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पुणे नगर निगम चुनाव से पहले अनोखा विवाद: शिवसेना नेता पर प्रतिद्वंद्वी का नामांकन फॉर्म निगलने का आरोप
नेशनल न्यूज
वार्ड कार्यालय में हंगामा, पुलिस ने दर्ज किया मामला; 15 जनवरी को होने हैं नगर निकाय चुनाव
महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव से ठीक पहले पुणे में एक असाधारण और गंभीर घटना सामने आई है। शिवसेना (शिंदे गुट) के एक उम्मीदवार पर आरोप है कि उसने पार्टी के ही दूसरे प्रत्याशी का अधिकृत नामांकन दस्तावेज फाड़कर निगल लिया। यह घटना बुधवार को धनकवड़ी–सहकारनगर वार्ड कार्यालय में हुई, जिसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
पुलिस के अनुसार, वार्ड नंबर 34 से शिवसेना के दो इच्छुक उम्मीदवारों—उद्धव कांबले और मच्छिंद्र धवले—को पार्टी की ओर से A और B फॉर्म जारी किए गए थे। ये फॉर्म किसी भी राजनीतिक दल द्वारा अपने अधिकृत प्रत्याशी को चुनाव में उतारने के लिए अनिवार्य दस्तावेज होते हैं। इसी को लेकर दोनों के बीच वार्ड कार्यालय में बहस हुई, जो देखते ही देखते हिंसक और अव्यवस्थित हो गई।
आरोप है कि विवाद के दौरान उद्धव कांबले ने मच्छिंद्र धवले का A-B फॉर्म छीना, उसे फाड़ दिया और उसके टुकड़े निगल लिए। मौके पर मौजूद कर्मचारियों और अन्य प्रत्याशियों ने घटना की सूचना पुलिस को दी। इसके बाद भारती विद्यापीठ पुलिस थाने में कांबले के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं में केस दर्ज किया गया।
घटना के बाद कांबले कुछ समय तक फरार रहे, लेकिन बाद में वे स्वयं पार्टी पदाधिकारियों के साथ थाने पहुंचे। पुलिस के सामने उन्होंने दावा किया कि वे ही पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार हैं और उन्हें वैध रूप से A-B फॉर्म दिया गया था। हालांकि, पुलिस ने उनके दावे की पुष्टि न होने तक उन्हें हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी है।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि निगले गए दस्तावेजों की पुष्टि और घटना की परिस्थितियों की जांच की जा रही है। वार्ड कार्यालय में मौजूद लोगों के बयान दर्ज किए जा रहे हैं और सीसीटीवी फुटेज भी खंगाले जा रहे हैं। चुनाव आयोग को भी इस मामले की जानकारी दी गई है, क्योंकि यह सीधे तौर पर चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता से जुड़ा मामला है।
महाराष्ट्र में 29 नगर निगमों के चुनाव 15 जनवरी को प्रस्तावित हैं, जबकि मतगणना 16 जनवरी को होगी। नामांकन की प्रक्रिया 30 दिसंबर को समाप्त हो चुकी है और 2 जनवरी नामांकन वापस लेने की अंतिम तारीख है। ऐसे में यह घटना चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक दलों के भीतर बढ़ते तनाव और टिकट वितरण को लेकर चल रही खींचतान को उजागर करती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं न केवल पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाती हैं, बल्कि स्थानीय स्तर पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े करती हैं। फिलहाल, पुलिस जांच के नतीजों और चुनाव आयोग के रुख पर सभी की नजरें टिकी हैं।
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