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लैंडमार्क के 15 साल: विधि कासलीवाल अब तैयार हैं इसके सबसे बड़े कायाकल्प के लिए
Digital Desk
एक पिता और एक बेटा, जो फिर से उम्मीद का रास्ता तलाश रहे हैं। दो बच्चे, जो सूखे की कठोर सच्चाई के बीच एक नन्ही-सी मछली को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। एक साधारण व्यक्ति, जिसकी दुनिया एक रेडियो के आने से बदल जाती है।
दो महिलाएं, जो समाज द्वारा तय किए गए सुंदरता के पैमानों पर सवाल उठाती हैं। एक आध्यात्मिक गुरु, जिनकी असाधारण यात्रा को सहेजना आवश्यक था। और एक पोती, जो अपने दादा की विरासत को इतिहास के पन्नों में समेट रही है।
फिल्ममेकर और प्रोड्यूसर विधि कासलीवाल के लिए कहानियाँ शायद ही कभी सिर्फ शोबाज़ी या दिखावे के बारे में रही हैं। उनकी कहानियों के केंद्र में हमेशा इंसान रहे हैं — वे क्या खोते हैं, क्या याद रखते हैं, कौन-सी घटनाएं उन्हें बदल देती हैं और तमाम मुश्किलों के बावजूद वे किस उम्मीद को थामे रहते हैं।
19 अगस्त को लैंडमार्क अपने 15 वर्ष पूरे कर रहा है और इस पड़ाव पर कासलीवाल अपने रचनात्मक कैनवास को और व्यापक बनाने जा रही हैं।
लैंडमार्क फिल्म्स अब ‘लैंडमार्क एंटरटेनमेंट’ के रूप में विकसित हो रहा है, जिसकी शुरुआत तीन प्रमुख शाखाओं — लैंडमार्क फिल्म्स, लैंडमार्क मेलोडीज़ और लैंडमार्क डिजिटल — से होगी। कंपनी के विस्तार के साथ आने वाले समय में इसमें और भी शाखाएं जोड़ी जाएंगी।
इसे अचानक किया गया बदलाव कहना सही नहीं होगा। यह उस सफर का स्वाभाविक अगला अध्याय है, जो शुरुआत से ही अलग-अलग फॉर्मेट्स और कहानी कहने के विविध माध्यमों में अपनी जगह खोजता रहा है।
सिनेमा की समझ कासलीवाल को राजश्री प्रोडक्शंस में मिली, जहाँ उन्होंने फिल्ममेकर सूरज आर. बड़जात्या के साथ विवाह जैसी फिल्मों पर काम किया। इसके बाद उन्होंने इसी लाईफ में से लेखक-निर्देशक के रूप में अपनी शुरुआत की।
लेकिन लैंडमार्क वह जगह बनी, जहाँ वह अपनी एक स्वतंत्र और विशिष्ट रचनात्मक भाषा गढ़ सकीं।
पिछले 15 वर्षों के दौरान इस बैनर ने ऐसी फिल्मोग्राफी तैयार की, जिसे किसी एक श्रेणी में समेटना आसान नहीं है। यहाँ डॉक्यूमेंट्री भी बनीं, फीचर फिल्में भी; बेहद निजी मानवीय कहानियाँ भी और सामाजिक यथार्थ से जुड़ी कथाएँ भी। अध्यात्म, रिश्ते, दोस्ती और अस्तित्व की लड़ाई — लैंडमार्क की दुनिया लगातार अलग-अलग भावनात्मक धरातलों को छूती रही।
पहली ही डॉक्यूमेंट्रीज़ ब्लॉक बाय ब्लॉक और बिल्डिंग फॉर द फ्यूचर ने यह संकेत दे दिया कि कासलीवाल की दृष्टि पारंपरिक फीचर फिल्मों से कहीं आगे जाती है। इन फिल्मों ने कैमरे को इंजीनियरिंग, मनुष्यों और मानवीय प्रयासों की ओर मोड़ा।
इसके बाद आया उनका मराठी सिनेमा।
सचिन पिलगांवकर अभिनीत सांगतो ऐका ने प्रायश्चित, परिवार और जिंदगी में दोबारा मिलने वाले मौके की कहानी कही। सई ताम्हणकर और प्रिया बापट की वजनदार ने महिलाओं के वजन तथा स्वीकार्यता को लेकर समाज की अपेक्षाओं पर सवाल उठाए।
रिंगण एक संघर्षरत पिता और उसके बेटे की बेहद संवेदनशील कहानी है। जिसे 63वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ मराठी फिल्म का सम्मान मिला। गच्ची ने एक छत पर अचानक मिलने वाले दो परेशान अजनबियों के बीच एक अनोखी दुनिया रची।
रेडू की कहानी एक साधारण आदमी और रेडियो के प्रति उसके बच्चों जैसे लगाव के इर्द-गिर्द घूमती है। इस फिल्म ने महाराष्ट्र राज्य फिल्म पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ फिल्म सहित कई श्रेणियों में जीत हासिल की।
वहीं पिप्सी ने कृषि संकट की भयावहता को दो आठ वर्षीय बच्चों की आंखों से देखा, जो एक छोटी-सी मछली को बचाने में जुटे हैं। फिल्म का प्रदर्शन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुआ, जहाँ ज़्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में स्पेशल जूरी मेंशन मिला।
अपनी फिल्मों के बारे में बात करते हुए कासलीवाल ने एक बार ऐसी बात कही थी — जिसे लैंडमार्क का अनकहा रचनात्मक आदर्श भी कहा जा सकता है — एक फिल्ममेकर की जिम्मेदारी है लोगों को आशा देना।
‘आशा’ — यही वह शब्द है, जो अलग-अलग दुनिया और विधाओं से गुजरते हुए कंपनी के पूरे सफर के साथ चुपचाप चलता रहा है। तब भी, जब कहानियाँ असहज थीं। तब भी, जब परिस्थितियां कठिन थीं। और तब भी, जब किरदारों को खुद आशा का कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था।
दिलचस्प बात यह है कि आज लैंडमार्क जिन डिजिटल संभावनाओं की ओर बढ़ रहा है, उनकी जड़ें भी उसके अतीत में मौजूद हैं।
मेमोआर्स ऑफ प्रेम रतन धन पायो के जरिए विधि और उनकी टीम ने सूरज बड़जात्या की सलमान खान स्टारर प्रेम रतन धन पायो के निर्माण के दौरान पर्दे के पीछे सभी वाक्यात शूट किये। सैकड़ों घंटों की फुटेज को डिजिटल वेबिसोड्स की एक श्रृंखला में बदला गया, जो रिलीज पर यूट्यूब पर ट्रेंड हुईं।
यानी उस समय भी, जब फिल्मों का डिजिटल कंटेंट मनोरंजन जगत का अनिवार्य हिस्सा नहीं बना था, लैंडमार्क इस संभावना को तलाश रहा था कि एक फिल्म की उम्र पर्दे से आगे कैसे बढ़ायी जा सकती है।
इसके बाद कासलीवाल ने विद्योदय के जरिए एक नये क्षेत्र में प्रवेश किया। जैन मुनी आचार्य विद्यासागर के जीवन पर आधारित यह एक आध्यात्मिक वृत्तचित्र है। दूसरी ओर भाऊ कदम संग नशीबवान और कलाकारों की टुकड़ी लिये मीडियम स्पाइसी जैसी फिल्मों ने उन साधारण लोगों की कहानियाँ दर्शाईं, जो अपनी आकांक्षाओं, रिश्तों और बदलती दुनिया के बीच अपना रास्ता तलाश रहे हैं।
हाल में कासलीवाल की सबसे व्यक्तिगत फिल्मों में से एक सामने आई — द ग्रैंड ओल्ड मॅन ऑफ इंडियन टेक्सटाइल्स। यह डॉक्यूमेंट्री उनके दादाजी के जीवन, मूल्यों और भारतीय टेक्सटाइल जगत में उनके योगदान को दर्ज करती है। फिल्म का वर्ल्ड प्रीमियर होहे (HOHE) जर्मनी 2026 में हुआ जहाँ इसने सर्वश्रेष्ठ शॉर्ट डॉक्यूमेंट्री फिल्म का पुरस्कार भी जीता।
कासलीवाल के लिए यह केवल एक डॉक्यूमेंट्री नहीं थी। यह विरासत, स्मृतियों और मूल्यों को सहेजने का एक प्रयास था।
और शायद यह संयोग नहीं कि यह फिल्म ठीक उसी समय सामने आई, जब लैंडमार्क अपनी खुद की विरासत और अगले अध्याय को नए सिरे से देख रहा है।
विधि कासलीवाल कहती हैं, “लैंडमार्क फिल्म्स ने मुझे उन कहानियों को कहने का सुयोग और सम्मान दिया, जिन पर मेरा दृढ़ विश्वास था। इस सफर में मुझे अद्भुत फिल्ममेकर्स, कलाकारों और सहयोगियों के साथ काम करने का मौका मिला। लेकिन कहानी कहने का तरीका अब बदल चुका है। आज जरूरी नहीं कि कोई कहानी फिल्म के पर्दे पर शुरू हो और वहीं खत्म हो जाए। वह एक गीत में जीवित रह सकती है, किसी पॉडकास्ट में, माइक्रो-ड्रामा में, डॉक्यूमेंट्री में या किसी बिल्कुल नए डिजिटल फॉर्मेट में।”
वह आगे कहती हैं, “15 वर्ष पूरे करना हमें कृतज्ञता के साथ पीछे देखने का अवसर देता है, लेकिन साथ ही यह सवाल भी पूछने का कि अगले 15 साल हमें कहाँ लेकर जाने चाहिए। ‘लैंडमार्क एंटरटेनमेंट’ हमारे लिए स्वयं को अधिक और विविध संभावनाओं के लिए तैयार करने का नाम है।”
इस नए सफर की शुरुआत लैंडमार्क फिल्म्स से होगी, जो फीचर फिल्म्स, शॉर्ट फिल्म्स और डॉक्यूमेंट्रीज़ के जरिए कंपनी की सिनेमाई यात्रा जारी रखेगा। लैंडमार्क मेलोडीज़ के अंतर्गत भक्ति गीत और पॉप म्यूजिक को एल्बम्स और सिंगल्स के माध्यम से सामने लाया जाएगा। वहीं लैंडमार्क डिजिटल का फोकस पॉडकास्ट, माइक्रो-ड्रामा, मिनी-सीरीज और लगातार विकसित होते डिजिटल फॉर्मेट्स पर होगा।
लेकिन कासलीवाल साफ करती हैं कि यह केवल शुरुआत है।
उनके शब्दों में, “हम अपने सोचने, निर्माण करने, सहयोग करने और मनोरंजन देने के तरीके को अधिक व्यापक बनाना चाहते हैं। फिल्म्स, मेलोडीज़ और डिजिटल हमारे पहले तीन वर्टिकल्स हैं और जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे, इसमें और भी आयाम जुड़ते जाएंगे। फॉर्मेट बदल सकता है, लेकिन हम जो भी करें, उसके पीछे मौजूद भावना नहीं बदलनी चाहिए। हमारा उद्देश्य केवल अधिक कंटेंट बनाना नहीं है। हम एक ऐसा इकोसिस्टम बनाना चाहते हैं, जहाँ अलग-अलग आवाजों, क्रिएटर्स और फॉर्मेट्स को लैंडमार्क की छत्र के नीचे अपनी छाया मिल सके।”
कंपनी की नई दृश्य पहचान भी इस बदलाव को दर्शाएगी।
लैंडमार्क के अब तक के सिग्नेचर रेड, ब्लैक और व्हाइट रंग अब ब्लू, ब्लैक और व्हाइट में बदल जाएंगे। कासलीवाल के अनुसार, नीला रंग अधिक समावेशी और संपूर्णता का एहसास देता है। यह रचनात्मक सोच को अधिक प्रेरित करता है और साथ ही कंपनी की बढ़ती डिजिटल दिशा को भी प्रकाशित करता है।
भले ही लाल अब नीले में परिवर्तित हो रहा है। जड़ें वही हैं। बस दायरा बढ़ रहा है।
और शायद लैंडमार्क के इस पुनर्निर्माण की सबसे खूबसूरत बात भी यही है।
यह अपने पहले 15 वर्षों को पीछे छोड़कर कुछ नया बनाने की कोशिश नहीं है। बल्कि उन्हीं वर्षों से जो कुछ सीखा है, उसी नींव पर अगला अध्याय खड़ा किया जा रहा है।
विधि कासलीवाल और ‘लैंडमार्क एंटरटेनमेंट’ के लिए केवल एक प्रश्न है, जो अपरिवर्तित रहा —
कहानी समाप्त हो जाने के बाद दर्शक अपने साथ क्या समेट कर ले जाता है?
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