ट्रम्प ने ‘बोर्ड ऑफ पीस’ लॉन्च किया: गाजा से वैश्विक संघर्ष समाधान की पहल, भारत रहा अनुपस्थित

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दावोस में पेश की गई अमेरिकी पहल में 60 देशों को न्योता, 20 की मौजूदगी; पाकिस्तान समेत 8 इस्लामिक देश शामिल, UN की भूमिका पर उठे सवाल

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने स्विट्जरलैंड के दावोस में  वैश्विक संघर्षों के समाधान के लिए प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का औपचारिक शुभारंभ किया। इस पहल का प्राथमिक उद्देश्य गाजा में लागू युद्धविराम को स्थिर करना बताया गया है, हालांकि ट्रम्प प्रशासन का दावा है कि भविष्य में यह बोर्ड अन्य अंतरराष्ट्रीय विवादों में भी सक्रिय भूमिका निभाएगा। कार्यक्रम में 60 देशों को आमंत्रित किया गया था, लेकिन हस्ताक्षर समारोह में केवल 20 देशों के प्रतिनिधि ही पहुंचे। भारत इस सूची में शामिल नहीं रहा।

व्हाइट हाउस के अनुसार, बोर्ड ऑफ पीस को एक बहुपक्षीय मंच के रूप में तैयार किया गया है, जिसकी अध्यक्षता खुद राष्ट्रपति ट्रम्प करेंगे। लॉन्च के दौरान ट्रम्प ने कहा कि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र के साथ समन्वय में काम करेगा और शांति स्थापना की मौजूदा व्यवस्थाओं को पूरक भूमिका में मजबूत करेगा। हालांकि, यूरोप के कई प्रमुख अमेरिकी सहयोगियों की गैरमौजूदगी ने इस पहल की स्वीकार्यता पर सवाल खड़े किए हैं।

समारोह में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की मौजूदगी विशेष रूप से चर्चा में रही। उनके अलावा सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, अर्जेंटीना और पराग्वे सहित कई देशों के नेता मंच पर दिखे। ANI के मुताबिक, कतर, तुर्किये, मिस्र, जॉर्डन, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, सऊदी अरब और UAE समेत आठ इस्लामिक देशों ने बोर्ड में शामिल होने पर सहमति जताई है। इसके उलट, फ्रांस ने साफ तौर पर इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया, जबकि ब्रिटेन ने फिलहाल दूरी बनाए रखने की बात कही है। चीन ने अब तक अपना रुख स्पष्ट नहीं किया है।

बोर्ड के ड्राफ्ट चार्टर को लेकर भी बहस तेज है। कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि स्थायी सदस्यता के लिए देशों को एक अरब डॉलर तक का योगदान देना पड़ सकता है। हालांकि, व्हाइट हाउस ने इन दावों को भ्रामक बताते हुए कहा है कि सदस्यता किसी तय शुल्क पर आधारित नहीं होगी, बल्कि शांति और सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता ही मुख्य मानदंड होगी।

रूस ने इस पहल पर सशर्त समर्थन का संकेत दिया है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि वह रणनीतिक साझेदारों से सलाह के बाद अंतिम निर्णय लेंगे, लेकिन गाजा पुनर्निर्माण के लिए एक अरब डॉलर तक की आर्थिक मदद पर विचार किया जा सकता है। यह राशि उन रूसी संपत्तियों से ली जा सकती है, जो यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों में फ्रीज हैं।

इजराइल ने बोर्ड की संरचना और कुछ सदस्य देशों को लेकर आपत्ति जताई है। इजराइली प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, गाजा से जुड़े नए प्रशासनिक ढांचे पर अमेरिका ने इजराइल से पर्याप्त परामर्श नहीं किया। खासतौर पर तुर्किये की भागीदारी को लेकर तेल अवीव ने असहमति जताई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बोर्ड ऑफ पीस ट्रम्प की विदेश नीति में एक बड़ा प्रयोग है। यह पहल जहां गाजा में स्थिरता के लिए नई संभावनाएं खोल सकती है, वहीं संयुक्त राष्ट्र की भूमिका, फंडिंग पारदर्शिता और सदस्य देशों की वास्तविक प्रतिबद्धता जैसे सवाल भविष्य में इसकी प्रभावशीलता तय करेंगे।

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www.dainikjagranmpcg.com
22 Jan 2026 By Nitin Trivedi

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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने स्विट्जरलैंड के दावोस में  वैश्विक संघर्षों के समाधान के लिए प्रस्तावित ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का औपचारिक शुभारंभ किया। इस पहल का प्राथमिक उद्देश्य गाजा में लागू युद्धविराम को स्थिर करना बताया गया है, हालांकि ट्रम्प प्रशासन का दावा है कि भविष्य में यह बोर्ड अन्य अंतरराष्ट्रीय विवादों में भी सक्रिय भूमिका निभाएगा। कार्यक्रम में 60 देशों को आमंत्रित किया गया था, लेकिन हस्ताक्षर समारोह में केवल 20 देशों के प्रतिनिधि ही पहुंचे। भारत इस सूची में शामिल नहीं रहा।

व्हाइट हाउस के अनुसार, बोर्ड ऑफ पीस को एक बहुपक्षीय मंच के रूप में तैयार किया गया है, जिसकी अध्यक्षता खुद राष्ट्रपति ट्रम्प करेंगे। लॉन्च के दौरान ट्रम्प ने कहा कि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र के साथ समन्वय में काम करेगा और शांति स्थापना की मौजूदा व्यवस्थाओं को पूरक भूमिका में मजबूत करेगा। हालांकि, यूरोप के कई प्रमुख अमेरिकी सहयोगियों की गैरमौजूदगी ने इस पहल की स्वीकार्यता पर सवाल खड़े किए हैं।

समारोह में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की मौजूदगी विशेष रूप से चर्चा में रही। उनके अलावा सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, अर्जेंटीना और पराग्वे सहित कई देशों के नेता मंच पर दिखे। ANI के मुताबिक, कतर, तुर्किये, मिस्र, जॉर्डन, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, सऊदी अरब और UAE समेत आठ इस्लामिक देशों ने बोर्ड में शामिल होने पर सहमति जताई है। इसके उलट, फ्रांस ने साफ तौर पर इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया, जबकि ब्रिटेन ने फिलहाल दूरी बनाए रखने की बात कही है। चीन ने अब तक अपना रुख स्पष्ट नहीं किया है।

बोर्ड के ड्राफ्ट चार्टर को लेकर भी बहस तेज है। कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि स्थायी सदस्यता के लिए देशों को एक अरब डॉलर तक का योगदान देना पड़ सकता है। हालांकि, व्हाइट हाउस ने इन दावों को भ्रामक बताते हुए कहा है कि सदस्यता किसी तय शुल्क पर आधारित नहीं होगी, बल्कि शांति और सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता ही मुख्य मानदंड होगी।

रूस ने इस पहल पर सशर्त समर्थन का संकेत दिया है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि वह रणनीतिक साझेदारों से सलाह के बाद अंतिम निर्णय लेंगे, लेकिन गाजा पुनर्निर्माण के लिए एक अरब डॉलर तक की आर्थिक मदद पर विचार किया जा सकता है। यह राशि उन रूसी संपत्तियों से ली जा सकती है, जो यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों में फ्रीज हैं।

इजराइल ने बोर्ड की संरचना और कुछ सदस्य देशों को लेकर आपत्ति जताई है। इजराइली प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, गाजा से जुड़े नए प्रशासनिक ढांचे पर अमेरिका ने इजराइल से पर्याप्त परामर्श नहीं किया। खासतौर पर तुर्किये की भागीदारी को लेकर तेल अवीव ने असहमति जताई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बोर्ड ऑफ पीस ट्रम्प की विदेश नीति में एक बड़ा प्रयोग है। यह पहल जहां गाजा में स्थिरता के लिए नई संभावनाएं खोल सकती है, वहीं संयुक्त राष्ट्र की भूमिका, फंडिंग पारदर्शिता और सदस्य देशों की वास्तविक प्रतिबद्धता जैसे सवाल भविष्य में इसकी प्रभावशीलता तय करेंगे।

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