भारतीय पासपोर्ट पर नई बहस, सरकार बोली- यह यात्रा दस्तावेज, नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं

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विदेश मंत्रालय की गाइडलाइन और पासपोर्ट अधिनियम की धारा 20 को लेकर फिर शुरू हुई चर्चा, विशेष परिस्थितियों में गैर-नागरिकों को भी जारी हो सकता है पासपोर्ट

भारत में पासपोर्ट को लंबे समय से नागरिकता का एक मजबूत दस्तावेज माना जाता रहा है, लेकिन हाल के दिनों में विदेश मंत्रालय (MEA) की ओर से स्पष्ट किए गए नियमों और मौजूदा कानूनी प्रावधानों ने इस धारणा पर नई बहस छेड़ दी है। सरकार की आधिकारिक गाइडलाइन और पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के प्रावधानों के अनुसार भारतीय पासपोर्ट मुख्य रूप से एक यात्रा और पहचान दस्तावेज है, न कि नागरिकता का अंतिम या निर्णायक प्रमाण। इस मुद्दे पर चर्चा तब तेज हुई जब पासपोर्ट से जुड़े नियमों का हवाला देते हुए बताया गया कि भारतीय कानून कुछ विशेष परिस्थितियों में गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी करने की अनुमति देता है। विदेश मंत्रालय के दस्तावेजों में भी इस बात का उल्लेख मिलता है कि पासपोर्ट का प्राथमिक उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय यात्रा के दौरान व्यक्ति की पहचान स्थापित करना और उसे यात्रा की अनुमति प्रदान करना है। पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 20 इस विषय में विशेष महत्व रखती है। इस धारा के तहत केंद्र सरकार को यह अधिकार प्राप्त है कि यदि उसे सार्वजनिक हित में आवश्यक लगे तो वह किसी ऐसे व्यक्ति को भी पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी कर सकती है जो भारत का नागरिक नहीं है। कानून में यह प्रावधान असाधारण परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए रखा गया था ताकि जरूरत पड़ने पर सरकार मानवीय, कूटनीतिक या राष्ट्रीय हित से जुड़े मामलों में निर्णय ले सके। सरकारी दिशा-निर्देशों में भी स्पष्ट रूप से कहा गया है कि पासपोर्ट सामान्य रूप से किसी देश के अपने नागरिकों को जारी किया जाने वाला पहचान और यात्रा दस्तावेज होता है। हालांकि भारतीय कानून के तहत कुछ मामलों में गैर-नागरिकों को भी ऐसे दस्तावेज उपलब्ध कराए जा सकते हैं। अधिकारियों के अनुसार इस अधिकार का इस्तेमाल नियमित प्रक्रिया के तहत नहीं किया जाता, बल्कि यह केवल चुनिंदा और विशेष परिस्थितियों में वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी में होता है।

नागरिकता और पासपोर्ट को अक्सर एक ही नजरिए से देखा जाता है, जबकि दोनों की कानूनी स्थिति अलग-अलग है। नागरिकता किसी व्यक्ति और राष्ट्र के बीच कानूनी संबंध को दर्शाती है, जबकि पासपोर्ट उस व्यक्ति को अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए अधिकृत करने वाला दस्तावेज होता है। यही वजह है कि अदालतों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में नागरिकता साबित करने के लिए जन्म प्रमाणपत्र, नागरिकता प्रमाणपत्र, वंश संबंधी रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेजों को भी महत्व दिया जाता है। दुनिया के कई देशों में भी पासपोर्ट को नागरिकता का पूर्ण और अंतिम प्रमाण नहीं माना जाता। कई बार प्रशासनिक त्रुटियों, विशेष अनुमति या मानवीय कारणों से ऐसे दस्तावेज जारी किए जा सकते हैं, जिनका अर्थ यह नहीं होता कि संबंधित व्यक्ति स्वतः उस देश का नागरिक बन गया है। भारत में भी धारा 20 का उद्देश्य इसी प्रकार की असाधारण स्थितियों का समाधान करना है।

विदेश मंत्रालय की गाइडलाइन में यह भी उल्लेख किया गया है कि गैर-नागरिकों को पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी करने का अधिकार सामान्य पासपोर्ट कार्यालयों के स्तर पर उपलब्ध नहीं होता। इसके लिए वरिष्ठ स्तर पर समीक्षा की जाती है और प्रत्येक मामले का अलग-अलग परीक्षण किया जाता है। सूत्रों के अनुसार इस प्रक्रिया में कई स्तरों की जांच और अनुमोदन शामिल होते हैं ताकि किसी प्रकार के दुरुपयोग की संभावना न रहे। हाल के वर्षों में नागरिकता, पहचान और दस्तावेजों को लेकर देश में कई बार बहस होती रही है। ऐसे में पासपोर्ट की कानूनी स्थिति को लेकर सामने आई जानकारी ने एक बार फिर इस विषय को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। हालांकि सरकारी अधिकारियों का कहना है कि आम नागरिकों के लिए पासपोर्ट एक महत्वपूर्ण पहचान और यात्रा दस्तावेज बना रहेगा, लेकिन कानूनी दृष्टि से इसे नागरिकता का अंतिम प्रमाण मानना सही नहीं होगा। इस मुद्दे पर लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि नागरिकता और यात्रा दस्तावेजों के बीच के अंतर को बेहतर ढंग से समझा जा सके। सरकार की ओर से जारी नियम और पासपोर्ट अधिनियम के प्रावधान यही संकेत देते हैं कि भारतीय पासपोर्ट की भूमिका मुख्य रूप से पहचान और अंतरराष्ट्रीय यात्रा से जुड़ी है, जबकि नागरिकता का निर्धारण अलग कानूनी प्रक्रियाओं और प्रमाणों के आधार पर किया जाता है।

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25 Jun 2026 By Vaishnavi.J

भारतीय पासपोर्ट पर नई बहस, सरकार बोली- यह यात्रा दस्तावेज, नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं

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भारत में पासपोर्ट को लंबे समय से नागरिकता का एक मजबूत दस्तावेज माना जाता रहा है, लेकिन हाल के दिनों में विदेश मंत्रालय (MEA) की ओर से स्पष्ट किए गए नियमों और मौजूदा कानूनी प्रावधानों ने इस धारणा पर नई बहस छेड़ दी है। सरकार की आधिकारिक गाइडलाइन और पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के प्रावधानों के अनुसार भारतीय पासपोर्ट मुख्य रूप से एक यात्रा और पहचान दस्तावेज है, न कि नागरिकता का अंतिम या निर्णायक प्रमाण। इस मुद्दे पर चर्चा तब तेज हुई जब पासपोर्ट से जुड़े नियमों का हवाला देते हुए बताया गया कि भारतीय कानून कुछ विशेष परिस्थितियों में गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी करने की अनुमति देता है। विदेश मंत्रालय के दस्तावेजों में भी इस बात का उल्लेख मिलता है कि पासपोर्ट का प्राथमिक उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय यात्रा के दौरान व्यक्ति की पहचान स्थापित करना और उसे यात्रा की अनुमति प्रदान करना है। पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 20 इस विषय में विशेष महत्व रखती है। इस धारा के तहत केंद्र सरकार को यह अधिकार प्राप्त है कि यदि उसे सार्वजनिक हित में आवश्यक लगे तो वह किसी ऐसे व्यक्ति को भी पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी कर सकती है जो भारत का नागरिक नहीं है। कानून में यह प्रावधान असाधारण परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए रखा गया था ताकि जरूरत पड़ने पर सरकार मानवीय, कूटनीतिक या राष्ट्रीय हित से जुड़े मामलों में निर्णय ले सके। सरकारी दिशा-निर्देशों में भी स्पष्ट रूप से कहा गया है कि पासपोर्ट सामान्य रूप से किसी देश के अपने नागरिकों को जारी किया जाने वाला पहचान और यात्रा दस्तावेज होता है। हालांकि भारतीय कानून के तहत कुछ मामलों में गैर-नागरिकों को भी ऐसे दस्तावेज उपलब्ध कराए जा सकते हैं। अधिकारियों के अनुसार इस अधिकार का इस्तेमाल नियमित प्रक्रिया के तहत नहीं किया जाता, बल्कि यह केवल चुनिंदा और विशेष परिस्थितियों में वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी में होता है।

नागरिकता और पासपोर्ट को अक्सर एक ही नजरिए से देखा जाता है, जबकि दोनों की कानूनी स्थिति अलग-अलग है। नागरिकता किसी व्यक्ति और राष्ट्र के बीच कानूनी संबंध को दर्शाती है, जबकि पासपोर्ट उस व्यक्ति को अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए अधिकृत करने वाला दस्तावेज होता है। यही वजह है कि अदालतों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में नागरिकता साबित करने के लिए जन्म प्रमाणपत्र, नागरिकता प्रमाणपत्र, वंश संबंधी रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेजों को भी महत्व दिया जाता है। दुनिया के कई देशों में भी पासपोर्ट को नागरिकता का पूर्ण और अंतिम प्रमाण नहीं माना जाता। कई बार प्रशासनिक त्रुटियों, विशेष अनुमति या मानवीय कारणों से ऐसे दस्तावेज जारी किए जा सकते हैं, जिनका अर्थ यह नहीं होता कि संबंधित व्यक्ति स्वतः उस देश का नागरिक बन गया है। भारत में भी धारा 20 का उद्देश्य इसी प्रकार की असाधारण स्थितियों का समाधान करना है।

विदेश मंत्रालय की गाइडलाइन में यह भी उल्लेख किया गया है कि गैर-नागरिकों को पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी करने का अधिकार सामान्य पासपोर्ट कार्यालयों के स्तर पर उपलब्ध नहीं होता। इसके लिए वरिष्ठ स्तर पर समीक्षा की जाती है और प्रत्येक मामले का अलग-अलग परीक्षण किया जाता है। सूत्रों के अनुसार इस प्रक्रिया में कई स्तरों की जांच और अनुमोदन शामिल होते हैं ताकि किसी प्रकार के दुरुपयोग की संभावना न रहे। हाल के वर्षों में नागरिकता, पहचान और दस्तावेजों को लेकर देश में कई बार बहस होती रही है। ऐसे में पासपोर्ट की कानूनी स्थिति को लेकर सामने आई जानकारी ने एक बार फिर इस विषय को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। हालांकि सरकारी अधिकारियों का कहना है कि आम नागरिकों के लिए पासपोर्ट एक महत्वपूर्ण पहचान और यात्रा दस्तावेज बना रहेगा, लेकिन कानूनी दृष्टि से इसे नागरिकता का अंतिम प्रमाण मानना सही नहीं होगा। इस मुद्दे पर लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि नागरिकता और यात्रा दस्तावेजों के बीच के अंतर को बेहतर ढंग से समझा जा सके। सरकार की ओर से जारी नियम और पासपोर्ट अधिनियम के प्रावधान यही संकेत देते हैं कि भारतीय पासपोर्ट की भूमिका मुख्य रूप से पहचान और अंतरराष्ट्रीय यात्रा से जुड़ी है, जबकि नागरिकता का निर्धारण अलग कानूनी प्रक्रियाओं और प्रमाणों के आधार पर किया जाता है।

https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/new-debate-on-indian-passport-government-said-this-travel/article-56868

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