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अमित शाह के नेतृत्व में लाल आतंक का हुआ अंत और उदय हुआ विकास का सूर्य
प्रफुल्ल कुमार सिंह
दशकों तक भारत के मानचित्र पर कुछ हिस्से ऐसे थे, जहाँ विकास की किरण पहुँचने से पहले ही 'लाल आतंक' का साया उसे निगल जाता था। घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ों में रहने वाले हमारे आदिवासी भाई-बहन, जो जल-जंगल-जमीन के असली संरक्षक हैं, दोहरी मार झेल रहे थे।
एक तरफ नक्सलियों की बंदूकें थीं, तो दूसरी तरफ दशकों की प्रशासनिक उपेक्षा। लेकिन आज, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के मार्गदर्शन और केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह के नेतृत्व में भारत एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। केंद्रीय गृह मंत्री ने संकल्प लिया था कि 31 मार्च 2026 तक भारत पूरी तरह से नक्सलवाद की इस त्रासदी से मुक्त होगा। हुआ भी वही, संसद सत्र के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री ने देश से नक्सलवाद के खात्मे की घोषणा की। 15 अप्रैल 2026 को गृह मंत्रालय भारत सरकार ने भी इस बात की घोषणा की कि नक्सलवाद प्रभावित जिलों की संख्या अब शून्य हो गई है।
दरअसल केंद्रीय गृह मंत्रालय का कार्यभार संभालने के बाद से ही श्री अमित शाह ने यह माना था कि वामपंथी उग्रवाद केवल एक सुरक्षा समस्या नहीं थी, बल्कि यह विकास की कमी और वैचारिक भटकाव का एक घातक मिश्रण था। दशकों तक आदिवासियों को उनकी बुनियादी जरूरतों से दूर रखा गया, जिसका फायदा उठाकर नक्सलियों ने वहाँ अपनी 'समानांतर सत्ता' स्थापित कर ली थी। श्री शाह ने इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए 'शून्य सहिष्णुता' (जीरो टॉलरेंस) की नीति अपनाई। इसके लिए 'क्लियर-होल्ड-बिल्ड' (साफ करो-पकड़ बनाए रखो-निर्माण करो) की एक त्रि-स्तरीय रणनीति पर काम किया। सुरक्षा बलों ने उन दुर्गम इलाकों में 'फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस' स्थापित किए, जहाँ पहले कभी आवागमन नहीं था। आज ये बेस केवल सुरक्षा चौकियाँ नहीं हैं, बल्कि ये विकास के केंद्र बन गए हैं जहाँ से सड़क, राशन और स्वास्थ्य सेवाएं गॉव-गॉव तक पहुँच रही हैं।
अबूझमाड़ जैसे क्षेत्र, जिन्हें कभी 'अज्ञात' माना जाता था, आज डिजिटल क्रांति का हिस्सा बन रहे हैं। भविष्य का विजन 'डिजिटल सैचुरेशन' पर आधारित है। सरकार ने इन क्षेत्रों में 2,500 से अधिक मोबाइल टावर लगाए हैं। अब बस्तर के सुदूर जंगलों में बैठा एक आदिवासी युवा भी 5जी नेटवर्क के जरिए दुनिया से जुड़ा है। यह केवल कनेक्टिविटी नहीं है, बल्कि सशक्तिकरण का हथियार है। इसके माध्यम से 'डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर' सुनिश्चित हुआ है, जिससे बिचौलियों का अंत हुआ और सरकारी पैसा सीधे आदिवासी भाई-बहनों के खातों में पहुंच रहा है। छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार ने नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्र में कई योजनाओं का शुभारंभ कर इस क्षेत्र में विकास की धारा बहा दी।
नक्सलियों ने सबसे ज्यादा प्रहार शिक्षा पर किया था, क्योंकि एक शिक्षित युवा कभी उनकी हिंसक विचारधारा का हिस्सा नहीं बनेगा। इसके जवाब में सरकार ने एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों का जाल बिछाया है। सरकार का विजन स्पष्ट था कि हर जनजातीय ब्लॉक में एक विश्वस्तरीय स्कूल हो, जहाँ आदिवासी प्रतिभा को तराशा जा सके। आर्थिक रूप से, 'धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान' के तहत 79,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया जा रहा है। यह योजना 63,000 से अधिक जनजातीय गॉवों के सर्वांगीण विकास का खाका है। साथ ही पीएम जनमन मिशन के जरिए हम उन जनजातीय समूहों तक पहुॅच रहे हैं, जो अब तक विकास की दौड़ में सबसे पीछे थे। उन्हें पक्के घर, स्वच्छ पानी और बिजली देना हमारा नैतिक दायित्व है, जिसे सरकार मिशन मोड में पूरा कर रही है।
विगत दशकों में एक नैरेटिव गढ़ा गया था कि आदिवासी समाज मुख्यधारा से अलग है। सरकार ने इस सोच को बदला है। भगवान बिरसा मुंडा की जयंती को 'जनजातीय गौरव दिवस' (15 नवंबर) के रूप में मनाना केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि उनके संघर्ष और बलिदान को राष्ट्र के सर्वोच्च सम्मान से जोड़ने का प्रयास है। देश भर में 10 जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय बना रहे हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ जान सकें कि भारत की आजादी की नींव में जनजातीय समाज का कितना गहरा योगदान है।
सुरक्षा बलों की आक्रामक रणनीति और आत्मसमर्पण नीतियों ने नक्सलियों के आधार को हिला दिया है। श्री शाह का विजन केवल बंदूकें शांत करना नहीं है, बल्कि इन क्षेत्रों को 'विकसित भारत @ 2047' के इंजन के रूप में विकसित करना है। आदिवासी क्षेत्रों का विकास, उनकी संस्कृति का संरक्षण और उन्हें राष्ट्र निर्माण की मुख्यधारा में अग्रणी भूमिका देना ही मोदी सरकार की प्राथमिकता है। 'लाल आतंक' का अंधकार अब छंट चुका है, और विकास का सूर्य इन पहाड़ियों पर अपनी पूरी चमक के साथ उदय हो रहा है।
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अमित शाह के नेतृत्व में लाल आतंक का हुआ अंत और उदय हुआ विकास का सूर्य
प्रफुल्ल कुमार सिंह
एक तरफ नक्सलियों की बंदूकें थीं, तो दूसरी तरफ दशकों की प्रशासनिक उपेक्षा। लेकिन आज, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के मार्गदर्शन और केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह के नेतृत्व में भारत एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। केंद्रीय गृह मंत्री ने संकल्प लिया था कि 31 मार्च 2026 तक भारत पूरी तरह से नक्सलवाद की इस त्रासदी से मुक्त होगा। हुआ भी वही, संसद सत्र के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री ने देश से नक्सलवाद के खात्मे की घोषणा की। 15 अप्रैल 2026 को गृह मंत्रालय भारत सरकार ने भी इस बात की घोषणा की कि नक्सलवाद प्रभावित जिलों की संख्या अब शून्य हो गई है।
दरअसल केंद्रीय गृह मंत्रालय का कार्यभार संभालने के बाद से ही श्री अमित शाह ने यह माना था कि वामपंथी उग्रवाद केवल एक सुरक्षा समस्या नहीं थी, बल्कि यह विकास की कमी और वैचारिक भटकाव का एक घातक मिश्रण था। दशकों तक आदिवासियों को उनकी बुनियादी जरूरतों से दूर रखा गया, जिसका फायदा उठाकर नक्सलियों ने वहाँ अपनी 'समानांतर सत्ता' स्थापित कर ली थी। श्री शाह ने इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए 'शून्य सहिष्णुता' (जीरो टॉलरेंस) की नीति अपनाई। इसके लिए 'क्लियर-होल्ड-बिल्ड' (साफ करो-पकड़ बनाए रखो-निर्माण करो) की एक त्रि-स्तरीय रणनीति पर काम किया। सुरक्षा बलों ने उन दुर्गम इलाकों में 'फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस' स्थापित किए, जहाँ पहले कभी आवागमन नहीं था। आज ये बेस केवल सुरक्षा चौकियाँ नहीं हैं, बल्कि ये विकास के केंद्र बन गए हैं जहाँ से सड़क, राशन और स्वास्थ्य सेवाएं गॉव-गॉव तक पहुँच रही हैं।
अबूझमाड़ जैसे क्षेत्र, जिन्हें कभी 'अज्ञात' माना जाता था, आज डिजिटल क्रांति का हिस्सा बन रहे हैं। भविष्य का विजन 'डिजिटल सैचुरेशन' पर आधारित है। सरकार ने इन क्षेत्रों में 2,500 से अधिक मोबाइल टावर लगाए हैं। अब बस्तर के सुदूर जंगलों में बैठा एक आदिवासी युवा भी 5जी नेटवर्क के जरिए दुनिया से जुड़ा है। यह केवल कनेक्टिविटी नहीं है, बल्कि सशक्तिकरण का हथियार है। इसके माध्यम से 'डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर' सुनिश्चित हुआ है, जिससे बिचौलियों का अंत हुआ और सरकारी पैसा सीधे आदिवासी भाई-बहनों के खातों में पहुंच रहा है। छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की सरकार ने नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्र में कई योजनाओं का शुभारंभ कर इस क्षेत्र में विकास की धारा बहा दी।
नक्सलियों ने सबसे ज्यादा प्रहार शिक्षा पर किया था, क्योंकि एक शिक्षित युवा कभी उनकी हिंसक विचारधारा का हिस्सा नहीं बनेगा। इसके जवाब में सरकार ने एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों का जाल बिछाया है। सरकार का विजन स्पष्ट था कि हर जनजातीय ब्लॉक में एक विश्वस्तरीय स्कूल हो, जहाँ आदिवासी प्रतिभा को तराशा जा सके। आर्थिक रूप से, 'धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान' के तहत 79,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया जा रहा है। यह योजना 63,000 से अधिक जनजातीय गॉवों के सर्वांगीण विकास का खाका है। साथ ही पीएम जनमन मिशन के जरिए हम उन जनजातीय समूहों तक पहुॅच रहे हैं, जो अब तक विकास की दौड़ में सबसे पीछे थे। उन्हें पक्के घर, स्वच्छ पानी और बिजली देना हमारा नैतिक दायित्व है, जिसे सरकार मिशन मोड में पूरा कर रही है।
विगत दशकों में एक नैरेटिव गढ़ा गया था कि आदिवासी समाज मुख्यधारा से अलग है। सरकार ने इस सोच को बदला है। भगवान बिरसा मुंडा की जयंती को 'जनजातीय गौरव दिवस' (15 नवंबर) के रूप में मनाना केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि उनके संघर्ष और बलिदान को राष्ट्र के सर्वोच्च सम्मान से जोड़ने का प्रयास है। देश भर में 10 जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय बना रहे हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ जान सकें कि भारत की आजादी की नींव में जनजातीय समाज का कितना गहरा योगदान है।
सुरक्षा बलों की आक्रामक रणनीति और आत्मसमर्पण नीतियों ने नक्सलियों के आधार को हिला दिया है। श्री शाह का विजन केवल बंदूकें शांत करना नहीं है, बल्कि इन क्षेत्रों को 'विकसित भारत @ 2047' के इंजन के रूप में विकसित करना है। आदिवासी क्षेत्रों का विकास, उनकी संस्कृति का संरक्षण और उन्हें राष्ट्र निर्माण की मुख्यधारा में अग्रणी भूमिका देना ही मोदी सरकार की प्राथमिकता है। 'लाल आतंक' का अंधकार अब छंट चुका है, और विकास का सूर्य इन पहाड़ियों पर अपनी पूरी चमक के साथ उदय हो रहा है।
