एमएसएमई संशोधन विधेयक: पहचान से परे, छोटे कारोबारों के विकास पर ज़ोर साहिल तनेजा, मुख्य व्यवसाय अधिकारी, नामदेव फिनवेस्ट

Digital Desk

उद्यम पोर्टल पर पंजीकृत सूक्ष्म, लघु एवं माध्यम उद्यमों (एमएसएमई) की संख्या अब 9.16 करोड़ से भी अधिक हो गई है, जो अप्रैल 2023 में 1.65 करोड़ थी।

इन उद्यमों से 40 करोड़ से अधिक लोगों को रोज़गार मिलता है। ऐसे में, 3 अगस्त को राज्यसभा और 7 अगस्त को लोकसभा में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (संशोधन) विधेयक, 2026 के पारित होने के साथ करीब दो दशक बाद एमएसएमई क्षेत्र के लिए कामकाज के नियमों में बड़ा बदलाव आया है।

एनबीएफसी क्षेत्र में आने से पहले मैंने आईसीआईसीआई बैंक में 20 साल बिताए हैं और इसी अनुभव के आधार पर, मैं इस संशोधन पर नज़र डाल रहा हूं। किसी बड़े बैंक के लिए एमएसएमई अक्सर एक फाइल भर होता है, यानी बैलेंस शीट, क्रेडिट ब्यूरो स्कोर और गिरवी रखी संपत्ति के मूल्यांकन के साथ दस्तावेज। वहीं, हमारे जैसे ऋणदाताओं के सामने वही उद्यम अक्सर विशिष्ट व्यक्ति के रूप में आता है, जो किसी छोटे शहर से हो सकता है और जिसके पास न लेखा-परीक्षित खाते होते हैं, न ही कोई लंबा क्रेडिट इतिहास। एक ही तरह के कारोबार के इन दो रूपों के बीच का यह फर्क लंबे समय से भारत में एमएसएमई को ऋण हासिल करने की राह में बड़ी चुनौती रहा है। इसलिए 2026 का संशोधन इस लिए महत्वपूर्ण नहीं है कि किसी प्रावधान में बदलाव आया है, बल्कि यह इस लिहाज़ से उल्लेखनीय है कि इसके दृष्टिकोण में बदलाव आया है। 2006 का कानून एमएसएमई को औपचारिक दायरे में लाने के लिए बनाया गया था; 2026 का संशोधन उन्हें आगे बढ़ने और मजबूत बनाने के लिए है।

नकदी प्रवाह प्राथमिता हो

किसी छोटे कारोबारी से पूछें कि उसे सबसे अधिक किस बात की चिंता रहती है, तो जवाब शायद ही कभी ‘मांग’ होगा। असली चिंता उस पैसे की होती है, जो उसने कमा तो लिया है, लेकिन अभी तक उसके हाथ में नहीं आया। बड़े खरीदार, चाहे कॉरपोरेट हों या सांविधिक निकाय संस्थाएं, उनकी ओर से भुगतान में देरी से धीरे-धीरे कई बड़े कारोबारों की नकदी खत्म हुई है। ऐसे में उन्हें काम पूरा होने और भुगतान मिलने के बीच के फर्क को पाटने के लिए उधार लेना पड़ता है।

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संशोधित कानून में अब पूरी प्रक्रिया के लिए स्पष्ट समय-सीमा तय की गई है, जबकि पुरानी प्रणाली में ऐसी कोई समय-सीमा नहीं थी। मध्यस्थता 90 दिनों के भीतर पूरी करनी होगी। जो विवाद नहीं सुलझेंगे, उन्हें 30 दिनों के भीतर आर्बिट्रेशन में भेजना होगा और दलीलें पूरी होने के 90 दिनों के भीतर फैसला सुनाना होगा। यह बदलाव उस समस्या को भी दूर करता है, जिसमें फैसला आपूर्तिकर्ता के पक्ष में आने के बावजूद उसे उसका पैसा मिलने में लंबा समय लग जाता था। यदि किसी फैसले को चुनौती देने की कार्यवाही छह महीने से अधिक चलती है, तो अदालतों को इस दौरान आपूर्तिकर्ता को तय राशि का कम से कम 50 प्रतिशत हिस्सा जारी करना होगा। इसके अलावा, मध्यस्थता से हुए समझौते या आर्बिट्रेशन के फैसले के तहत मिलने वाली रकम अब जिला कलेक्टर के ज़रिए भू-राजस्व के बकाये की तरह वसूल की जा सकेगी।

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अब केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (सीपीएसई) को अपने एमएसएमई के इनवॉइस का भुगतान ट्रेड रिसीवेबल्स डिस्काउंटिंग सिस्टम (टीआरईडीएस) के ज़रिए करना होगा। यह आरबीआई से स्वीकृति प्राप्त ऐसा मंच है, जहां बकाया इनवॉइस को समय से पहले नकदी में बदला जा सकता है। टीआरईडीएस पर लेन-देन की मात्रा बढ़कर 2025-26 में लगभग 3.47 लाख करोड़ रुपये हो गई है जो 2022-23 में करीब 40,000 करोड़ रुपये थी। ऐसे क्षेत्र में, जहां भुगतान में देरी का मतलब कर्मचारियों का वेतन रुक जाना, वहां भुगतान चक्र में निश्चितता कोई छोटी बात नहीं है। यह कारोबार के लिए ऑक्सीजन की तरह है।

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आगे बढ़ने की गुंजाइश

इस बदलाव के बाद निवेश और कारोबार के आकार (टर्नओवर) की सीमाएं तय करने का अधिकार अब सीधे कानून में तय होने के बजाय सरकारी अधिसूचना के जरिए तय किया जा सकेगा। कागज़ पर यह महज प्रक्रियागत बदलाव लग सकता है, लेकिन वास्तव में यह एक बड़ी व्यावहारिक अड़चन को दूर करता है।

कानून में तय सीमाओं के मद्देनज़र कोई सफल कंपनी, महज एक साल में अपनी श्रेणी से बाहर हो सकती थी और उन सुविधाओं से वंचित हो जाती थी, जिन्होंने उसके विकास में मदद की थी - जैसे प्राथमिकता क्षेत्र को मिलने वाला कर्ज, सरकारी खरीद में प्राथमिकता और गारंटी कवर। मैंने ऐसे प्रवर्तकों (प्रमोटरों) को देखा है, जिन्होंने सिर्फ इन सीमाओं के भीतर बने रहने के लिए अपने कारोबार का विस्तार रोक दिया या उसे अलग-अलग कंपनियों में बांट दिया। यह उद्यमी की नहीं, बल्कि नीति की विफलता है। अब सीमाओं को नए कानून का इंतज़ार किए बगैर समय-समय पर संशोधित किया जा सकता है, ताकि कारोबार के विस्तार को सज़ा देने के बजाय प्रोत्साहित किया जा सके। इसके साथ ही, दोषसिद्धि पर आधारित दंड की जगह अलग-अलग स्तर के दीवानी जुर्माने का प्रावधान किया गया है, जिससे कारोबारों के लिए औपचारिक पंजीकरण अब पहले की तरह जोखिम भरा नहीं नज़र आता।

कारोबार की औपचारिक पहचान का न होना सबसे बड़ी अड़चन

उद्यम का पंजीकरण अब हमेशा के लिए मुफ्त, स्वैच्छिक और पूरी तरह डिजिटल हो गया है। संभव है कि इस बदलाव का असर सबसे लंबे समय तक देखने को मिले। छोटे कारोबारों के लिए किफायती ऋण की राह में सबसे बड़ी अड़चन हमेशा जोखिम नहीं होती, बल्कि उनकी औपचारिक पहचान और विश्वसनीय जानकारी का उपलब्ध न होना भी होती है। जो कारोबार केवल नकदी लेन-देन और अनौपचारिक बही-खातों के आधार पर चलता है, उसके लिए ऋण स्वीकृति मुश्किल होती है, फिर चाहे वह कारोबार कितना ही मज़बूत क्यों न हो।

हमारे संस्थापक और प्रबंध निदेशक, जितेंद्र तंवर ने इस स्थिति के दोनों पहलुओं को करीब से देखा और समझा है। उन्होंने मात्र 17 साल की आयु में जयपुर के आसपास के गांवों में किसानों को ट्रैक्टर बेचने और उन्हें ऋण की शर्तें समझाने से अपना करियर शुरू किया। इनमें से कई ऐसे किसान थे, जिन्होंने इससे पहले कभी स्वीकृति पत्र (सैंक्शन लेटर) तक नहीं देखा था। ‘नामदेव फिनवेस्ट’ आज नौ राज्यों में 137 शाखाओं के जरिए 1,829 करोड़ रुपये से अधिक की परिसंपत्तियों का प्रबंधन करती है, साथ ही 46,000 से अधिक ग्राहकों को सेवा प्रदान करती है। उन्होंने बेहद सरल सोच के साथ इस संस्था का निर्माण किया। उनका मानना है कि जिन कारोबारों को औपचारिक वित्तीय व्यवस्था के तहत मदद नहीं मिल पाती, उनसे दूर नहीं भागना चाहिए। दरअसल, ये ही वे कारोबार हैं, जिन पर अब तक किसी ने पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है।

आयकर और जीएसटी रिकॉर्ड से जुड़ी सत्यापित डिजिटल पहचान से यह तस्वीर बदल जाती है। इससे ऋण देने वालों को व्यापार के वास्तविक नकदी प्रवाह को समझने में मदद मिलती है। इससे कर्ज देने वालों को कारोबार के वास्तविक नकदी प्रवाह को समझने में मदद मिलती है। वे कम ज़मानत पर कार्यशील पूंजी उपलब्ध करा सकते हैं और जोखिम के आधार पर ऋण का उचित मूल्य तय कर सकते हैं। कारोबार को औपचारिक रूप देना अपने आप में कोई अंतिम लक्ष्य नहीं है, यह पूंजी तक पहुंचने का रास्ता भर है।

अगला कदम

कई प्रावधान तभी प्रभावी होते हैं, जब उनसे जुड़े नियम और अधिसूचना जारी होती है, लेकिन असली चुनौती होती है उनका क्रियान्वयन। जैसे, मध्यस्थता एवं सुविधा परिषद (फैसिलिटेशन काउंसिल) कितनी तेज़ी से विवादों को सुलझाती है, टीआरईडीएस का दायरा तय सीपीआईएसई से आगे कितना बढ़ता है, और ज़मीनी स्तर पर वसूली (रिकवरी) कितनी निरंतरता से होती है। सुव्यवस्थित और सुविचारित कानून तभी लाभप्रद होता है जब वह सिर्फ महानगरों में स्थित कंपनियों तक ही नहीं, बल्कि छोटे शहरों के व्यवसायियों तक भी पहुंचे।

सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी अब उन ऋणदाताओं की है, जो अब तक ऋण की पहुंच से दूर रहे कारोबारों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। कानून नियम और ढांचा तय कर सकता है, लेकिन सिर्फ इसी से पहली पीढ़ी के उद्यमियों तक कार्य पूंजी का प्रसार नहीं हो सकता। यदि 2006 के कानून ने भारत को अपने छोटे कारोबारों को औपचारिक पहचान प्रदान करने का आधार प्रदान किया, तो 2026 का संशोधन हमारे सामने इन व्यवसायों को आवश्यक वित्तीय सहायता प्रदान करने और उनका समर्थन करने की चुनौती पेश कर रहा है।

साहिल तनेजा 'नामदेव फिनवेस्ट' में मुख्य व्यवसाय अधिकारी हैं। यह आरबीआई के साथ पंजीकृत एनबीएफसी है जो नौ राज्यों में एमएसएमई, ग्रामीण और हरित ऋण उपलब्ध करती है। तनेजा, नामदेव फिनवेस्ट से जुड़ने से पहले, आईसीआईसीआई बैंक में दो दशक तक कार्यरत रहे, जहां उन्होंने एमएसएमई ऋण, खुदरा परिसंपत्ति (रिटेल एसेट), ब्रांच बैंकिंग और प्राथमिकता क्षेत्र से जुड़े ऋण कारोबार की ज़िम्मेदारी संभाली।

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