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भारतीय फोटोग्राफर गौरव पाटिल ने जीता वैश्विक मैंग्रोव फोटोग्राफी अवॉर्ड, 'घोस्ट नेट' संकट पर दुनिया का ध्यान खींचा
Digital Desk
मुंबई के पास मैंग्रोव में फंसे परित्यक्त मछली पकड़ने के जाल की अनोखी तस्वीर को मिला अंतरराष्ट्रीय सम्मान, समुद्री प्रदूषण और मैंग्रोव संरक्षण का मजबूत संदेश।
भारतीय समुद्री जीवविज्ञानी और वन्यजीव फोटोग्राफर गौरव पाटिल ने प्रतिष्ठित मैंग्रोव फोटोग्राफर ऑफ द ईयर 2026 का खिताब जीतकर देश का नाम वैश्विक स्तर पर रोशन किया है। उनकी पुरस्कार विजेता तस्वीर ने न केवल कला और फोटोग्राफी की दुनिया में पहचान बनाई, बल्कि समुद्री पर्यावरण के सामने खड़े एक गंभीर खतरे 'घोस्ट नेट' यानी परित्यक्त मछली पकड़ने वाले जाल की समस्या को भी दुनिया के सामने प्रभावी ढंग से रखा है।

गौरव पाटिल की विजेता तस्वीर महाराष्ट्र के मुंबई के दक्षिण में स्थित नांदगांव गांव के मैंग्रोव क्षेत्र में खींची गई थी। इस तस्वीर का शीर्षक "Tangled Glow: When Life Meets the Ruins" रखा गया है। इसमें मैंग्रोव के बीच फंसा एक पुराना मछली पकड़ने का जाल अल्ट्रावायलेट रोशनी और 13 सेकंड के लंबे एक्सपोजर के जरिए बेहद अलग और प्रभावशाली रूप में दिखाई देता है। यह तस्वीर देखने में जितनी आकर्षक है, उतनी ही गंभीर पर्यावरणीय संदेश भी देती है। गौरव पाटिल पहले समुद्री जीवविज्ञानी के रूप में काम कर चुके हैं। बाद में उन्होंने संरक्षण फोटोग्राफी को अपना माध्यम बनाया ताकि प्रकृति और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को आम लोगों तक प्रभावी तरीके से पहुंचाया जा सके। उनका मानना है कि केवल आंकड़ों और रिपोर्टों से ज्यादा असर एक ऐसी तस्वीर छोड़ सकती है, जो लोगों को सोचने पर मजबूर कर दे। उन्होंने बताया कि भारत के समुद्री तटीय इलाकों में मैंग्रोव जंगलों के बीच बड़ी संख्या में मछली पकड़ने वाले पुराने और छोड़े गए जाल फंस जाते हैं। समय के साथ ये जाल छोटे-छोटे माइक्रोप्लास्टिक कणों में बदलते रहते हैं, जिससे समुद्री जीवों, पक्षियों, केकड़ों, कछुओं और मैंग्रोव की जड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचता है। कई बार ये जाल वर्षों तक वहीं पड़े रहते हैं और लगातार पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते रहते हैं।

'घोस्ट नेट' समुद्री प्रदूषण की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक माने जाते हैं। ये ऐसे मछली पकड़ने वाले जाल होते हैं, जिन्हें समुद्र में छोड़ दिया जाता है या जो किसी कारणवश खो जाते हैं। ये जाल लंबे समय तक समुद्र और तटीय इलाकों में पड़े रहते हैं तथा बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के लगातार मछलियों और अन्य जीवों को फंसाते रहते हैं। इस प्रक्रिया को 'घोस्ट फिशिंग' कहा जाता है। इससे समुद्री जैव विविधता पर गंभीर प्रभाव पड़ता है और स्थानीय मछुआरों की आजीविका भी प्रभावित होती है। हर साल दुनिया भर के समुद्रों में लगभग पांच लाख से दस लाख टन तक मछली पकड़ने के उपकरण छोड़े जाते हैं। इनमें सबसे अधिक संख्या जालों की होती है। यही कारण है कि घोस्ट नेट आज वैश्विक स्तर पर समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण का प्रमुख स्रोत बन चुके हैं। भारत मैंग्रोव जैव विविधता के लिहाज से दुनिया के महत्वपूर्ण देशों में शामिल है। देश में लगभग पांच हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में मैंग्रोव वन फैले हुए हैं। विश्व के सबसे बड़े मैंग्रोव क्षेत्र सुंदरबन का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा भारत में स्थित है। मैंग्रोव तटीय क्षेत्रों को समुद्री कटाव से बचाने, चक्रवातों के प्रभाव को कम करने, कार्बन अवशोषण बढ़ाने और समुद्री जीवों के लिए सुरक्षित आवास उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

हालांकि बढ़ता शहरीकरण, तटीय विकास परियोजनाएं, प्लास्टिक प्रदूषण, समुद्र के बढ़ते जलस्तर और परित्यक्त मछली पकड़ने वाले जाल इन पारिस्थितिक तंत्रों के लिए लगातार चुनौती बन रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते इन समस्याओं पर नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में मैंग्रोव वनों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। मैंग्रोव फोटोग्राफी अवॉर्ड का आयोजन पिछले 12 वर्षों से किया जा रहा है। इस वर्ष प्रतियोगिता में दुनिया भर से पांच हजार से अधिक तस्वीरें भेजी गईं। विभिन्न देशों के फोटोग्राफरों ने मैंग्रोव पारिस्थितिकी, वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरणीय चुनौतियों से जुड़ी शानदार तस्वीरें प्रस्तुत कीं। प्रतियोगिता का उद्देश्य फोटोग्राफी के माध्यम से लोगों को मैंग्रोव संरक्षण के प्रति जागरूक करना और वैश्विक स्तर पर संरक्षण प्रयासों को बढ़ावा देना है। इस वर्ष अन्य विजेता तस्वीरों में भारत के सुंदरबन में जंगल कैट के शावक, रॉयल बंगाल टाइगर, अमेरिका में बॉटलनोज डॉल्फिन, अफ्रीका के गाम्बिया में नाइल मॉनिटर छिपकली और इंडोनेशिया में सामुदायिक मैंग्रोव संरक्षण जैसे विषय शामिल रहे। इन सभी तस्वीरों ने प्राकृतिक विरासत और जैव विविधता के संरक्षण की आवश्यकता को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।
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पर्यावरण संरक्षण केवल पेड़ लगाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। मैंग्रोव जैसे संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए प्राकृतिक जल प्रवाह को बनाए रखना, प्लास्टिक प्रदूषण पर नियंत्रण, घोस्ट नेट हटाने के अभियान और स्थानीय समुदायों की भागीदारी बेहद जरूरी है। गौरव पाटिल की यह उपलब्धि न केवल भारतीय फोटोग्राफी जगत के लिए गर्व का विषय है, बल्कि यह भी साबित करती है कि एक प्रभावशाली तस्वीर वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में जनजागरूकता बढ़ाने का मजबूत माध्यम बन सकती है। उनकी यह तस्वीर दुनिया को याद दिलाती है कि समुद्र और मैंग्रोव जैसे अनमोल प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए सामूहिक प्रयास समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
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भारतीय फोटोग्राफर गौरव पाटिल ने जीता वैश्विक मैंग्रोव फोटोग्राफी अवॉर्ड, 'घोस्ट नेट' संकट पर दुनिया का ध्यान खींचा
Digital Desk
भारतीय समुद्री जीवविज्ञानी और वन्यजीव फोटोग्राफर गौरव पाटिल ने प्रतिष्ठित मैंग्रोव फोटोग्राफर ऑफ द ईयर 2026 का खिताब जीतकर देश का नाम वैश्विक स्तर पर रोशन किया है। उनकी पुरस्कार विजेता तस्वीर ने न केवल कला और फोटोग्राफी की दुनिया में पहचान बनाई, बल्कि समुद्री पर्यावरण के सामने खड़े एक गंभीर खतरे 'घोस्ट नेट' यानी परित्यक्त मछली पकड़ने वाले जाल की समस्या को भी दुनिया के सामने प्रभावी ढंग से रखा है।

गौरव पाटिल की विजेता तस्वीर महाराष्ट्र के मुंबई के दक्षिण में स्थित नांदगांव गांव के मैंग्रोव क्षेत्र में खींची गई थी। इस तस्वीर का शीर्षक "Tangled Glow: When Life Meets the Ruins" रखा गया है। इसमें मैंग्रोव के बीच फंसा एक पुराना मछली पकड़ने का जाल अल्ट्रावायलेट रोशनी और 13 सेकंड के लंबे एक्सपोजर के जरिए बेहद अलग और प्रभावशाली रूप में दिखाई देता है। यह तस्वीर देखने में जितनी आकर्षक है, उतनी ही गंभीर पर्यावरणीय संदेश भी देती है। गौरव पाटिल पहले समुद्री जीवविज्ञानी के रूप में काम कर चुके हैं। बाद में उन्होंने संरक्षण फोटोग्राफी को अपना माध्यम बनाया ताकि प्रकृति और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को आम लोगों तक प्रभावी तरीके से पहुंचाया जा सके। उनका मानना है कि केवल आंकड़ों और रिपोर्टों से ज्यादा असर एक ऐसी तस्वीर छोड़ सकती है, जो लोगों को सोचने पर मजबूर कर दे। उन्होंने बताया कि भारत के समुद्री तटीय इलाकों में मैंग्रोव जंगलों के बीच बड़ी संख्या में मछली पकड़ने वाले पुराने और छोड़े गए जाल फंस जाते हैं। समय के साथ ये जाल छोटे-छोटे माइक्रोप्लास्टिक कणों में बदलते रहते हैं, जिससे समुद्री जीवों, पक्षियों, केकड़ों, कछुओं और मैंग्रोव की जड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचता है। कई बार ये जाल वर्षों तक वहीं पड़े रहते हैं और लगातार पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते रहते हैं।

'घोस्ट नेट' समुद्री प्रदूषण की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक माने जाते हैं। ये ऐसे मछली पकड़ने वाले जाल होते हैं, जिन्हें समुद्र में छोड़ दिया जाता है या जो किसी कारणवश खो जाते हैं। ये जाल लंबे समय तक समुद्र और तटीय इलाकों में पड़े रहते हैं तथा बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के लगातार मछलियों और अन्य जीवों को फंसाते रहते हैं। इस प्रक्रिया को 'घोस्ट फिशिंग' कहा जाता है। इससे समुद्री जैव विविधता पर गंभीर प्रभाव पड़ता है और स्थानीय मछुआरों की आजीविका भी प्रभावित होती है। हर साल दुनिया भर के समुद्रों में लगभग पांच लाख से दस लाख टन तक मछली पकड़ने के उपकरण छोड़े जाते हैं। इनमें सबसे अधिक संख्या जालों की होती है। यही कारण है कि घोस्ट नेट आज वैश्विक स्तर पर समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण का प्रमुख स्रोत बन चुके हैं। भारत मैंग्रोव जैव विविधता के लिहाज से दुनिया के महत्वपूर्ण देशों में शामिल है। देश में लगभग पांच हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में मैंग्रोव वन फैले हुए हैं। विश्व के सबसे बड़े मैंग्रोव क्षेत्र सुंदरबन का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा भारत में स्थित है। मैंग्रोव तटीय क्षेत्रों को समुद्री कटाव से बचाने, चक्रवातों के प्रभाव को कम करने, कार्बन अवशोषण बढ़ाने और समुद्री जीवों के लिए सुरक्षित आवास उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

हालांकि बढ़ता शहरीकरण, तटीय विकास परियोजनाएं, प्लास्टिक प्रदूषण, समुद्र के बढ़ते जलस्तर और परित्यक्त मछली पकड़ने वाले जाल इन पारिस्थितिक तंत्रों के लिए लगातार चुनौती बन रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते इन समस्याओं पर नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में मैंग्रोव वनों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। मैंग्रोव फोटोग्राफी अवॉर्ड का आयोजन पिछले 12 वर्षों से किया जा रहा है। इस वर्ष प्रतियोगिता में दुनिया भर से पांच हजार से अधिक तस्वीरें भेजी गईं। विभिन्न देशों के फोटोग्राफरों ने मैंग्रोव पारिस्थितिकी, वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरणीय चुनौतियों से जुड़ी शानदार तस्वीरें प्रस्तुत कीं। प्रतियोगिता का उद्देश्य फोटोग्राफी के माध्यम से लोगों को मैंग्रोव संरक्षण के प्रति जागरूक करना और वैश्विक स्तर पर संरक्षण प्रयासों को बढ़ावा देना है। इस वर्ष अन्य विजेता तस्वीरों में भारत के सुंदरबन में जंगल कैट के शावक, रॉयल बंगाल टाइगर, अमेरिका में बॉटलनोज डॉल्फिन, अफ्रीका के गाम्बिया में नाइल मॉनिटर छिपकली और इंडोनेशिया में सामुदायिक मैंग्रोव संरक्षण जैसे विषय शामिल रहे। इन सभी तस्वीरों ने प्राकृतिक विरासत और जैव विविधता के संरक्षण की आवश्यकता को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।
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पर्यावरण संरक्षण केवल पेड़ लगाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। मैंग्रोव जैसे संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए प्राकृतिक जल प्रवाह को बनाए रखना, प्लास्टिक प्रदूषण पर नियंत्रण, घोस्ट नेट हटाने के अभियान और स्थानीय समुदायों की भागीदारी बेहद जरूरी है। गौरव पाटिल की यह उपलब्धि न केवल भारतीय फोटोग्राफी जगत के लिए गर्व का विषय है, बल्कि यह भी साबित करती है कि एक प्रभावशाली तस्वीर वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में जनजागरूकता बढ़ाने का मजबूत माध्यम बन सकती है। उनकी यह तस्वीर दुनिया को याद दिलाती है कि समुद्र और मैंग्रोव जैसे अनमोल प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए सामूहिक प्रयास समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
