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DRDO की मिसाइल तकनीक निजी कंपनियों को मिलेगी, सरकार का बड़ा फैसला
Sandeep Patel
रक्षा मंत्रालय ने DRDO की पारंपरिक मिसाइल तकनीक निजी कंपनियों को ट्रांसफर करने की मंजूरी दी है। इससे स्वदेशी रक्षा उत्पादन और MSME भागीदारी बढ़ेगी।
रक्षा मंत्रालय ने पारंपरिक मिसाइल प्रणालियों के लिए DRDO द्वारा विकसित तकनीक निजी कंपनियों को ट्रांसफर करने की मंजूरी दी है। सरकार का लक्ष्य घरेलू रक्षा उत्पादन बढ़ाना, निजी क्षेत्र की भागीदारी मजबूत करना और भारत के रक्षा औद्योगिक आधार का विस्तार करना है। केंद्र सरकार ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित पारंपरिक मिसाइल प्रणालियों की तकनीक भारतीय निजी क्षेत्र को उत्पादन के लिए उपलब्ध कराने का बड़ा फैसला लिया है। रक्षा मंत्रालय ने 25 अगस्त को इसकी घोषणा की। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस तकनीक हस्तांतरण पहल को मंजूरी दी है। इसका उद्देश्य देश में रक्षा उत्पादन की क्षमता बढ़ाने के साथ सरकारी उत्पादन संस्थानों पर निर्भरता कम करना है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इस पहल से भारतीय MSME और तकनीकी साझेदारों के लिए रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में शामिल होने के नए अवसर भी पैदा होंगे।
निजी क्षेत्र को बड़ी भूमिका
नई व्यवस्था के तहत DRDO द्वारा विकसित पारंपरिक मिसाइल तकनीक पात्र निजी रक्षा कंपनियों को तकनीक हस्तांतरण के जरिए उपलब्ध कराई जाएगी। सरकार का मानना है कि निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ने से उत्पादन क्षमता में विस्तार होगा, निवेश को बढ़ावा मिलेगा और रक्षा क्षेत्र में तकनीकी नवाचार तेज होगा। यह फैसला सरकार की उस व्यापक नीति का हिस्सा है, जिसके तहत रक्षा विनिर्माण में भारतीय निजी कंपनियों की भूमिका बढ़ाई जा रही है। इसके साथ ही DRDO जैसी सरकारी संस्थाओं को उत्पादन के बजाय अनुसंधान और विकास पर अधिक ध्यान केंद्रित करने का अवसर मिलेगा।
आकाश, अस्त्र और नाग
रक्षा मंत्रालय ने अभी तक उन मिसाइल प्रणालियों की पूरी सूची सार्वजनिक नहीं की है, जिन्हें नई तकनीक हस्तांतरण व्यवस्था में शामिल किया जाएगा। हालांकि, इस पहल के तहत आकाश सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल, अस्त्र हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल और नाग एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल जैसे स्वदेशी कार्यक्रमों से जुड़ी तकनीकों को शामिल किए जाने की संभावना हो सकती है। इन प्रणालियों ने भारत की स्वदेशी मिसाइल विकास क्षमता को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि, किन तकनीकों का हस्तांतरण होगा, उत्पादन के अधिकार किसे मिलेंगे और कौन-सी कंपनियां पात्र होंगी, यह अलग-अलग तकनीक हस्तांतरण समझौतों और सरकारी मंजूरी पर निर्भर करेगा।
MSME को मिलेगा फायदा
इस पहल का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) की रक्षा उत्पादन में भागीदारी बढ़ाना है। रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि तकनीक हस्तांतरण से भारतीय MSME और अन्य तकनीकी साझेदारों को रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में शामिल होने के अवसर मिलेंगे। छोटी और मध्यम कंपनियों की भागीदारी बढ़ने से रक्षा क्षेत्र में सप्लायर नेटवर्क का विस्तार हो सकता है। इससे कंपोनेंट, इलेक्ट्रॉनिक्स, प्रणोदन से जुड़े सिस्टम और अन्य विशेष रक्षा तकनीकों के क्षेत्र में नई क्षमताएं विकसित होने की संभावना है।
17 अगस्त की पहल से अलग
रक्षा मंत्रालय का यह फैसला 17 अगस्त को DRDO द्वारा शुरू की गई पहल से अलग है। 17 अगस्त को DRDO ने भारतीय निजी कंपनियों को मिसाइल और बम हथियार प्रणालियों से जुड़े विकास एवं उत्पादन प्रोजेक्ट्स में साझेदार बनने के लिए आमंत्रित किया था। यह पहल Missiles and Strategic Systems (MSS) क्लस्टर से जुड़ी थी। दोनों फैसले रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ाने की सरकार की व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं। हालांकि, ताजा फैसला विशेष रूप से DRDO द्वारा विकसित तकनीकों को निजी उद्योग को उत्पादन के लिए उपलब्ध कराने पर केंद्रित है।
निजी कंपनियां पहले से सक्रिय
भारतीय निजी कंपनियां पहले से ही रक्षा और मिसाइल आपूर्ति श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, कल्याणी, लार्सन एंड टुब्रो और भारत फोर्ज जैसी कंपनियां विभिन्न रक्षा कार्यक्रमों के लिए कंपोनेंट और सब-सिस्टम तैयार करती हैं। हालांकि, पूर्ण मिसाइल प्रणालियों के उत्पादन में भारतीय निजी कंपनियों की भूमिका अब तक सीमित रही है। सरकार की नई पहल से घरेलू निजी उद्योग को भविष्य में बड़े और अधिक जटिल उत्पादन कार्य संभालने का अवसर मिल सकता है।
रक्षा निर्यात पर भी नजर
यह कदम भारत को एक प्रमुख रक्षा विनिर्माण और निर्यात केंद्र बनाने की व्यापक सरकारी योजना से भी जुड़ा है। निजी कंपनियों की उत्पादन क्षमता बढ़ने से भारत बड़े पैमाने पर रक्षा प्रणालियों का निर्माण कर सकता है। इससे मित्र देशों को रक्षा उपकरणों के निर्यात के नए अवसर भी बन सकते हैं। सरकार पिछले कुछ वर्षों से घरेलू रक्षा खरीद, निजी निवेश और स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देने वाली नीतियों के जरिए रक्षा उद्योग का विस्तार कर रही है। एक मजबूत औद्योगिक आधार से प्रतिस्पर्धा बढ़ने और कंपनियों के नए तकनीकी क्षेत्रों में निवेश करने की संभावना भी है।
DRDO का फोकस R&D पर
नई नीति सरकारी संस्थानों की भूमिका में व्यापक बदलाव की दिशा में भी संकेत करती है। सरकार चाहती है कि DRDO अनुसंधान, विकास और उन्नत रक्षा तकनीकों पर अधिक ध्यान दे, जबकि निजी कंपनियां बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उत्पादन की जिम्मेदारी संभालें। इसी तरह के बदलाव भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में भी देखने को मिल रहे हैं, जहां निजी कंपनियों को उत्पादन में अधिक भूमिका देने और ISRO को अनुसंधान एवं उन्नत मिशनों पर अधिक केंद्रित करने की दिशा में काम हो रहा है। IN-SPACe के चेयरमैन पवन गोयनका ने हाल में कहा था कि भविष्य में ISRO लॉन्च व्हीकल का निर्माण बंद कर सकता है और इसका उत्पादन धीरे-धीरे निजी क्षेत्र को सौंपा जा सकता है।
आगे क्या होगा
अब अगला महत्वपूर्ण कदम विशिष्ट मिसाइल तकनीकों, पात्र निजी कंपनियों और तकनीक हस्तांतरण की शर्तों की पहचान करना होगा। यदि निजी कंपनियों को परिपक्व DRDO तकनीकों तक पहुंच मिलती है और वे बड़े पैमाने पर पूर्ण प्रणालियों का उत्पादन करने में सक्षम होती हैं, तो इससे भारतीय रक्षा उद्योग में बड़ा बदलाव आ सकता है। DRDO के लिए इसका मतलब अधिक संसाधनों और क्षमता को अनुसंधान एवं विकास की दिशा में लगाने का अवसर होगा। सरकार को उम्मीद है कि इस नीति से घरेलू रक्षा उत्पादन मजबूत होगा, MSME की भागीदारी बढ़ेगी, निजी निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा और भारत की दीर्घकालिक रक्षा निर्यात क्षमता में वृद्धि होगी।
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