25 जून 1975: लोकतंत्र की सबसे लंबी रात

नई दिल्ली

कुछ तिथियाँ गौरव का प्रतीक होती हैं, जबकि कुछ हमें इतिहास के उन अध्यायों की याद दिलाती हैं जिन्हें कभी भुलाया नहीं जाना चाहिए। 25 जून 1975 ऐसी ही एक तारीख है। इसी रात भारत ने अपनी लोकतांत्रिक यात्रा के सबसे अंधकारमय दौरों में से एक में प्रवेश किया था। इसके बाद लागू हुआ आपातकाल इक्कीस महीनों तक चला, लेकिन उसका महत्व केवल उसकी अवधि तक सीमित नहीं है। यह वह समय था जब मौलिक स्वतंत्रताओं पर रोक लगाई गई, राजनीतिक विरोधियों को जेलों में डाला गया, प्रेस की आवाज़ को दबा दिया गया और सत्ता का ऐसा केंद्रीकरण हुआ, जैसा स्वतंत्र भारत ने पहले कभी नहीं देखा था।

जिस पीढ़ी ने उस दौर को देखा, उसके लिए आपातकाल कोई संवैधानिक बहस या राजनीतिक अवधारणा नहीं था। वह एक जीता-जागता अनुभव था। यह वह समय था जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की जगह सेंसरशिप ने ले ली, न्यायिक प्रक्रिया की जगह मनमानी गिरफ्तारियों ने और असहमति की जगह भय ने। यह वह क्षण था जब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को इस कठोर सच्चाई का सामना करना पड़ा कि जिन स्वतंत्रताओं को लोग स्थायी मानते हैं, वे भी छीनी जा सकती हैं।

जब एक राजनीतिक संकट पूरे राष्ट्र पर भारी पड़ गया

आपातकाल की पृष्ठभूमि 1971 के लोकसभा चुनाव से जुड़ी थी। रायबरेली से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को उनके प्रतिद्वंद्वी राज नारायण ने चुनौती दी। आरोप था कि चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया गया और चुनावी अनियमितताएँ हुईं।

12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इंदिरा गांधी को चुनावी अनियमितताओं का दोषी ठहराया और छह वर्षों के लिए किसी भी निर्वाचित पद पर रहने से अयोग्य घोषित कर दिया।

इस निर्णय ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया। मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा, जहाँ न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर ने केवल आंशिक राहत दी। इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी रह सकती थीं, लेकिन संसद में मतदान नहीं कर सकती थीं और उन्हें सांसद के पूर्ण अधिकार भी प्राप्त नहीं थे। विपक्ष ने उनके इस्तीफे की मांग तेज कर दी और राजनीतिक संकट लगातार गहराता गया।

इसी पृष्ठभूमि में 25 जून 1975 की रात संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत “आंतरिक अशांति” के आधार पर आंतरिक आपातकाल घोषित कर दिया गया। जो संकट शुरुआत में राजनीतिक था, वह शीघ्र ही देश की हर प्रमुख संस्था और करोड़ों नागरिकों के जीवन को प्रभावित करने वाला बन गया।

जब स्वतंत्रता सलाखों के पीछे चली गई

आपातकाल स्वतंत्र भारत के उन विरले दौरों में से एक है जब संवैधानिक अधिकारों को इतने व्यापक स्तर पर सीमित कर दिया गया।

संविधान के भाग-3 में प्रदत्त मौलिक अधिकारों पर रोक लगा दी गई। एक लाख दस हजार से अधिक राजनीतिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, छात्र नेताओं, ट्रेड यूनियन प्रतिनिधियों और विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया। इनमें से लगभग 35 हजार लोगों को मीसा (MISA) यानी मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट के तहत बिना मुकदमे के हिरासत में रखा गया। उस दौर के अनेक विवरण हिरासत में यातना, धमकी और अमानवीय व्यवहार की ओर संकेत करते हैं।गिरफ्तार होने वालों में जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, महारानी गायत्री देवी सहित कई प्रमुख नेता शामिल थे। कार्रवाई केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रही। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर प्रतिबंध लगा दिया गया और उसके हजारों स्वयंसेवकों व पदाधिकारियों को गिरफ्तार किया गया।

लेकिन शायद सबसे चिंताजनक पहलू गिरफ्तारियों की संख्या नहीं थी, बल्कि उनके खिलाफ कानूनी राहत का लगभग समाप्त हो जाना था। ‘हैबियस कॉर्पस’ जैसी संवैधानिक व्यवस्था, जिसके माध्यम से नागरिक अपनी अवैध गिरफ्तारी को अदालत में चुनौती दे सकते थे, मौलिक अधिकारों के निलंबन के बाद प्रभावहीन हो गई।

1976 के प्रसिद्ध एडीएम जबलपुर मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने भी यह माना कि आपातकाल के दौरान नागरिक अदालतों के माध्यम से इन अधिकारों को लागू नहीं करा सकते।

इस प्रकार लाखों भारतीयों के लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता अब कानून की नहीं, बल्कि राज्य की इच्छा पर निर्भर हो गई थी।

जब गणतंत्र की आवाज़ को खामोश कर दिया गया

सत्तावाद केवल गिरफ्तारियों के सहारे नहीं चलता, वह खामोशी के सहारे भी चलता है।

आपातकाल लागू होने के कुछ ही घंटों के भीतर प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी गई। समाचार पत्रों को प्रकाशन से पहले अपनी सामग्री सरकारी अधिकारियों को दिखानी पड़ती थी। 25 जून की रात दिल्ली के कई अखबारों के दफ्तरों की बिजली तक काट दी गई, ताकि आपातकाल संबंधी समाचार समय पर प्रकाशित न हो सकें।

प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को भंग कर दिया गया। आकाशवाणी और दूरदर्शन सीधे सरकारी नियंत्रण में आ गए और वे केवल सरकार द्वारा स्वीकृत सूचनाओं के माध्यम बनकर रह गए।
सेंसरशिप का दायरा राजनीति तक सीमित नहीं था। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर को मीसा के तहत गिरफ्तार किया गया। अभिनेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता स्नेहलता रेड्डी को हिरासत में प्रताड़ना झेलनी पड़ी और पर्याप्त चिकित्सा न मिलने के कारण रिहाई के कुछ समय बाद उनका निधन हो गया।

व्यंग्यात्मक फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’ की प्रतियाँ जब्त कर जला दी गईं। प्रसिद्ध गायक किशोर कुमार ने सरकारी प्रचार अभियान में हिस्सा लेने से इनकार किया तो उन्हें अनौपचारिक रूप से ब्लैकलिस्ट कर दिया गया और उनके गीत सरकारी प्रसारणों से गायब हो गए।

उद्देश्य केवल सूचना को नियंत्रित करना नहीं था, बल्कि ऐसा माहौल बनाना था जिसमें असहमति जताना ही जोखिम भरा बन जाए।

जब भय सार्वजनिक नीति का हिस्सा बन गया

कई भारतीयों के लिए आपातकाल का अनुभव संवैधानिक संशोधनों या न्यायिक फैसलों से नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के भय से जुड़ा हुआ था।

इस दौरान चलाए गए परिवार नियोजन अभियान के तहत देशभर में 83 लाख से अधिक नसबंदी प्रक्रियाएँ की गईं। बाद की जांचों और ऐतिहासिक अध्ययनों ने लक्ष्य प्राप्ति के लिए व्यापक दबाव, जबरदस्ती और प्रशासनिक दुरुपयोग की ओर संकेत किया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इन प्रक्रियाओं से जुड़ी जटिलताओं के कारण कम-से-कम 1,774 लोगों की मृत्यु हुई।

दिल्ली का तुर्कमान गेट विध्वंस भी इसी दौर का प्रतीक बन गया। शहरी सौंदर्यीकरण के नाम पर पूरी बस्तियाँ उजाड़ दी गईं। विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस फायरिंग हुई, लोगों की जान गई और अनेक परिवार अपने घरों तथा आजीविका से वंचित हो गए।

आपातकाल ने यह दिखाया कि जब जवाबदेही कमजोर पड़ती है, तो प्रशासनिक शक्ति आसानी से दमनकारी रूप धारण कर सकती है।

जब संविधान के नियम बदले गए

आपातकाल केवल कार्यपालिका की शक्ति के सहारे नहीं चला। इसे संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से भी मजबूत किया गया।

38वें संविधान संशोधन ने आपातकाल संबंधी निर्णयों को न्यायिक समीक्षा से काफी हद तक बाहर कर दिया। 39वें संशोधन ने प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और लोकसभा अध्यक्ष के चुनावों को न्यायिक जांच से परे रखने का प्रयास किया। 42वें संशोधन ने संसद और कार्यपालिका की शक्तियों को बढ़ाया तथा न्यायपालिका की भूमिका को सीमित किया।

इन परिवर्तनों ने संस्थाओं के बीच संतुलन को बदल दिया और सत्ता को अधिक केंद्रीकृत बना दिया। आपातकाल अब केवल एक राजनीतिक संकट की प्रतिक्रिया नहीं रह गया था, बल्कि वह नागरिक, संविधान और राज्य के संबंधों को पुनर्परिभाषित करने का प्रयास बन चुका था।

25 जून की चेतावनी

जब अंततः 21 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्त हुआ और चुनाव हुए, तो भारतीय जनता ने अपना फैसला सुना दिया। कांग्रेस सरकार सत्ता से बाहर हो गई और केंद्र में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी।

इसके बाद गठित शाह आयोग ने मनमानी गिरफ्तारियों, निवारक कानूनों के दुरुपयोग, प्रेस सेंसरशिप, प्रशासनिक हस्तक्षेप और नागरिक स्वतंत्रताओं के व्यापक उल्लंघन का विस्तार से दस्तावेजीकरण किया।

लगभग पाँच दशक बाद भी आपातकाल भारत के लोकतांत्रिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण चेतावनियों में से एक बना हुआ है।

इसकी सीख किसी एक राजनीतिक दल, एक सरकार या एक पीढ़ी तक सीमित नहीं है। यह याद दिलाती है कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता। उसे जीवित रखने के लिए ऐसी संस्थाओं की आवश्यकता होती है जो स्वतंत्रता की रक्षा करें, ऐसी न्यायपालिका जो अधिकारों को सुरक्षित रखे, ऐसा मीडिया जो सत्ता से प्रश्न पूछ सके और ऐसे नागरिक जो स्वतंत्रता के महत्व को समझें।
आपातकाल इक्कीस महीने चला था, लेकिन उसकी चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।

क्योंकि उसने भारत को यह सिखाया कि अधिकार निलंबित किए जा सकते हैं, संस्थाएँ कमजोर पड़ सकती हैं और स्वतंत्रताएँ उतनी स्थायी नहीं होतीं जितना हम अक्सर मान लेते हैं। लोकतंत्र तभी सुरक्षित रहता है जब सत्ता अपनी सीमाओं को पहचाने और समाज उन सीमाओं की रक्षा के लिए सजग बना रहे।

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25 Jun 2026 By दैनिक जागरण

25 जून 1975: लोकतंत्र की सबसे लंबी रात

नई दिल्ली

जिस पीढ़ी ने उस दौर को देखा, उसके लिए आपातकाल कोई संवैधानिक बहस या राजनीतिक अवधारणा नहीं था। वह एक जीता-जागता अनुभव था। यह वह समय था जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की जगह सेंसरशिप ने ले ली, न्यायिक प्रक्रिया की जगह मनमानी गिरफ्तारियों ने और असहमति की जगह भय ने। यह वह क्षण था जब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को इस कठोर सच्चाई का सामना करना पड़ा कि जिन स्वतंत्रताओं को लोग स्थायी मानते हैं, वे भी छीनी जा सकती हैं।

जब एक राजनीतिक संकट पूरे राष्ट्र पर भारी पड़ गया

आपातकाल की पृष्ठभूमि 1971 के लोकसभा चुनाव से जुड़ी थी। रायबरेली से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को उनके प्रतिद्वंद्वी राज नारायण ने चुनौती दी। आरोप था कि चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया गया और चुनावी अनियमितताएँ हुईं।

12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इंदिरा गांधी को चुनावी अनियमितताओं का दोषी ठहराया और छह वर्षों के लिए किसी भी निर्वाचित पद पर रहने से अयोग्य घोषित कर दिया।

इस निर्णय ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया। मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा, जहाँ न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर ने केवल आंशिक राहत दी। इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी रह सकती थीं, लेकिन संसद में मतदान नहीं कर सकती थीं और उन्हें सांसद के पूर्ण अधिकार भी प्राप्त नहीं थे। विपक्ष ने उनके इस्तीफे की मांग तेज कर दी और राजनीतिक संकट लगातार गहराता गया।

इसी पृष्ठभूमि में 25 जून 1975 की रात संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत “आंतरिक अशांति” के आधार पर आंतरिक आपातकाल घोषित कर दिया गया। जो संकट शुरुआत में राजनीतिक था, वह शीघ्र ही देश की हर प्रमुख संस्था और करोड़ों नागरिकों के जीवन को प्रभावित करने वाला बन गया।

जब स्वतंत्रता सलाखों के पीछे चली गई

आपातकाल स्वतंत्र भारत के उन विरले दौरों में से एक है जब संवैधानिक अधिकारों को इतने व्यापक स्तर पर सीमित कर दिया गया।

संविधान के भाग-3 में प्रदत्त मौलिक अधिकारों पर रोक लगा दी गई। एक लाख दस हजार से अधिक राजनीतिक कार्यकर्ताओं, पत्रकारों, छात्र नेताओं, ट्रेड यूनियन प्रतिनिधियों और विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया। इनमें से लगभग 35 हजार लोगों को मीसा (MISA) यानी मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट के तहत बिना मुकदमे के हिरासत में रखा गया। उस दौर के अनेक विवरण हिरासत में यातना, धमकी और अमानवीय व्यवहार की ओर संकेत करते हैं।गिरफ्तार होने वालों में जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, महारानी गायत्री देवी सहित कई प्रमुख नेता शामिल थे। कार्रवाई केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रही। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर प्रतिबंध लगा दिया गया और उसके हजारों स्वयंसेवकों व पदाधिकारियों को गिरफ्तार किया गया।

लेकिन शायद सबसे चिंताजनक पहलू गिरफ्तारियों की संख्या नहीं थी, बल्कि उनके खिलाफ कानूनी राहत का लगभग समाप्त हो जाना था। ‘हैबियस कॉर्पस’ जैसी संवैधानिक व्यवस्था, जिसके माध्यम से नागरिक अपनी अवैध गिरफ्तारी को अदालत में चुनौती दे सकते थे, मौलिक अधिकारों के निलंबन के बाद प्रभावहीन हो गई।

1976 के प्रसिद्ध एडीएम जबलपुर मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने भी यह माना कि आपातकाल के दौरान नागरिक अदालतों के माध्यम से इन अधिकारों को लागू नहीं करा सकते।

इस प्रकार लाखों भारतीयों के लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता अब कानून की नहीं, बल्कि राज्य की इच्छा पर निर्भर हो गई थी।

जब गणतंत्र की आवाज़ को खामोश कर दिया गया

सत्तावाद केवल गिरफ्तारियों के सहारे नहीं चलता, वह खामोशी के सहारे भी चलता है।

आपातकाल लागू होने के कुछ ही घंटों के भीतर प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी गई। समाचार पत्रों को प्रकाशन से पहले अपनी सामग्री सरकारी अधिकारियों को दिखानी पड़ती थी। 25 जून की रात दिल्ली के कई अखबारों के दफ्तरों की बिजली तक काट दी गई, ताकि आपातकाल संबंधी समाचार समय पर प्रकाशित न हो सकें।

प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को भंग कर दिया गया। आकाशवाणी और दूरदर्शन सीधे सरकारी नियंत्रण में आ गए और वे केवल सरकार द्वारा स्वीकृत सूचनाओं के माध्यम बनकर रह गए।
सेंसरशिप का दायरा राजनीति तक सीमित नहीं था। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर को मीसा के तहत गिरफ्तार किया गया। अभिनेत्री और सामाजिक कार्यकर्ता स्नेहलता रेड्डी को हिरासत में प्रताड़ना झेलनी पड़ी और पर्याप्त चिकित्सा न मिलने के कारण रिहाई के कुछ समय बाद उनका निधन हो गया।

व्यंग्यात्मक फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’ की प्रतियाँ जब्त कर जला दी गईं। प्रसिद्ध गायक किशोर कुमार ने सरकारी प्रचार अभियान में हिस्सा लेने से इनकार किया तो उन्हें अनौपचारिक रूप से ब्लैकलिस्ट कर दिया गया और उनके गीत सरकारी प्रसारणों से गायब हो गए।

उद्देश्य केवल सूचना को नियंत्रित करना नहीं था, बल्कि ऐसा माहौल बनाना था जिसमें असहमति जताना ही जोखिम भरा बन जाए।

जब भय सार्वजनिक नीति का हिस्सा बन गया

कई भारतीयों के लिए आपातकाल का अनुभव संवैधानिक संशोधनों या न्यायिक फैसलों से नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के भय से जुड़ा हुआ था।

इस दौरान चलाए गए परिवार नियोजन अभियान के तहत देशभर में 83 लाख से अधिक नसबंदी प्रक्रियाएँ की गईं। बाद की जांचों और ऐतिहासिक अध्ययनों ने लक्ष्य प्राप्ति के लिए व्यापक दबाव, जबरदस्ती और प्रशासनिक दुरुपयोग की ओर संकेत किया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इन प्रक्रियाओं से जुड़ी जटिलताओं के कारण कम-से-कम 1,774 लोगों की मृत्यु हुई।

दिल्ली का तुर्कमान गेट विध्वंस भी इसी दौर का प्रतीक बन गया। शहरी सौंदर्यीकरण के नाम पर पूरी बस्तियाँ उजाड़ दी गईं। विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस फायरिंग हुई, लोगों की जान गई और अनेक परिवार अपने घरों तथा आजीविका से वंचित हो गए।

आपातकाल ने यह दिखाया कि जब जवाबदेही कमजोर पड़ती है, तो प्रशासनिक शक्ति आसानी से दमनकारी रूप धारण कर सकती है।

जब संविधान के नियम बदले गए

आपातकाल केवल कार्यपालिका की शक्ति के सहारे नहीं चला। इसे संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से भी मजबूत किया गया।

38वें संविधान संशोधन ने आपातकाल संबंधी निर्णयों को न्यायिक समीक्षा से काफी हद तक बाहर कर दिया। 39वें संशोधन ने प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और लोकसभा अध्यक्ष के चुनावों को न्यायिक जांच से परे रखने का प्रयास किया। 42वें संशोधन ने संसद और कार्यपालिका की शक्तियों को बढ़ाया तथा न्यायपालिका की भूमिका को सीमित किया।

इन परिवर्तनों ने संस्थाओं के बीच संतुलन को बदल दिया और सत्ता को अधिक केंद्रीकृत बना दिया। आपातकाल अब केवल एक राजनीतिक संकट की प्रतिक्रिया नहीं रह गया था, बल्कि वह नागरिक, संविधान और राज्य के संबंधों को पुनर्परिभाषित करने का प्रयास बन चुका था।

25 जून की चेतावनी

जब अंततः 21 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्त हुआ और चुनाव हुए, तो भारतीय जनता ने अपना फैसला सुना दिया। कांग्रेस सरकार सत्ता से बाहर हो गई और केंद्र में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी।

इसके बाद गठित शाह आयोग ने मनमानी गिरफ्तारियों, निवारक कानूनों के दुरुपयोग, प्रेस सेंसरशिप, प्रशासनिक हस्तक्षेप और नागरिक स्वतंत्रताओं के व्यापक उल्लंघन का विस्तार से दस्तावेजीकरण किया।

लगभग पाँच दशक बाद भी आपातकाल भारत के लोकतांत्रिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण चेतावनियों में से एक बना हुआ है।

इसकी सीख किसी एक राजनीतिक दल, एक सरकार या एक पीढ़ी तक सीमित नहीं है। यह याद दिलाती है कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता। उसे जीवित रखने के लिए ऐसी संस्थाओं की आवश्यकता होती है जो स्वतंत्रता की रक्षा करें, ऐसी न्यायपालिका जो अधिकारों को सुरक्षित रखे, ऐसा मीडिया जो सत्ता से प्रश्न पूछ सके और ऐसे नागरिक जो स्वतंत्रता के महत्व को समझें।
आपातकाल इक्कीस महीने चला था, लेकिन उसकी चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।

क्योंकि उसने भारत को यह सिखाया कि अधिकार निलंबित किए जा सकते हैं, संस्थाएँ कमजोर पड़ सकती हैं और स्वतंत्रताएँ उतनी स्थायी नहीं होतीं जितना हम अक्सर मान लेते हैं। लोकतंत्र तभी सुरक्षित रहता है जब सत्ता अपनी सीमाओं को पहचाने और समाज उन सीमाओं की रक्षा के लिए सजग बना रहे।

https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/25-june-1975-the-longest-night-of-democracy/article-56889

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