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एर्दोगन का इजराइल पर हमला, US-Iran समझौता पटरी से उतारने का आरोप
Digital Desk
तुर्किये के राष्ट्रपति एर्दोगन ने इजराइल पर अमेरिका-ईरान इस्लामाबाद समझौते को पटरी से उतारने और शांति प्रयासों को बाधित करने का आरोप लगाया। जानें पूरा मामला।
मध्य पूर्व में जारी सैन्य तनाव के बीच तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने इजराइल पर तीखा हमला बोला है। एर्दोगन ने आरोप लगाया कि इजराइल ने अपनी “साजिशों और उकसावे” के जरिए अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने की कोशिशों को बाधित किया और जून में हुए 14 सूत्री इस्लामाबाद समझौते को पटरी से उतार दिया।
तुर्किये के राष्ट्रपति ने कहा कि इस युद्ध की कीमत केवल ईरानी जनता या खाड़ी देशों को नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था और उन देशों को भी चुकानी पड़ रही है जो सीधे संघर्ष में शामिल नहीं हैं। एर्दोगन ने तत्काल कूटनीतिक प्रयासों की ओर लौटने की अपील की।
एर्दोगन ने इजराइल को घेरा
राष्ट्रपति कैबिनेट की बैठक के बाद एर्दोगन ने इजराइल के नेतृत्व पर गंभीर आरोप लगाए। उनके कार्यालय की ओर से जारी बयान के मुताबिक, उन्होंने कहा कि इजराइल की कार्रवाइयों ने ईरान, अमेरिका और क्षेत्रीय देशों के बीच तनाव कम करने वाले प्रयासों को कमजोर किया।
एर्दोगन ने दावा किया कि इजराइल के “झूठ और तोड़फोड़ की कार्रवाइयों” ने उस समझौते को नुकसान पहुंचाया था, जिससे पूरे क्षेत्र में तनाव कम होने की उम्मीद बनी थी।
उन्होंने चेतावनी दी कि जब तक शांति की किसी भी संभावना को खतरे के रूप में देखने वाली कठोर मानसिकता में बदलाव नहीं आता, तब तक मध्य पूर्व में संकट का दौर खत्म नहीं होगा।
इस्लामाबाद समझौता क्या था
अमेरिका और ईरान के बीच जून में हुआ 14 सूत्री समझौता तनाव कम करने के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल के रूप में सामने आया था। यह समझौता इस्लामाबाद की मध्यस्थता से आगे बढ़ा था और इसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव को कम करना तथा बातचीत का रास्ता खोलना था।
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, समझौते में तत्काल सैन्य अभियानों को रोकने, जिसमें लेबनान से जुड़े सैन्य अभियान भी शामिल थे, और अगले 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौते की दिशा में काम करने का प्रावधान था।
समझौते में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही, अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी हटाने, ईरान पर प्रतिबंधों में चरणबद्ध राहत और ईरान की जमी हुई संपत्तियों को लेकर भी प्रावधान बताए गए थे।
समझौते में आर्थिक प्रावधान
रिपोर्टों के अनुसार, समझौते में ईरान के लिए अमेरिकी समर्थन से कम से कम 300 अरब डॉलर के आर्थिक विकास कार्यक्रम का प्रावधान भी शामिल था।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का मुद्दा विशेष रूप से महत्वपूर्ण था, क्योंकि यह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार के लिए बेहद अहम मार्ग है। समझौते में इस रास्ते से वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने की व्यवस्था शामिल की गई थी।
हालांकि, यह समझौता लंबे समय तक प्रभावी नहीं रह सका। अगस्त में अमेरिका-ईरान समझौते के समाप्त होने और दोनों पक्षों के बीच फिर तनाव बढ़ने की रिपोर्ट सामने आई थी।
नेतन्याहू ने दी चेतावनी
एर्दोगन के आरोपों के बीच इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान के खिलाफ कड़ा रुख दोहराया है।
रविवार को रोश हशाना के अवसर पर आयोजित सरकारी बैठक में नेतन्याहू ने कहा कि इजराइल अपनी रक्षा करने और अपने दुश्मनों पर हमला करने के लिए दृढ़ है। उन्होंने ईरान को इजराइल पर हमला करने से बचने की चेतावनी भी दी।
इजराइली प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, नेतन्याहू ने दावा किया कि ईरानी सरकार अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है और उसका अंत करीब है। उन्होंने यह भी कहा कि इजराइल के सामने अभी एक और महत्वपूर्ण लक्ष्य पूरा करना बाकी है।
ईरान के भविष्य पर टकराव
एर्दोगन और नेतन्याहू के बयानों से अमेरिका-ईरान संघर्ष को लेकर दोनों पक्षों की सोच में गहरा अंतर दिखाई देता है।
एर्दोगन का जोर कूटनीति, तनाव कम करने और क्षेत्रीय स्थिरता पर है। उन्होंने कहा कि वर्तमान कठोर नीतियों में बदलाव के बिना मध्य पूर्व में स्थायी शांति संभव नहीं होगी।
इसके विपरीत, नेतन्याहू ने ईरानी शासन के कमजोर होने और उसके पतन को लेकर दावा किया है। इससे संकेत मिलता है कि इजराइल और तुर्किये मध्य पूर्व संकट के समाधान को लेकर बिल्कुल अलग रणनीतिक दृष्टिकोण अपना रहे हैं।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर
एर्दोगन ने विशेष रूप से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर युद्ध के प्रभाव को लेकर चिंता जताई। मध्य पूर्व में जारी संघर्ष का असर ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ रहा है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में किसी भी लंबे व्यवधान से वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। यह मार्ग पहले भी अमेरिका-ईरान तनाव के दौरान प्रमुख रणनीतिक मुद्दा बन चुका है।
अगस्त में प्रकाशित विश्लेषण के अनुसार, अमेरिका-ईरान समझौते का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को दोबारा खोलना और वहां वाणिज्यिक आवाजाही सामान्य करना था।
इसलिए समझौते के विफल होने से केवल क्षेत्रीय सुरक्षा ही नहीं, बल्कि ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक व्यापार पर भी दबाव बढ़ने की आशंका है।
तुर्किये की कूटनीतिक भूमिका
तुर्किये लंबे समय से मध्य पूर्व के संघर्षों में कूटनीतिक भूमिका निभाने की कोशिश करता रहा है। एर्दोगन का ताजा बयान भी इसी नीति के अनुरूप दिखाई देता है, जिसमें उन्होंने सैन्य कार्रवाई की जगह बातचीत और तनाव कम करने पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि क्षेत्र में संकट का “तूफान” तब तक शांत नहीं होगा जब तक शांति की संभावना को स्वीकार करने वाली राजनीतिक सोच विकसित नहीं होती।
तुर्किये का यह रुख ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच सैन्य और राजनीतिक तनाव लगातार अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बना हुआ है।
आगे क्या होगा?
एर्दोगन के बयान से स्पष्ट है कि तुर्किये मध्य पूर्व संकट के समाधान के लिए कूटनीतिक रास्ते की वकालत कर रहा है। वहीं इजराइल ईरान के खिलाफ अपने सुरक्षा और सैन्य लक्ष्यों को जारी रखने के संकेत दे रहा है।
आने वाले दिनों में अमेरिका-ईरान संबंध, इजराइल की सैन्य रणनीति, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की स्थिति और किसी नए कूटनीतिक प्रयास पर दुनिया की नजर रहेगी।
यदि अमेरिका और ईरान के बीच दोबारा बातचीत शुरू होती है, तो जून के समझौते में शामिल कुछ मुद्दे भविष्य की वार्ता का आधार बन सकते हैं। लेकिन फिलहाल क्षेत्रीय तनाव और दोनों पक्षों के कड़े बयानों के बीच तत्काल व्यापक शांति की संभावना स्पष्ट नहीं है।
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