पूर्व CDS चौहान ने ट्रंप के सीजफायर दावे पर उठाए सवाल, पूछा- अमेरिका को कैसे पता चला?

Sandeep Patel

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पूर्व CDS जनरल अनिल चौहान ने भारत-पाकिस्तान सीजफायर में अमेरिकी मध्यस्थता के दावे को खारिज किया और पूछा कि आधिकारिक घोषणा से पहले अमेरिका को इसकी जानकारी कैसे मिली।

पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत-पाकिस्तान सीजफायर में अमेरिकी मध्यस्थता के दावे को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि युद्धविराम का फैसला दोनों देशों के सैन्य नेतृत्व के बीच सीधे संवाद से हुआ और सवाल उठाया कि आधिकारिक घोषणा से पहले अमेरिका को इसकी जानकारी कैसे मिली। पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस दावे पर सवाल उठाया है, जिसमें उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच युद्धविराम कराने में अमेरिका की भूमिका का दावा किया था। विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन (VIF) में मंगलवार को आयोजित एक कार्यक्रम में चौहान ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद सैन्य कार्रवाई रोकने का फैसला भारत और पाकिस्तान के डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस (DGMO) के बीच सीधे संवाद के जरिए हुआ था। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि भारत और पाकिस्तान की आधिकारिक घोषणा से पहले अमेरिका को युद्धविराम की जानकारी कैसे मिल गई।

चौहान ने मध्यस्थता नकारी

जनरल चौहान ने कहा कि युद्धविराम तक पहुंचने वाली बातचीत में उन्हें किसी तीसरे पक्ष की भूमिका नजर नहीं आती। उनके अनुसार, दोनों देशों के सैन्य नेतृत्व के बीच स्थापित चैनल के जरिए बातचीत हुई और इसी प्रक्रिया में सैन्य कार्रवाई रोकने का निर्णय लिया गया। चौहान की यह टिप्पणी ट्रंप के उन दावों से अलग है, जिनमें अमेरिकी राष्ट्रपति ने कई बार कहा है कि वॉशिंगटन ने भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष समाप्त कराने में अहम भूमिका निभाई। पूर्व CDS के बयान में भारत-पाकिस्तान के सीधे सैन्य संपर्क को युद्धविराम का मुख्य माध्यम बताया गया है।

10 मई 2025 का घटनाक्रम

चौहान ने 10 मई 2025 के युद्धविराम से पहले की घटनाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि शुरुआत में भारत को पाकिस्तानी समकक्ष से संपर्क स्थापित करने में कठिनाई हुई थी। बाद में दोनों पक्षों के बीच बातचीत हुई और सैन्य कार्रवाई रोकने को लेकर चर्चा आगे बढ़ी। चौहान के अनुसार, अंततः शाम 5 बजे से युद्धविराम लागू करने का निर्णय लिया गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह समझ दोनों देशों के DGMO के बीच बातचीत के जरिए बनी थी। यह बयान ऑपरेशन सिंदूर के अंतिम चरण में इस्तेमाल किए गए सैन्य संचार तंत्र पर महत्वपूर्ण जानकारी देता है।

'अमेरिका को कैसे पता चला?'

चौहान के बयान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा अमेरिकी घोषणा के समय को लेकर उनका सवाल था। उन्होंने पूछा कि जब भारत और पाकिस्तान ने अभी आधिकारिक तौर पर युद्धविराम की घोषणा नहीं की थी, तब अमेरिका को इसकी जानकारी कैसे मिल गई। चौहान ने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास है कि यह जानकारी भारत की ओर से लीक नहीं हुई थी। उन्होंने संभावना जताई कि जानकारी “दूसरी तरफ से लीक” हुई हो सकती है, यानी पाकिस्तान की ओर से। हालांकि, उन्होंने इस बात का कोई प्रमाण पेश नहीं किया कि सूचना वास्तव में पाकिस्तान से ही अमेरिका तक पहुंची थी।

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ट्रंप ने पहले की घोषणा

डोनाल्ड ट्रंप ने भारत और पाकिस्तान के युद्धविराम की घोषणा दोनों देशों की आधिकारिक घोषणाओं से पहले की थी। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर दावा किया था कि भारत और पाकिस्तान ने “पूर्ण और तत्काल युद्धविराम” पर सहमति जताई है। उन्होंने यह भी कहा था कि यह समझौता अमेरिका की मध्यस्थता में हुई “लंबी रात की बातचीत” के बाद हुआ। इसके बाद ट्रंप ने कई बार युद्धविराम में अमेरिकी भूमिका का श्रेय लिया। उन्होंने यह भी दावा किया कि अमेरिकी दबाव और संभावित आर्थिक कदमों, जिसमें टैरिफ का इस्तेमाल भी शामिल था, ने दोनों पक्षों को संघर्ष रोकने के लिए प्रभावित किया।

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भारत ने मध्यस्थता नहीं मानी

भारत का रुख लंबे समय से यह रहा है कि भारत-पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय मुद्दों में तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार नहीं की जाती। नई दिल्ली ने युद्धविराम को अमेरिकी मध्यस्थता का परिणाम बताए जाने के दावे को स्वीकार नहीं किया है। भारत के अनुसार, सैन्य कार्रवाई रोकने की समझ दोनों देशों के बीच सीधे सैन्य संपर्क के जरिए बनी थी। जनरल चौहान का ताजा बयान इसी स्थिति को मजबूत करता है। उन्होंने विशेष रूप से DGMO स्तर पर हुई बातचीत को युद्धविराम का आधार बताया।

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ऑपरेशन सिंदूर की पृष्ठभूमि

ऑपरेशन सिंदूर मई 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़े सैन्य तनाव के बाद शुरू हुआ था। भारत ने इसे पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में की गई सैन्य कार्रवाई बताया था। इसके बाद दोनों देशों के बीच मिसाइल, ड्रोन और तोपखाने से जुड़े हमलों के साथ तनाव तेजी से बढ़ा। कई दिनों तक चले सैन्य टकराव के बाद 10 मई को दोनों देशों ने सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमति जताई। युद्धविराम के बाद भी इस बात पर बहस जारी रही कि संघर्ष को रोकने में भारत-पाकिस्तान के सैन्य संपर्क के अलावा बाहरी देशों की क्या भूमिका थी।

अमेरिका की भूमिका पर विवाद

युद्धविराम का श्रेय किसे जाता है, यह मुद्दा भारत और अमेरिका के बीच व्यापक कूटनीतिक चर्चा का हिस्सा रहा है। ट्रंप ने अमेरिका की भूमिका को प्रमुखता दी है, जबकि भारत ने लगातार द्विपक्षीय प्रक्रिया पर जोर दिया है। यह अंतर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नई दिल्ली लंबे समय से भारत-पाकिस्तान विवादों में बाहरी मध्यस्थता का विरोध करती रही है। चौहान का बयान इसी संवेदनशील मुद्दे पर सैन्य दृष्टिकोण को सामने लाता है।

सूचना लीक का सवाल

चौहान के बयान ने सैन्य अभियानों के दौरान संवेदनशील सूचनाओं की सुरक्षा पर भी सवाल खड़ा किया है। यदि किसी युद्धविराम समझौते की जानकारी आधिकारिक घोषणा से पहले किसी बाहरी सरकार तक पहुंची थी, तो यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि सूचना किस माध्यम से साझा हुई। हालांकि, चौहान ने केवल यह संभावना जताई कि सूचना दूसरी तरफ से लीक हुई हो सकती है। उन्होंने इसके स्रोत की पुष्टि नहीं की है। इसलिए यह दावा फिलहाल अप्रमाणित है और किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए आगे आधिकारिक जानकारी या अन्य प्रमाण की जरूरत होगी।

आगे क्या होगा

जनरल चौहान की टिप्पणियों से भारत-पाकिस्तान युद्धविराम में अमेरिकी भूमिका को लेकर बहस फिर तेज हो सकती है। पूर्व CDS ने स्पष्ट किया कि उनके अनुसार सैन्य कार्रवाई रोकने का निर्णय दोनों देशों के DGMO के बीच बातचीत से हुआ था और उन्हें इसमें किसी तीसरे पक्ष की भूमिका नजर नहीं आती। वहीं, आधिकारिक घोषणा से पहले अमेरिका को जानकारी मिलने का सवाल अभी भी अनुत्तरित है। ऑपरेशन सिंदूर से जुड़े रणनीतिक सबक, भारत-पाकिस्तान सैन्य संबंध और भविष्य में संकट के दौरान संचार तंत्र आने वाले समय में भी चर्चा के प्रमुख विषय बने रह सकते हैं।

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