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भागवत बोले- आज का युवा 30 साल बाद बुजुर्ग होगा, भविष्य भी सोचें
भारत
नागपुर के कार्यक्रम में RSS प्रमुख ने युवाओं को देश की ताकत बताया, कहा- डेमोग्राफिक डिविडेंड का सही इस्तेमाल हुआ तो भारत को बड़ा फायदा
नागपुर में शनिवार को आयोजित ‘हमारा तिरंगा, हमारी शान’ कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने युवाओं से देश के भविष्य को ध्यान में रखकर काम करने की अपील की। उन्होंने कहा कि जो युवा आज देश की सबसे बड़ी ताकत दिखाई दे रहे हैं, वही करीब 30 साल बाद बुजुर्ग हो जाएंगे। ऐसे में सोच सिर्फ वर्तमान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसी व्यवस्था, कैसा समाज और किस तरह का देश छोड़ा जाएगा, इस पर भी युवाओं को विचार करना होगा। भागवत ने युवाओं को भारत का ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ बताते हुए कहा कि बड़ी युवा आबादी देश के लिए अवसर है, लेकिन इसका सही दिशा में इस्तेमाल नहीं हुआ तो यही स्थिति आगे चलकर चुनौती भी बन सकती है।
उनके मुताबिक कामकाजी उम्र की आबादी अगर शिक्षा, कौशल, रोजगार और सही सोच से जुड़ती है तो उसका सीधा फायदा अर्थव्यवस्था और समाज दोनों को मिलता है। कार्यक्रम में उन्होंने युवाओं से सिर्फ व्यक्तिगत सफलता को लक्ष्य नहीं बनाने की बात कही। उनका कहना था कि व्यक्ति की तरक्की जरूरी है, लेकिन समाज और देश की जरूरतों को नजरअंदाज करके विकास को पूरा नहीं माना जा सकता। आज की युवा पीढ़ी के सामने सुविधाएं और अवसर दोनों पहले की तुलना में ज्यादा हैं, इसलिए जिम्मेदारी भी बड़ी है।
भागवत ने युवाओं को यह समझने की जरूरत बताई कि आने वाले दशकों में देश किन चुनौतियों का सामना करेगा और उसके लिए अभी से तैयारी कैसे की जा सकती है। उन्होंने जनसंख्या की संरचना को लेकर भी बात रखी। डेमोग्राफिक डिविडेंड उस स्थिति को कहा जाता है जब किसी देश में काम करने की उम्र वाले लोगों की संख्या बच्चों और बुजुर्गों की तुलना में अधिक होती है। ऐसी आबादी को अगर रोजगार और उत्पादक काम से जोड़ा जाए तो आर्थिक विकास की रफ्तार बढ़ सकती है। भारत में इस समय बड़ी संख्या में युवा आबादी है और इसी वजह से इसे आर्थिक अवसर के तौर पर देखा जाता है। भागवत ने इसी ताकत को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए युवाओं में जिम्मेदारी और दूरदृष्टि विकसित करने की बात कही।
अपने संबोधन में भागवत ने भारत के विकास मॉडल को लेकर भी अलग नजरिया रखने की बात कही। उन्होंने कहा कि देश की परिस्थितियां अमेरिका, चीन, ऑस्ट्रेलिया या न्यूजीलैंड जैसी नहीं हैं, इसलिए भारत को अपनी जरूरतों और अपनी सामाजिक परिस्थितियों के आधार पर प्रगति के मानक तय करने चाहिए। उनके मुताबिक किसी दूसरे देश का मॉडल देखकर उसी को विकास का अंतिम पैमाना मान लेना सही तरीका नहीं है। भारत की अपनी परंपरा, सामाजिक संरचना, जरूरतें और चुनौतियां हैं। इन सभी को ध्यान में रखकर विकास की दिशा तय करनी होगी।
उन्होंने युवाओं से देश को सिर्फ आर्थिक आंकड़ों के नजरिए से देखने के बजाय समाज और संस्कृति के व्यापक संदर्भ में समझने की अपील की। भागवत ने कहा कि भारत की अपनी गरिमा और पहचान है और विकास का मतलब केवल ज्यादा उत्पादन या ज्यादा खपत नहीं हो सकता। देश किस तरह का समाज बनाना चाहता है, लोगों के जीवन में किस तरह की गुणवत्ता चाहिए और आने वाली पीढ़ियों के लिए कौन-सी व्यवस्था छोड़ी जानी है, इन सवालों पर भी चर्चा जरूरी है। उन्होंने दुनिया की मौजूदा स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि कई जगहों पर अधूरी सोच और असंतुलित दृष्टिकोण के कारण समस्याएं बढ़ रही हैं। ऐसे माहौल में भारत के पास अपनी सोच और अनुभव के आधार पर दुनिया के सामने अलग रास्ता रखने का अवसर है।
इसके लिए युवाओं को तैयार करना होगा। भागवत ने युवाओं को केवल नौकरी पाने तक सीमित लक्ष्य रखने के बजाय समाज में अपनी भूमिका समझने की बात कही। उनके अनुसार आने वाले समय में तकनीक, अर्थव्यवस्था और सामाजिक बदलाव तेजी से होंगे, ऐसे में नई पीढ़ी को इन बदलावों के साथ खुद को तैयार करना पड़ेगा। नागपुर के इस कार्यक्रम में उन्होंने देश की युवा आबादी को भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण शक्तियों में गिना और कहा कि इसका लाभ तभी मिलेगा, जब युवा अपने वर्तमान फैसलों के दूरगामी असर को समझेंगे। उन्होंने विकास को लेकर भारत के लिए अलग मानक तय करने, अपनी जरूरतों के मुताबिक आगे बढ़ने और दुनिया के सामने संतुलित सोच रखने की जरूरत पर भी जोर दिया। कार्यक्रम में तिरंगे और राष्ट्र से जुड़े विषय के बीच भागवत का संबोधन युवाओं की भूमिका और आने वाली पीढ़ियों की जिम्मेदारी पर केंद्रित रहा।
भागवत बोले- आज का युवा 30 साल बाद बुजुर्ग होगा, भविष्य भी सोचें
भारत
नागपुर में शनिवार को आयोजित ‘हमारा तिरंगा, हमारी शान’ कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने युवाओं से देश के भविष्य को ध्यान में रखकर काम करने की अपील की। उन्होंने कहा कि जो युवा आज देश की सबसे बड़ी ताकत दिखाई दे रहे हैं, वही करीब 30 साल बाद बुजुर्ग हो जाएंगे। ऐसे में सोच सिर्फ वर्तमान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसी व्यवस्था, कैसा समाज और किस तरह का देश छोड़ा जाएगा, इस पर भी युवाओं को विचार करना होगा। भागवत ने युवाओं को भारत का ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ बताते हुए कहा कि बड़ी युवा आबादी देश के लिए अवसर है, लेकिन इसका सही दिशा में इस्तेमाल नहीं हुआ तो यही स्थिति आगे चलकर चुनौती भी बन सकती है।
उनके मुताबिक कामकाजी उम्र की आबादी अगर शिक्षा, कौशल, रोजगार और सही सोच से जुड़ती है तो उसका सीधा फायदा अर्थव्यवस्था और समाज दोनों को मिलता है। कार्यक्रम में उन्होंने युवाओं से सिर्फ व्यक्तिगत सफलता को लक्ष्य नहीं बनाने की बात कही। उनका कहना था कि व्यक्ति की तरक्की जरूरी है, लेकिन समाज और देश की जरूरतों को नजरअंदाज करके विकास को पूरा नहीं माना जा सकता। आज की युवा पीढ़ी के सामने सुविधाएं और अवसर दोनों पहले की तुलना में ज्यादा हैं, इसलिए जिम्मेदारी भी बड़ी है।
भागवत ने युवाओं को यह समझने की जरूरत बताई कि आने वाले दशकों में देश किन चुनौतियों का सामना करेगा और उसके लिए अभी से तैयारी कैसे की जा सकती है। उन्होंने जनसंख्या की संरचना को लेकर भी बात रखी। डेमोग्राफिक डिविडेंड उस स्थिति को कहा जाता है जब किसी देश में काम करने की उम्र वाले लोगों की संख्या बच्चों और बुजुर्गों की तुलना में अधिक होती है। ऐसी आबादी को अगर रोजगार और उत्पादक काम से जोड़ा जाए तो आर्थिक विकास की रफ्तार बढ़ सकती है। भारत में इस समय बड़ी संख्या में युवा आबादी है और इसी वजह से इसे आर्थिक अवसर के तौर पर देखा जाता है। भागवत ने इसी ताकत को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए युवाओं में जिम्मेदारी और दूरदृष्टि विकसित करने की बात कही।
अपने संबोधन में भागवत ने भारत के विकास मॉडल को लेकर भी अलग नजरिया रखने की बात कही। उन्होंने कहा कि देश की परिस्थितियां अमेरिका, चीन, ऑस्ट्रेलिया या न्यूजीलैंड जैसी नहीं हैं, इसलिए भारत को अपनी जरूरतों और अपनी सामाजिक परिस्थितियों के आधार पर प्रगति के मानक तय करने चाहिए। उनके मुताबिक किसी दूसरे देश का मॉडल देखकर उसी को विकास का अंतिम पैमाना मान लेना सही तरीका नहीं है। भारत की अपनी परंपरा, सामाजिक संरचना, जरूरतें और चुनौतियां हैं। इन सभी को ध्यान में रखकर विकास की दिशा तय करनी होगी।
उन्होंने युवाओं से देश को सिर्फ आर्थिक आंकड़ों के नजरिए से देखने के बजाय समाज और संस्कृति के व्यापक संदर्भ में समझने की अपील की। भागवत ने कहा कि भारत की अपनी गरिमा और पहचान है और विकास का मतलब केवल ज्यादा उत्पादन या ज्यादा खपत नहीं हो सकता। देश किस तरह का समाज बनाना चाहता है, लोगों के जीवन में किस तरह की गुणवत्ता चाहिए और आने वाली पीढ़ियों के लिए कौन-सी व्यवस्था छोड़ी जानी है, इन सवालों पर भी चर्चा जरूरी है। उन्होंने दुनिया की मौजूदा स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि कई जगहों पर अधूरी सोच और असंतुलित दृष्टिकोण के कारण समस्याएं बढ़ रही हैं। ऐसे माहौल में भारत के पास अपनी सोच और अनुभव के आधार पर दुनिया के सामने अलग रास्ता रखने का अवसर है।
इसके लिए युवाओं को तैयार करना होगा। भागवत ने युवाओं को केवल नौकरी पाने तक सीमित लक्ष्य रखने के बजाय समाज में अपनी भूमिका समझने की बात कही। उनके अनुसार आने वाले समय में तकनीक, अर्थव्यवस्था और सामाजिक बदलाव तेजी से होंगे, ऐसे में नई पीढ़ी को इन बदलावों के साथ खुद को तैयार करना पड़ेगा। नागपुर के इस कार्यक्रम में उन्होंने देश की युवा आबादी को भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण शक्तियों में गिना और कहा कि इसका लाभ तभी मिलेगा, जब युवा अपने वर्तमान फैसलों के दूरगामी असर को समझेंगे। उन्होंने विकास को लेकर भारत के लिए अलग मानक तय करने, अपनी जरूरतों के मुताबिक आगे बढ़ने और दुनिया के सामने संतुलित सोच रखने की जरूरत पर भी जोर दिया। कार्यक्रम में तिरंगे और राष्ट्र से जुड़े विषय के बीच भागवत का संबोधन युवाओं की भूमिका और आने वाली पीढ़ियों की जिम्मेदारी पर केंद्रित रहा।
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