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मानसून में Gut Health से Clear Skin तक, दही-छाछ क्यों जरूरी?
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नमी और बदलते खानपान के बीच पेट की सेहत पर ध्यान जरूरी, प्रोबायोटिक फूड्स गट माइक्रोबायोम को सपोर्ट कर सकते हैं; लेकिन इन्हें मुंहासों का इलाज नहीं माना जा सकता
मानसून में मौसम बदलने के साथ खानपान और पाचन से जुड़ी परेशानियां भी बढ़ सकती हैं। बाहर का खाना, दूषित पानी, ज्यादा नमी और लंबे समय तक रखा भोजन पेट को परेशान कर सकता है। इसी वजह से इन दिनों आंतों की सेहत पर काफी चर्चा हो रही है। आंतों में मौजूद सूक्ष्मजीवों का समुदाय पाचन के साथ शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता और सूजन से जुड़ी प्रक्रियाओं में भी भूमिका निभाता है। आंत और त्वचा के बीच संबंध को आम तौर पर ‘आंत-त्वचा संबंध’ कहा जाता है। इसी कड़ी के चलते यह सवाल भी उठता है कि क्या पेट की सेहत बेहतर रखने से त्वचा पर भी असर पड़ सकता है। प्रोबायोटिक्स यानी लाभकारी जीवित सूक्ष्मजीव इसी चर्चा का एक हिस्सा हैं। दही और कुछ किण्वित खाद्य पदार्थ इनके आम स्रोत माने जाते हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि दही या कोई किण्वित पेय लेने से चेहरे के मुंहासे सीधे खत्म हो जाएंगे। त्वचा की सेहत पर पूरे खानपान और जीवनशैली का भी असर पड़ता है।
प्रोबायोटिक्स और त्वचा को लेकर हुई शोध में कुछ सकारात्मक संकेत जरूर मिले हैं। खासकर मुंहासों के मामले में वैज्ञानिकों ने आंतों के सूक्ष्मजीवों और शरीर में सूजन के बीच संबंध की संभावना पर अध्ययन किया है। कुछ शोध में प्रोबायोटिक्स लेने वाले लोगों में मुंहासों की गंभीरता कम होने के संकेत मिले हैं। हालांकि अलग-अलग अध्ययनों के नतीजे एक जैसे नहीं हैं और इस विषय पर अभी और विस्तृत शोध की जरूरत है। इसलिए प्रोबायोटिक्स को मुंहासों का इलाज मानना ठीक नहीं होगा। इन्हें संतुलित आहार के हिस्से के तौर पर देखा जा सकता है। अगर किसी व्यक्ति को बार-बार मुंहासे होते हैं, त्वचा पर दर्दनाक गांठें बनती हैं या समस्या लगातार बढ़ रही है तो सिर्फ दही या किसी प्रोबायोटिक उत्पाद पर निर्भर रहने के बजाय त्वचा रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर रहेगा। त्वचा की समस्या के पीछे हार्मोन, आनुवंशिक कारण, त्वचा में तेल का अधिक उत्पादन और सूजन जैसे कई कारण हो सकते हैं।
मानसून में घर का ताजा दही आहार में शामिल करना आसान विकल्प हो सकता है। इसमें मौजूद लाभकारी जीवित सूक्ष्मजीव कुछ लोगों के पाचन स्वास्थ्य को सहारा दे सकते हैं। छाछ भी इस मौसम में हल्का विकल्प मानी जाती है, लेकिन इसमें बहुत ज्यादा नमक या मसाला डालने से बचना बेहतर है। कांजी जैसे पारंपरिक किण्वित पेय भी आहार का हिस्सा हो सकते हैं। लेकिन यहां सबसे जरूरी बात साफ-सफाई की है। बारिश के मौसम में गलत तरीके से तैयार या लंबे समय तक रखे गए किण्वित खाद्य पदार्थ पेट के लिए परेशानी पैदा कर सकते हैं। साफ बर्तन, सुरक्षित पानी और सही तरीके से तैयार किया गया भोजन इस्तेमाल करना जरूरी है। अगर दही, छाछ या किसी किण्वित पेय में असामान्य गंध, रंग या स्वाद आ गया है तो उसे खाना या पीना ठीक नहीं है। बाजार से मिलने वाले प्रोबायोटिक उत्पाद खरीदते समय उनके लेबल और उन्हें रखने से जुड़ी जानकारी भी देखनी चाहिए।
साफ त्वचा के लिए केवल प्रोबायोटिक्स को जिम्मेदार मानना सही नहीं होगा। त्वचा की सेहत पर नींद, तनाव, पानी, खानपान, हार्मोन और त्वचा की देखभाल की दिनचर्या का असर पड़ता है। बहुत ज्यादा प्रसंस्कृत भोजन, मीठे पेय और असंतुलित आहार को कम करना पूरे स्वास्थ्य के लिए बेहतर हो सकता है। वहीं रेशे से भरपूर चीजें जैसे फल, सब्जियां, दालें और साबुत अनाज आंतों के लिए उपयोगी हो सकते हैं। पर्याप्त पानी पीना भी जरूरी है, खासकर मानसून में जब कई बार प्यास कम लगने के कारण लोग पानी कम पीते हैं। हालांकि किसी एक खाद्य पदार्थ को ‘त्वचा साफ करने वाला भोजन’ कहना सही नहीं होगा। शरीर की जरूरत हर व्यक्ति में अलग होती है। जिस व्यक्ति को दूध या दही लेने से गैस, पेट दर्द या दूसरी परेशानी होती है, उसके लिए इन्हें जबरदस्ती आहार में शामिल करने की जरूरत नहीं है।
मानसून में आंतों की सेहत को लेकर एक और जरूरी बात भोजन की स्वच्छता है। बारिश के मौसम में खुले में रखे कटे फल, सड़क किनारे रखा खाना और संदिग्ध पानी से बनी चीजों से संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे में प्रोबायोटिक लेने के चक्कर में साफ-सफाई को नजरअंदाज करना उल्टा नुकसान कर सकता है। घर में बनी छाछ या दही को भी बहुत देर तक कमरे के तापमान पर रखने के बजाय उचित तापमान पर रखना बेहतर है। अगर किसी व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है या वह किसी गंभीर बीमारी का इलाज करा रहा है तो प्रोबायोटिक पूरक शुरू करने से पहले चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए। सामान्य तौर पर भी पूरक लेने के बजाय रोजमर्रा के भोजन से पोषण पूरा करना ज्यादा व्यावहारिक तरीका माना जाता है। दही, छाछ और किण्वित खाद्य पदार्थों को संतुलित मात्रा में लिया जा सकता है, लेकिन इन्हें किसी बीमारी का इलाज नहीं समझना चाहिए।
आंतों की सेहत और साफ त्वचा के बीच संबंध को लेकर शोध अभी जारी है और आने वाले समय में इस विषय पर और जानकारी सामने आ सकती है। फिलहाल जरूरी बात यही है कि पेट और त्वचा की सेहत के लिए किसी एक खाद्य पदार्थ पर निर्भर रहने के बजाय पूरी जीवनशैली पर ध्यान दिया जाए। मानसून में साफ पानी, ताजा खाना, पर्याप्त रेशे वाला आहार, अच्छी नींद और नियमित शारीरिक गतिविधि के साथ घर के सुरक्षित किण्वित खाद्य पदार्थ भोजन का हिस्सा बनाए जा सकते हैं। दही, छाछ और कांजी कुछ लोगों के लिए उपयोगी विकल्प हो सकते हैं, लेकिन इनका असर हर व्यक्ति में अलग हो सकता है। लगातार मुंहासे या पाचन से जुड़ी परेशानी होने पर खुद से कोई पूरक या इलाज शुरू करने के बजाय चिकित्सक की सलाह लेना ज्यादा सुरक्षित तरीका है।
मानसून में Gut Health से Clear Skin तक, दही-छाछ क्यों जरूरी?
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मानसून में मौसम बदलने के साथ खानपान और पाचन से जुड़ी परेशानियां भी बढ़ सकती हैं। बाहर का खाना, दूषित पानी, ज्यादा नमी और लंबे समय तक रखा भोजन पेट को परेशान कर सकता है। इसी वजह से इन दिनों आंतों की सेहत पर काफी चर्चा हो रही है। आंतों में मौजूद सूक्ष्मजीवों का समुदाय पाचन के साथ शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता और सूजन से जुड़ी प्रक्रियाओं में भी भूमिका निभाता है। आंत और त्वचा के बीच संबंध को आम तौर पर ‘आंत-त्वचा संबंध’ कहा जाता है। इसी कड़ी के चलते यह सवाल भी उठता है कि क्या पेट की सेहत बेहतर रखने से त्वचा पर भी असर पड़ सकता है। प्रोबायोटिक्स यानी लाभकारी जीवित सूक्ष्मजीव इसी चर्चा का एक हिस्सा हैं। दही और कुछ किण्वित खाद्य पदार्थ इनके आम स्रोत माने जाते हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि दही या कोई किण्वित पेय लेने से चेहरे के मुंहासे सीधे खत्म हो जाएंगे। त्वचा की सेहत पर पूरे खानपान और जीवनशैली का भी असर पड़ता है।
प्रोबायोटिक्स और त्वचा को लेकर हुई शोध में कुछ सकारात्मक संकेत जरूर मिले हैं। खासकर मुंहासों के मामले में वैज्ञानिकों ने आंतों के सूक्ष्मजीवों और शरीर में सूजन के बीच संबंध की संभावना पर अध्ययन किया है। कुछ शोध में प्रोबायोटिक्स लेने वाले लोगों में मुंहासों की गंभीरता कम होने के संकेत मिले हैं। हालांकि अलग-अलग अध्ययनों के नतीजे एक जैसे नहीं हैं और इस विषय पर अभी और विस्तृत शोध की जरूरत है। इसलिए प्रोबायोटिक्स को मुंहासों का इलाज मानना ठीक नहीं होगा। इन्हें संतुलित आहार के हिस्से के तौर पर देखा जा सकता है। अगर किसी व्यक्ति को बार-बार मुंहासे होते हैं, त्वचा पर दर्दनाक गांठें बनती हैं या समस्या लगातार बढ़ रही है तो सिर्फ दही या किसी प्रोबायोटिक उत्पाद पर निर्भर रहने के बजाय त्वचा रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर रहेगा। त्वचा की समस्या के पीछे हार्मोन, आनुवंशिक कारण, त्वचा में तेल का अधिक उत्पादन और सूजन जैसे कई कारण हो सकते हैं।
मानसून में घर का ताजा दही आहार में शामिल करना आसान विकल्प हो सकता है। इसमें मौजूद लाभकारी जीवित सूक्ष्मजीव कुछ लोगों के पाचन स्वास्थ्य को सहारा दे सकते हैं। छाछ भी इस मौसम में हल्का विकल्प मानी जाती है, लेकिन इसमें बहुत ज्यादा नमक या मसाला डालने से बचना बेहतर है। कांजी जैसे पारंपरिक किण्वित पेय भी आहार का हिस्सा हो सकते हैं। लेकिन यहां सबसे जरूरी बात साफ-सफाई की है। बारिश के मौसम में गलत तरीके से तैयार या लंबे समय तक रखे गए किण्वित खाद्य पदार्थ पेट के लिए परेशानी पैदा कर सकते हैं। साफ बर्तन, सुरक्षित पानी और सही तरीके से तैयार किया गया भोजन इस्तेमाल करना जरूरी है। अगर दही, छाछ या किसी किण्वित पेय में असामान्य गंध, रंग या स्वाद आ गया है तो उसे खाना या पीना ठीक नहीं है। बाजार से मिलने वाले प्रोबायोटिक उत्पाद खरीदते समय उनके लेबल और उन्हें रखने से जुड़ी जानकारी भी देखनी चाहिए।
साफ त्वचा के लिए केवल प्रोबायोटिक्स को जिम्मेदार मानना सही नहीं होगा। त्वचा की सेहत पर नींद, तनाव, पानी, खानपान, हार्मोन और त्वचा की देखभाल की दिनचर्या का असर पड़ता है। बहुत ज्यादा प्रसंस्कृत भोजन, मीठे पेय और असंतुलित आहार को कम करना पूरे स्वास्थ्य के लिए बेहतर हो सकता है। वहीं रेशे से भरपूर चीजें जैसे फल, सब्जियां, दालें और साबुत अनाज आंतों के लिए उपयोगी हो सकते हैं। पर्याप्त पानी पीना भी जरूरी है, खासकर मानसून में जब कई बार प्यास कम लगने के कारण लोग पानी कम पीते हैं। हालांकि किसी एक खाद्य पदार्थ को ‘त्वचा साफ करने वाला भोजन’ कहना सही नहीं होगा। शरीर की जरूरत हर व्यक्ति में अलग होती है। जिस व्यक्ति को दूध या दही लेने से गैस, पेट दर्द या दूसरी परेशानी होती है, उसके लिए इन्हें जबरदस्ती आहार में शामिल करने की जरूरत नहीं है।
मानसून में आंतों की सेहत को लेकर एक और जरूरी बात भोजन की स्वच्छता है। बारिश के मौसम में खुले में रखे कटे फल, सड़क किनारे रखा खाना और संदिग्ध पानी से बनी चीजों से संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे में प्रोबायोटिक लेने के चक्कर में साफ-सफाई को नजरअंदाज करना उल्टा नुकसान कर सकता है। घर में बनी छाछ या दही को भी बहुत देर तक कमरे के तापमान पर रखने के बजाय उचित तापमान पर रखना बेहतर है। अगर किसी व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है या वह किसी गंभीर बीमारी का इलाज करा रहा है तो प्रोबायोटिक पूरक शुरू करने से पहले चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए। सामान्य तौर पर भी पूरक लेने के बजाय रोजमर्रा के भोजन से पोषण पूरा करना ज्यादा व्यावहारिक तरीका माना जाता है। दही, छाछ और किण्वित खाद्य पदार्थों को संतुलित मात्रा में लिया जा सकता है, लेकिन इन्हें किसी बीमारी का इलाज नहीं समझना चाहिए।
आंतों की सेहत और साफ त्वचा के बीच संबंध को लेकर शोध अभी जारी है और आने वाले समय में इस विषय पर और जानकारी सामने आ सकती है। फिलहाल जरूरी बात यही है कि पेट और त्वचा की सेहत के लिए किसी एक खाद्य पदार्थ पर निर्भर रहने के बजाय पूरी जीवनशैली पर ध्यान दिया जाए। मानसून में साफ पानी, ताजा खाना, पर्याप्त रेशे वाला आहार, अच्छी नींद और नियमित शारीरिक गतिविधि के साथ घर के सुरक्षित किण्वित खाद्य पदार्थ भोजन का हिस्सा बनाए जा सकते हैं। दही, छाछ और कांजी कुछ लोगों के लिए उपयोगी विकल्प हो सकते हैं, लेकिन इनका असर हर व्यक्ति में अलग हो सकता है। लगातार मुंहासे या पाचन से जुड़ी परेशानी होने पर खुद से कोई पूरक या इलाज शुरू करने के बजाय चिकित्सक की सलाह लेना ज्यादा सुरक्षित तरीका है।
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