सिंगल मदर भी पूर्ण अभिभावक: बॉम्बे हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

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रेप पीड़िता मां के पक्ष में निर्णय, बच्चे की पहचान गरिमा और संवैधानिक अधिकार से जुड़ी—स्कूल रिकॉर्ड में पिता का नाम हटाने की अनुमति

बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने सिंगल मदर के अधिकारों पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि अकेले बच्चे का पालन-पोषण करने वाली मां को पूर्ण अभिभावक माना जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे की पहचान ऐसे पिता से जोड़ना, जिसका उसके जीवन से कोई संबंध नहीं, संवैधानिक गरिमा के विरुद्ध है। यह फैसला एक दुष्कर्म पीड़िता मां की याचिका पर दिया गया, जिसने स्कूल रिकॉर्ड और जन्म दस्तावेजों से पिता का नाम हटाने की मांग की थी।

डिवीजन बेंच ने कहा कि संविधान के तहत सम्मान के साथ जीने का अधिकार केवल जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्ति की पहचान और सामाजिक गरिमा भी उसी का हिस्सा है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं में पिता का नाम अनिवार्य रखना एक पुरानी पितृसत्तात्मक संरचना को दर्शाता है, जिसे संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप बदलना आवश्यक है।

यह मामला तब सामने आया जब स्कूल प्रशासन ने दस्तावेजों में संशोधन से इनकार कर दिया। डीएनए परीक्षण में आरोपी को जैविक पिता सिद्ध किए जाने के बावजूद उसने बच्चे से कोई संबंध नहीं रखा। अदालत ने कहा कि जब मां ही एकमात्र अभिभावक है, तो सार्वजनिक दस्तावेजों में उसी की पहचान दर्ज करना न्यायसंगत है और इससे किसी सार्वजनिक हित को नुकसान नहीं होता।

पीठ ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया कि स्कूल रिकॉर्ड केवल औपचारिक दस्तावेज नहीं, बल्कि बच्चे के भविष्य से जुड़े सार्वजनिक प्रमाण होते हैं। ऐसे में वास्तविक सामाजिक स्थिति को प्रतिबिंबित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। अदालत ने यह टिप्पणी भी की कि महिलाओं के अधिकारों की मान्यता किसी दया का विषय नहीं, बल्कि संवैधानिक निष्ठा का प्रश्न है।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय सिंगल मदर्स और उनके बच्चों के नागरिक अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। 

अदालत ने जाति परिवर्तन के मुद्दे पर सावधानी बरतने की आवश्यकता भी जताई। बेंच ने कहा कि जाति निर्धारण अलग प्रक्रिया का विषय है और स्कूल इसे तय करने वाली संस्था नहीं है। हालांकि, जहां रिकॉर्ड वास्तविक स्थिति को प्रतिबिंबित नहीं करते, वहां सुधार की अनुमति दी जा सकती है।

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20 Feb 2026 By Nitin Trivedi

सिंगल मदर भी पूर्ण अभिभावक: बॉम्बे हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

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बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने सिंगल मदर के अधिकारों पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि अकेले बच्चे का पालन-पोषण करने वाली मां को पूर्ण अभिभावक माना जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे की पहचान ऐसे पिता से जोड़ना, जिसका उसके जीवन से कोई संबंध नहीं, संवैधानिक गरिमा के विरुद्ध है। यह फैसला एक दुष्कर्म पीड़िता मां की याचिका पर दिया गया, जिसने स्कूल रिकॉर्ड और जन्म दस्तावेजों से पिता का नाम हटाने की मांग की थी।

डिवीजन बेंच ने कहा कि संविधान के तहत सम्मान के साथ जीने का अधिकार केवल जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्ति की पहचान और सामाजिक गरिमा भी उसी का हिस्सा है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं में पिता का नाम अनिवार्य रखना एक पुरानी पितृसत्तात्मक संरचना को दर्शाता है, जिसे संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप बदलना आवश्यक है।

यह मामला तब सामने आया जब स्कूल प्रशासन ने दस्तावेजों में संशोधन से इनकार कर दिया। डीएनए परीक्षण में आरोपी को जैविक पिता सिद्ध किए जाने के बावजूद उसने बच्चे से कोई संबंध नहीं रखा। अदालत ने कहा कि जब मां ही एकमात्र अभिभावक है, तो सार्वजनिक दस्तावेजों में उसी की पहचान दर्ज करना न्यायसंगत है और इससे किसी सार्वजनिक हित को नुकसान नहीं होता।

पीठ ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया कि स्कूल रिकॉर्ड केवल औपचारिक दस्तावेज नहीं, बल्कि बच्चे के भविष्य से जुड़े सार्वजनिक प्रमाण होते हैं। ऐसे में वास्तविक सामाजिक स्थिति को प्रतिबिंबित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। अदालत ने यह टिप्पणी भी की कि महिलाओं के अधिकारों की मान्यता किसी दया का विषय नहीं, बल्कि संवैधानिक निष्ठा का प्रश्न है।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय सिंगल मदर्स और उनके बच्चों के नागरिक अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। 

अदालत ने जाति परिवर्तन के मुद्दे पर सावधानी बरतने की आवश्यकता भी जताई। बेंच ने कहा कि जाति निर्धारण अलग प्रक्रिया का विषय है और स्कूल इसे तय करने वाली संस्था नहीं है। हालांकि, जहां रिकॉर्ड वास्तविक स्थिति को प्रतिबिंबित नहीं करते, वहां सुधार की अनुमति दी जा सकती है।

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