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राज्यसभा में खड़गे-रिजिजू की तीखी नोकझोंक, बोलने के अधिकार पर गरमाई सियासत
Digital Desk
मानसून सत्र में फिर हंगामा, विपक्ष ने अमित शाह से जवाब की मांग दोहराई; सत्ता पक्ष ने नए सांसदों को बोलने का अवसर नहीं मिलने का मुद्दा उठाया
संसद के मानसून सत्र के दौरान गुरुवार को भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव का सिलसिला जारी रहा। राज्यसभा में संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू और विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के बीच बोलने के अधिकार और सदन की कार्यवाही को लेकर तीखी बहस देखने को मिली। दोनों नेताओं ने अपने-अपने पक्ष को मजबूती से रखा, जबकि इस पूरे घटनाक्रम के बीच विपक्ष ने गृह मंत्री अमित शाह से सदन में आकर जवाब देने की मांग दोहराई। लगातार हंगामे के कारण लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों की कार्यवाही प्रभावित हुई।
राज्यसभा की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्षी दलों ने विभिन्न मुद्दों को लेकर नारेबाजी शुरू कर दी। कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों के सांसदों ने नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को बोलने की अनुमति देने की मांग की। शून्यकाल के दौरान कुछ देर तक सदन की कार्यवाही चली, लेकिन हंगामे के कारण माहौल लगातार गरमाता गया। बाद में सभापति ने मल्लिकार्जुन खड़गे को अपनी बात रखने की अनुमति दी, जिसके बाद सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक शुरू हो गई।
मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि उन्हें यह बताने की कोशिश की जा रही है कि सदन में कब और कैसे बोलना चाहिए। उन्होंने कहा कि संसद में क्या बोलना है, कब बोलना है और किस विषय पर बोलना है, यह तय करना उनका अधिकार है। उन्होंने यह भी कहा कि सत्ता पक्ष विपक्षी सांसदों के अधिकारों का सम्मान नहीं कर रहा और विपक्ष केवल गृह मंत्री अमित शाह से सदन में आकर जवाब देने की मांग कर रहा है। खड़गे ने अपने वक्तव्य के दौरान पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकतंत्र में विरोध और व्यवधान भी संसदीय प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं।
खड़गे के वक्तव्य पर प्रतिक्रिया देते हुए संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि सदन की कार्यवाही नियमों के अनुसार संचालित होती है और कोई भी सदस्य एक ही विषय पर बार-बार नहीं बोल सकता। उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी अपने नए सांसदों को सदन में बोलने का अवसर नहीं दे रही है। रिजिजू ने कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा का उदाहरण देते हुए कहा कि वे नए सदस्य हैं और अब तक उन्हें सदन में स्वागत भाषण देने का अवसर भी नहीं मिला। उन्होंने कहा कि संसदीय परंपराओं का सम्मान करते हुए सभी सदस्यों को अपनी बात रखने का समान अवसर मिलना चाहिए।
राज्यसभा में बढ़ते विवाद और नारेबाजी के बीच कार्यवाही को कुछ समय के लिए स्थगित करना पड़ा। हालांकि बाद में सदन की कार्यवाही दोबारा शुरू हुई, लेकिन दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी रहा। इस दौरान विपक्ष लगातार अपने मुद्दों पर चर्चा कराने और सरकार से जवाब मांगने की मांग करता रहा।
उधर, लोकसभा में भी हंगामे का असर साफ दिखाई दिया। कार्यवाही शुरू होने के कुछ ही मिनट बाद विपक्षी सांसदों के विरोध और नारेबाजी के कारण सदन की कार्यवाही बाधित हो गई। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने विपक्ष के व्यवहार पर नाराजगी जताते हुए कहा कि संसद देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था है और यहां व्यवस्थित चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि देश सरकार का जवाब सुनना चाहता है, लेकिन लगातार हंगामे के कारण सदन की कार्यवाही प्रभावित हो रही है। इसके बाद लोकसभा की कार्यवाही दोपहर तक के लिए स्थगित कर दी गई।
संसद परिसर के बाहर भी राजनीतिक गतिविधियां तेज रहीं। विपक्षी दलों के सांसदों ने गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ पोस्टर लेकर प्रदर्शन किया और 20 जुलाई को छात्र प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई के मामले में सरकार से जवाब मांगा। विपक्ष का कहना है कि इस मुद्दे पर सरकार को सदन में स्पष्ट बयान देना चाहिए और संसद में चर्चा कराई जानी चाहिए।
गृह मंत्री अमित शाह संसद पहुंचे, लेकिन विपक्ष उनकी ओर से सीधे जवाब दिए जाने की मांग पर कायम रहा। विपक्षी दलों का कहना है कि संसद में उठाए जा रहे महत्वपूर्ण मुद्दों पर संबंधित मंत्री को स्वयं उपस्थित होकर जवाब देना चाहिए। वहीं सरकार का पक्ष है कि सदन की कार्यवाही नियमों के अनुसार चलनी चाहिए और बिना व्यवधान के चर्चा होनी चाहिए।
संसद परिसर में भाजपा सांसद रवि किशन भी मीडिया के सामने नजर आए। हालांकि उन्होंने पत्रकारों के किसी सवाल का जवाब नहीं दिया। आसपास मौजूद लोगों ने बताया कि वे मौन व्रत पर हैं, जिसके चलते उन्होंने किसी भी राजनीतिक विषय पर प्रतिक्रिया देने से परहेज किया।
मानसून सत्र के दौरान लगातार हो रहे हंगामे ने विधायी कार्यों की गति पर भी असर डाला है। कई महत्वपूर्ण विधेयकों और चर्चाओं पर समय पर विचार नहीं हो पा रहा है। यदि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद की स्थिति नहीं बनती है तो सत्र के शेष दिनों में भी कार्यवाही प्रभावित हो सकती है। संसदीय परंपराओं के अनुसार सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है कि वे लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करते हुए महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर सार्थक चर्चा सुनिश्चित करें। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों पक्ष आपसी सहमति से सदन की कार्यवाही को सुचारु रूप से चलाने के लिए कोई साझा रास्ता निकाल पाते हैं या नहीं।
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राज्यसभा में खड़गे-रिजिजू की तीखी नोकझोंक, बोलने के अधिकार पर गरमाई सियासत
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संसद के मानसून सत्र के दौरान गुरुवार को भी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव का सिलसिला जारी रहा। राज्यसभा में संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू और विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के बीच बोलने के अधिकार और सदन की कार्यवाही को लेकर तीखी बहस देखने को मिली। दोनों नेताओं ने अपने-अपने पक्ष को मजबूती से रखा, जबकि इस पूरे घटनाक्रम के बीच विपक्ष ने गृह मंत्री अमित शाह से सदन में आकर जवाब देने की मांग दोहराई। लगातार हंगामे के कारण लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों की कार्यवाही प्रभावित हुई।
राज्यसभा की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्षी दलों ने विभिन्न मुद्दों को लेकर नारेबाजी शुरू कर दी। कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों के सांसदों ने नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को बोलने की अनुमति देने की मांग की। शून्यकाल के दौरान कुछ देर तक सदन की कार्यवाही चली, लेकिन हंगामे के कारण माहौल लगातार गरमाता गया। बाद में सभापति ने मल्लिकार्जुन खड़गे को अपनी बात रखने की अनुमति दी, जिसके बाद सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक शुरू हो गई।
मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि उन्हें यह बताने की कोशिश की जा रही है कि सदन में कब और कैसे बोलना चाहिए। उन्होंने कहा कि संसद में क्या बोलना है, कब बोलना है और किस विषय पर बोलना है, यह तय करना उनका अधिकार है। उन्होंने यह भी कहा कि सत्ता पक्ष विपक्षी सांसदों के अधिकारों का सम्मान नहीं कर रहा और विपक्ष केवल गृह मंत्री अमित शाह से सदन में आकर जवाब देने की मांग कर रहा है। खड़गे ने अपने वक्तव्य के दौरान पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकतंत्र में विरोध और व्यवधान भी संसदीय प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं।
खड़गे के वक्तव्य पर प्रतिक्रिया देते हुए संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि सदन की कार्यवाही नियमों के अनुसार संचालित होती है और कोई भी सदस्य एक ही विषय पर बार-बार नहीं बोल सकता। उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी अपने नए सांसदों को सदन में बोलने का अवसर नहीं दे रही है। रिजिजू ने कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा का उदाहरण देते हुए कहा कि वे नए सदस्य हैं और अब तक उन्हें सदन में स्वागत भाषण देने का अवसर भी नहीं मिला। उन्होंने कहा कि संसदीय परंपराओं का सम्मान करते हुए सभी सदस्यों को अपनी बात रखने का समान अवसर मिलना चाहिए।
राज्यसभा में बढ़ते विवाद और नारेबाजी के बीच कार्यवाही को कुछ समय के लिए स्थगित करना पड़ा। हालांकि बाद में सदन की कार्यवाही दोबारा शुरू हुई, लेकिन दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी रहा। इस दौरान विपक्ष लगातार अपने मुद्दों पर चर्चा कराने और सरकार से जवाब मांगने की मांग करता रहा।
उधर, लोकसभा में भी हंगामे का असर साफ दिखाई दिया। कार्यवाही शुरू होने के कुछ ही मिनट बाद विपक्षी सांसदों के विरोध और नारेबाजी के कारण सदन की कार्यवाही बाधित हो गई। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने विपक्ष के व्यवहार पर नाराजगी जताते हुए कहा कि संसद देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था है और यहां व्यवस्थित चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि देश सरकार का जवाब सुनना चाहता है, लेकिन लगातार हंगामे के कारण सदन की कार्यवाही प्रभावित हो रही है। इसके बाद लोकसभा की कार्यवाही दोपहर तक के लिए स्थगित कर दी गई।
संसद परिसर के बाहर भी राजनीतिक गतिविधियां तेज रहीं। विपक्षी दलों के सांसदों ने गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ पोस्टर लेकर प्रदर्शन किया और 20 जुलाई को छात्र प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई के मामले में सरकार से जवाब मांगा। विपक्ष का कहना है कि इस मुद्दे पर सरकार को सदन में स्पष्ट बयान देना चाहिए और संसद में चर्चा कराई जानी चाहिए।
गृह मंत्री अमित शाह संसद पहुंचे, लेकिन विपक्ष उनकी ओर से सीधे जवाब दिए जाने की मांग पर कायम रहा। विपक्षी दलों का कहना है कि संसद में उठाए जा रहे महत्वपूर्ण मुद्दों पर संबंधित मंत्री को स्वयं उपस्थित होकर जवाब देना चाहिए। वहीं सरकार का पक्ष है कि सदन की कार्यवाही नियमों के अनुसार चलनी चाहिए और बिना व्यवधान के चर्चा होनी चाहिए।
संसद परिसर में भाजपा सांसद रवि किशन भी मीडिया के सामने नजर आए। हालांकि उन्होंने पत्रकारों के किसी सवाल का जवाब नहीं दिया। आसपास मौजूद लोगों ने बताया कि वे मौन व्रत पर हैं, जिसके चलते उन्होंने किसी भी राजनीतिक विषय पर प्रतिक्रिया देने से परहेज किया।
मानसून सत्र के दौरान लगातार हो रहे हंगामे ने विधायी कार्यों की गति पर भी असर डाला है। कई महत्वपूर्ण विधेयकों और चर्चाओं पर समय पर विचार नहीं हो पा रहा है। यदि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद की स्थिति नहीं बनती है तो सत्र के शेष दिनों में भी कार्यवाही प्रभावित हो सकती है। संसदीय परंपराओं के अनुसार सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है कि वे लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करते हुए महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर सार्थक चर्चा सुनिश्चित करें। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों पक्ष आपसी सहमति से सदन की कार्यवाही को सुचारु रूप से चलाने के लिए कोई साझा रास्ता निकाल पाते हैं या नहीं।
