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UPSC में उम्मीदवारी रद्द होने के बाद अब राज्य सेवा पर संकट: केंद्र सरकार ने यूपी के मुख्य सचिव को भेजी शिकायत, नायब तहसीलदार स्तर के अफसर पर 'एक्शन' की तैयारी
Digital Desk
विकलांगता कोटे (PwBD) के गलत इस्तेमाल का आरोप, सुप्रीम कोर्ट के मेडिकल बोर्ड में भी हुए थे फेल
देश की सिविल सेवा परीक्षा (UPSC) में विकलांगता कोटे के कथित गलत इस्तेमाल का एक बेहद संवेदनशील और बड़ा मामला सामने आया है। केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने उत्तर प्रदेश कैडर के सरकारी अधिकारी शुभम अग्रवाल के खिलाफ मिली गंभीर शिकायतों को यूपी के मुख्य सचिव (Chief Secretary) को रेफर कर दिया है। डीओपीटी ने राज्य सरकार से इस पूरे मामले की गहन जांच करने और नियमों के तहत "कड़ी आवश्यक कार्रवाई" करने को कहा है। यह मामला इसलिए बेहद गंभीर हो चुका है क्योंकि यह केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT), दिल्ली हाईकोर्ट और देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) तक का सफर तय कर चुका है।
सुप्रीम कोर्ट के स्पेशल मेडिकल बोर्ड में खुली पोल
यूपी सरकार के इस अधिकारी पर केंद्र और राज्य दोनों जगह एक ही मेडिकल सर्टिफिकेट के जरिए नौकरी पाने और कोटा हथियाने के गंभीर आरोप हैं। डीओपीटी के पत्र के मुताबिक, शुभम अग्रवाल ने सिविल सेवा परीक्षा 2017, 2018, 2020 और 2022 के दौरान 'श्रवण बाधित' (Hearing Impairment) कैटेगरी के तहत आरक्षण का दावा किया था। लेकिन हर बार हुए मेडिकल टेस्ट में उनकी विकलांगता तय मापदंडों (Benchmark Disability) से कम पाई गई। इसके बाद, सिविल सेवा परीक्षा-2024 के लिए भी उन्हें PwBD नियमों के तहत 'अयोग्य' घोषित कर दिया गया और संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) ने उनकी उम्मीदवारी को पूरी तरह रद्द (Cancel) कर दिया था।
मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो अदालत ने चेन्नई के राजीव गांधी गवर्नमेंट जनरल हॉस्पिटल में एक स्वतंत्र और निष्पक्ष विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड का गठन किया था। इस बोर्ड की रिपोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और यूपीएससी को राहत देते हुए शुभम को कोटे का लाभ देने की बाध्यता से मुक्त कर दिया था।
UPSC में अयोग्य, तो यूपी सरकार में कैसे मिली नौकरी?
यह पूरा विवाद अब उत्तर प्रदेश सरकार के गले की फांस बनने जा रहा है। दरअसल, शुभम अग्रवाल वर्तमान में यूपी सरकार के तहत नायब तहसीलदार (Naib Tehsildar) के पद पर तैनात हैं। शिकायतकर्ता आशीष गुप्ता ने सरकार को सौंपे दस्तावेजों में आरोप लगाया है कि शुभम ने जिस विकलांगता सर्टिफिकेट और दस्तावेजों को आधार बनाकर यूपीएससी में आरक्षण मांगा था (जो जांच में फर्जी या तय मानक से कम पाया गया), उन्हीं दस्तावेजों का इस्तेमाल करके उन्होंने यूपी लोक सेवा आयोग के जरिए राज्य सरकार में नौकरी हासिल कर ली।
अधिकारियों से सांठगांठ का भी आरोप
शिकायत में यह भी संगीन आरोप लगाया गया है कि शुभम अग्रवाल और उनके परिवार ने गाजियाबाद के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) कार्यालय के कुछ अधिकारियों के साथ मिलकर मिलीभगत की और ये मेडिकल दस्तावेज तैयार करवाए। हालांकि, सक्षम अधिकारियों द्वारा इन आरोपों की जांच की जानी अभी बाकी है।
आगे क्या? यूपी सरकार के फैसले पर टिकी नजरें
डीओपीटी द्वारा मामला उत्तर प्रदेश सरकार को सौंपे जाने के बाद, शिकायतकर्ता आशीष गुप्ता ने मुख्य सचिव से मांग की है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश और डीओपीटी के निर्देश के तहत शुभम अग्रवाल के नियुक्ति रिकॉर्ड की तुरंत समीक्षा की जाए और सेवा नियमों के तहत उन पर सख्त एक्शन लिया जाए। अब गेंद उत्तर प्रदेश सरकार के पाले में है। इस मामले में राज्य सरकार की कार्रवाई का देश में विकलांगता आरक्षण सत्यापन (PwBD Verification) की प्रक्रिया और सरकारी नौकरियों में चयन की पारदर्शिता पर बहुत बड़ा असर पड़ने वाला है।
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UPSC में उम्मीदवारी रद्द होने के बाद अब राज्य सेवा पर संकट: केंद्र सरकार ने यूपी के मुख्य सचिव को भेजी शिकायत, नायब तहसीलदार स्तर के अफसर पर 'एक्शन' की तैयारी
Digital Desk
देश की सिविल सेवा परीक्षा (UPSC) में विकलांगता कोटे के कथित गलत इस्तेमाल का एक बेहद संवेदनशील और बड़ा मामला सामने आया है। केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने उत्तर प्रदेश कैडर के सरकारी अधिकारी शुभम अग्रवाल के खिलाफ मिली गंभीर शिकायतों को यूपी के मुख्य सचिव (Chief Secretary) को रेफर कर दिया है। डीओपीटी ने राज्य सरकार से इस पूरे मामले की गहन जांच करने और नियमों के तहत "कड़ी आवश्यक कार्रवाई" करने को कहा है। यह मामला इसलिए बेहद गंभीर हो चुका है क्योंकि यह केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT), दिल्ली हाईकोर्ट और देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) तक का सफर तय कर चुका है।
सुप्रीम कोर्ट के स्पेशल मेडिकल बोर्ड में खुली पोल
यूपी सरकार के इस अधिकारी पर केंद्र और राज्य दोनों जगह एक ही मेडिकल सर्टिफिकेट के जरिए नौकरी पाने और कोटा हथियाने के गंभीर आरोप हैं। डीओपीटी के पत्र के मुताबिक, शुभम अग्रवाल ने सिविल सेवा परीक्षा 2017, 2018, 2020 और 2022 के दौरान 'श्रवण बाधित' (Hearing Impairment) कैटेगरी के तहत आरक्षण का दावा किया था। लेकिन हर बार हुए मेडिकल टेस्ट में उनकी विकलांगता तय मापदंडों (Benchmark Disability) से कम पाई गई। इसके बाद, सिविल सेवा परीक्षा-2024 के लिए भी उन्हें PwBD नियमों के तहत 'अयोग्य' घोषित कर दिया गया और संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) ने उनकी उम्मीदवारी को पूरी तरह रद्द (Cancel) कर दिया था।
मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो अदालत ने चेन्नई के राजीव गांधी गवर्नमेंट जनरल हॉस्पिटल में एक स्वतंत्र और निष्पक्ष विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड का गठन किया था। इस बोर्ड की रिपोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और यूपीएससी को राहत देते हुए शुभम को कोटे का लाभ देने की बाध्यता से मुक्त कर दिया था।
UPSC में अयोग्य, तो यूपी सरकार में कैसे मिली नौकरी?
यह पूरा विवाद अब उत्तर प्रदेश सरकार के गले की फांस बनने जा रहा है। दरअसल, शुभम अग्रवाल वर्तमान में यूपी सरकार के तहत नायब तहसीलदार (Naib Tehsildar) के पद पर तैनात हैं। शिकायतकर्ता आशीष गुप्ता ने सरकार को सौंपे दस्तावेजों में आरोप लगाया है कि शुभम ने जिस विकलांगता सर्टिफिकेट और दस्तावेजों को आधार बनाकर यूपीएससी में आरक्षण मांगा था (जो जांच में फर्जी या तय मानक से कम पाया गया), उन्हीं दस्तावेजों का इस्तेमाल करके उन्होंने यूपी लोक सेवा आयोग के जरिए राज्य सरकार में नौकरी हासिल कर ली।
अधिकारियों से सांठगांठ का भी आरोप
शिकायत में यह भी संगीन आरोप लगाया गया है कि शुभम अग्रवाल और उनके परिवार ने गाजियाबाद के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) कार्यालय के कुछ अधिकारियों के साथ मिलकर मिलीभगत की और ये मेडिकल दस्तावेज तैयार करवाए। हालांकि, सक्षम अधिकारियों द्वारा इन आरोपों की जांच की जानी अभी बाकी है।
आगे क्या? यूपी सरकार के फैसले पर टिकी नजरें
डीओपीटी द्वारा मामला उत्तर प्रदेश सरकार को सौंपे जाने के बाद, शिकायतकर्ता आशीष गुप्ता ने मुख्य सचिव से मांग की है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश और डीओपीटी के निर्देश के तहत शुभम अग्रवाल के नियुक्ति रिकॉर्ड की तुरंत समीक्षा की जाए और सेवा नियमों के तहत उन पर सख्त एक्शन लिया जाए। अब गेंद उत्तर प्रदेश सरकार के पाले में है। इस मामले में राज्य सरकार की कार्रवाई का देश में विकलांगता आरक्षण सत्यापन (PwBD Verification) की प्रक्रिया और सरकारी नौकरियों में चयन की पारदर्शिता पर बहुत बड़ा असर पड़ने वाला है।
