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E20 पेट्रोल पर बड़ा बयान, रियल टेस्ट अगले साल आएगा
बिजनेस डेस्क
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने कहा—20% एथेनॉल ब्लेंडिंग जारी, नीति में बदलाव नहीं, असर का असली आकलन 2027 तक होगा
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि देश में पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल (E20) ब्लेंडिंग का प्रयोग अभी भी चल रहा है और इसका वास्तविक प्रभाव यानी “रियल टेस्ट” अभी पूरा नहीं हुआ है। सरकार के अनुसार इस नीति के नतीजे अगले वर्ष तक स्पष्ट रूप से सामने आएंगे, जिसके बाद ही इसके दीर्घकालिक प्रभावों का सही आकलन संभव होगा। यह बयान ऐसे समय में आया है जब E20 पेट्रोल को लेकर देश में लगातार बहस जारी है और कई विशेषज्ञ यह आशंका जता रहे हैं कि इससे पुरानी गाड़ियों के इंजन पर असर पड़ सकता है। हालांकि सरकार ने कोर्ट में यह साफ कर दिया कि अब तक किसी तरह के ठोस वैज्ञानिक या तकनीकी सबूत नहीं मिले हैं, जिससे यह साबित हो सके कि E20 मिश्रण से वाहनों को मैकेनिकल नुकसान होता है। सरकार ने इसे ऊर्जा सुरक्षा, कच्चे तेल के आयात में कमी, किसानों की आय बढ़ाने और पर्यावरण सुधार की दिशा में एक अहम नीति बताया है।
सुप्रीम कोर्ट में यह टिप्पणी भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) की याचिका पर सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी द्वारा की गई। यह मामला कर्नाटक हाई कोर्ट के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें तेल कंपनियों को एक डिस्टिलरी के आवेदन पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया गया था। BPCL ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि हाई कोर्ट का आदेश राष्ट्रीय स्तर की एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति को प्रभावित कर सकता है, क्योंकि सरकार पहले ही E20 को एक व्यापक नीतिगत लक्ष्य के रूप में आगे बढ़ा रही है। सुनवाई के दौरान अदालत ने भी यह सवाल उठाया कि कंपनी ने पहले कर्नाटक हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच में अपील क्यों नहीं की, बजाय सीधे सुप्रीम कोर्ट आने के। इस पर अटॉर्नी जनरल ने कहा कि देश के कई हाई कोर्ट में इसी तरह के मामले लंबित हैं, इसलिए इन सभी मामलों को एक साथ सुनना जरूरी हो सकता है ताकि नीति में असमानता न पैदा हो।
सुनवाई के दौरान सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि एथेनॉल सप्लाई वर्ष 2025-26 के अनुबंध पहले ही कई स्तरों पर अंतिम रूप दिए जा चुके हैं और अक्टूबर 2025 में इनके रिन्यूअल से पहले इस विवाद का निपटारा जरूरी है। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने ट्रांसफर याचिका का विरोध करते हुए कहा कि इससे मामलों के निपटारे में अनावश्यक देरी होगी और नीति से जुड़े फैसलों पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर, अटॉर्नी जनरल ने यह भी कहा कि अलग-अलग अदालतों में चल रहे मामलों के कारण राष्ट्रीय नीति पर अस्थिरता की स्थिति बन सकती है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट में एक साथ सुनवाई उचित होगी।
कंपनी की ओर से यह दावा भी किया गया कि उसकी वार्षिक उत्पादन क्षमता लगभग 9.90 करोड़ लीटर है, लेकिन उसे उसके अनुरूप एथेनॉल आवंटन नहीं मिला। इसी वजह से उसने अतिरिक्त आवंटन की मांग की थी। सरकार ने अदालत में स्पष्ट किया कि किसी भी कंपनी को “प्रेफरेंशियल अलोकेशन” या “बेस्ट एंडेवर” के आधार पर अतिरिक्त एथेनॉल आवंटन का कानूनी अधिकार नहीं है। यदि किसी एक कंपनी के लिए आवंटन बढ़ाया जाता है तो पूरी नीति में बदलाव करना पड़ेगा, जिसकी अनुमति कानून नहीं देता। सुनवाई के बाद सरकार ने दोहराया कि मौजूदा E20 नीति जारी रहेगी और इसमें किसी बदलाव की आवश्यकता नहीं है, जबकि वास्तविक प्रभाव का आकलन आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा।
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E20 पेट्रोल पर बड़ा बयान, रियल टेस्ट अगले साल आएगा
बिजनेस डेस्क
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि देश में पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल (E20) ब्लेंडिंग का प्रयोग अभी भी चल रहा है और इसका वास्तविक प्रभाव यानी “रियल टेस्ट” अभी पूरा नहीं हुआ है। सरकार के अनुसार इस नीति के नतीजे अगले वर्ष तक स्पष्ट रूप से सामने आएंगे, जिसके बाद ही इसके दीर्घकालिक प्रभावों का सही आकलन संभव होगा। यह बयान ऐसे समय में आया है जब E20 पेट्रोल को लेकर देश में लगातार बहस जारी है और कई विशेषज्ञ यह आशंका जता रहे हैं कि इससे पुरानी गाड़ियों के इंजन पर असर पड़ सकता है। हालांकि सरकार ने कोर्ट में यह साफ कर दिया कि अब तक किसी तरह के ठोस वैज्ञानिक या तकनीकी सबूत नहीं मिले हैं, जिससे यह साबित हो सके कि E20 मिश्रण से वाहनों को मैकेनिकल नुकसान होता है। सरकार ने इसे ऊर्जा सुरक्षा, कच्चे तेल के आयात में कमी, किसानों की आय बढ़ाने और पर्यावरण सुधार की दिशा में एक अहम नीति बताया है।
सुप्रीम कोर्ट में यह टिप्पणी भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) की याचिका पर सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी द्वारा की गई। यह मामला कर्नाटक हाई कोर्ट के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें तेल कंपनियों को एक डिस्टिलरी के आवेदन पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया गया था। BPCL ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि हाई कोर्ट का आदेश राष्ट्रीय स्तर की एथेनॉल ब्लेंडिंग नीति को प्रभावित कर सकता है, क्योंकि सरकार पहले ही E20 को एक व्यापक नीतिगत लक्ष्य के रूप में आगे बढ़ा रही है। सुनवाई के दौरान अदालत ने भी यह सवाल उठाया कि कंपनी ने पहले कर्नाटक हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच में अपील क्यों नहीं की, बजाय सीधे सुप्रीम कोर्ट आने के। इस पर अटॉर्नी जनरल ने कहा कि देश के कई हाई कोर्ट में इसी तरह के मामले लंबित हैं, इसलिए इन सभी मामलों को एक साथ सुनना जरूरी हो सकता है ताकि नीति में असमानता न पैदा हो।
सुनवाई के दौरान सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि एथेनॉल सप्लाई वर्ष 2025-26 के अनुबंध पहले ही कई स्तरों पर अंतिम रूप दिए जा चुके हैं और अक्टूबर 2025 में इनके रिन्यूअल से पहले इस विवाद का निपटारा जरूरी है। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने ट्रांसफर याचिका का विरोध करते हुए कहा कि इससे मामलों के निपटारे में अनावश्यक देरी होगी और नीति से जुड़े फैसलों पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर, अटॉर्नी जनरल ने यह भी कहा कि अलग-अलग अदालतों में चल रहे मामलों के कारण राष्ट्रीय नीति पर अस्थिरता की स्थिति बन सकती है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट में एक साथ सुनवाई उचित होगी।
कंपनी की ओर से यह दावा भी किया गया कि उसकी वार्षिक उत्पादन क्षमता लगभग 9.90 करोड़ लीटर है, लेकिन उसे उसके अनुरूप एथेनॉल आवंटन नहीं मिला। इसी वजह से उसने अतिरिक्त आवंटन की मांग की थी। सरकार ने अदालत में स्पष्ट किया कि किसी भी कंपनी को “प्रेफरेंशियल अलोकेशन” या “बेस्ट एंडेवर” के आधार पर अतिरिक्त एथेनॉल आवंटन का कानूनी अधिकार नहीं है। यदि किसी एक कंपनी के लिए आवंटन बढ़ाया जाता है तो पूरी नीति में बदलाव करना पड़ेगा, जिसकी अनुमति कानून नहीं देता। सुनवाई के बाद सरकार ने दोहराया कि मौजूदा E20 नीति जारी रहेगी और इसमें किसी बदलाव की आवश्यकता नहीं है, जबकि वास्तविक प्रभाव का आकलन आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा।
