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गाजा पुनर्निर्माण के लिए 1.5 लाख करोड़ पैकेज: ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की पहली बैठक में भारत ऑब्जर्वर के रूप में शामिल
अंतराष्ट्रीय न्यूज
Donald Trump की पहल पर Washington DC में वैश्विक बैठक; 50 देशों की भागीदारी, सुरक्षा बल तैनाती पर सहमति
अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में आयोजित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की पहली अंतरराष्ट्रीय बैठक में भारत ने ऑब्जर्वर देश के रूप में हिस्सा लिया। बैठक में गाजा क्षेत्र के पुनर्निर्माण और स्थिरता बहाली के लिए लगभग ₹1.5 लाख करोड़ (17 अरब डॉलर) के राहत पैकेज की घोषणा की गई। यह पहल युद्ध प्रभावित क्षेत्र में मानवीय सहायता, बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण और सुरक्षा व्यवस्था स्थापित करने के उद्देश्य से की गई है।
बैठक में करीब 50 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए। भारत की ओर से वरिष्ठ राजनयिक नमग्या सी खम्पा ने भाग लिया। भारत ने अभी तक बोर्ड की स्थायी सदस्यता को लेकर औपचारिक रुख स्पष्ट नहीं किया है। अधिकारियों के अनुसार, यह भागीदारी क्षेत्रीय शांति प्रयासों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को समझने की दिशा में एक कूटनीतिक कदम माना जा रहा है।
घोषित राहत पैकेज में नौ सदस्य देशों द्वारा संयुक्त रूप से लगभग 7 अरब डॉलर का योगदान किया जाएगा, जबकि अमेरिका 10 अरब डॉलर उपलब्ध कराएगा। इसके साथ ही पांच देशों ने गाजा में एक अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल के हिस्से के रूप में सैनिक तैनात करने पर सहमति दी है। प्रस्तावित बल का उद्देश्य सुरक्षा व्यवस्था बहाल करना और मानवीय सहायता अभियानों को सुरक्षित बनाना है।
बैठक को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा कि यह वित्तीय सहायता युद्ध के खर्च की तुलना में सीमित है, लेकिन इससे दीर्घकालिक स्थिरता और पुनर्निर्माण की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि सामूहिक अंतरराष्ट्रीय प्रयासों से दशकों से संघर्ष झेल रहे क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित की जा सकती है।
बैठक में यह भी प्रस्ताव रखा गया कि यह बोर्ड वैश्विक संघर्ष समाधान में सहयोगी मंच की भूमिका निभाएगा और United Nations की कार्यप्रणाली पर निगरानी की जिम्मेदारी भी निभा सकता है। हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर कई देशों ने संतुलित वैश्विक कूटनीतिक ढांचे की आवश्यकता पर बल दिया है।
इस पहल की पृष्ठभूमि गाजा संघर्ष से उपजे मानवीय संकट से जुड़ी है, जिसमें बुनियादी ढांचा, आवास और स्वास्थ्य सेवाएं गंभीर रूप से प्रभावित हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वित्तीय सहायता के साथ राजनीतिक सहमति और सुरक्षा व्यवस्था की स्पष्ट रणनीति ही इस योजना की सफलता तय करेगी।
बैठक के समानांतर क्षेत्रीय तनाव भी चर्चा में रहा। इजराइल और हमास के बीच निरस्त्रीकरण तथा सैन्य उपस्थिति को लेकर मतभेद जारी हैं, जिससे शांति प्रक्रिया की राह जटिल बनी हुई है। विश्लेषकों के अनुसार, प्रस्तावित सुरक्षा बल की भूमिका और अधिकार क्षेत्र पर स्पष्टता आने के बाद ही योजना का प्रभावी क्रियान्वयन संभव होगा।
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