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पीएम मोदी ने क्यों की 1 साल तक सोना न खररदने की अपील? समझें वजह
नेशनल डेस्क
पीएम मोदी की एक साल सोना न खरीदने की अपील पर चर्चा तेज। जानें गोल्ड आयात, फॉरेक्स रिजर्व और आर्थिक असर का पूरा गणित।
देश में सोने की खरीद को लेकर हाल ही में एक नई बहस शुरू हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को कहा कि देशवासियों से एक साल तक सोना नहीं खरीदने की अपील की गई है। इसके साथ ही उन्होंने अनावश्यक विदेश यात्रा टालने की भी बात की। यह अपील ऐसे समय में आई है जब वैश्विक स्तर पर टेंशन, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और आर्थिक अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। ऐसा माना जा रहा है कि इस संदेश का उद्देश्य देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम करना और आर्थिक स्थिरता को बनाए रखना है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए सोने का आयात महंगा साबित हो रहा है। देश में सोने की मांग बहुत ज्यादा है, लेकिन इसकी पूर्ति मुख्य रूप से विदेशों से आयात के जरिए होती है। जब भारत सोना खरीदता है, तो उसे डॉलर में भुगतान करना पड़ता है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर सीधा असर पड़ता है। यही वजह है कि सोने की कीमतों और आयात में वृद्धि के साथ देश का इंपोर्ट बिल भी तेजी से बढ़ता है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने हालात को और भी कठिन बना दिया है, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इससे डॉलर की निकासी बढ़ती है और फॉरेन एक्सचेंज पर दबाव आता है।
सूत्रों की माने तो पीएम की अपील को देशभक्ति और स्वदेशी भावना से जोड़ने की कोशिश की गई है। उन्होंने लोगों से ऊर्जा की बचत, पब्लिक ट्रांसपोर्ट का अधिक उपयोग, वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा देने और स्वदेशी उत्पादों को अपनाने की सलाह दी है। आर्थिक जानकार मानते हैं कि अगर देश में सोने की खपत कुछ कम होती है, तो इससे ट्रेड बैलेंस को सुधारने में मदद मिल सकती है और रुपये की स्थिति भी मज़बूत हो सकती है। लेकिन यह भी सच है कि भारत में सोना सिर्फ एक निवेश नहीं है, बल्कि इसका सांस्कृतिक और पारंपरिक महत्व भी है, इसलिए किसी भी बदलाव का सीधा असर आम लोगों की आदतों पर पड़ेगा।
फिलहाल फॉरेक्स रिजर्व की स्थिति पूरी तरह से चिंताजनक नहीं है। मार्च 2026 तक के अनुमानित आंकड़ों के अनुसार, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 691 अरब डॉलर के स्तर पर है, जो कई महीनों के आयात को कवर करने के लिए पर्याप्त माना जाता है। इसके अलावा, रिपोर्ट्स से यह भी पता चला है कि रिजर्व में सोने का हिस्सा धीरे-धीरे बढ़ रहा है, जो निवेश रणनीति में बदलाव का संकेत देता है। सितंबर 2025 की तुलना में इसमें वृद्धि हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में भारत के लिए आयात और खर्च दोनों पर संतुलन बनाए रखना ज़रूरी है, ताकि लंबे समय में आर्थिक स्थिरता बनी रह सके।
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पीएम मोदी ने क्यों की 1 साल तक सोना न खररदने की अपील? समझें वजह
नेशनल डेस्क
देश में सोने की खरीद को लेकर हाल ही में एक नई बहस शुरू हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को कहा कि देशवासियों से एक साल तक सोना नहीं खरीदने की अपील की गई है। इसके साथ ही उन्होंने अनावश्यक विदेश यात्रा टालने की भी बात की। यह अपील ऐसे समय में आई है जब वैश्विक स्तर पर टेंशन, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और आर्थिक अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। ऐसा माना जा रहा है कि इस संदेश का उद्देश्य देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम करना और आर्थिक स्थिरता को बनाए रखना है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए सोने का आयात महंगा साबित हो रहा है। देश में सोने की मांग बहुत ज्यादा है, लेकिन इसकी पूर्ति मुख्य रूप से विदेशों से आयात के जरिए होती है। जब भारत सोना खरीदता है, तो उसे डॉलर में भुगतान करना पड़ता है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर सीधा असर पड़ता है। यही वजह है कि सोने की कीमतों और आयात में वृद्धि के साथ देश का इंपोर्ट बिल भी तेजी से बढ़ता है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने हालात को और भी कठिन बना दिया है, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इससे डॉलर की निकासी बढ़ती है और फॉरेन एक्सचेंज पर दबाव आता है।
सूत्रों की माने तो पीएम की अपील को देशभक्ति और स्वदेशी भावना से जोड़ने की कोशिश की गई है। उन्होंने लोगों से ऊर्जा की बचत, पब्लिक ट्रांसपोर्ट का अधिक उपयोग, वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा देने और स्वदेशी उत्पादों को अपनाने की सलाह दी है। आर्थिक जानकार मानते हैं कि अगर देश में सोने की खपत कुछ कम होती है, तो इससे ट्रेड बैलेंस को सुधारने में मदद मिल सकती है और रुपये की स्थिति भी मज़बूत हो सकती है। लेकिन यह भी सच है कि भारत में सोना सिर्फ एक निवेश नहीं है, बल्कि इसका सांस्कृतिक और पारंपरिक महत्व भी है, इसलिए किसी भी बदलाव का सीधा असर आम लोगों की आदतों पर पड़ेगा।
फिलहाल फॉरेक्स रिजर्व की स्थिति पूरी तरह से चिंताजनक नहीं है। मार्च 2026 तक के अनुमानित आंकड़ों के अनुसार, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 691 अरब डॉलर के स्तर पर है, जो कई महीनों के आयात को कवर करने के लिए पर्याप्त माना जाता है। इसके अलावा, रिपोर्ट्स से यह भी पता चला है कि रिजर्व में सोने का हिस्सा धीरे-धीरे बढ़ रहा है, जो निवेश रणनीति में बदलाव का संकेत देता है। सितंबर 2025 की तुलना में इसमें वृद्धि हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में भारत के लिए आयात और खर्च दोनों पर संतुलन बनाए रखना ज़रूरी है, ताकि लंबे समय में आर्थिक स्थिरता बनी रह सके।
