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पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर फैसला 2-3 महीने बाद, महंगे कच्चे तेल के असर से सरकार ने जताई इंतजार की बात
बिजनेस डेस्क
ईरान संकट के दौरान खरीदे गए महंगे कच्चे तेल की प्रोसेसिंग जारी, सरकारी तेल कंपनियों को 74,781 करोड़ रुपये की अंडर-रिकवरी का सामना
देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में राहत का इंतजार कर रहे लोगों को अभी कुछ समय और इंतजार करना पड़ सकता है। केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने गुरुवार को दिल्ली में कहा कि पेट्रोल-डीजल के दाम घटेंगे या नहीं, इस पर कोई फैसला अगले दो से तीन महीनों में ही संभव होगा। फिलहाल सरकार या सरकारी तेल कंपनियां कीमतों में कटौती को लेकर कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहतीं। मंत्री के अनुसार, हाल ही में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट जरूर आई है, लेकिन इसका असर घरेलू बाजार में तुरंत दिखाई नहीं देगा क्योंकि भारतीय रिफाइनरियां अभी भी उस महंगे कच्चे तेल को प्रोसेस कर रही हैं जिसे ईरान संकट के दौरान ऊंची कीमतों पर खरीदा गया था।
उन्होंने बताया कि जब ईरान से जुड़े तनाव और युद्ध जैसे हालात बने थे, तब वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़कर 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। उस समय देश की तेल कंपनियों ने ऊर्जा आपूर्ति बनाए रखने के लिए ऊंचे दामों पर कच्चा तेल खरीदा था। अब वही स्टॉक रिफाइनरियों में प्रोसेस हो रहा है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें कम होने के बावजूद घरेलू स्तर पर तत्काल राहत देना आसान नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि आने वाले दो-तीन महीनों तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह नियंत्रित बनी रहती हैं, तब पेट्रोल और डीजल के दाम घटाने पर विचार किया जा सकता है।
केंद्रीय मंत्री ने सरकारी तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति का भी जिक्र किया। उनके मुताबिक लागत से कम कीमत पर पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस बेचने की वजह से सरकारी तेल कंपनियों पर भारी आर्थिक दबाव पड़ा है। 30 जून तक इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC), भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (HPCL) को कुल 74,781 करोड़ रुपये की अंडर-रिकवरी का सामना करना पड़ा है। उन्होंने कहा कि यह नुकसान केवल मौजूदा अवधि तक सीमित नहीं है, बल्कि पिछले महीनों की भरपाई का असर भी इसमें शामिल है।
पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार अप्रैल से जून की तिमाही में केवल पेट्रोल पर लगभग 19,905 करोड़ रुपये की अंडर-रिकवरी दर्ज की गई। वहीं डीजल पर नुकसान का आंकड़ा और भी अधिक रहा। इसके अलावा घरेलू रसोई गैस यानी एलपीजी सिलेंडर की बिक्री पर भी कंपनियों को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा। मंत्री ने कहा कि यदि पिछले वर्षों और पिछली तिमाहियों के एलपीजी नुकसान को भी इसमें जोड़ दिया जाए तो कुल अंडर-रिकवरी का आंकड़ा 2.1 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है। हालांकि विभिन्न वित्तीय समायोजनों के बाद मौजूदा कुल नुकसान 74,781 करोड़ रुपये बताया गया है।
गौरतलब है कि इसी वर्ष मई महीने में सरकारी तेल कंपनियों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का हवाला देते हुए पेट्रोल और डीजल दोनों के दामों में चरणबद्ध तरीके से 7.50 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की थी। देश के एक लाख से अधिक पेट्रोल पंपों में से करीब 90 प्रतिशत पर इन्हीं तीन सरकारी कंपनियों का संचालन है। ऐसे में इनके द्वारा लिया गया कोई भी फैसला सीधे तौर पर करोड़ों उपभोक्ताओं को प्रभावित करता है। फिलहाल इन कंपनियों ने कीमतों में किसी तरह की कटौती की घोषणा नहीं की है।
दूसरी ओर निजी क्षेत्र की प्रमुख ईंधन विक्रेता कंपनी नायरा एनर्जी ने ग्राहकों को राहत देते हुए पेट्रोल और डीजल दोनों की कीमतों में कमी की है। कंपनी ने पेट्रोल पर 5 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 3 रुपये प्रति लीटर की कटौती की है। इसके बाद भोपाल में नायरा के पेट्रोल की कीमत 119.79 रुपये से घटकर 114.79 रुपये प्रति लीटर हो गई है, जबकि डीजल की कीमत 102.57 रुपये से घटकर 99.57 रुपये प्रति लीटर पहुंच गई है। इससे यह संकेत मिला है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक नीचे बनी रहती हैं तो अन्य कंपनियां भी भविष्य में इसी दिशा में कदम उठा सकती हैं।पिछले कुछ दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें फिर से लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर लौट आई हैं। इससे ऊर्जा बाजार में कुछ स्थिरता आई है। हालांकि सरकारी तेल कंपनियां अभी भी पुराने महंगे स्टॉक के प्रभाव से बाहर नहीं निकली हैं। यही वजह है कि आम उपभोक्ताओं को तत्काल राहत मिलने की संभावना कम दिखाई दे रही है।
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पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर फैसला 2-3 महीने बाद, महंगे कच्चे तेल के असर से सरकार ने जताई इंतजार की बात
बिजनेस डेस्क
देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में राहत का इंतजार कर रहे लोगों को अभी कुछ समय और इंतजार करना पड़ सकता है। केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने गुरुवार को दिल्ली में कहा कि पेट्रोल-डीजल के दाम घटेंगे या नहीं, इस पर कोई फैसला अगले दो से तीन महीनों में ही संभव होगा। फिलहाल सरकार या सरकारी तेल कंपनियां कीमतों में कटौती को लेकर कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहतीं। मंत्री के अनुसार, हाल ही में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट जरूर आई है, लेकिन इसका असर घरेलू बाजार में तुरंत दिखाई नहीं देगा क्योंकि भारतीय रिफाइनरियां अभी भी उस महंगे कच्चे तेल को प्रोसेस कर रही हैं जिसे ईरान संकट के दौरान ऊंची कीमतों पर खरीदा गया था।
उन्होंने बताया कि जब ईरान से जुड़े तनाव और युद्ध जैसे हालात बने थे, तब वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़कर 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। उस समय देश की तेल कंपनियों ने ऊर्जा आपूर्ति बनाए रखने के लिए ऊंचे दामों पर कच्चा तेल खरीदा था। अब वही स्टॉक रिफाइनरियों में प्रोसेस हो रहा है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें कम होने के बावजूद घरेलू स्तर पर तत्काल राहत देना आसान नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि आने वाले दो-तीन महीनों तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह नियंत्रित बनी रहती हैं, तब पेट्रोल और डीजल के दाम घटाने पर विचार किया जा सकता है।
केंद्रीय मंत्री ने सरकारी तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति का भी जिक्र किया। उनके मुताबिक लागत से कम कीमत पर पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस बेचने की वजह से सरकारी तेल कंपनियों पर भारी आर्थिक दबाव पड़ा है। 30 जून तक इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC), भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (HPCL) को कुल 74,781 करोड़ रुपये की अंडर-रिकवरी का सामना करना पड़ा है। उन्होंने कहा कि यह नुकसान केवल मौजूदा अवधि तक सीमित नहीं है, बल्कि पिछले महीनों की भरपाई का असर भी इसमें शामिल है।
पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार अप्रैल से जून की तिमाही में केवल पेट्रोल पर लगभग 19,905 करोड़ रुपये की अंडर-रिकवरी दर्ज की गई। वहीं डीजल पर नुकसान का आंकड़ा और भी अधिक रहा। इसके अलावा घरेलू रसोई गैस यानी एलपीजी सिलेंडर की बिक्री पर भी कंपनियों को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा। मंत्री ने कहा कि यदि पिछले वर्षों और पिछली तिमाहियों के एलपीजी नुकसान को भी इसमें जोड़ दिया जाए तो कुल अंडर-रिकवरी का आंकड़ा 2.1 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच जाता है। हालांकि विभिन्न वित्तीय समायोजनों के बाद मौजूदा कुल नुकसान 74,781 करोड़ रुपये बताया गया है।
गौरतलब है कि इसी वर्ष मई महीने में सरकारी तेल कंपनियों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का हवाला देते हुए पेट्रोल और डीजल दोनों के दामों में चरणबद्ध तरीके से 7.50 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की थी। देश के एक लाख से अधिक पेट्रोल पंपों में से करीब 90 प्रतिशत पर इन्हीं तीन सरकारी कंपनियों का संचालन है। ऐसे में इनके द्वारा लिया गया कोई भी फैसला सीधे तौर पर करोड़ों उपभोक्ताओं को प्रभावित करता है। फिलहाल इन कंपनियों ने कीमतों में किसी तरह की कटौती की घोषणा नहीं की है।
दूसरी ओर निजी क्षेत्र की प्रमुख ईंधन विक्रेता कंपनी नायरा एनर्जी ने ग्राहकों को राहत देते हुए पेट्रोल और डीजल दोनों की कीमतों में कमी की है। कंपनी ने पेट्रोल पर 5 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 3 रुपये प्रति लीटर की कटौती की है। इसके बाद भोपाल में नायरा के पेट्रोल की कीमत 119.79 रुपये से घटकर 114.79 रुपये प्रति लीटर हो गई है, जबकि डीजल की कीमत 102.57 रुपये से घटकर 99.57 रुपये प्रति लीटर पहुंच गई है। इससे यह संकेत मिला है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक नीचे बनी रहती हैं तो अन्य कंपनियां भी भविष्य में इसी दिशा में कदम उठा सकती हैं।पिछले कुछ दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें फिर से लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर लौट आई हैं। इससे ऊर्जा बाजार में कुछ स्थिरता आई है। हालांकि सरकारी तेल कंपनियां अभी भी पुराने महंगे स्टॉक के प्रभाव से बाहर नहीं निकली हैं। यही वजह है कि आम उपभोक्ताओं को तत्काल राहत मिलने की संभावना कम दिखाई दे रही है।
