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बालिग युवती को अपनी पसंद से रहने की आजादी, हाई कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला
ग्वालियर,(म.प्र.)
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा कि बालिग महिला अपनी इच्छा से कहीं भी रह सकती है, लेकिन साथ रहने भर से संबंध को वैध विवाह का दर्जा नहीं दिया जा सकता।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए बालिग युवती की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर अहम टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई युवती बालिग है तो उसे अपनी इच्छा के अनुसार रहने और जीवन से जुड़े फैसले लेने का पूरा अधिकार है। हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि किसी युवक के साथ रहने या लिव-इन रिलेशनशिप में रहने मात्र से उस संबंध को कानूनी रूप से वैध विवाह नहीं माना जा सकता। विवाह की वैधता का फैसला केवल सक्षम न्यायालय ही कर सकता है।
यह मामला एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा हुआ था, जिसे अभिषेक गुर्जर ने हाई कोर्ट में दायर किया था। याचिका में आरोप लगाया गया था कि जिस युवती के साथ वह रहना चाहता है, उसे उसके पिता ने उसकी इच्छा के विरुद्ध अपने पास रखा हुआ है। याचिकाकर्ता का कहना था कि युवती अपनी मर्जी से उसके साथ रहना चाहती है, लेकिन परिवार की ओर से उस पर दबाव बनाया जा रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने सुनवाई शुरू की और संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया।
सुनवाई के दौरान अभिषेक गुर्जर ने अदालत को बताया कि उसने 25 मार्च 2026 को धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार युवती से विवाह किया था। उसने यह भी दावा किया कि युवती लगभग ढाई महीने की गर्भवती है। याचिका में यह भी कहा गया कि एक जून को पुलिस की सहायता से युवती को उसके पास से हटाकर जबरन उसके पिता के घर भेज दिया गया था। इन आरोपों के बाद अदालत ने पूरे मामले की जानकारी मांगी और पुलिस को युवती को न्यायालय में पेश करने का निर्देश दिया। बाद में पुरानी छावनी थाना पुलिस युवती को अदालत में लेकर पहुंची।
मामले ने उस समय नया मोड़ ले लिया जब ब्रजेश गुर्जर नामक एक अन्य व्यक्ति ने अदालत में हस्तक्षेप याचिका दायर कर दी। उसने दावा किया कि युवती का विवाह पहले ही उसके साथ हो चुका है और इस संबंध में उसने कुछ फोटो तथा विवाह कार्ड भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए। तीसरे पक्ष के इस दावे ने मामले को और जटिल बना दिया। अदालत ने उसके आवेदन को स्वीकार करते हुए उसे भी मामले में पक्षकार बनने की अनुमति प्रदान कर दी, ताकि सभी तथ्यों को सामने रखकर निष्पक्ष निर्णय लिया जा सके।
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने युवती से अलग कमरे में बातचीत की और उसकी इच्छा जानने का प्रयास किया। अदालत के समक्ष युवती ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह अभिषेक गुर्जर के साथ रहना चाहती है और किसी प्रकार के दबाव में नहीं है। राज्य सरकार की ओर से भी अदालत को बताया गया कि युवती बालिग है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार उसकी जन्मतिथि 1 जनवरी 2008 बताई गई, जिसके आधार पर अदालत ने माना कि वह अपने जीवन के फैसले स्वयं लेने के लिए कानूनी रूप से सक्षम है।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति दीपक खोत की खंडपीठ ने कहा कि भारतीय कानून बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीने का अधिकार देता है। अदालत ने माना कि किसी बालिग महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी स्थान पर रोककर नहीं रखा जा सकता। यदि वह अपनी मर्जी से किसी व्यक्ति के साथ रहना चाहती है तो उसे ऐसा करने की स्वतंत्रता है।
हालांकि कोर्ट ने अपने आदेश में एक महत्वपूर्ण बात भी जोड़ी। अदालत ने कहा कि युवती का किसी व्यक्ति के साथ रहना या उसके साथ जाने का निर्णय विवाह की वैधता को साबित नहीं करता। यदि विवाह को लेकर विवाद है या कई पक्ष अलग-अलग दावे कर रहे हैं, तो ऐसे मामलों में विवाह की वैधता का निर्धारण केवल सक्षम सिविल या पारिवारिक न्यायालय द्वारा ही किया जाएगा। हाई कोर्ट ने इस याचिका की सुनवाई के दौरान केवल युवती की स्वतंत्रता और उसकी इच्छा को ध्यान में रखा
यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। हाल के वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें बालिग युवक-युवतियों की पसंद और परिवार की इच्छा के बीच टकराव देखने को मिला है। अदालतें लगातार यह स्पष्ट करती रही हैं कि बालिग व्यक्ति को अपनी जिंदगी के फैसले लेने का अधिकार है, चाहे परिवार उसकी पसंद से सहमत हो या नहीं। इस मामले में भी हाई कोर्ट ने यही संदेश दिया कि किसी बालिग महिला की इच्छा सर्वोपरि है। साथ ही अदालत ने यह भी सुनिश्चित किया कि विवाह की वैधता से जुड़े विवादों का निपटारा उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत ही किया जाए।
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बालिग युवती को अपनी पसंद से रहने की आजादी, हाई कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला
ग्वालियर,(म.प्र.)
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए बालिग युवती की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर अहम टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई युवती बालिग है तो उसे अपनी इच्छा के अनुसार रहने और जीवन से जुड़े फैसले लेने का पूरा अधिकार है। हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि किसी युवक के साथ रहने या लिव-इन रिलेशनशिप में रहने मात्र से उस संबंध को कानूनी रूप से वैध विवाह नहीं माना जा सकता। विवाह की वैधता का फैसला केवल सक्षम न्यायालय ही कर सकता है।
यह मामला एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा हुआ था, जिसे अभिषेक गुर्जर ने हाई कोर्ट में दायर किया था। याचिका में आरोप लगाया गया था कि जिस युवती के साथ वह रहना चाहता है, उसे उसके पिता ने उसकी इच्छा के विरुद्ध अपने पास रखा हुआ है। याचिकाकर्ता का कहना था कि युवती अपनी मर्जी से उसके साथ रहना चाहती है, लेकिन परिवार की ओर से उस पर दबाव बनाया जा रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने सुनवाई शुरू की और संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया।
सुनवाई के दौरान अभिषेक गुर्जर ने अदालत को बताया कि उसने 25 मार्च 2026 को धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार युवती से विवाह किया था। उसने यह भी दावा किया कि युवती लगभग ढाई महीने की गर्भवती है। याचिका में यह भी कहा गया कि एक जून को पुलिस की सहायता से युवती को उसके पास से हटाकर जबरन उसके पिता के घर भेज दिया गया था। इन आरोपों के बाद अदालत ने पूरे मामले की जानकारी मांगी और पुलिस को युवती को न्यायालय में पेश करने का निर्देश दिया। बाद में पुरानी छावनी थाना पुलिस युवती को अदालत में लेकर पहुंची।
मामले ने उस समय नया मोड़ ले लिया जब ब्रजेश गुर्जर नामक एक अन्य व्यक्ति ने अदालत में हस्तक्षेप याचिका दायर कर दी। उसने दावा किया कि युवती का विवाह पहले ही उसके साथ हो चुका है और इस संबंध में उसने कुछ फोटो तथा विवाह कार्ड भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए। तीसरे पक्ष के इस दावे ने मामले को और जटिल बना दिया। अदालत ने उसके आवेदन को स्वीकार करते हुए उसे भी मामले में पक्षकार बनने की अनुमति प्रदान कर दी, ताकि सभी तथ्यों को सामने रखकर निष्पक्ष निर्णय लिया जा सके।
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने युवती से अलग कमरे में बातचीत की और उसकी इच्छा जानने का प्रयास किया। अदालत के समक्ष युवती ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह अभिषेक गुर्जर के साथ रहना चाहती है और किसी प्रकार के दबाव में नहीं है। राज्य सरकार की ओर से भी अदालत को बताया गया कि युवती बालिग है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार उसकी जन्मतिथि 1 जनवरी 2008 बताई गई, जिसके आधार पर अदालत ने माना कि वह अपने जीवन के फैसले स्वयं लेने के लिए कानूनी रूप से सक्षम है।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति दीपक खोत की खंडपीठ ने कहा कि भारतीय कानून बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीने का अधिकार देता है। अदालत ने माना कि किसी बालिग महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी स्थान पर रोककर नहीं रखा जा सकता। यदि वह अपनी मर्जी से किसी व्यक्ति के साथ रहना चाहती है तो उसे ऐसा करने की स्वतंत्रता है।
हालांकि कोर्ट ने अपने आदेश में एक महत्वपूर्ण बात भी जोड़ी। अदालत ने कहा कि युवती का किसी व्यक्ति के साथ रहना या उसके साथ जाने का निर्णय विवाह की वैधता को साबित नहीं करता। यदि विवाह को लेकर विवाद है या कई पक्ष अलग-अलग दावे कर रहे हैं, तो ऐसे मामलों में विवाह की वैधता का निर्धारण केवल सक्षम सिविल या पारिवारिक न्यायालय द्वारा ही किया जाएगा। हाई कोर्ट ने इस याचिका की सुनवाई के दौरान केवल युवती की स्वतंत्रता और उसकी इच्छा को ध्यान में रखा
यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। हाल के वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें बालिग युवक-युवतियों की पसंद और परिवार की इच्छा के बीच टकराव देखने को मिला है। अदालतें लगातार यह स्पष्ट करती रही हैं कि बालिग व्यक्ति को अपनी जिंदगी के फैसले लेने का अधिकार है, चाहे परिवार उसकी पसंद से सहमत हो या नहीं। इस मामले में भी हाई कोर्ट ने यही संदेश दिया कि किसी बालिग महिला की इच्छा सर्वोपरि है। साथ ही अदालत ने यह भी सुनिश्चित किया कि विवाह की वैधता से जुड़े विवादों का निपटारा उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत ही किया जाए।
