बॉलीवुड अभिनेता सुनील शेट्टी ने भाषा और पहचान को लेकर चल रही बहस के बीच स्पष्ट शब्दों में कहा है कि किसी भी व्यक्ति को किसी भाषा को बोलने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मराठी या किसी भी भाषा को वे सम्मान और अपनी इच्छा से सीखना और बोलना पसंद करेंगे, न कि किसी सामाजिक या राजनीतिक दबाव में। उनका यह बयान बुधवार को TiECon मंगलुरु के एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान सामने आया।
कार्यक्रम में जब भाषा और क्षेत्रीय पहचान को लेकर सवाल किया गया, तो सुनील शेट्टी ने कहा कि किसी व्यक्ति का किसी शहर या राज्य में काम करना उसकी मूल पहचान को खत्म नहीं करता। उन्होंने बताया कि वे कम उम्र में अपने गृहनगर मंगलुरु से बाहर जरूर निकले, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि वे अपनी जड़ों से दूर हो गए।
सुनील शेट्टी ने कहा, “मैं जब यहां से बाहर गया, तो किसी और जैसा बनने के लिए नहीं गया था। मैं बेहतर अवसरों की तलाश में निकला था, अपनी पहचान छोड़ने के लिए नहीं।” उन्होंने साफ किया कि आज भी उनके व्यक्तित्व, सोच और काम में मंगलुरु की छाप दिखाई देती है।
मराठी भाषा को लेकर पूछे गए सवाल पर अभिनेता ने दो टूक कहा कि अगर कोई उनसे यह अपेक्षा करता है कि वे किसी दबाव में मराठी बोलें, तो वे इससे सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा, “अगर कोई मुझसे कहे कि तुम्हें मराठी बोलनी ही पड़ेगी, तो मैं कहूंगा—ऐसा जरूरी नहीं है। मैं मराठी तब बोलूंगा, जब मैं खुद चाहूंगा। मुझे मजबूर मत करो।”
हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका यह बयान किसी भाषा या समुदाय के अपमान के इरादे से नहीं है। मुंबई को अपनी कर्मभूमि बताते हुए उन्होंने कहा कि मराठी सीखना और बोलना उनके लिए सम्मान की बात है। उन्होंने कहा, “अगर मैं अपनी कर्मभूमि की भाषा सीखता हूं, तो यह स्वाभाविक है और इससे लोगों को खुशी मिलती है।”
सुनील शेट्टी ने यह भी जोड़ा कि समय के साथ उन्होंने मराठी सीखी है और आज वे आत्मविश्वास के साथ इसे बोल पाते हैं। उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि कई बार वे मुंबई के कुछ स्थानीय युवाओं से भी बेहतर मराठी बोल लेते हैं।
कार्यक्रम में सुनील शेट्टी के साथ वरिष्ठ पत्रकार स्मिता प्रकाश और शिव अरूर भी मंच पर मौजूद थे। बातचीत के दौरान अभिनेता ने सांस्कृतिक विविधता, पहचान और आपसी सम्मान पर जोर दिया।
उनके इस बयान के बाद भाषा और क्षेत्रीय अस्मिता को लेकर चल रही बहस एक बार फिर चर्चा में आ गई है। हालांकि, शेट्टी का रुख संतुलित माना जा रहा है, जिसमें उन्होंने न तो किसी भाषा का विरोध किया और न ही किसी पर उसे थोपने का समर्थन किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भाषा सम्मान से जुड़ती है, मजबूरी से नहीं।
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