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असीम मुनीर की बढ़ती ताकत से पाकिस्तान में सैन्य शासन को लेकर सवाल
Sandeep Patel
पाकिस्तान के नए रक्षा कानूनों ने असीम मुनीर के अधिकार बढ़ाए हैं। इससे नागरिक नियंत्रण और सैन्य शक्ति के संतुलन पर बहस तेज हो गई है।
पाकिस्तान के नए रक्षा कानूनों ने चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज असीम मुनीर के अधिकार बढ़ा दिए हैं। इससे देश में नागरिक नियंत्रण और सैन्य शक्ति के संतुलन को लेकर नए सवाल उठ रहे हैं।
संसद ने दो कानून मंजूर किए
पाकिस्तान की नेशनल असेंबली और सीनेट ने देश की सैन्य और रणनीतिक कमान व्यवस्था में बदलाव से जुड़े दो महत्वपूर्ण कानूनों को मंजूरी दी है। इनमें डिफेंस फोर्सेज ऑफ पाकिस्तान एक्ट, 2026 और नेशनल कमांड अथॉरिटी (संशोधन) एक्ट, 2026 शामिल हैं।
ये कानून नवंबर 2025 में पारित 27वें संवैधानिक संशोधन के बाद लाए गए हैं। इस संशोधन के तहत चेयरमैन ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी का पद समाप्त कर चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज यानी सीडीएफ का नया पद बनाया गया था।
फील्ड मार्शल असीम मुनीर, जो पाकिस्तान के सेना प्रमुख भी हैं, देश के पहले सीडीएफ बने।
तीनों सेनाओं की कमान मुनीर के पास
नए रक्षा कानून के तहत सीडीएफ को पाकिस्तान की थल सेना, नौसेना और वायु सेना की संयुक्त कमान और नियंत्रण में केंद्रीय भूमिका दी गई है।
सीडीएफ को तीनों सेनाओं के बीच संचालन, संगठन, प्रशिक्षण, प्रशासन और समन्वय से जुड़े मामलों में व्यापक जिम्मेदारियां दी गई हैं। सैन्य मामलों से संबंधित निर्देश और आदेश जारी करने की शक्ति भी इस पद को मिली है।
सेना, नौसेना और वायु सेना के प्रमुख अपने-अपने पदों पर बने रहेंगे, लेकिन नई व्यवस्था में संयुक्त सैन्य कमान के शीर्ष पर सीडीएफ की भूमिका होगी।
नियुक्ति और रिटायरमेंट की शक्ति
नई व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सैन्य कर्मचारियों से जुड़े मामलों में सीडीएफ की शक्तियां हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, सीडीएफ को सैन्यकर्मियों को सेवानिवृत्त करने, सेवा से मुक्त करने, बर्खास्त करने, इस्तीफा स्वीकार या अस्वीकार करने तथा सेवा में बनाए रखने की शक्ति दी गई है। कुछ परिस्थितियों में निर्धारित आयु या सेवा सीमा में छूट देने का अधिकार भी शामिल है।
इसी वजह से असीम मुनीर के पास सैन्यकर्मियों को “हायर, फायर और रिटायर” करने जैसी व्यापक शक्ति होने की चर्चा हो रही है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सीडीएफ को सभी वरिष्ठ सैन्य नियुक्तियों पर असीमित अधिकार मिल गया है। सेना, नौसेना और वायु सेना प्रमुखों जैसी संवैधानिक नियुक्तियां संविधान के अनुच्छेद 243 के तहत प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती हैं।
रणनीतिक कमान में भी बदलाव
दूसरे कानून के जरिए पाकिस्तान की नेशनल कमांड अथॉरिटी की व्यवस्था को नई सैन्य संरचना के अनुरूप बदला गया है।
इसके तहत कमांडर ऑफ द नेशनल स्ट्रैटेजिक कमांड का नया चार सितारा पद बनाया गया है। यह अधिकारी पाकिस्तान की रणनीतिक सेनाओं के संचालन और एकीकरण की जिम्मेदारी संभालेगा।
जनरल सैयद आमेर रजा को इस नए कमांड का पहला प्रमुख नियुक्त किया गया है।
हालांकि, पाकिस्तान की रणनीतिक और परमाणु निर्णय व्यवस्था में नेशनल कमांड अथॉरिटी की केंद्रीय भूमिका बनी हुई है। प्रधानमंत्री अब भी इस प्राधिकरण के अध्यक्ष हैं। इसलिए नए कानून के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि परमाणु नीति का अंतिम अधिकार सीधे मुनीर को सौंप दिया गया है।
विपक्ष ने प्रक्रिया पर उठाए सवाल
दोनों कानून राजनीतिक विवाद के बीच पारित हुए।
विपक्षी सांसदों ने नेशनल असेंबली की कार्यवाही से वॉकआउट किया और विधेयकों को पेश करने तथा पारित करने की प्रक्रिया और गति पर आपत्ति जताई।
सत्तारूढ़ पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज की सहयोगी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने भी संसदीय प्रक्रिया को लेकर चिंता जताई।
सरकार ने इन कानूनों को 27वें संवैधानिक संशोधन के तहत बदली गई सैन्य कमान व्यवस्था को लागू करने के लिए जरूरी बताया है।
पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, डिफेंस फोर्सेज ऑफ पाकिस्तान बिल, 2026 और नेशनल कमांड अथॉरिटी (संशोधन) बिल, 2026 को सदन ने मंजूरी दी है।
नागरिक-सैन्य संतुलन पर बहस
सीडीएफ के बढ़ते अधिकारों ने पाकिस्तान में नागरिक और सैन्य सत्ता के संतुलन पर बहस को फिर तेज कर दिया है।
नए कानून के तहत सीडीएफ प्रधानमंत्री के प्रमुख सैन्य सलाहकार की भूमिका भी निभाएगा। रक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और सशस्त्र बलों से जुड़े मामलों में यह भूमिका सैन्य नेतृत्व को सरकार के महत्वपूर्ण सुरक्षा फैसलों में संस्थागत रूप से अधिक प्रभाव देती है।
समर्थकों का तर्क है कि एकीकृत कमान से सेना, नौसेना और वायु सेना के बीच बेहतर तालमेल स्थापित होगा और रणनीतिक फैसले अधिक प्रभावी ढंग से लिए जा सकेंगे।
आलोचकों का कहना है कि सैन्य अधिकारों का एक ही पद में इतना अधिक केंद्रीकरण नागरिक निगरानी को कमजोर कर सकता है।
क्या पाकिस्तान सैन्य शासन की ओर?
क्या पाकिस्तान फिर से सीधे सैन्य शासन की ओर बढ़ रहा है, यह राजनीतिक विश्लेषण का विषय है। नए कानूनों ने औपचारिक रूप से देश की नागरिक सरकार को समाप्त नहीं किया है।
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ अब भी सरकार के प्रमुख हैं। संसद कानून बना रही है और प्रधानमंत्री के पास वरिष्ठ सैन्य नियुक्तियों तथा नेशनल कमांड अथॉरिटी से जुड़े महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार बने हुए हैं।
लेकिन दूसरी ओर, असीम मुनीर की संस्थागत स्थिति पहले की तुलना में काफी मजबूत हुई है। वह सेना प्रमुख और चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज दोनों पदों पर हैं और तीनों सेनाओं की संयुक्त कमान के केंद्र में हैं।
इसलिए ताजा कानूनों को पाकिस्तान के नागरिक-सैन्य ढांचे में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा सकता है। यह अपने आप में पाकिस्तान में प्रत्यक्ष सैन्य शासन की वापसी साबित नहीं करता, लेकिन यह जरूर दिखाता है कि मौजूदा संवैधानिक ढांचे के भीतर सैन्य शक्ति किस हद तक केंद्रीकृत हो रही है।
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