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क्या डिजिटल टूलकिट छात्र आंदोलनों को सरकार-विरोधी अभियान में बदल रहे हैं?
Ajay Jasra
साज़िश की कहानियों को अक्सर लोगों का वहम या कल्पना कहकर खारिज कर दिया जाता है। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि हर साज़िश झूठ नहीं होती। कई बार जो बातें शुरुआत में अफवाह लगती हैं, बाद में सच साबित हो जाती हैं। इसलिए किसी भी बात को आँख बंद करके मान लेना या पूरी तरह नकार देना, दोनों ही गलत हो सकते हैं।
इसी संदर्भ में एक सवाल उठता है।
क्या यह संभव है कि कुछ छात्र आंदोलन पूरी तरह वैसे न हों जैसे वे ऊपर से दिखाई देते हैं?
यह सवाल छात्रों की नीयत या उनकी परेशानियों पर शक करने के लिए नहीं है। पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में धांधली, एडमिशन में गड़बड़ियाँ और सरकारी नौकरियों में देरी जैसे मुद्दे करोड़ों युवाओं के भविष्य से जुड़े हैं। जब किसी छात्र की सालों की मेहनत एक पेपर लीक की वजह से बर्बाद हो जाती है, तो उसका गुस्सा स्वाभाविक है। जब भर्ती परीक्षा रद्द होती है या परिणामों पर सवाल उठते हैं, तो विरोध होना भी लोकतंत्र का हिस्सा है।
लेकिन क्या यह भी संभव है कि छात्रों के इसी असली गुस्से और नाराज़गी को कुछ संगठित राजनीतिक और डिजिटल नेटवर्क अपने बड़े राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल कर रहे हों?
हाल के समय में जिस तथाकथित " दक्षिण भारत की एक पार्टी के डिजिटल मॉडल" की चर्चा हुई है, उसने इस सवाल को और दिलचस्प बना दिया है। मीडिया और राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि इस मॉडल के तहत लगभग 34,000 व्हाट्सएप ग्रुप, कई टेलीग्राम चैनल, हजारों इन्फ्लुएंसर और एक मजबूत तकनीकी नेटवर्क मिलकर काम कर रहे थे। दावा किया गया कि 4,000 से अधिक पेड इन्फ्लुएंसर और लगभग 14,000 पार्ट-टाइम इन्फ्लुएंसर विभिन्न मुद्दों पर सोशल मीडिया का माहौल बनाने में सक्रिय थे।
बताया जाता है कि इसके पीछे डेटा साइंटिस्ट, AI आधारित कंटेंट जनरेशन सिस्टम, सेंटिमेंट एनालिसिस डैशबोर्ड और हजारों डिजिटल समुदायों को एक साथ संचालित करने वाली तकनीक मौजूद थी।
अगर इन दावों में सच्चाई है, तो यह केवल सोशल मीडिया एक्टिविज्म नहीं है। यह लोगों की सोच, भावनाओं और सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित करने की एक बेहद संगठित व्यवस्था है।
AI हर दिन सैकड़ों पोस्ट, वीडियो स्क्रिप्ट, मीम, ग्राफिक्स और संदेश तैयार कर सकता है। इन्फ्लुएंसर उन्हें अलग-अलग रूपों में लोगों तक पहुँचाते हैं। डेटा एनालिस्ट लगातार देखते हैं कि कौन-सा संदेश सबसे ज्यादा असर डाल रहा है और उसी हिसाब से नई रणनीति बनाई जाती है।
ऐसी स्थिति में एक बड़ा सवाल उठता है।

अगर इतनी बड़ी डिजिटल मशीनरी मौजूद है, तो उसका इस्तेमाल सिर्फ चुनावों तक ही सीमित क्यों रहता है?
राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक हो जाता है। लाखों छात्र प्रभावित होते हैं। अभिभावक परेशान हैं। मीडिया में बहस शुरू हो जाती है। शुरुआत में यह पूरी तरह एक छात्र और शिक्षा से जुड़ा मुद्दा होता है। छात्र पूछते हैं कि पेपर किसने लीक किया? कौन अधिकारी जिम्मेदार हैं? दोषियों को कब सजा मिलेगी? आगे ऐसी घटनाएँ रोकने के लिए क्या सुधार होंगे?
लेकिन फिर अचानक सोशल मीडिया पर एक अलग तरह का नैरेटिव दिखाई देने लगता है। हजारों अकाउंट एक जैसी भाषा में पोस्ट करने लगते हैं। कुछ हैशटैग ट्रेंड करने लगते हैं। भावनात्मक वीडियो वायरल होते हैं। हर घटना को एक बड़े राजनीतिक निष्कर्ष से जोड़ा जाने लगता है।
धीरे-धीरे चर्चा का केंद्र बदल जाता है।
पेपर लीक से ज्यादा चर्चा सरकार की वैधता पर होने लगती है। परीक्षा सुधारों से ज्यादा चर्चा राजनीतिक बदलाव पर होने लगती है। समस्या के समाधान से ज्यादा ध्यान गुस्से को बनाए रखने पर दिखाई देता है।
यहीं सबसे गंभीर सवाल पैदा होता है।
क्या लक्ष्य वास्तव में समस्या का समाधान है, या फिर समस्या को लगातार जिंदा रखना? क्योंकि एक बार समस्या का समाधान हो जाए, तो आंदोलन की ऊर्जा कम हो जाती है। लेकिन अगर नाराज़गी लगातार बनी रहे, तो उससे राजनीतिक लाभ उठाने की संभावनाएँ भी बनी रहती हैं।
यह बात केवल किसी एक राजनीतिक दल या विचारधारा पर लागू नहीं होती। दुनिया भर में राजनीतिक दल, एक्टिविस्ट समूह और दबाव समूह सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए करते हैं।
असल चिंता यह नहीं है कि कौन ऐसा कर रहा है।
असल चिंता यह है कि क्या आम नागरिकों को पता है कि वे जो देख रहे हैं, वह पूरी तरह स्वाभाविक जनभावना है या किसी संगठित डिजिटल नेटवर्क द्वारा उसे बढ़ाया जा रहा है।
छात्रों को यह जानने का अधिकार है कि उनके मुद्दे को समर्थन मिल रहा है या उसका राजनीतिक इस्तेमाल किया जा रहा है।
यह सवाल उठाना “लोकतांत्रिक विरोध है” का विरोध नहीं है।
बल्कि यह सुनिश्चित करने की कोशिश है कि असली मुद्दा कहीं खो न जाए।
अगर किसी परीक्षा में गड़बड़ी हुई है, तो चर्चा का केंद्र परीक्षा व्यवस्था को ठीक करना होना चाहिए। अगर भर्ती प्रक्रिया में भ्रष्टाचार हुआ है, तो दोषियों को पकड़ने और व्यवस्था सुधारने की मांग सबसे आगे होनी चाहिए।
लेकिन जब हर मुद्दा अंततः केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन की बहस में बदल जाता है, तो यह पूछना स्वाभाविक है कि क्या कहीं न कहीं मूल समस्या पीछे छूट रही है।
आज AI, डेटा एनालिटिक्स, इन्फ्लुएंसर नेटवर्क और डिजिटल कमांड सिस्टम के दौर में जनमत को प्रभावित करना पहले से कहीं आसान हो गया है। ऐसे में नागरिकों, मीडिया और छात्रों—सभी को अधिक सतर्क रहने की जरूरत है।
आखिरकार किसी भी आंदोलन की सफलता केवल उसके गुस्से से नहीं मापी जानी चाहिए। उसकी सफलता इस बात से मापी जानी चाहिए कि वह समस्या का समाधान खोजने में कितना गंभीर है।
और शायद सबसे महत्वपूर्ण सवाल आज भी वही है -
अगर चिंता वास्तव में छात्रों के भविष्य की है, तो फिर बहस का केंद्र परीक्षा व्यवस्था को सुधारना क्यों नहीं है? समाधान पर उतनी ऊर्जा क्यों नहीं दिखाई देती, जितनी राजनीतिक टकराव पैदा करने में दिखाई देती है?
इस सवाल का जवाब तलाशना जरूरी है। क्योंकि लोकतंत्र में विरोध भी जरूरी है और सुधार भी। लेकिन जब विरोध समाधान से बड़ा हो जाए, तब यह देखना जरूरी हो जाता है कि आंदोलन का असली लाभ किसे मिल रहा है - छात्रों को या राजनीति को।
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क्या डिजिटल टूलकिट छात्र आंदोलनों को सरकार-विरोधी अभियान में बदल रहे हैं?
Ajay Jasra
साज़िश की कहानियों को अक्सर लोगों का वहम या कल्पना कहकर खारिज कर दिया जाता है। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि हर साज़िश झूठ नहीं होती। कई बार जो बातें शुरुआत में अफवाह लगती हैं, बाद में सच साबित हो जाती हैं। इसलिए किसी भी बात को आँख बंद करके मान लेना या पूरी तरह नकार देना, दोनों ही गलत हो सकते हैं।
इसी संदर्भ में एक सवाल उठता है।
क्या यह संभव है कि कुछ छात्र आंदोलन पूरी तरह वैसे न हों जैसे वे ऊपर से दिखाई देते हैं?
यह सवाल छात्रों की नीयत या उनकी परेशानियों पर शक करने के लिए नहीं है। पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में धांधली, एडमिशन में गड़बड़ियाँ और सरकारी नौकरियों में देरी जैसे मुद्दे करोड़ों युवाओं के भविष्य से जुड़े हैं। जब किसी छात्र की सालों की मेहनत एक पेपर लीक की वजह से बर्बाद हो जाती है, तो उसका गुस्सा स्वाभाविक है। जब भर्ती परीक्षा रद्द होती है या परिणामों पर सवाल उठते हैं, तो विरोध होना भी लोकतंत्र का हिस्सा है।
लेकिन क्या यह भी संभव है कि छात्रों के इसी असली गुस्से और नाराज़गी को कुछ संगठित राजनीतिक और डिजिटल नेटवर्क अपने बड़े राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल कर रहे हों?
हाल के समय में जिस तथाकथित " दक्षिण भारत की एक पार्टी के डिजिटल मॉडल" की चर्चा हुई है, उसने इस सवाल को और दिलचस्प बना दिया है। मीडिया और राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि इस मॉडल के तहत लगभग 34,000 व्हाट्सएप ग्रुप, कई टेलीग्राम चैनल, हजारों इन्फ्लुएंसर और एक मजबूत तकनीकी नेटवर्क मिलकर काम कर रहे थे। दावा किया गया कि 4,000 से अधिक पेड इन्फ्लुएंसर और लगभग 14,000 पार्ट-टाइम इन्फ्लुएंसर विभिन्न मुद्दों पर सोशल मीडिया का माहौल बनाने में सक्रिय थे।
बताया जाता है कि इसके पीछे डेटा साइंटिस्ट, AI आधारित कंटेंट जनरेशन सिस्टम, सेंटिमेंट एनालिसिस डैशबोर्ड और हजारों डिजिटल समुदायों को एक साथ संचालित करने वाली तकनीक मौजूद थी।
अगर इन दावों में सच्चाई है, तो यह केवल सोशल मीडिया एक्टिविज्म नहीं है। यह लोगों की सोच, भावनाओं और सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित करने की एक बेहद संगठित व्यवस्था है।
AI हर दिन सैकड़ों पोस्ट, वीडियो स्क्रिप्ट, मीम, ग्राफिक्स और संदेश तैयार कर सकता है। इन्फ्लुएंसर उन्हें अलग-अलग रूपों में लोगों तक पहुँचाते हैं। डेटा एनालिस्ट लगातार देखते हैं कि कौन-सा संदेश सबसे ज्यादा असर डाल रहा है और उसी हिसाब से नई रणनीति बनाई जाती है।
ऐसी स्थिति में एक बड़ा सवाल उठता है।

अगर इतनी बड़ी डिजिटल मशीनरी मौजूद है, तो उसका इस्तेमाल सिर्फ चुनावों तक ही सीमित क्यों रहता है?
राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक हो जाता है। लाखों छात्र प्रभावित होते हैं। अभिभावक परेशान हैं। मीडिया में बहस शुरू हो जाती है। शुरुआत में यह पूरी तरह एक छात्र और शिक्षा से जुड़ा मुद्दा होता है। छात्र पूछते हैं कि पेपर किसने लीक किया? कौन अधिकारी जिम्मेदार हैं? दोषियों को कब सजा मिलेगी? आगे ऐसी घटनाएँ रोकने के लिए क्या सुधार होंगे?
लेकिन फिर अचानक सोशल मीडिया पर एक अलग तरह का नैरेटिव दिखाई देने लगता है। हजारों अकाउंट एक जैसी भाषा में पोस्ट करने लगते हैं। कुछ हैशटैग ट्रेंड करने लगते हैं। भावनात्मक वीडियो वायरल होते हैं। हर घटना को एक बड़े राजनीतिक निष्कर्ष से जोड़ा जाने लगता है।
धीरे-धीरे चर्चा का केंद्र बदल जाता है।
पेपर लीक से ज्यादा चर्चा सरकार की वैधता पर होने लगती है। परीक्षा सुधारों से ज्यादा चर्चा राजनीतिक बदलाव पर होने लगती है। समस्या के समाधान से ज्यादा ध्यान गुस्से को बनाए रखने पर दिखाई देता है।
यहीं सबसे गंभीर सवाल पैदा होता है।
क्या लक्ष्य वास्तव में समस्या का समाधान है, या फिर समस्या को लगातार जिंदा रखना? क्योंकि एक बार समस्या का समाधान हो जाए, तो आंदोलन की ऊर्जा कम हो जाती है। लेकिन अगर नाराज़गी लगातार बनी रहे, तो उससे राजनीतिक लाभ उठाने की संभावनाएँ भी बनी रहती हैं।
यह बात केवल किसी एक राजनीतिक दल या विचारधारा पर लागू नहीं होती। दुनिया भर में राजनीतिक दल, एक्टिविस्ट समूह और दबाव समूह सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए करते हैं।
असल चिंता यह नहीं है कि कौन ऐसा कर रहा है।
असल चिंता यह है कि क्या आम नागरिकों को पता है कि वे जो देख रहे हैं, वह पूरी तरह स्वाभाविक जनभावना है या किसी संगठित डिजिटल नेटवर्क द्वारा उसे बढ़ाया जा रहा है।
छात्रों को यह जानने का अधिकार है कि उनके मुद्दे को समर्थन मिल रहा है या उसका राजनीतिक इस्तेमाल किया जा रहा है।
यह सवाल उठाना “लोकतांत्रिक विरोध है” का विरोध नहीं है।
बल्कि यह सुनिश्चित करने की कोशिश है कि असली मुद्दा कहीं खो न जाए।
अगर किसी परीक्षा में गड़बड़ी हुई है, तो चर्चा का केंद्र परीक्षा व्यवस्था को ठीक करना होना चाहिए। अगर भर्ती प्रक्रिया में भ्रष्टाचार हुआ है, तो दोषियों को पकड़ने और व्यवस्था सुधारने की मांग सबसे आगे होनी चाहिए।
लेकिन जब हर मुद्दा अंततः केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन की बहस में बदल जाता है, तो यह पूछना स्वाभाविक है कि क्या कहीं न कहीं मूल समस्या पीछे छूट रही है।
आज AI, डेटा एनालिटिक्स, इन्फ्लुएंसर नेटवर्क और डिजिटल कमांड सिस्टम के दौर में जनमत को प्रभावित करना पहले से कहीं आसान हो गया है। ऐसे में नागरिकों, मीडिया और छात्रों—सभी को अधिक सतर्क रहने की जरूरत है।
आखिरकार किसी भी आंदोलन की सफलता केवल उसके गुस्से से नहीं मापी जानी चाहिए। उसकी सफलता इस बात से मापी जानी चाहिए कि वह समस्या का समाधान खोजने में कितना गंभीर है।
और शायद सबसे महत्वपूर्ण सवाल आज भी वही है -
अगर चिंता वास्तव में छात्रों के भविष्य की है, तो फिर बहस का केंद्र परीक्षा व्यवस्था को सुधारना क्यों नहीं है? समाधान पर उतनी ऊर्जा क्यों नहीं दिखाई देती, जितनी राजनीतिक टकराव पैदा करने में दिखाई देती है?
इस सवाल का जवाब तलाशना जरूरी है। क्योंकि लोकतंत्र में विरोध भी जरूरी है और सुधार भी। लेकिन जब विरोध समाधान से बड़ा हो जाए, तब यह देखना जरूरी हो जाता है कि आंदोलन का असली लाभ किसे मिल रहा है - छात्रों को या राजनीति को।
