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झारखंड में JSSC-CGL रद्द, छात्रों की मांग मानी गई लेकिन पेच बाकी
भारत
24 दिन के आंदोलन के बाद हेमंत सोरेन सरकार ने परीक्षा और TDPL से जुड़ी भर्तियां रद्द कीं, लेकिन CBI जांच और चयनित अभ्यर्थियों की नौकरी पर सवाल कायम
रांची में सरकारी नौकरी की भर्ती परीक्षाओं को लेकर 24 दिन से चल रहा छात्रों का आंदोलन सोमवार देर रात एक बड़े फैसले के बाद बदल गया। झारखंड सरकार ने JSSC-CGL 2024 परीक्षा रद्द करने का ऐलान किया। साथ ही आउटसोर्स एजेंसी TSR Data Processing Pvt Ltd यानी TDPL के जरिए 2014 से अब तक कराई गई भर्ती परीक्षाओं, उनके नतीजों और उनसे जुड़ी नियुक्तियों को भी रद्द करने का फैसला लिया गया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक के बाद यह घोषणा की गई। रांची में धरना दे रहे छात्रों ने फैसले को अपनी बड़ी जीत बताया। छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो ने 16 दिन से चल रही भूख हड़ताल भी खत्म कर दी। लेकिन आंदोलन पूरी तरह खत्म हो गया है, ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगी। वजह है CBI जांच की मांग, जिसे सरकार ने स्वीकार नहीं किया है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि परीक्षा रद्द होना एक मुद्दा है और कथित गड़बड़ी की स्वतंत्र जांच दूसरा। दोनों को एक जैसा नहीं माना जा सकता।
सरकार ने सिर्फ JSSC-CGL को रद्द करने का फैसला नहीं किया है। TDPL से जुड़ी पुरानी भर्ती परीक्षाओं को भी जांच के दायरे में लाया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा है कि 2014 के बाद हुई प्रक्रियाओं में सामने आने वाली गड़बड़ियों की पड़ताल की जाएगी। भर्ती व्यवस्था में सुधार के लिए वरिष्ठ IAS अधिकारी अमिताभ कौशल की अध्यक्षता में एक परीक्षा सुधार समिति बनाने की बात भी कही गई है। सरकार की तरफ से चल रही जांच में CID और दूसरी राज्य स्तरीय एजेंसियां पहले से अलग-अलग पहलुओं को देख रही हैं। हाल के दिनों में JSSC कार्यालय पर CID की कार्रवाई और अधिकारियों से पूछताछ भी हुई है। इसी जांच के दौरान परीक्षा संचालन से जुड़ी कुछ जानकारियां सामने आने की बात कही गई है। सरकार का कहना है कि जांच में जो तथ्य सामने आएंगे, उनके आधार पर जिम्मेदारी तय की जाएगी। मगर प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि पूरा मामला CBI को सौंपा जाए। यही बिंदु अब सबसे ज्यादा खिंच रहा है।
JSSC-CGL को लेकर विवाद का असर उन अभ्यर्थियों पर भी पड़ा है, जिन्होंने परीक्षा पास करके सरकारी नौकरी हासिल कर ली है। अलग-अलग रिपोर्टों के मुताबिक करीब 2 हजार चयनित अभ्यर्थी इस फैसले से सीधे प्रभावित हो सकते हैं। सरकार ने परीक्षा और उससे जुड़े परिणामों को रद्द करने का निर्णय लिया है, लेकिन पहले से नियुक्त लोगों की नौकरी और उनकी आगे की स्थिति को लेकर तस्वीर अभी साफ नहीं है। फैसला सामने आने के बाद कुछ चयनित कर्मचारी और अभ्यर्थी भी विरोध में उतर आए। उनका कहना है कि अगर किसी स्तर पर गड़बड़ी हुई है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जाए, लेकिन जिन उम्मीदवारों ने परीक्षा देकर चयन हासिल किया, उन्हें उसकी सजा क्यों मिले। अब इनके सामने दोबारा परीक्षा देने, उम्र सीमा, नौकरी की निरंतरता और पुरानी नियुक्ति की वैधता जैसे सवाल हैं। सरकार को इन सवालों पर अलग से रास्ता बताना होगा।
यहीं से यह मामला NEET विवाद से अलग दिखता है। NEET एक राष्ट्रीय स्तर की मेडिकल प्रवेश परीक्षा है, जबकि झारखंड का विवाद राज्य की सरकारी नौकरियों की भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा है। यहां एक परीक्षा के पेपर या रिजल्ट से आगे बढ़कर उस एजेंसी की भूमिका पर सवाल है, जिसे कई भर्ती परीक्षाओं के संचालन का काम मिला था। सरकार ने TDPL से जुड़ी 2014 के बाद की परीक्षाओं तक जांच और कार्रवाई का दायरा बढ़ाया है। यानी विवाद का असर एक बैच या एक भर्ती तक सीमित नहीं है। जिन परीक्षाओं में TDPL की भूमिका रही, उनके परिणाम और नियुक्तियां भी अब सवालों के घेरे में आ सकती हैं। इसी वजह से कई अभ्यर्थियों के लिए सरकार का फैसला राहत के बजाय नई चिंता लेकर आया है। कुछ लोगों ने वर्षों की तैयारी के बाद नौकरी हासिल की थी और अब उन्हें यह पता नहीं कि उनकी स्थिति आगे क्या होगी।
छात्र आंदोलन की बात करें तो रांची में यह प्रदर्शन जुलाई के आखिरी हफ्ते में तेज हुआ था। मोरहाबादी के बापू वाटिका इलाके में अभ्यर्थियों ने धरना शुरू किया और धीरे-धीरे आंदोलन बड़ा होता गया। परीक्षा में कथित अनियमितताओं, भर्ती प्रक्रिया और JPSC-JSSC की कार्यप्रणाली को लेकर छात्रों ने कई मांगें रखीं। बातचीत के कई दौर हुए, लेकिन शुरुआत में कोई ऐसा फैसला नहीं आया जिससे प्रदर्शनकारी पीछे हटते। आंदोलन के दौरान भूख हड़ताल भी शुरू हुई। देवेंद्र नाथ महतो 16 दिनों तक अनशन पर रहे। सरकार के ताजा फैसले के बाद उन्होंने अस्पताल में अनशन खत्म किया। प्रदर्शन स्थल पर छात्रों ने नारे लगाए और इसे लंबे संघर्ष की सफलता बताया। हालांकि कुछ संगठनों ने साफ किया कि CBI जांच की मांग पूरी होने तक उनकी आपत्ति बनी रहेगी।
सरकार ने भर्ती व्यवस्था में सुधार की बात तो कही है, लेकिन आगे की प्रक्रिया को लेकर कई चीजें अभी बाकी हैं। JSSC-CGL दोबारा कब होगी, नया पेपर और नई चयन प्रक्रिया किस तरीके से होगी, पहले से चयनित उम्मीदवारों को क्या राहत मिलेगी और TDPL की दूसरी परीक्षाओं में शामिल अभ्यर्थियों के साथ क्या होगा, इन सवालों पर विस्तृत व्यवस्था का इंतजार है। दूसरी तरफ जांच का दायरा 2014 तक ले जाने की घोषणा ने पुराने मामलों को भी फिर से चर्चा में ला दिया है। जिन परीक्षाओं के परिणाम पहले जारी हो चुके हैं और जिनसे नियुक्तियां हो चुकी हैं, उनका रिकॉर्ड खंगाला जाएगा या नहीं, इसमें भी कई स्तर के सवाल हैं। सरकार ने परीक्षा सुधार समिति बनाकर व्यवस्था बदलने का संकेत दिया है, जबकि छात्र संगठनों का जोर जांच की एजेंसी पर है। रांची में आंदोलन के एक हिस्से ने सरकार के फैसले को स्वीकार किया है, लेकिन CBI जांच को लेकर विरोध अभी पूरी तरह थमा नहीं है।
इस पूरे विवाद में अब एक तरफ वे छात्र हैं, जिन्होंने परीक्षा रद्द कराने के लिए सड़क पर लंबा आंदोलन किया, और दूसरी तरफ वे अभ्यर्थी हैं, जिनका चयन इसी परीक्षा के जरिए हुआ था। दोनों की स्थिति बिल्कुल अलग है। पहले समूह के लिए परीक्षा रद्द होना मांग पूरी होने जैसा है, जबकि दूसरे समूह के लिए यही फैसला नौकरी बचाने की लड़ाई बन गया है। सरकार के फैसले के बाद अब जांच, नई भर्ती प्रक्रिया और मौजूदा नियुक्तियों को लेकर अलग-अलग स्तर पर कार्रवाई की जरूरत होगी। CBI जांच की मांग पर सरकार का रुख फिलहाल नहीं बदला है और इसी वजह से आंदोलन से जुड़े संगठनों में आगे की रणनीति को लेकर चर्चा चल रही है।
झारखंड में JSSC-CGL रद्द, छात्रों की मांग मानी गई लेकिन पेच बाकी
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रांची में सरकारी नौकरी की भर्ती परीक्षाओं को लेकर 24 दिन से चल रहा छात्रों का आंदोलन सोमवार देर रात एक बड़े फैसले के बाद बदल गया। झारखंड सरकार ने JSSC-CGL 2024 परीक्षा रद्द करने का ऐलान किया। साथ ही आउटसोर्स एजेंसी TSR Data Processing Pvt Ltd यानी TDPL के जरिए 2014 से अब तक कराई गई भर्ती परीक्षाओं, उनके नतीजों और उनसे जुड़ी नियुक्तियों को भी रद्द करने का फैसला लिया गया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक के बाद यह घोषणा की गई। रांची में धरना दे रहे छात्रों ने फैसले को अपनी बड़ी जीत बताया। छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो ने 16 दिन से चल रही भूख हड़ताल भी खत्म कर दी। लेकिन आंदोलन पूरी तरह खत्म हो गया है, ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगी। वजह है CBI जांच की मांग, जिसे सरकार ने स्वीकार नहीं किया है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि परीक्षा रद्द होना एक मुद्दा है और कथित गड़बड़ी की स्वतंत्र जांच दूसरा। दोनों को एक जैसा नहीं माना जा सकता।
सरकार ने सिर्फ JSSC-CGL को रद्द करने का फैसला नहीं किया है। TDPL से जुड़ी पुरानी भर्ती परीक्षाओं को भी जांच के दायरे में लाया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा है कि 2014 के बाद हुई प्रक्रियाओं में सामने आने वाली गड़बड़ियों की पड़ताल की जाएगी। भर्ती व्यवस्था में सुधार के लिए वरिष्ठ IAS अधिकारी अमिताभ कौशल की अध्यक्षता में एक परीक्षा सुधार समिति बनाने की बात भी कही गई है। सरकार की तरफ से चल रही जांच में CID और दूसरी राज्य स्तरीय एजेंसियां पहले से अलग-अलग पहलुओं को देख रही हैं। हाल के दिनों में JSSC कार्यालय पर CID की कार्रवाई और अधिकारियों से पूछताछ भी हुई है। इसी जांच के दौरान परीक्षा संचालन से जुड़ी कुछ जानकारियां सामने आने की बात कही गई है। सरकार का कहना है कि जांच में जो तथ्य सामने आएंगे, उनके आधार पर जिम्मेदारी तय की जाएगी। मगर प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि पूरा मामला CBI को सौंपा जाए। यही बिंदु अब सबसे ज्यादा खिंच रहा है।
JSSC-CGL को लेकर विवाद का असर उन अभ्यर्थियों पर भी पड़ा है, जिन्होंने परीक्षा पास करके सरकारी नौकरी हासिल कर ली है। अलग-अलग रिपोर्टों के मुताबिक करीब 2 हजार चयनित अभ्यर्थी इस फैसले से सीधे प्रभावित हो सकते हैं। सरकार ने परीक्षा और उससे जुड़े परिणामों को रद्द करने का निर्णय लिया है, लेकिन पहले से नियुक्त लोगों की नौकरी और उनकी आगे की स्थिति को लेकर तस्वीर अभी साफ नहीं है। फैसला सामने आने के बाद कुछ चयनित कर्मचारी और अभ्यर्थी भी विरोध में उतर आए। उनका कहना है कि अगर किसी स्तर पर गड़बड़ी हुई है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जाए, लेकिन जिन उम्मीदवारों ने परीक्षा देकर चयन हासिल किया, उन्हें उसकी सजा क्यों मिले। अब इनके सामने दोबारा परीक्षा देने, उम्र सीमा, नौकरी की निरंतरता और पुरानी नियुक्ति की वैधता जैसे सवाल हैं। सरकार को इन सवालों पर अलग से रास्ता बताना होगा।
यहीं से यह मामला NEET विवाद से अलग दिखता है। NEET एक राष्ट्रीय स्तर की मेडिकल प्रवेश परीक्षा है, जबकि झारखंड का विवाद राज्य की सरकारी नौकरियों की भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा है। यहां एक परीक्षा के पेपर या रिजल्ट से आगे बढ़कर उस एजेंसी की भूमिका पर सवाल है, जिसे कई भर्ती परीक्षाओं के संचालन का काम मिला था। सरकार ने TDPL से जुड़ी 2014 के बाद की परीक्षाओं तक जांच और कार्रवाई का दायरा बढ़ाया है। यानी विवाद का असर एक बैच या एक भर्ती तक सीमित नहीं है। जिन परीक्षाओं में TDPL की भूमिका रही, उनके परिणाम और नियुक्तियां भी अब सवालों के घेरे में आ सकती हैं। इसी वजह से कई अभ्यर्थियों के लिए सरकार का फैसला राहत के बजाय नई चिंता लेकर आया है। कुछ लोगों ने वर्षों की तैयारी के बाद नौकरी हासिल की थी और अब उन्हें यह पता नहीं कि उनकी स्थिति आगे क्या होगी।
छात्र आंदोलन की बात करें तो रांची में यह प्रदर्शन जुलाई के आखिरी हफ्ते में तेज हुआ था। मोरहाबादी के बापू वाटिका इलाके में अभ्यर्थियों ने धरना शुरू किया और धीरे-धीरे आंदोलन बड़ा होता गया। परीक्षा में कथित अनियमितताओं, भर्ती प्रक्रिया और JPSC-JSSC की कार्यप्रणाली को लेकर छात्रों ने कई मांगें रखीं। बातचीत के कई दौर हुए, लेकिन शुरुआत में कोई ऐसा फैसला नहीं आया जिससे प्रदर्शनकारी पीछे हटते। आंदोलन के दौरान भूख हड़ताल भी शुरू हुई। देवेंद्र नाथ महतो 16 दिनों तक अनशन पर रहे। सरकार के ताजा फैसले के बाद उन्होंने अस्पताल में अनशन खत्म किया। प्रदर्शन स्थल पर छात्रों ने नारे लगाए और इसे लंबे संघर्ष की सफलता बताया। हालांकि कुछ संगठनों ने साफ किया कि CBI जांच की मांग पूरी होने तक उनकी आपत्ति बनी रहेगी।
सरकार ने भर्ती व्यवस्था में सुधार की बात तो कही है, लेकिन आगे की प्रक्रिया को लेकर कई चीजें अभी बाकी हैं। JSSC-CGL दोबारा कब होगी, नया पेपर और नई चयन प्रक्रिया किस तरीके से होगी, पहले से चयनित उम्मीदवारों को क्या राहत मिलेगी और TDPL की दूसरी परीक्षाओं में शामिल अभ्यर्थियों के साथ क्या होगा, इन सवालों पर विस्तृत व्यवस्था का इंतजार है। दूसरी तरफ जांच का दायरा 2014 तक ले जाने की घोषणा ने पुराने मामलों को भी फिर से चर्चा में ला दिया है। जिन परीक्षाओं के परिणाम पहले जारी हो चुके हैं और जिनसे नियुक्तियां हो चुकी हैं, उनका रिकॉर्ड खंगाला जाएगा या नहीं, इसमें भी कई स्तर के सवाल हैं। सरकार ने परीक्षा सुधार समिति बनाकर व्यवस्था बदलने का संकेत दिया है, जबकि छात्र संगठनों का जोर जांच की एजेंसी पर है। रांची में आंदोलन के एक हिस्से ने सरकार के फैसले को स्वीकार किया है, लेकिन CBI जांच को लेकर विरोध अभी पूरी तरह थमा नहीं है।
इस पूरे विवाद में अब एक तरफ वे छात्र हैं, जिन्होंने परीक्षा रद्द कराने के लिए सड़क पर लंबा आंदोलन किया, और दूसरी तरफ वे अभ्यर्थी हैं, जिनका चयन इसी परीक्षा के जरिए हुआ था। दोनों की स्थिति बिल्कुल अलग है। पहले समूह के लिए परीक्षा रद्द होना मांग पूरी होने जैसा है, जबकि दूसरे समूह के लिए यही फैसला नौकरी बचाने की लड़ाई बन गया है। सरकार के फैसले के बाद अब जांच, नई भर्ती प्रक्रिया और मौजूदा नियुक्तियों को लेकर अलग-अलग स्तर पर कार्रवाई की जरूरत होगी। CBI जांच की मांग पर सरकार का रुख फिलहाल नहीं बदला है और इसी वजह से आंदोलन से जुड़े संगठनों में आगे की रणनीति को लेकर चर्चा चल रही है।
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