ध्यान और योग से बदली ज़िंदगी: तनाव से संतुलन तक, भारत में बढ़ता मानसिक स्वास्थ्य का नया रास्ता

लाइफस्टाइल डेस्क

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तेज़ रफ्तार जीवन, बढ़ता तनाव और मानसिक असंतुलन के बीच योग और ध्यान बन रहे हैं स्वस्थ जीवनशैली का भरोसेमंद आधार

तेज़ होती जीवनशैली, काम का दबाव और डिजिटल निर्भरता के दौर में ध्यान और योग अब सिर्फ आध्यात्मिक अभ्यास नहीं रहे, बल्कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य का अहम जरिया बनते जा रहे हैं। देशभर में योग और ध्यान को अपनाने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित अभ्यास से न सिर्फ तनाव कम होता है, बल्कि जीवन में संतुलन, एकाग्रता और सकारात्मक सोच भी विकसित होती है।

क्या बदलाव आ रहा है?
मेडिकल और सामाजिक अध्ययनों के अनुसार, जो लोग नियमित रूप से ध्यान और योग करते हैं, उनमें एंग्जायटी, डिप्रेशन और नींद से जुड़ी समस्याएं अपेक्षाकृत कम पाई गई हैं। योग से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, जबकि ध्यान मन को स्थिर करता है। यही वजह है कि कॉरपोरेट सेक्टर से लेकर स्कूलों तक, योग और मेडिटेशन को दिनचर्या में शामिल किया जा रहा है।

क्यों बढ़ रही है इसकी जरूरत?
विशेषज्ञ बताते हैं कि लगातार स्क्रीन टाइम, अनियमित दिनचर्या और प्रतिस्पर्धा के कारण मानसिक थकान आम हो गई है। ऐसे में ध्यान व्यक्ति को वर्तमान में जीना सिखाता है, जिससे भावनात्मक संतुलन बनता है। योगासन और प्राणायाम शरीर में ऑक्सीजन का प्रवाह बढ़ाकर हार्मोनल बैलेंस सुधारते हैं, जिसका सीधा असर मनोदशा पर पड़ता है।

कैसे बदलता है जीवन?
दिल्ली स्थित योग प्रशिक्षक के अनुसार, “योग केवल व्यायाम नहीं, बल्कि अनुशासन है। यह व्यक्ति को स्वयं से जोड़ता है।” नियमित अभ्यास करने वाले लोगों का कहना है कि उनमें चिड़चिड़ापन कम हुआ है, निर्णय लेने की क्षमता बेहतर हुई है और रिश्तों में धैर्य बढ़ा है। कई लोग इसे कामकाजी तनाव से निपटने का प्रभावी तरीका मानते हैं।

युवा और कामकाजी वर्ग में बढ़ता चलन
आज के युवा, जो करियर और निजी जीवन के बीच संतुलन बनाने में जूझ रहे हैं, योग और ध्यान को मानसिक स्थिरता का साधन मान रहे हैं। कई स्टार्टअप और कंपनियां कर्मचारियों के लिए वेलनेस सेशन शुरू कर चुकी हैं। स्कूलों में भी बच्चों को योग सिखाने पर जोर दिया जा रहा है ताकि वे बचपन से ही मानसिक मजबूती विकसित कर सकें।

सरकारी और सामाजिक पहल
सरकार की ओर से अंतरराष्ट्रीय योग दिवस जैसे आयोजनों ने भी लोगों को जागरूक किया है। आयुष मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में योग प्रशिक्षण केंद्रों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स से जुड़ने वालों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह संकेत है कि समाज अब स्वास्थ्य को लेकर अधिक सजग हो रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ध्यान और योग को जीवनशैली का हिस्सा बनाने से दीर्घकालिक लाभ मिल सकते हैं। हालांकि, इसे त्वरित समाधान की तरह नहीं, बल्कि निरंतर अभ्यास के रूप में अपनाना जरूरी है। बदलते समय में योग और ध्यान न सिर्फ व्यक्तिगत स्वास्थ्य, बल्कि सामाजिक संतुलन की दिशा में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं।

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