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मध्यप्रदेश में अल्पवर्षा की आशंका पर सरकार अलर्ट, हर जिले में बनेगी जल संकट आकस्मिक योजना
भोपाल,(म.प्र.)
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने संभावित कम बारिश से निपटने के लिए सभी विभागों के साथ समीक्षा बैठक की। जल डैशबोर्ड, कंटिन्जेंसी क्रॉप प्लान, जल संरक्षण अभियान और किसानों के लिए वैज्ञानिक खेती पर विशेष जोर दिया गया।
मध्यप्रदेश में संभावित अल्पवर्षा की आशंका को देखते हुए राज्य सरकार ने व्यापक स्तर पर तैयारी शुरू कर दी है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में मंत्रालय में हुई उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में जल संकट, कृषि, सिंचाई और पेयजल प्रबंधन को लेकर कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। सरकार ने तय किया है कि प्रदेश के प्रत्येक जिले में कलेक्टर की अध्यक्षता में जल संकट से निपटने के लिए आकस्मिक कार्ययोजना तैयार की जाएगी। इसके साथ ही राज्य स्तर पर रियल-टाइम मॉनिटरिंग और पूर्व चेतावनी प्रणाली के लिए आधुनिक जल डैशबोर्ड विकसित किया जाएगा, जिससे जलाशयों, भूजल और पेयजल की स्थिति पर लगातार नजर रखी जा सके। सरकार का कहना है कि समय रहते वैज्ञानिक योजना और विभागों के बेहतर समन्वय से संभावित अल्पवर्षा के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि संभावित कम बारिश को केवल संकट के रूप में नहीं बल्कि बेहतर योजना और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों को अपनाने के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने सभी संबंधित विभागों को निर्देश दिए कि किसानों तक समय पर सही जानकारी और तकनीकी सलाह पहुंचाई जाए ताकि मौसम की चुनौती के बावजूद कृषि उत्पादन और किसानों की आय पर न्यूनतम असर पड़े। बैठक में किसान कल्याण एवं कृषि विकास, जल संसाधन, उद्यानिकी, पशुपालन, मत्स्य पालन, सहकारिता और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग सहित कई विभागों की तैयारियों की समीक्षा की गई।
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि किसानों को कम पानी और कम अवधि में तैयार होने वाली फसलों की खेती के लिए व्यापक स्तर पर जागरूक किया जाए। उन्होंने ज्वार, बाजरा, उड़द, मूंग, तुअर, कोदो और कुटकी जैसी मोटे अनाज एवं दलहनी फसलों को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया। उनका कहना था कि ये फसलें कम पानी में भी बेहतर उत्पादन देती हैं और किसानों के लिए आर्थिक रूप से भी लाभकारी साबित हो सकती हैं। इसके साथ ही किसानों से जल्दबाजी में बुआई नहीं करने की अपील करने के निर्देश भी दिए गए। सरकार चाहती है कि खेतों में पर्याप्त नमी बनने के बाद ही बुआई की जाए ताकि फसलों को शुरुआती नुकसान से बचाया जा सके। बैठक में आधुनिक कृषि तकनीकों के अधिकतम उपयोग पर भी बल दिया गया। अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की सलाह गांव-गांव तक पहुंचाई जाए ताकि किसान अपने क्षेत्र की जल उपलब्धता और मौसम के अनुसार उपयुक्त फसल का चयन कर सकें। इसके लिए कृषि विस्तार तंत्र को और अधिक सक्रिय बनाने की योजना तैयार की गई है। साथ ही कम अवधि में अधिक उत्पादन देने वाली उन्नत बीज किस्मों के उपयोग को भी बढ़ावा देने का निर्णय लिया गया।
जल प्रबंधन को लेकर सरकार ने कई दीर्घकालिक योजनाओं पर भी काम शुरू करने का फैसला किया है। ग्रामीण क्षेत्रों में जल जीवन मिशन के तहत प्रत्येक गांव की समीक्षा की जाएगी और बंद या अधूरी नल-जल योजनाओं की मरम्मत के लिए 90 दिवसीय विशेष अभियान चलाया जाएगा। वहीं शहरी निकायों में वैकल्पिक जल स्रोतों की पहचान कर टैंकर व्यवस्था की आकस्मिक योजना तैयार की जाएगी। अमृत 2.0 योजना के तहत लंबित जल प्रदाय परियोजनाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा करने के निर्देश भी दिए गए हैं। सरकार ने "जलाभिषेक 2.0" अभियान के तहत प्रदेश के पुराने तालाबों, बावड़ियों, कुओं और अन्य पारंपरिक जल संरचनाओं का सर्वे और पुनर्जीवन करने की योजना बनाई है। मनरेगा के समन्वय से प्रत्येक विकासखंड में कम से कम 100 जल संरचनाओं को अगले दो वर्षों में पुनर्जीवित किया जाएगा। इसके अलावा भूजल पुनर्भरण अभियान के अंतर्गत रिचार्ज शाफ्ट, चेक डैम, स्टॉप डैम और खेत-तालाब निर्माण को मिशन मोड में पूरा किया जाएगा। सरकार "खेत का पानी खेत में और गांव का पानी गांव में" की अवधारणा को भी व्यापक स्तर पर लागू करेगी।
बैठक में यह भी तय किया गया कि प्रदेश के सभी प्रमुख जलाशयों जैसे इंदिरा सागर, ओंकारेश्वर, बाणसागर और गांधीसागर में जल उपयोग के लिए स्पष्ट प्राथमिकता तय की जाएगी। सरकार ने पेयजल को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का निर्णय लिया है। इसके बाद सिंचाई और फिर जलविद्युत उत्पादन के लिए जल उपयोग किया जाएगा। साथ ही नहरों की सफाई और मरम्मत रबी सीजन से पहले पूरी करने तथा अंतिम छोर तक पानी पहुंचाने की जिम्मेदारी भी संबंधित अधिकारियों को सौंपी जाएगी। कृषि क्षेत्र के लिए प्रत्येक जिले में कंटिन्जेंसी क्रॉप प्लान तैयार किया जाएगा। कम जल मांग वाली फसलों, दलहन, तिलहन और श्रीअन्न को बढ़ावा देने के साथ न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी की व्यवस्था मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है। धान उत्पादक क्षेत्रों में डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) और वैकल्पिक गीला-सूखा (AWD) तकनीक को बढ़ावा देने की भी योजना बनाई गई है। साथ ही डिजिटल क्रॉप सर्वे, सैटेलाइट इमेजरी आधारित फसल क्षति आकलन और फसल बीमा दावों के त्वरित निपटारे के लिए नई व्यवस्था लागू करने की तैयारी की जा रही है।
इस बीच सरकार की तैयारियों को लेकर विपक्ष ने भी सवाल उठाए हैं। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि यदि संभावित अल्पवर्षा के संकेत पहले से मौजूद थे तो अप्रैल और मई में ही तैयारी क्यों नहीं की गई। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार समय रहते प्रभावी कदम उठाने में विफल रही है और अब समीक्षा बैठकों के जरिए स्थिति संभालने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने नहरों के अंतिम छोर तक पानी पहुंचाने और किसानों के लिए जमीनी स्तर पर तत्काल राहत उपाय लागू करने की मांग की। वहीं राज्य सरकार का कहना है कि सभी विभाग समन्वय के साथ काम कर रहे हैं और संभावित जल संकट से निपटने के लिए आवश्यक तैयारियां तेजी से आगे बढ़ाई जा रही हैं।
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मध्यप्रदेश में अल्पवर्षा की आशंका पर सरकार अलर्ट, हर जिले में बनेगी जल संकट आकस्मिक योजना
भोपाल,(म.प्र.)
मध्यप्रदेश में संभावित अल्पवर्षा की आशंका को देखते हुए राज्य सरकार ने व्यापक स्तर पर तैयारी शुरू कर दी है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में मंत्रालय में हुई उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में जल संकट, कृषि, सिंचाई और पेयजल प्रबंधन को लेकर कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। सरकार ने तय किया है कि प्रदेश के प्रत्येक जिले में कलेक्टर की अध्यक्षता में जल संकट से निपटने के लिए आकस्मिक कार्ययोजना तैयार की जाएगी। इसके साथ ही राज्य स्तर पर रियल-टाइम मॉनिटरिंग और पूर्व चेतावनी प्रणाली के लिए आधुनिक जल डैशबोर्ड विकसित किया जाएगा, जिससे जलाशयों, भूजल और पेयजल की स्थिति पर लगातार नजर रखी जा सके। सरकार का कहना है कि समय रहते वैज्ञानिक योजना और विभागों के बेहतर समन्वय से संभावित अल्पवर्षा के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि संभावित कम बारिश को केवल संकट के रूप में नहीं बल्कि बेहतर योजना और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों को अपनाने के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने सभी संबंधित विभागों को निर्देश दिए कि किसानों तक समय पर सही जानकारी और तकनीकी सलाह पहुंचाई जाए ताकि मौसम की चुनौती के बावजूद कृषि उत्पादन और किसानों की आय पर न्यूनतम असर पड़े। बैठक में किसान कल्याण एवं कृषि विकास, जल संसाधन, उद्यानिकी, पशुपालन, मत्स्य पालन, सहकारिता और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग सहित कई विभागों की तैयारियों की समीक्षा की गई।
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि किसानों को कम पानी और कम अवधि में तैयार होने वाली फसलों की खेती के लिए व्यापक स्तर पर जागरूक किया जाए। उन्होंने ज्वार, बाजरा, उड़द, मूंग, तुअर, कोदो और कुटकी जैसी मोटे अनाज एवं दलहनी फसलों को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया। उनका कहना था कि ये फसलें कम पानी में भी बेहतर उत्पादन देती हैं और किसानों के लिए आर्थिक रूप से भी लाभकारी साबित हो सकती हैं। इसके साथ ही किसानों से जल्दबाजी में बुआई नहीं करने की अपील करने के निर्देश भी दिए गए। सरकार चाहती है कि खेतों में पर्याप्त नमी बनने के बाद ही बुआई की जाए ताकि फसलों को शुरुआती नुकसान से बचाया जा सके। बैठक में आधुनिक कृषि तकनीकों के अधिकतम उपयोग पर भी बल दिया गया। अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की सलाह गांव-गांव तक पहुंचाई जाए ताकि किसान अपने क्षेत्र की जल उपलब्धता और मौसम के अनुसार उपयुक्त फसल का चयन कर सकें। इसके लिए कृषि विस्तार तंत्र को और अधिक सक्रिय बनाने की योजना तैयार की गई है। साथ ही कम अवधि में अधिक उत्पादन देने वाली उन्नत बीज किस्मों के उपयोग को भी बढ़ावा देने का निर्णय लिया गया।
जल प्रबंधन को लेकर सरकार ने कई दीर्घकालिक योजनाओं पर भी काम शुरू करने का फैसला किया है। ग्रामीण क्षेत्रों में जल जीवन मिशन के तहत प्रत्येक गांव की समीक्षा की जाएगी और बंद या अधूरी नल-जल योजनाओं की मरम्मत के लिए 90 दिवसीय विशेष अभियान चलाया जाएगा। वहीं शहरी निकायों में वैकल्पिक जल स्रोतों की पहचान कर टैंकर व्यवस्था की आकस्मिक योजना तैयार की जाएगी। अमृत 2.0 योजना के तहत लंबित जल प्रदाय परियोजनाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा करने के निर्देश भी दिए गए हैं। सरकार ने "जलाभिषेक 2.0" अभियान के तहत प्रदेश के पुराने तालाबों, बावड़ियों, कुओं और अन्य पारंपरिक जल संरचनाओं का सर्वे और पुनर्जीवन करने की योजना बनाई है। मनरेगा के समन्वय से प्रत्येक विकासखंड में कम से कम 100 जल संरचनाओं को अगले दो वर्षों में पुनर्जीवित किया जाएगा। इसके अलावा भूजल पुनर्भरण अभियान के अंतर्गत रिचार्ज शाफ्ट, चेक डैम, स्टॉप डैम और खेत-तालाब निर्माण को मिशन मोड में पूरा किया जाएगा। सरकार "खेत का पानी खेत में और गांव का पानी गांव में" की अवधारणा को भी व्यापक स्तर पर लागू करेगी।
बैठक में यह भी तय किया गया कि प्रदेश के सभी प्रमुख जलाशयों जैसे इंदिरा सागर, ओंकारेश्वर, बाणसागर और गांधीसागर में जल उपयोग के लिए स्पष्ट प्राथमिकता तय की जाएगी। सरकार ने पेयजल को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का निर्णय लिया है। इसके बाद सिंचाई और फिर जलविद्युत उत्पादन के लिए जल उपयोग किया जाएगा। साथ ही नहरों की सफाई और मरम्मत रबी सीजन से पहले पूरी करने तथा अंतिम छोर तक पानी पहुंचाने की जिम्मेदारी भी संबंधित अधिकारियों को सौंपी जाएगी। कृषि क्षेत्र के लिए प्रत्येक जिले में कंटिन्जेंसी क्रॉप प्लान तैयार किया जाएगा। कम जल मांग वाली फसलों, दलहन, तिलहन और श्रीअन्न को बढ़ावा देने के साथ न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी की व्यवस्था मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है। धान उत्पादक क्षेत्रों में डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) और वैकल्पिक गीला-सूखा (AWD) तकनीक को बढ़ावा देने की भी योजना बनाई गई है। साथ ही डिजिटल क्रॉप सर्वे, सैटेलाइट इमेजरी आधारित फसल क्षति आकलन और फसल बीमा दावों के त्वरित निपटारे के लिए नई व्यवस्था लागू करने की तैयारी की जा रही है।
इस बीच सरकार की तैयारियों को लेकर विपक्ष ने भी सवाल उठाए हैं। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि यदि संभावित अल्पवर्षा के संकेत पहले से मौजूद थे तो अप्रैल और मई में ही तैयारी क्यों नहीं की गई। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार समय रहते प्रभावी कदम उठाने में विफल रही है और अब समीक्षा बैठकों के जरिए स्थिति संभालने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने नहरों के अंतिम छोर तक पानी पहुंचाने और किसानों के लिए जमीनी स्तर पर तत्काल राहत उपाय लागू करने की मांग की। वहीं राज्य सरकार का कहना है कि सभी विभाग समन्वय के साथ काम कर रहे हैं और संभावित जल संकट से निपटने के लिए आवश्यक तैयारियां तेजी से आगे बढ़ाई जा रही हैं।
