12 साल बाद मोदी सिद्धांत: योजनाओं और नारों से आगे की कहानी

नई दिल्ली

सरकारों को अक्सर उनकी योजनाओं से याद किया जाता है। कुछ सरकारें संकटों से निपटने की अपनी क्षमता के लिए जानी जाती हैं। लेकिन बहुत कम सरकारें ऐसी होती हैं जो राजनीति और शासन की पूरी भाषा ही बदल देती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहली बार सत्ता में आने के बारह वर्ष बाद शायद सबसे बड़ा बदलाव किसी एक योजना, सुधार, कल्याणकारी कार्यक्रम या बुनियादी ढांचा परियोजना में नहीं, बल्कि इस बात में दिखाई देता है कि शासन स्वयं भारतीय राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण पूंजी बन गया है।

पिछले बारह वर्षों का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि क्या बनाया गया, क्या शुरू किया गया या क्या हासिल किया गया। इसकी सबसे बड़ी विशेषता नागरिक और सरकार के बीच संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करना है। विकास के वादे पहले भी किए जाते थे, लेकिन 2014 के बाद पहली बार शासन को मापने योग्य, डिलीवरी को ट्रैक करने योग्य और जवाबदेही को स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाला बनाने का प्रयास हुआ। इसी प्रक्रिया में मोदी सरकार ने न केवल सरकारी तंत्र को बदला, बल्कि मतदाताओं की अपेक्षाओं को भी नई दिशा दी।

यदि व्यापक रूप से देखा जाए तो यह यात्रा तीन चरणों में विकसित हुई। पहला चरण 2014 से 2019 के बीच व्यवस्था को साफ और मजबूत करने का था। दूसरा चरण 2019 से 2022 के बीच संकटों से निपटने और लचीली प्रशासनिक क्षमता दिखाने का था। तीसरा चरण इसके बाद तेज गति से राष्ट्र निर्माण और विकास को आगे बढ़ाने का रहा। हालांकि इन सभी चरणों को जोड़ने वाला मूल सिद्धांत एक ही था—संस्थाओं को मजबूत करना, डिलीवरी को प्रभावी बनाना और परिणामों को बड़े पैमाने तक पहुंचाना।

भारतीय शासन व्यवस्था को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश
जब 2014 में एनडीए सरकार सत्ता में आई तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती योजनाओं की कमी नहीं, बल्कि उनके क्रियान्वयन की कमजोरी थी। दस लाख करोड़ रुपये से अधिक की अटकी हुई परियोजनाओं को आगे बढ़ाने का निर्णय शुरुआती संकेत था कि सरकार घोषणाओं की राजनीति से आगे बढ़कर क्रियान्वयन की राजनीति पर जोर देने वाली है।

लेकिन असली बदलाव शासन की संरचना में आया। 56 करोड़ से अधिक जनधन खातों ने करोड़ों लोगों को पहली बार औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा। वहीं आधार आधारित प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) ने सरकारी सहायता को सीधे लाभार्थियों तक पहुंचाने का अभूतपूर्व तंत्र विकसित किया।

इसका परिणाम केवल बेहतर दक्षता के रूप में नहीं दिखा, बल्कि सरकार के अनुसार 2.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बचत भी हुई। धीरे-धीरे शासन का केंद्र वादों से हटकर डिलीवरी की निगरानी पर आ गया।

GST ने बदला आर्थिक ढांचा
वस्तु एवं सेवा कर (GST) भी इसी व्यापक परिवर्तन का हिस्सा था। इसने देश को एकीकृत राष्ट्रीय बाजार में बदलने, व्यापार को आसान बनाने और अर्थव्यवस्था के औपचारिककरण को बढ़ावा देने का काम किया।

आज GST संग्रह लगातार 1.7 लाख करोड़ रुपये से अधिक के स्तर पर बना हुआ है। यह केवल राजस्व वृद्धि का संकेत नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था के औपचारिक दायरे के विस्तार का भी प्रमाण है।
मोदी सरकार की कार्यशैली की एक प्रमुख विशेषता यह रही कि उसने नई योजनाओं का विस्तार करने से पहले व्यवस्था की खामियों को दूर करने पर जोर दिया। चाहे पारदर्शिता बढ़ाने की पहल हो, जवाबदेही मजबूत करने के प्रयास हों, लीकेज रोकने की कोशिश हो या फिर नोटबंदी जैसा विवादास्पद फैसला—बड़ी सोच हमेशा यही रही कि एक ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जो बड़े पैमाने पर परिणाम देने में सक्षम हो।

कल्याणकारी योजनाओं को मिला नया स्वरूप
इसी सोच का विस्तार कल्याणकारी योजनाओं में भी दिखाई दिया। स्वच्छ भारत अभियान के तहत 11 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण हुआ, जिससे स्वच्छता, सार्वजनिक स्वास्थ्य और विशेष रूप से महिलाओं की गरिमा से जुड़े मुद्दों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा।

प्रधानमंत्री आवास योजना, हर घर बिजली और जल जीवन मिशन जैसी पहलों ने कल्याण को केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं रखा, बल्कि जीवन स्तर सुधारने और बुनियादी सुविधाओं को घर-घर पहुंचाने का माध्यम बनाया।

महिला सशक्तिकरण बना नीति का केंद्रीय विषय
पिछले बारह वर्षों में महिला सशक्तिकरण सरकार की सबसे निरंतर प्राथमिकताओं में से एक रहा। चाहे स्वच्छ भारत अभियान के तहत शौचालय निर्माण हो, घरों तक बिजली और पानी पहुंचाना हो, तीन तलाक की समाप्ति हो या फिर लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाला नारी शक्ति वंदन अधिनियम—इन सभी पहलों ने महिलाओं की गरिमा, भागीदारी और प्रतिनिधित्व को नीति निर्माण के केंद्र में लाने का प्रयास किया।

कोविड-19 महामारी के दौरान इसी व्यवस्था की ताकत सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई दी। जब दुनिया अभूतपूर्व संकट से गुजर रही थी, तब भारत ने अपनी डिजिटल और कल्याणकारी संरचना का उपयोग करते हुए 80 करोड़ से अधिक लोगों तक मुफ्त राशन पहुंचाया और DBT के माध्यम से लाखों जरूरतमंद परिवारों को सहायता प्रदान की।
वर्षों की संस्थागत तैयारी संकट प्रबंधन का सबसे प्रभावी साधन बन गई।

स्केल पर विकास की तैयारी
यदि पहले चरण का लक्ष्य व्यवस्था को सुधारना था, तो उसके बाद का दौर देश की क्षमता निर्माण पर केंद्रित रहा।
कोविड काल में घोषित 20 लाख करोड़ रुपये का आत्मनिर्भर भारत पैकेज संकट को अवसर में बदलने का प्रयास था। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं के साथ मिलकर इसने उद्योगों को समर्थन दिया, रोजगारों की रक्षा की और भारत के विनिर्माण क्षेत्र को नई गति दी।

मोबाइल निर्माण बना परिवर्तन का प्रतीक
एक समय मोबाइल फोन आयात पर निर्भर रहने वाला भारत आज 1.9 लाख करोड़ रुपये से अधिक के मोबाइल निर्यात कर रहा है। यह बदलाव केवल एक उद्योग की सफलता नहीं, बल्कि वैश्विक विनिर्माण नेटवर्क में भारत की बढ़ती हिस्सेदारी का प्रतीक है।
इसी तरह डिजिटल इंडिया और UPI ने देश की आर्थिक गतिविधियों में क्रांतिकारी बदलाव लाया। जो व्यवस्था शुरुआत में केवल डिजिटल भुगतान मंच थी, वह आज दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर में बदल चुकी है।
रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं, छोटे व्यापारियों, किसानों और आम नागरिकों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। तकनीक केवल सुविधा का माध्यम नहीं रही, बल्कि समावेशन का साधन बन गई।

भविष्य की अर्थव्यवस्था पर ध्यान
सरकार ने सेमीकंडक्टर मिशन, स्टार्टअप इकोसिस्टम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, ग्रीन एनर्जी और रक्षा निर्माण जैसे क्षेत्रों में भी निवेश बढ़ाया। यह स्वीकार किया गया कि भविष्य की प्रतिस्पर्धा केवल औद्योगिक उत्पादन से नहीं, बल्कि नवाचार और तकनीक से भी तय होगी।

इसी दौरान हाईवे, एक्सप्रेसवे, वंदे भारत ट्रेन, लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर और पीएम गतिशक्ति जैसी परियोजनाएं विकास की नई पहचान बनकर उभरीं। लक्ष्य केवल कनेक्टिविटी बढ़ाना नहीं था, बल्कि उत्पादकता, दक्षता और राष्ट्रीय क्षमता को मजबूत करना था।

यदि पिछले बारह वर्षों की शासन शैली को एक वाक्य में समेटा जाए, तो वह शायद यही होगा—रिफॉर्म से परफॉर्म, परफॉर्म से ट्रांसफॉर्म और ट्रांसफॉर्म से स्केल तक की यात्रा।
वे फैसले जिन्हें पहले टाला जाता था

यदि डिलीवरी ने शासन को बदला, तो दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति ने राजनीति को बदला।
पिछले बारह वर्षों में कई ऐसे फैसले लिए गए जिन्हें पहले की सरकारें राजनीतिक रूप से कठिन, प्रशासनिक रूप से जटिल या चुनावी दृष्टि से जोखिम भरा मानती थीं।

अनुच्छेद 370, तीन तलाक और वक्फ संशोधन
अनुच्छेद 370 को हटाने का निर्णय दशकों पुरानी संवैधानिक व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव था। इसी तरह तीन तलाक की समाप्ति ने लंबे समय से लंबित सामाजिक और कानूनी बहस को निर्णायक दिशा दी।

हाल के वर्षों में वक्फ संशोधन ने भी यह संकेत दिया कि सरकार संवेदनशील माने जाने वाले मुद्दों पर भी निर्णय लेने से पीछे हटने को तैयार नहीं है।इन सभी फैसलों ने एक ऐसी राजनीतिक शैली को सामने रखा जिसमें सावधानी से अधिक दृढ़ विश्वास दिखाई देता है।

राम मंदिर और सांस्कृतिक पुनर्जागरण
अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का विकास केवल निर्माण परियोजनाएं नहीं थे। वे उन सांस्कृतिक और सभ्यतागत आकांक्षाओं की पूर्ति के प्रतीक बने जो दशकों से भारतीय जनमानस का हिस्सा थीं।
इन परियोजनाओं ने यह भी दिखाया कि सरकार उन विषयों पर भी पहल करने को तैयार है जिन्हें पहले अक्सर राजनीतिक संवेदनशीलता के कारण सावधानी से संभाला जाता था।

आत्मविश्वास बना नई राज्यकला का आधार
राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति में भी यही आत्मविश्वास दिखाई दिया। बालाकोट से लेकर ऑपरेशन सिंदूर तक, रक्षा आधुनिकीकरण से लेकर INS विक्रांत के कमीशनिंग तक, भारत की सुरक्षा नीति अधिक सक्रिय, आत्मनिर्भर और निर्णायक दिखाई दी।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की स्थिति मजबूत हुई। वैक्सीन मैत्री ने वैश्विक संकट के दौरान भारत की क्षमता को प्रदर्शित किया। G20 की सफल अध्यक्षता ने उसकी बढ़ती कूटनीतिक शक्ति को रेखांकित किया। बढ़ते निर्यात, मजबूत रणनीतिक साझेदारियां और वैश्विक मंचों पर बढ़ती भूमिका ने भारत की अंतरराष्ट्रीय पहचान को नई ऊंचाई दी।भारत अब केवल एक उभरते बाजार (Emerging Market) के रूप में नहीं, बल्कि एक उभरती वैश्विक शक्ति (Emerging Power) के रूप में देखा जाने लगा है।

सबसे स्थायी विरासत क्या होगी?
बारह वर्षों के इस दौर की योजनाओं, सुधारों और फैसलों पर बहस आगे भी जारी रहेगी। लेकिन इसकी सबसे बड़ी विरासत शायद किसी एक योजना या परियोजना में नहीं है।
यह उस बदलाव में है जिसने नागरिकों की अपेक्षाओं को बदल दिया। आज शासन का मूल्यांकन केवल नीयत से नहीं, बल्कि परिणामों से किया जाता है। कल्याणकारी योजनाओं को घोषणाओं से नहीं, बल्कि उनकी डिलीवरी से परखा जाता है। नेतृत्व का आकलन भाषणों से नहीं, बल्कि क्रियान्वयन की क्षमता से होने लगा है।

संभव है कि आने वाले वर्षों में मोदी सरकार की सबसे स्थायी विरासत किसी एक सुधार, योजना या परियोजना में नहीं, बल्कि इस बदलाव में दिखाई दे कि शासन अब केवल एक नारा नहीं रहा। वह एक मानक बन चुका है, जिसके आधार पर सत्ता का मूल्यांकन किया जाता है।

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10 Jun 2026 By दैनिक जागरण

12 साल बाद मोदी सिद्धांत: योजनाओं और नारों से आगे की कहानी

नई दिल्ली

पिछले बारह वर्षों का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि क्या बनाया गया, क्या शुरू किया गया या क्या हासिल किया गया। इसकी सबसे बड़ी विशेषता नागरिक और सरकार के बीच संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करना है। विकास के वादे पहले भी किए जाते थे, लेकिन 2014 के बाद पहली बार शासन को मापने योग्य, डिलीवरी को ट्रैक करने योग्य और जवाबदेही को स्पष्ट रूप से दिखाई देने वाला बनाने का प्रयास हुआ। इसी प्रक्रिया में मोदी सरकार ने न केवल सरकारी तंत्र को बदला, बल्कि मतदाताओं की अपेक्षाओं को भी नई दिशा दी।

यदि व्यापक रूप से देखा जाए तो यह यात्रा तीन चरणों में विकसित हुई। पहला चरण 2014 से 2019 के बीच व्यवस्था को साफ और मजबूत करने का था। दूसरा चरण 2019 से 2022 के बीच संकटों से निपटने और लचीली प्रशासनिक क्षमता दिखाने का था। तीसरा चरण इसके बाद तेज गति से राष्ट्र निर्माण और विकास को आगे बढ़ाने का रहा। हालांकि इन सभी चरणों को जोड़ने वाला मूल सिद्धांत एक ही था—संस्थाओं को मजबूत करना, डिलीवरी को प्रभावी बनाना और परिणामों को बड़े पैमाने तक पहुंचाना।

भारतीय शासन व्यवस्था को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश
जब 2014 में एनडीए सरकार सत्ता में आई तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती योजनाओं की कमी नहीं, बल्कि उनके क्रियान्वयन की कमजोरी थी। दस लाख करोड़ रुपये से अधिक की अटकी हुई परियोजनाओं को आगे बढ़ाने का निर्णय शुरुआती संकेत था कि सरकार घोषणाओं की राजनीति से आगे बढ़कर क्रियान्वयन की राजनीति पर जोर देने वाली है।

लेकिन असली बदलाव शासन की संरचना में आया। 56 करोड़ से अधिक जनधन खातों ने करोड़ों लोगों को पहली बार औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा। वहीं आधार आधारित प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) ने सरकारी सहायता को सीधे लाभार्थियों तक पहुंचाने का अभूतपूर्व तंत्र विकसित किया।

इसका परिणाम केवल बेहतर दक्षता के रूप में नहीं दिखा, बल्कि सरकार के अनुसार 2.5 लाख करोड़ रुपये से अधिक की बचत भी हुई। धीरे-धीरे शासन का केंद्र वादों से हटकर डिलीवरी की निगरानी पर आ गया।

GST ने बदला आर्थिक ढांचा
वस्तु एवं सेवा कर (GST) भी इसी व्यापक परिवर्तन का हिस्सा था। इसने देश को एकीकृत राष्ट्रीय बाजार में बदलने, व्यापार को आसान बनाने और अर्थव्यवस्था के औपचारिककरण को बढ़ावा देने का काम किया।

आज GST संग्रह लगातार 1.7 लाख करोड़ रुपये से अधिक के स्तर पर बना हुआ है। यह केवल राजस्व वृद्धि का संकेत नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था के औपचारिक दायरे के विस्तार का भी प्रमाण है।
मोदी सरकार की कार्यशैली की एक प्रमुख विशेषता यह रही कि उसने नई योजनाओं का विस्तार करने से पहले व्यवस्था की खामियों को दूर करने पर जोर दिया। चाहे पारदर्शिता बढ़ाने की पहल हो, जवाबदेही मजबूत करने के प्रयास हों, लीकेज रोकने की कोशिश हो या फिर नोटबंदी जैसा विवादास्पद फैसला—बड़ी सोच हमेशा यही रही कि एक ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जो बड़े पैमाने पर परिणाम देने में सक्षम हो।

कल्याणकारी योजनाओं को मिला नया स्वरूप
इसी सोच का विस्तार कल्याणकारी योजनाओं में भी दिखाई दिया। स्वच्छ भारत अभियान के तहत 11 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण हुआ, जिससे स्वच्छता, सार्वजनिक स्वास्थ्य और विशेष रूप से महिलाओं की गरिमा से जुड़े मुद्दों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा।

प्रधानमंत्री आवास योजना, हर घर बिजली और जल जीवन मिशन जैसी पहलों ने कल्याण को केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं रखा, बल्कि जीवन स्तर सुधारने और बुनियादी सुविधाओं को घर-घर पहुंचाने का माध्यम बनाया।

महिला सशक्तिकरण बना नीति का केंद्रीय विषय
पिछले बारह वर्षों में महिला सशक्तिकरण सरकार की सबसे निरंतर प्राथमिकताओं में से एक रहा। चाहे स्वच्छ भारत अभियान के तहत शौचालय निर्माण हो, घरों तक बिजली और पानी पहुंचाना हो, तीन तलाक की समाप्ति हो या फिर लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाला नारी शक्ति वंदन अधिनियम—इन सभी पहलों ने महिलाओं की गरिमा, भागीदारी और प्रतिनिधित्व को नीति निर्माण के केंद्र में लाने का प्रयास किया।

कोविड-19 महामारी के दौरान इसी व्यवस्था की ताकत सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई दी। जब दुनिया अभूतपूर्व संकट से गुजर रही थी, तब भारत ने अपनी डिजिटल और कल्याणकारी संरचना का उपयोग करते हुए 80 करोड़ से अधिक लोगों तक मुफ्त राशन पहुंचाया और DBT के माध्यम से लाखों जरूरतमंद परिवारों को सहायता प्रदान की।
वर्षों की संस्थागत तैयारी संकट प्रबंधन का सबसे प्रभावी साधन बन गई।

स्केल पर विकास की तैयारी
यदि पहले चरण का लक्ष्य व्यवस्था को सुधारना था, तो उसके बाद का दौर देश की क्षमता निर्माण पर केंद्रित रहा।
कोविड काल में घोषित 20 लाख करोड़ रुपये का आत्मनिर्भर भारत पैकेज संकट को अवसर में बदलने का प्रयास था। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं के साथ मिलकर इसने उद्योगों को समर्थन दिया, रोजगारों की रक्षा की और भारत के विनिर्माण क्षेत्र को नई गति दी।

मोबाइल निर्माण बना परिवर्तन का प्रतीक
एक समय मोबाइल फोन आयात पर निर्भर रहने वाला भारत आज 1.9 लाख करोड़ रुपये से अधिक के मोबाइल निर्यात कर रहा है। यह बदलाव केवल एक उद्योग की सफलता नहीं, बल्कि वैश्विक विनिर्माण नेटवर्क में भारत की बढ़ती हिस्सेदारी का प्रतीक है।
इसी तरह डिजिटल इंडिया और UPI ने देश की आर्थिक गतिविधियों में क्रांतिकारी बदलाव लाया। जो व्यवस्था शुरुआत में केवल डिजिटल भुगतान मंच थी, वह आज दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर में बदल चुकी है।
रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं, छोटे व्यापारियों, किसानों और आम नागरिकों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। तकनीक केवल सुविधा का माध्यम नहीं रही, बल्कि समावेशन का साधन बन गई।

भविष्य की अर्थव्यवस्था पर ध्यान
सरकार ने सेमीकंडक्टर मिशन, स्टार्टअप इकोसिस्टम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, ग्रीन एनर्जी और रक्षा निर्माण जैसे क्षेत्रों में भी निवेश बढ़ाया। यह स्वीकार किया गया कि भविष्य की प्रतिस्पर्धा केवल औद्योगिक उत्पादन से नहीं, बल्कि नवाचार और तकनीक से भी तय होगी।

इसी दौरान हाईवे, एक्सप्रेसवे, वंदे भारत ट्रेन, लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर और पीएम गतिशक्ति जैसी परियोजनाएं विकास की नई पहचान बनकर उभरीं। लक्ष्य केवल कनेक्टिविटी बढ़ाना नहीं था, बल्कि उत्पादकता, दक्षता और राष्ट्रीय क्षमता को मजबूत करना था।

यदि पिछले बारह वर्षों की शासन शैली को एक वाक्य में समेटा जाए, तो वह शायद यही होगा—रिफॉर्म से परफॉर्म, परफॉर्म से ट्रांसफॉर्म और ट्रांसफॉर्म से स्केल तक की यात्रा।
वे फैसले जिन्हें पहले टाला जाता था

यदि डिलीवरी ने शासन को बदला, तो दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति ने राजनीति को बदला।
पिछले बारह वर्षों में कई ऐसे फैसले लिए गए जिन्हें पहले की सरकारें राजनीतिक रूप से कठिन, प्रशासनिक रूप से जटिल या चुनावी दृष्टि से जोखिम भरा मानती थीं।

अनुच्छेद 370, तीन तलाक और वक्फ संशोधन
अनुच्छेद 370 को हटाने का निर्णय दशकों पुरानी संवैधानिक व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव था। इसी तरह तीन तलाक की समाप्ति ने लंबे समय से लंबित सामाजिक और कानूनी बहस को निर्णायक दिशा दी।

हाल के वर्षों में वक्फ संशोधन ने भी यह संकेत दिया कि सरकार संवेदनशील माने जाने वाले मुद्दों पर भी निर्णय लेने से पीछे हटने को तैयार नहीं है।इन सभी फैसलों ने एक ऐसी राजनीतिक शैली को सामने रखा जिसमें सावधानी से अधिक दृढ़ विश्वास दिखाई देता है।

राम मंदिर और सांस्कृतिक पुनर्जागरण
अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का विकास केवल निर्माण परियोजनाएं नहीं थे। वे उन सांस्कृतिक और सभ्यतागत आकांक्षाओं की पूर्ति के प्रतीक बने जो दशकों से भारतीय जनमानस का हिस्सा थीं।
इन परियोजनाओं ने यह भी दिखाया कि सरकार उन विषयों पर भी पहल करने को तैयार है जिन्हें पहले अक्सर राजनीतिक संवेदनशीलता के कारण सावधानी से संभाला जाता था।

आत्मविश्वास बना नई राज्यकला का आधार
राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति में भी यही आत्मविश्वास दिखाई दिया। बालाकोट से लेकर ऑपरेशन सिंदूर तक, रक्षा आधुनिकीकरण से लेकर INS विक्रांत के कमीशनिंग तक, भारत की सुरक्षा नीति अधिक सक्रिय, आत्मनिर्भर और निर्णायक दिखाई दी।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की स्थिति मजबूत हुई। वैक्सीन मैत्री ने वैश्विक संकट के दौरान भारत की क्षमता को प्रदर्शित किया। G20 की सफल अध्यक्षता ने उसकी बढ़ती कूटनीतिक शक्ति को रेखांकित किया। बढ़ते निर्यात, मजबूत रणनीतिक साझेदारियां और वैश्विक मंचों पर बढ़ती भूमिका ने भारत की अंतरराष्ट्रीय पहचान को नई ऊंचाई दी।भारत अब केवल एक उभरते बाजार (Emerging Market) के रूप में नहीं, बल्कि एक उभरती वैश्विक शक्ति (Emerging Power) के रूप में देखा जाने लगा है।

सबसे स्थायी विरासत क्या होगी?
बारह वर्षों के इस दौर की योजनाओं, सुधारों और फैसलों पर बहस आगे भी जारी रहेगी। लेकिन इसकी सबसे बड़ी विरासत शायद किसी एक योजना या परियोजना में नहीं है।
यह उस बदलाव में है जिसने नागरिकों की अपेक्षाओं को बदल दिया। आज शासन का मूल्यांकन केवल नीयत से नहीं, बल्कि परिणामों से किया जाता है। कल्याणकारी योजनाओं को घोषणाओं से नहीं, बल्कि उनकी डिलीवरी से परखा जाता है। नेतृत्व का आकलन भाषणों से नहीं, बल्कि क्रियान्वयन की क्षमता से होने लगा है।

संभव है कि आने वाले वर्षों में मोदी सरकार की सबसे स्थायी विरासत किसी एक सुधार, योजना या परियोजना में नहीं, बल्कि इस बदलाव में दिखाई दे कि शासन अब केवल एक नारा नहीं रहा। वह एक मानक बन चुका है, जिसके आधार पर सत्ता का मूल्यांकन किया जाता है।

https://www.dainikjagranmpcg.com/national-international/after-12-years-the-story-beyond-modi-principles-plans-and/article-55509

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