्रशासन द्वारा स्टेशन के पुनर्विकास और विस्तार परियोजना के तहत क्षेत्र खाली कराने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। इसी संदर्भ में जारी नोटिस को लेकर जरदारी ने प्रतिक्रिया दी और अल्पसंख्यकों के अधिकारों तथा सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा की बात कही थी। उन्होंने अपने बयान में कश्मीर का भी उल्लेख किया, जिसके बाद भारत की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई।
भारत सरकार का कहना है कि काशी रेलवे स्टेशन का मामला पूरी तरह प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है। इससे जुड़े निर्णय स्थानीय कानूनों और विकास परियोजनाओं के अनुरूप लिए जा रहे हैं। ऐसे मामलों पर किसी विदेशी नेता की टिप्पणी को भारत ने अनावश्यक हस्तक्षेप बताया है। विदेश मंत्रालय ने दो टूक कहा कि भारत अपने आंतरिक मामलों को संभालने में पूरी तरह सक्षम है और किसी बाहरी सलाह या टिप्पणी की आवश्यकता नहीं है।
राजनयिक हलकों में भी इस बयान को लेकर चर्चा तेज है। जानकारों का मानना है कि पाकिस्तान समय-समय पर कश्मीर सहित अन्य मुद्दों को उठाकर घरेलू राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश करता रहा है। हालांकि भारत लगातार यह दोहराता आया है कि जम्मू-कश्मीर उसका अभिन्न अंग है और इससे जुड़े सभी विषय पूरी तरह आंतरिक हैं। भारत की नीति रही है कि किसी भी द्विपक्षीय मुद्दे का समाधान दोनों देशों के बीच सीधे संवाद से ही संभव है, न कि सार्वजनिक बयानबाजी से।
पिछले कुछ वर्षों में भारत और पाकिस्तान के संबंधों में कई उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं। सीमा पार आतंकवाद, कश्मीर और अन्य मुद्दों को लेकर दोनों देशों के बीच कई बार तनाव बढ़ा है। ऐसे माहौल में पाकिस्तान के राष्ट्रपति का यह बयान एक बार फिर दोनों देशों के बीच राजनीतिक बहस का कारण बन गया है। फिलहाल भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस तरह की टिप्पणियों को गंभीरता से नहीं लेता और अपने आंतरिक मामलों में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करेगा।
